Monday, May 16, 2016

बहन की मौत का दर्द सीने में दबाए महफिल 

में गाती रहीं सुषमा श्रेष्ठ, बजती रहीं तालियां 

प्रख्यात पाश्र्वगायिका सुषमा श्रेष्ठ भिलाई में अपना कार्यक्रम दे रही थी और मुंबई 

में उनकी बहन की मौत हो गई, 45 साल पहले पिता भी ऐसे ही पल में दुनिया छोड़ गए थे

मोहम्मद जाकिर हुसैन/भिलाई
स्टील क्लब में सुषमा (पूर्णिमा) श्रेष्ठ 
प्रख्यात पाश्र्व गायिका सुषमा (पूर्णिमा)  श्रेष्ठ  14 मई 2016 शनिवार की रात स्टील क्लब सेक्टर-8 में एक से बढ़ एक शानदार गीत सुना रही थी। गीत सुनाते हुए वह थोड़ी उदास जरूर थी लेकिन अपने मन की बात उन्होंने ज्यादा लोगों से शेयर नहीं की । उनके एक-एक गीत पर खूब-खूब तालियां बजी, वाहवाही हुई और लोग इसके बाद घर भी चले गए। लेकिन यह बहुत कम लोगों को मालूम था कि जिस वक्त सुषमा सुरों की तान छेड़ रहीं थीं, उनके सीने में बहन की मौत का दर्द कसक मार रहा था। सुषमा जब भिलाई के लिए रवाना हुई थी तो उनकी बड़ी बहन देव्यानी वेंटीलेटर पर थीं जिनका शनिवार 14 मई की सुबह निधन हो गया।
सुषमा रविवार की सुबह ही मुंबई रवाना हुई है। उनके जाने के बाद जिसे भी पता चला सभी उनके इस जज्बे को सलाम कर रहा है। वैसे, सुषमा के साथ यह दुर्योग दूसरी बार हुआ है। करीब 45 साल पहले ऐसे ही एक बड़े कार्यक्रम के ठीक पहले उनके पिता भी ह्दयघात से चल बसे थे।
इंटरव्यू के दौरान 
7 साल की उम्र से फिल्मों में पाश्र्वगायन शुरू करने वाली सुषमा श्रेष्ठ बाद के दौर में पूर्णिमा के नाम से गाने लगीं।

