Thursday, October 9, 2014

मॉल तो गरीब आदमी को चिढ़ाते हैं कि देख बे...! 

(अभिनेता ओमपुरी से खास बातचीत)

- मुहम्मद जाकिर हुसैन


व्यवस्था के खिलाफ अपनी फिल्मों में उन्होंने शुरूआती दौर में जो आक्रोश दिखाया था, आज भी वैसा ही तेवर उनमें मौजूद है। फिल्म अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता ओम पुरी आज भी मानते हैं कि व्यवस्था बदलने के लिए जन आंदोलन बेहद जरुरी है। 
पर्यावरण जैसे मुद्दे पर वह ‘निर्भया’ जैसे बड़े आंदोलन के हिमायती हैं। 4-5 अक्टूबर को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर हुए वाइल्ड लाइफ फिल्म फेस्टिवल शिरकत करने ओम पुरी खास तौर पर  आए थे।
 दो दिन के व्यस्त कार्यक्रम के बाद फुरसत पाते ही ओमपुरी ने बातचीत  के लिए वक्त निकाला। इस दौरान उन्होंने साफगोई के साथ बहुत कुछ अपनी कही और कुछ आज के मुद्दों पर बात की। उनसे हुई बातचीत सवाल-जवाब की शक्ल में।



रायपुर में एक मुलाक़ात ओम पुरी के साथ
0 तीन अलग-अलग दशक में हुआ तीन दौरा...अब तक छत्तीसगढ़  को किस तरह बदलता  हुआ पाते हैं आप? 

00 मैं तीन दशक में तीन बार यहां आया। 1981 में तो ‘सद्गति’ शूटिंग के लिए हम लोग ट्रेन से आए थे। तब छत्तीसगढ़ के गांव में जाने का मौका मिला था। उसके बाद 2007 में आया तो एयरपोर्ट पर उतरा। 
इस बार भी एयरपोर्ट से होटल और शहर तक चौड़ी-चौड़ी सड़कें बन चुकी हैं और चारों तरफ  शहर फैल चुका है। कई बड़े होटल बन गए हैं। शहर ने काफी ग्रो किया है। बिल्डिंगें बन गईं और मॉल भी तन गए। 

0 मतलब बिल्डिंग और शॉपिंग मॉल अब तरक्की का पैमाना है..? 

00 नहीं ऐसा नहीं है....मुझे बहुत गर्व नहीं होता इस मॉल कल्चर पर। मॉल तो गरीब आदमी को  चिढ़ाते हैं कि देख..बे...! 
 
0 छत्तीसगढ़ के श्रमिक नेता स्व.शंकर गुहा नियोगी से आप प्रभावित रहे हैं। उन्हें कैसे याद करते हैं? 
00 हां, उनसे वाकिफ था मैं। सोते वक्त उन्हें खिड़की से फायर कर मारा गया। मुझे खबर लगी तो बहुत तकलीफ हुई थी। मजदूरों के लिए बहुत काम किया था उन्होंने। आज उनके संगठन का क्या हाल है, मुझे नहीं पता। 
 
0 छत्तीसगढ़ में ‘सद्गति’ की शूटिंग का दौर कैसे याद करते हैं आप? 
00 बहुत सी यादें हैं। हमारे डायरेक्टर सत्यजीत रे साहब के साथ मैं, स्मिता पाटिल, मोहन अगाशे , गीता सिद्धार्थ सहित पूरी यूनिट रायपुर में जयस्तंभ चौक के एक होटल में रुके थे। होटल से लगा एक सिनेमा हॉल था, जहां उस वक्त ‘एक दूजे के लिए’ फिल्म लगी हुई थी। 
रोज सुबह 7 बजे हम लोग महासमुंद के लिए रवाना हो जाते थे। महासमुंद बड़ी शांत जगह है। मुझे याद है एक गांव था जहां हमनें लगातार 20 दिन तक शूटिंग की, बड़े अच्छे से काम हुआ। रोज शूटिंग पूरी कर शाम 7 बजे तक हम लोग होटल लौटते थे। थकान इतनी होती थी कि खाना खाते ही नींद आ जाती थी लेकिन सिनेमा हॉल में चल रही पिक्चर की आवाज मेरे कमरे की दीवारों और खिड़कियों से टकराती रहती थी। 
एक दिन रे साहब ने छुट्टी दी तो मैनें राज टॉकीज में जाकर वह फिल्म देखी। (इस बातचीत के दौरान मौजूद रहे वरिष्ठ पत्रकार सुदीप ठाकुर ने जब इस दौरान बताया कि बात राज टॉकीज और होटल मयूरा की हो रही है तो ओमपुरी को भी तुरंत याद आ गया और बोल पड़े-हां मयूरा होटल थी वो)
 