आज वह अपनी 7 साल की पोती की दादी बन चुकी हैं।  प्रो. डॉ. टी.उन्नीकृष्णन के साथ एक कंसर्ट 'तू जो मेरे सुर में' पेश करने 13 मई को वे भिलाई पहुंची थीं। आयोजन की तैयारियां करीब छह माह से चल रही थी। इसलिए सुषमा यहां आते ही रिहर्सल में जुट गर्इं। तब तक उनकी बड़ी बहन देव्यानी को मुंबई के एक हास्पिटल में वेंटीलेटर पर रखा जा चुका था। इसके बावजूद बिना विचलित हुए सुषमा अपने रियाज में लगी रहीं। शायद उन्हें उम्मीद थी कि कोई राहत की खबर आएगी। लेकिन 14 मई की सुबह बहन की मौत की खबर आ गई। ऐसे में आयोजकों ने उन्हें ढांढस बंधाया और घर जाने की सलाह दी। लेकिन सुषमा ने घर वालों खास कर अपने जीजा से बात की और फिर कंसर्ट के बाद 15 मई की सुबह ही घर जाने की बात कही। आयोजकों को उनकी बात माननी पड़ी। सुषमा के साथ आई एक सहायिका ने बताया कि देव्यानी उनकी कजिन थी और संयुक्त परिवार में सब एक साथ पले-बड़े हैं, इसलिए स्वाभाविक है कि बहन का अचानक चले जाना उनके लिए किसी सदमे से कम नहीं होगा।
ऐसे ही एक शो के ठीक पहले पिता गुजर गए थे 
पिता भोला श्रेष्ठ के साथ सुषमा
आयोजन से ठीक पहले सुषमा ने संक्षिप्त बातचीत में बताया कि 45 साल पहले भी परिवार में ऐसा ही हादसा हुआ था। मुंबई में रह रहे पंजाब मूल के लोगों की संस्था पंजाब एसोसिएशन का सालाना जलसा 12 अप्रैल 1971 को होना था। इसमें राजकपूर अंकल, दारा सिंह जी, प्राण साहब और बीआर चोपड़ा जी जैसी बड़ी बड़ी पंजाबी हस्तियों के सामने अपनी परफ ार्मेंस को लेकर मैं बहुत उत्साहित थी। पिताजी भोला श्रेष्ठ प्रख्यात संगीतकार खेमचंद्र प्रकाश के सहायक थे। वे भी लगातार मुझे तैयारी करवा रहे थे। अचानक 11 अप्रैल को दिल का दौरा पडऩे से पिताजी का देहांत हो गया। ऐसे गमगीन माहौल के बावजूद लोगों ने मुझे किसी तरह कार्यक्रम मे परफ ार्म करने राजी कर लिया। मैनें अगले दिन 12 अप्रैल को प्रोग्राम दिया। तब पिताजी की जगह नरेंद्र चंचल जी ने मेरे साथ संगत की। शो सफ ल रहा और इसके बाद पंजाब एसोसिएशन ने मुझे स्कालरशिप दी।
रवि ने दिया साथ 'तेरा मुझसे है...' में
 तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई......
स्टील क्लब में 14 मई की रात सुषमा (पूर्णिमा) श्रेष्ठ  और प्रो. डॉ. टी.उन्नीकृष्णन ने मिलकर 4 दशक के सुपरहिट हिंदी, मलयाली, तेलुगू और बंगाली गीतों से समां बांध दिया। सुषमा ने अपनी परफ ार्मेंस के दौरान लोगों को यह एहसास नहीं होने दिया कि उनके घर में कोई दुखद घटना घटी है। हालांकि 1973 की फिल्म 'आ गले लग जा' के गीत 'तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई' शुरू करते वक्त उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा कि यह गीत स्व. राहुल देव बर्मन और मेरे बिछड़े परिजनों को समर्पित है। इसके बाद गाते वक्त कुछ देर के लिए उनका गला रुंध गया। इसी गाने में एक पल ऐसा भी आया जब सुषमा गाते-गाते स्टेज से नीचे उतरी और सामने बैठे भिलाई स्टील प्लांट के ईडी वक्र्स एम. रवि ने माइक संभााल लिया। रवि ने इस गाने का पूरा एक अंतरा गाया और फिर सुषमा ने भी उनका पूरा साथ दिया। इसके बाद पूरी महफिल तालियों से गूंज उठी।

सुषमा/पूर्णिमा की पहचान है ये गीत 
1. है न बोलो-बोलो,  पापा को मम्मी से... (अंदाज)
2. तेरा मुझसे है पहले का नाता कोई... (आ गले लग जा)
3. यादों की बारात निकली है आज दिल के द्वारे... (यादों की बारात)
4. एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल... (धरम-करम)
5. बड़े अच्छे लगते हैं ये धरती, ये नदिया... (बालिका बधू)
6. इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो न... (अंकुश)
7. तूत्तू तू तुत्तू तारा, तोड़ो ना दिल हमारा... (बोल राधा बोल)
8. बरसात में जब आएगा सावन का महीना... (मां)

Saturday, April 16, 2016

घने जंगल के बीच बसा है एक घर का राजस्व गांव 

राजस्व रिकार्ड में शुरू से गांव का दर्जा, रहता है सिर्फ  एक परिवार,देश-विदेश में हैं बच्चे


बंजारीडीह गांव और एकमात्र घर 
घने जंगल के बीच महज एक घर। वह भी पूरी तरह से आबाद। प्रशासनिक रिकार्ड में यह आज भी गांव का दर्जा रखता है। गांव की आबादी महज 25 लोगों की है। इनमें भी बच्चे देश-विदेश में पढ़ रहे हैं। पूर्ण साक्षर, पूरी तरह जागरुक और सर्वसुविधायुक्त यह गांव है बालोद जिले के अंतिम छोर में बसा बंजारीडीह।
आम तौर पर जंगलों के अंदर इक्का-दुक्का घरों के वनग्राम बहुतायत पाए जाते हैं लेकिन अंचल में बंजारीडीह  संभवत: अपनी तरह का इकलौता राजस्व ग्राम है। इस इलाके में चल रही मोहड़ जलाशय परियोजना का मुख्य बांध इसी बंजारीडीह गांव की सीमा पर ही बनना है।
रिजर्व फारेस्ट से होकर जाता है बंजारीडीह का पहुंच मार्ग

ऐसा नहीं कि इस गांव में कभी दूसरे परिवार बसे नहीं। दरअसल घने जंगल के बीच में होने की वजह से यहां बसने वाले ज्यादातर परिवार एक या दो साल में ही यहां से चले गए। वर्तमान में यहां सुंदरा बालोद के मूल निवासी दाऊ भारत सिंह देशमुख के वंशज पूनम कुमार देशमुख, स्व.ऋषि कुमार और ललित कुमार का परिवार एक ही घर में रह रहा हैं। 100 साल पहले यहां आकर बसा देशमुख परिवार आज भी खेती कर रहा है। देशमुख परिवार के वरिष्ठ सदस्य पूनम कुमार देशमुख बताते हैं कि पहले तो बिजली तक नहीं थी और जंगली जानवरों का खतरा बहुत ज्यादा था। बारिश में तो गांव करीब डेढ़ महीने तक बाहरी दुनिया से कटा रहता था। इतनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हमारे पूर्वजों ने जब गांव नहीं छोड़ा तो हम कैसे छोड़ सकते हैं। पूनम बताते हैं कि-हमारे दादाजी ने जेवरतला से रूपसिंह साहू परिवार को यहां लाकर बसाया था। इसी तरह राज्य शासन ने भी 4 किसानों को जमीन देकर यहां बसाने का प्रयत्न किया था। लेकिन सब कुछ साल बाद यहां से चले गए। अब कोई 16-17 परिवार की यहां खेती की जमीन है, जो समय-समय पर खेती के नाम से आते हैं लेकिन यहां स्थाई रूप से रहने कोई नहीं आता।
इस तरह जेठासी में मिला था जंगल के बीच का गांव 
पूनम कुमार देशमुख 
पूनम देशमुख बताते हैं-हमारे परिवार के पितृपुरुष दाऊ भारत सिंह देशमुख का मूल गांव बालोद के समीप सुंदरा व जगतरा है। गांधी जी के सिद्धांतों पर चलने वाले भारत दाऊ ने तमाम पैतृक संपत्ति अपने छह भाईयों में बांट दी थी। इस त्याग से अभिभूत होकर इन छह भाईयों ने भारत दाऊ के इकलौते बेटे धारा सिंह देशमुख को 105 एकड़ रकबा वाला बंजारीडीह गांव जेठासी (ज्येष्ठ को उपहार) में दिया था। धारा सिंह के दो बेटे पन्नालाल और खम्हनलाल हुए। इनमें स्व. पन्नालाल के 5 बेटे अर्जुन सिंह, परसराम , स्व. पीलालाल, बसंत और पीलेश्वर हुए। इन सभी की काश्तकारी की जमीन बंजारीडीह में है लेकिन निवास आस-पास के गांवों में है। वहीं खम्हनलाल के तीन बेटों पूनम कुमार, स्व. ऋषि कुमार और ललित कुमार का परिवार आज भी बंजारीडीह में रह रहा है।
बच्चे पढ़ रहे देश-विदेश में 
बंजारीडीह गांव पूरी तरह समृद्ध और शिक्षित है। साक्षरता का आलम यह है कि यहां सभी 'निवासीÓ पढ़े-लिखे हैं। वहीं इनकी नई पीढ़ी अब देश-विदेश में पढ़ाई कर रही है या फिर कर चुकी है। पूनम कुमार देशमुख का बड़ा बेटा प्रतुल कुमार देशमुख रशिया में एमडी की पढ़ाई करने गया हुआ है। छोटा बेटा राहुल देशमुख इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुका और बिटिया बीसीए कर रही है।
कभी पत्नी तो कभी पति बनते हैं पंच 
त्रिभुवन व सुनीता (बारी-बारी से पंच )
ग्राम पंचायत कुदारी दल्ली के अंतर्गत आश्रित ग्राम बंजारीडीह वार्ड-7 का दर्जा रखता है और महज एक घर वाले इस गांव में प्रशासनिक कामकाज के लिहाज से जनप्रतिनिधि (पंच) भी हंै। यहां देशमुख परिवार के त्रिभुवन देशमुख-सुनीता बाई देशमुख (बेटा बहू) बारी-बारी से पंच बनते हैं। दरअसल राजनीतिक रूप से भी इस इलाके के तमाम गांव बेहद जागरुक है। यही वजह है कि कुदारी दल्ली ग्राम पंचायत में आज तक जनप्रतिनिधि सर्वसम्मति से निर्वाचित होते आए हैं। जिसके चलते कभी चुनाव की नौबत नहीं आई। फिलहाल बंजारीडीह का प्रतिनिधित्व सुनीता बाई कर रही है। जरूरत पडऩे पर उनके पति और पूर्व पंच त्रिभुवन देशमुख उनके कामकाज में मदद कर देते हैं। सुनीता बाई बताती हैं,यहां सबसे बड़ी समस्या पहुंच मार्ग की है। यहां पहुंच मार्ग की जमीन वन विभाग के अंतर्गत संरक्षित वन क्षेत्र (रिजर्व फारेस्ट) में आती है। मोहड़ बांध परियोजना में मुख्य बांध का प्रस्तावित इलाका बंजारीडीह से लगा हुआ है। ऐसे में जल संसाधन विभाग वालों ने भरोसा दिलाया है कि उनका अमला यहां पहुंच मार्ग बना कर देगा। लेकिन यह भी भविष्य के गर्त में है।