0 छत्तीसगढ़ की लोकेशन पर ‘सद्गति’ फिल्म का आधार क्या था? 
00 देखिए, मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘सद्गति’ गांव को केंद्र में रख कर लिखी थी। उसमें छत्तीसगढ़ की जगह यूपी-बिहार का भी गांव होता तो भी दिक्कत नहीं होती। 
वो फिल्म तो किसी भी गांव की लोकेशन पर बनाई जा सकती थी। मुझे जहां तक याद आ रहा है, सत्यजीत रे साहब कलकत्ते से अपने किसी परिचित के बुलावे पर यहां लोकेशन देखने आए थे और मुंबई-हावड़ा ट्रेन रूट पर सीधा रास्ता होने की वजह से लोकेशन उन्हे जंच गई थी। बस इतनी सी बात है। मुझे सत्यजीत रे साहब ने ‘आक्रोश’ में देखने के बाद  ‘सद्गति’ के लिए साइन किया था।
  फिर इसमें छत्तीसगढ़ के बहुत से कलाकारों ने भी काम किया। मेरी बेटी धनिया का किरदार निभाने वाली ऋचा मिश्रा की आज भी मुझे याद है। छोटी सी बच्ची थी वो..अब तो बड़ी हो गई है।
 
0 जंगल और गांव की लोकेशन पर आपने बहुत सी फिल्में की है। यह संयोग था या फिर आपकी पसंद..? 
00 संयोग ही कह सकते हैं क्योंकि उस दौर में तो जैसी फिल्में मिली, हमें करनी ही थी। वैसे निजी तौर पर कुदरत के करीब रहना मुझे ज्यादा पसंद है। कुछ चेहरा-मोहरा भी वैसा ही है कि शुरूआती दौर में फिल्म बनाने वाले भी मुझे लेकर जंगल, गांव या दलित से जुड़े मुद्दे पर ही फिल्म बनाना चाहते थे। इसमें कई बार धोखे भी हुए। 
1978 की बात है, एक सज्जन रस्किन बांड की कहानी ‘द लास्ट टाइगर’ पर फिल्म बनाना चाहते थे। मुझे, टॉम आल्टर और एक नए चेहरे नरेश सूरी को उन्होंने लिया। स्क्रिप्ट शायद प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी लिख रहे थे। हमारी 10 लोगों की टीम को वो सज्जन संथाल परगना (आज के झारखंड) में जंगल के अंदर 25 किमी दूर एक गांव में ले गए।
 वहां दो कमरे के एक कच्चे मकान में उन्होंने मुझे ठहरा दिया। अंदर जाकर देखता हूं तो उपर छत ही नहीं है। नीचे खटिया बिछाने जा रहा हूं तो पास से एक सांप रेंगते हुए आगे बढ़ रहा है। 
खैर, रात किसी तरह कटी लेकिन, सुबह वो जनाब खुद ही गायब हो गए। दोपहर तक हम लोगों ने इंतजार किया लेकिन जब वो नहीं आए तो हम लोगों ने 25 किमी पैदल सफर तय कर सर्किट हाउस तक पहुंचे और उस पूरी फिल्म के प्रोजेक्ट से ही तौबा कर ली। 
 
0 फिल्मों की शूटिंग के जरिए जंगलों और गांवों को कितना देख या समझ   पाए? 
00 फिल्में ही क्यों। जब भी मौका मिलता है मैं जंगल और गांव ही जाना पसंद करता हूं। अपने देश के ज्यादातर रिजर्व फारेस्ट में जा चुका हूं। अपने करियर के शुरूआती दौर में 1977 में किसी डाक्यूमेंट्री फिल्म के लिए बस्तर के किसी गांव में भी आया था। 
एक आदिवासी के झोपड़े के बाहर...चांदनी रात में खुला आसमान..क्या अद्भुत दृश्य था मैं बता नहीं सकता। मुझे लगा यही तो जन्नत है। पत्ते के बने दोने में छक कर महुआ पिया। मुझे तो महुआ चढ़ गया था। 
 