एक मकान वाले गांव की खास बातें 
गोबर गैस का इस्तेमाल
संरक्षित वन क्षेत्र से होकर जाता है गांव का रास्ता
आबादी 25 लेकिन रहते हैं 11 लोग, बाकी बच्चे देश-विदेश में पढ़ रहे
उन्नत और आधुनिक खेती है आय का मुख्य जरिय
तत्कालीन दुर्ग जिले के प्रथम शत-प्रतिशत साक्षर गांव में से एक
गोबर गैस का शत-प्रतिशत इस्तेमाल
 बालोद व राजनांदगांव दोनों जिले का बिजली कनेक्शन इस गांव में

'' ये जानना काफी रोचक है कि जंगल के अंदर मात्र एक घर वाला राजस्व गांव है। मैं एक बार जाकर जरूर देखना चाहूंगा। अगर वहां किसी प्रकार के कार्यों की जरूरत है तो जिला प्रशासन जरूर करवाएगा।'' 
राजेश सिंह राणा, कलेक्टर बालोद 

Tuesday, January 5, 2016

मैनें इंदिरा गांधी नहीं गायत्री देवी से 
प्रभावित होकर लिखी थी 'आंधी' 

प्रख्यात कथाकार व पत्रकार कमलेश्वर से खास चर्चा 


साक्षात्कार के अगले दिन सुबह
भिलाई (12 जनवरी 2003)। प्रख्यात साहित्यकार व पत्रकार कमलेश्वर का मानना है कि साहित्य कोई क्रांति नहीं ला सकता बल्कि क्रांति लाने वालों का मार्गदर्शन भर कर सकता है। 
बहुचर्चित उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' के बेस्ट सेलर बनने से उन्हें अपने उद्देश्यों की पूर्ति का संतोष है। इंदिरा गांधी पर केंद्रित माने जाते रहे बहुचर्चित उपन्यास 'काली आंधी' के संबंध में कमलेश्वर का कहना है कि उन्होंने यह उपन्यास इंदिरा गांधी से प्रभावित होकर नहीं बल्कि जयपुर की महारानी गायत्री देवी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर लिखा था।
 इन दिनों इंदिरा गांधी पर ही महत्वाकांक्षी फिल्म का लेखन कर रहे कमलेश्वर मानते हैं कि सुभाषचंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू और सीमांत गांधी पर भी फिल्म बननी चाहिए। 
कमलेश्वर के मुताबिक छत्तीसगढ़ में श्रेष्ठ साहित्य लिखा जा रहा है क्योंकि यहां के लोग बाजारवाद से दूर हैं। छत्तीसगढ़ी बोली में भाषा बनने की उन्हें पूरी संभावनाएं नजर आती है। 
इन दिन गुजरात त्रासदी पर केंद्रित उपन्यास लिख रहे कमलेश्वर से उनके भिलाई प्रवास के दौरान विशेष बातचील हुई। 


सवाल-जवाब

0 दो वर्ष पूर्व लिखा गया आपका उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' आज भी बेस्ट सेलर है। 
जिन उद्देश्यों को लेकर आपने उपन्यास लिखा, क्या आप उसमें सफल रहे? 
00 इस उपन्यास को जितना विशाल व विराट पाठक समुदाय मिला, उससे निश्चित ही संतोष हुआ। हिंदी में इसके 9 संस्करण निकल चुके हैं और मराठी, उर्दू, बांग्ला व उडिय़ा में इसका अनुवाद हुआ।
कई जगह यह किताब 'ब्लैक' में साइक्लोस्टाइल स्वरूप में भी बिकी। मेरा संदेश ज्यादा लोगों तक पहुंचा। इससे लगता है कि मैं अपने उद्देश्य में सफल रहा। 

0 आपने (काली ) आंधी जैसी संवेदनशील फिल्म लिखी तो मिस्टर नटवरलाल और राम-बलराम जैसी मसाला फिल्म भी. क्या मसाला फिल्म लिखते हुए कहीं आपको अपने स्तर से समझौता करना पड़ा? 
00 कोई समझौता नहीं। अगर मैं व्यावसायिक तरीके से 'मिस्टर नटवरलाल' या 'राम-बलराम' लिख रहा हूं तो मेरा मकसद अपनी फिल्म को सफल बनाना है। अब इसका मतलब यह नहीं कि मैं गलत करूंगा।

जयपुर सांसद गायत्री देवी अपनी जनता की समस्याएं सुनते हुए।

0 आपकी 'काली आंधी' में इंदिरा गांधी की छवि दिखती है? 
00 ऐसा नहीं है, यह लोगों की गलतफहमी है कि 'आंधी' मैंनें इंदिरा गांधी को केंद्र में रख कर लिखी। दरअसल उन दिनों जयपुर में महारानी गायत्री देवी स्वतंत्र पार्टी से लोकसभा का चुनाव लड़ रही थी। 
मैं जयपुर गया था चुनाव की रिपोर्टिंग करने। वहां देखा तो गायत्री देवी एक हाथ मेें नंगी तलवार और सिर पर कलश लिए पूजा के लिए मंदिर जा रही हैं। उनके पीछे हजारों की भीड़ है। उस वक्त मेरे ध्यान में आया कि ऐसी महिलाएं ही राजनीति में आनी चाहिए और इसके बाद मैनें 'काली आंधी' लिखना शुरू किया। 

0 लेकिन इस पर बनीं फिल्म तो इंदिरा गांधी के जीवन के काफी करीब लगती है? 
00 दरअसल जब गुलजार ने 'आंधी' बनाने सुचित्रा सेन को चुना तो उसके सामने कोई मॉडल नहीं था।

 हमनें इंदिरा गांधी, तारकेश्वरी सिन्हा और नंदिनी सत्पथी के चेहरे सामने रखे। जिसमें कहानी के अनुसार सुचित्रा सेन को इंदिरा गांधी की भाव-भंगिमा पसंद आई।इसके बाद सुचित्रा का गेटअप ठीक इंदिरा गांधी की तरह रखा गया, इसलिए लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है। 