0 पर्यावरण को बचाने भारतीय फिल्म जगत अपना योगदान कैसे दे सकता है? 
00 हमारा फिल्म जगत तो फिल्में ही बना सकता है। प्रकाश झा ने ‘चक्रव्यूह’ बनाई थी नक्सल मूवमेंट के बारे में। ऐसे ही पर्यावरण पर भी बड़े पैमाने पर फिल्म बनाई जा सकती है।
 जिसमें शिकारी, फारेस्ट गार्ड, भ्रष्ट नेता, उद्योग जगत और समाज के दूसरे किरदार शामिल किए जा सकते हैं। क्योंकि हमारे जंगल इन्हीं तत्वों के गठजोड़ से बरबाद हो रहे हैं। ऐसी फिल्में जरुर बनाई जानी चाहिए, जिससे समाज में और ज्यादा जागरुकता आए। 
 
0...लेकिन बड़े बजट की फिल्में तो दूर की बात है। फिलहाल तो पर्यावरण को लेकर जो डाक्यूमेंट्री बनती है, उन्हें दर्शक नसीब ही नहीं होते? 
00 हमारे डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर तो अच्छे मन और बड़े पैशन के साथ डाक्यूमेंट्री बनाते हैं। सच है कि दर्शक इन्हें मिलते नहीं। इसलिए सबसे पहले तो हमारे नेताओं को ऐसी डाक्यूमेंट्री फिल्में दिखानी चाहिए। तब ही ये नेता समझेंगे कि हमारी नीतियों में कहां खराबी है। 
पर अफसोस कि उनके पास समय ही नहीं होता और वो दूसरी समस्याओं में उलझे रहते हैं। साफ कहूं तो यह पर्यावरण मंत्री की जवाबदारी है कि वो ऐसी फिल्मों को न सिर्फ देखे बल्कि दूरदर्शन के माध्यम से इसे प्रसारित भी करवाए। जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पर्यावरण की वास्तविकता पहुंचे। 
 
0 जंगलों में शिकार पर कानूनन रोक के बावजूद क्या अब तक हालात नहीं बदले हैं? 
00 अगर हालात सुधरे होते तो आज संसार चंद जैसा शिकारी इतने सालों तक जंगल में जानवरों को अंधाधुंध तरीके से मारता न रहता। संसार चंद कोई टारजन नहीं था। मुमकिन है कि इन जैसे शिकारियों की कारगुजारी में फॉरेस्ट विभाग, कुछ एनजीओ और कुछ नेता भी इन्वाल्व होंगे। 
मुझे तो बचपन से उन तस्वीरों को देखकर बड़ा गुस्सा आता है, जिसमें ये बड़े-बड़े राजा-महाराजा शेर और दूसरे शिकार पर पैर रख कर बंदूक हाथ में लेकर नजर आते हैं। मैं तो कहता हूं अरे, नामर्दों अगर इतने ही बड़े शिकारी हो तो जाओ ना जंगल में निहत्थे। उसके बाद करो आमने-सामने की लड़ाई। 
 
0 शहरीकरण तो बढ़ता ही जाएगा। ऐसे में एक आम शहरी अपना पर्यावरण बचाने क्या योगदान दे सकता है? 
00 शहर में रहने वाले सभी लोगों से मुझे कहना है कि लकड़ी का कम से कम इस्तेमाल करो। क्योंकि आखिर लकड़ियां भी तो जंगल से ही आती है। मैं शहरों में देखता हूं आलीशान कोठियों से लेकर आम घरों तक में छत से लेकर टाइल्स तक ढेर सारी लकड़ियां इस्तेमाल होती है।
 इसे बंद करना होगा। अपने फिल्म वालों को भी मैं कहता हूं कि शूटिंग के दौरान अगर पेड़ की कोई टहनी बाधा बन रही है तो उसे बिना सोचे-समझे काट देते हैं। जबकि इसे बांधा जा सकता है।
 अभी हमारे मुंबई में एक बड़ा गलत काम हो रहा है। सड़क बनाने के दौरान बड़े-बड़े पेड़  के नीचे की जमीन पूरी की पूरी कांक्रीट से पक्की कर दी जा रही है। आखिर पेड़ की जड़ों तक पानी कैसे पहुंचेगा। 
कोई इन सरकारों को समझाए। तल्ख़ियां तो बहुत सी है लेकिन एक छोटी सी अपील मैं करना चाहता हूं कि कम से कम आप अपने बच्चों के जन्मदिन पर एक पौधा हर साल लगाकर अच्छी शुरूआत तो कर सकते हैं। 
 
0 आप खुद भी जन आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं, ऐसे में आज के दौर में पर्यावरण जैसे मुद्दे पर जन आंदोलनों का क्या भविष्य देखते हैं आप? 
00 देखिए, जन आंदोलन तो जनता का सबसे बड़ा हथियार है।  दिल्ली में जब निभर्या वाला मामला हुआ।
 नौजवानों में इतना जोश आया कि वो अन्याय के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। सर्दी के मौसम में उन पर ठंडा पानी फेका जा रहा है लेकिन वो हिले नहीं बल्कि सरकार को हिला दिया। नतीजा देखिए, नया कानून बन गया।
 तो पर्यावरण बचाने के लिए भी ऐसे ही जन आंदोलन की जरुरत है। जैसे गांधी जी और जयप्रकाश नारायण जी ने लोगों को एकजुट कर आंदोलन खड़ा किया, ठीक वैसा ही दबाव हो तो पर्यावरण और प्रदूषण जैसे मुद्दे पर सरकार जरूर जागेगी। 
 
0 लेकिन जिस अन्ना आंदोलन में आपने मंच साझा किया, आपको नहीं लगता कि वह पूरा का पूरा आंदोलन भटक कर खत्म हो गया? 
00 अन्ना आंदोलन कहां भटका? आखिर केजरीवाल तो अन्ना आंदोलन की ही उपज है। उसे तो जनता ने चीफ मिनिस्टर बनाया। पूरा हिंदुस्तान हिल गया था कि ये ‘आप’ पार्टी है कौन।
 सबके होश उड़ गए थे कि ‘आप’  तो अब नेशनल पार्टी बन जाएगी। लेकिन उसको (केजरीवाल को)अकल नहीं थी...भाग गया कुर्सी छोड़ कर। उसे बैठना चाहिए था, लड़ता वो जनता के हक के लिए...लेकिन। 
 
0...तो क्या केजरीवाल को एक मौका और नहीं मिलना चाहिए..? 
00 मुझे नहीं लगता उसका भविष्य उज्ज्वल है। 
 
0 आपको लगता है कि चर्चित हस्तियों के जीवन पर लिखी गई किताबें बिना विवाद के हाथों-हाथ नहीं बिक सकती? 
00 इस सवाल से मेरा क्या लेना-देना और आप मुझसे यह क्यों पूछ रहे हैं, मैं नहीं समझ पा रहा। 
 
0 आपकी पत्नी नंदिता पुरी ने आपकी बायोग्राफी लिखी,उस पर खूब बवेला मचा तो किताब चर्चा में आ गई, इसलिए..
00 (टोकते हुए) मैं उस पर कोई बात नहीं करना चाहता। उस मुद्दे को मैं पीछे छोड़ आया हूं। यहां छत्तीसगढ़ में पर्यावरण पर कार्यक्रम में आया हूं। उससे जुड़ा कोई सवाल हो तो जरुर पूछिए या कुछ और भी..। 
 
0 छत्तीसगढ़ में फिल्म सिटी की गुंजाइश देखते हैं क्या..? 
00 फिल्म सिटी तो बाद की बात है। पहले आप फिल्में तो बेहतरीन बनाइए। फिल्म सिटी तो और भी कई स्टेट में बनाई गई। उनका क्या हश्र हो रहा है, सबको मालूम है। इसलिए फिल्म सिटी की तो बात ही ना करें। 
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 भावभीनीं श्रद्धांजलि

मैनें आटोग्राफ मांगा तो बोले-तेरा 'बाबू ' तो 

पढ़ा लिखा नहीं है और अंगूठा लगा दिया

ओमपुरी हमेशा के लिए बन गए ऋचा के बाबू...अब यादें ही रह गईं


 'सद्गति' में ऋचा-ओमपुरी
महासमुंद के एक गांव में ये रिश्ता करीब 37 साल पहले बना और उसके बाद दिग्गज अभिनेता ओमपुरी जिंदगी भर उनके लिए बाबू ही रहे। अब अपने 'बाबू'  के गुजरने की खबर सुनने के बाद डॉ.ऋचा ठाकुर के जहन में सारी यादें ताजा हो गई हैं। 
डॉ.ऋचा यहां शासकीय डॉ. वामन वासुदेव पाटणकर कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय दुर्ग के नृत्य विभाग की अध्यक्ष है। शुक्रवार 6 जनवरी 2017 की सुबह जब ओमपुरी के गुजरने की खबर आई तो डॉ.ऋचा अपने कॉलेज में भारतीय शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी की तैयारियों में लगी हुई थी। इस दौरान उनका फोन लगातार बज रहा था और लोग संवेदनाएं भेज रहे थे।
ओमपुरी के साथ अपने इस भावनात्मक रिश्ते को बताते हुए डॉ ऋचा भी भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि 1981 में महान फिल्मकार सत्यजीत रे छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि पर मुंशी प्रेमचंद की कृति 'सद्गति' फिल्म बनाने की तैयारी के लिए रायपुर आए थे। चूंकि मेरे पिता डॉ. देवदत्त मिश्र और माता डॉ. सुमन मिश्र रंगकर्मी थे और शंकर नगर स्थित अपने घर में बाल नाट्य केंद्र चलाते थे,लिहाजा एक दिन रे साहब का हमारे घर भी आना हुआ। तब उनके सामने हम बच्चों ने मुंशी प्रेमचंद का नाटक 'ईदगाह' प्रस्तुत किया था। यह नाटक देखते हुए रे साहब ने दो बच्चों (मुझे और हमारे पारिवारिक सदस्य सलील दीवान) को  अपनी फिल्म के लिए चुन लिया।

बाबू का यादगार आटोग्राफ 
तब मेरी उम्र 10-11 साल थी। मुझे मुख्य पात्र दुखी (ओमपुरी) और झुरिया (स्मिता पाटिल) की बेटी धनिया की भूमिका दी गई। रायपुर के छतौना, मंदिर हसौद, पलारी और महासमुंद के पास कुछ गांवों में पूरी फिल्म की शूटिंग हुई। जिसमें मुंबई से मोहन आगाशे और गीता सिद्धार्थ के अलावा छत्तीसगढ़ से वरिष्ठ अभिनेता भैयालाल हेड़ऊ सहित अन्य लोग भी थे। पूरी शूटिंग में हम लोगों खूब एन्ज्वाए किया। कई बार तो लगता था कि मेरे असली माता-पिता यही दोनों हैं। ओमपुरी के साथ आत्मीयता को याद करते हुए डॉ. ऋचा बताती हैं-फिल्म में मुझे उन्हें बाबू कहना था और मैं शूटिंग के बाद भी उन्हें बाबू ही कहती रही। 'बाबू' भी मुझे पितातुल्य स्नेह देते थे। यहां तक कि जब शूटिंग खत्म हो गई और पूरी यूनिट लौटने लगी तो मैनें आटोग्राफ के लिए 'बाबू' के आगे अपनी कॉपी बढ़ा दी। उन्होंने कॉपी ली और 'सद्गति' फिल्म के किरदार को याद करते हुए बोले-धनिया तेरा बाबू तो पढ़ा-लिखा नहीं है, इसलिए ला अंगूठा लगा देता हूं। इसके बाद उन्होंने अंगूठा लगाया और फिर हंसते हुए उसके नीचे अपने आटोग्राफ दे दिए। यह आटोग्राफ मेरे पास 'बाबू' की एकमात्र अनमोल पूंजी है।
डॉ. ऋचा से उनके कॉलेज में हुई मुलाकात 
डॉ ऋचा बताती हैं-फिल्म के बाद बाबू से रिश्ता हमेशा कायम रहा। मैं उन्हें चिट्ठियां लिखती थी तो हर जवाब में वह यह जरूर लिखते थे कि पहले अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान दो, अच्छे से पढ़-लिख लो फिर एक्टिंग के बारे में सोचना।
 बाद के दिनों में रंगमंच और कुछ छत्तीसगढ़ी फिल्मों में सक्रिय रही डॉ. ऋचा ने बताया कि 2014 में जब 'बाबू' रायपुर आए थे तो फोन पर बात हुई थी उसके बाद 2015 में आए तो उनसे मिलने गई थी।
इसके अलावा मोबाइल फोन का दौर आने के बाद उनसे हमेशा बात होती रहती थी। जीवन में कभी भी मार्गदर्शन लेना होता था उनको फोन जरूर लगाती थी।
 आखिरी बार तीन महीना पहले 18 अक्टूबर को उनके जन्मदिन पर विश करने फोन किया था। तब  शायद वह मेहमानों से घिरे हुए थे, फिर भी उन्होंने काफी देर बात की। हालचाल पूछा और मिलने का वादा किया। मुझे नहीं मालूम था कि यह उनसे आखिरी बातचीत होगी।