0 इन दिनों आप इंदिरा गांधी पर केंद्रित महत्वाकांक्षी फिल्म का लेखन कर रहे हैं। क्या आप उसमेें इंदिरा के संपूर्ण व्यक्तित्व से न्याय कर पाएंगे? 
00 जिस तरह रिचर्ड एटनबरो की 'गांधी' थी उसी तरह यह फिल्म होगी। यकीन मानिए, इसमेें इमरजेंसी के हालात, आपरेशन ब्ल्यू स्टार सहित तमाम वह बातें भी होंगी जो इंदिरा के व्यक्तित्व के दूसरे पहलू से भी रूबरू कराती है। 

0 क्या मनीषा कोईराला को दर्शक इंदिरा गांधी के रूप में स्वीकार कर पाएगा, जबकि वह 'छोटी सी लव स्टोरी' से विवादित हो गई हैं?
00 जिस वक्त कलाकार का चयन करना था हम लोगों ने तब्बू, नंदिता दास सेल लेकर दक्षिण व बांग्ला की कई अभिनेत्रियों के चेहरे व भाव-भंगिमा का अध्यन किया। 
लेकिन, कंप्यूटर पर मनीषा का चेहरा इंदिरा के काफी करीब लगा। इसलिए उसे चुना गया। जहां तक 'लव स्टोरी' वाली बात है तो मैं उस विवाद मेें पडऩा नहीं चाहता। आखिरकार मनीषा एक कलाकार भी है और विभिन्न किरदारों को निभाना उसका पेशा है। 

0 इंदिरा गांधी के अलावा राजनीति मेें आपको कोई ऐसा व्यक्तित्व नहीं लगता जिस पर आप फिल्म लिखें और वह चले भी? 
00 क्यों नहीं सुभाषचंद्र बोस हैं, जवाहरलाल नेहरू हैं और फिर सीमांत गांधी भी हैं। इन सब पर फिल्म बननी चाहिए। 

0 इन दिनों सैटेलाइट चैनलों पर जो सीरियल आ रहे हैं उनका समाज में कैसा प्रभाव महसूस करते हैं? 
00 माफ कीजिएगा, इन सीरियलों से मेरे अपने घर की महिलाएं 'डि-वैल्यूड' होती  दिखती है। सीरियलों में और खूबसूरत होती सास या बहू को देख कर मुझे लगता है कि इतनी सुंदर तो मेरे घर की महिलाएं भी नहीं है। 

0 हिंदी की पहली कहानी माधवराव सप्रे ने छत्तीसगढ़ में ही लिखी थी। लेकिन, आज भी साहित्य के नक्शे में छत्तीसगढ़ का विशेष स्थान नहीं बन पाया? 
00 साहित्य में छत्तीसगढ़ का महत्व तो पहले से ही रेखांकित हो चुका है। फिर मैनें पहले ही कहा कि छत्तीसगढ़ के पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी और सप्रे जी के बिना हिंदी साहित्य का इतिहास ही लंगड़ा है। 

0 फिलहाल छत्तीसगढ़ में जो साहित्य लिखा जा रहा है उस पर आपकी टिप्पणी? 
00 यहां छत्तीसगढ़ में तो बहुत अच्छा लिखा जा रहा है। परदेशी राम की कहानियां बहुत अच्छी है। कनक तिवारी, सतीश जायसवाल भी लिख रहे हैं। कबीर पर जितना अच्छा अंक महावीर अग्रवाल ने 'सापेक्ष' का निकाला है, मेरी नजर में पूरे भारत मेें इसकी मिसाल नहीं है। दरअसल छत्तीसगढ़ में इतना अच्छा इसलिए लिखा जा रहा है क्योंकि यहां के लोग बाजारवाद से दूर हैं। 

0 यहां मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ी बोली को भाषा का दर्जा दिलाने का संकल्प व्यक्त किया है। आपकी नजर में छत्तीसगढ़ी बोली के भाषा मेें तब्दील होने की क्या संभावनाएं हैं? 
00 बहुत संभावनाएं हैं। छत्तीसगढ़ी में कोई कमी नहीं है। दरअसल जब तक तमाम क्षेत्रीय सहयात्री भाषाएं पुष्ट होकर सामने नहीं आएंगी तब तक हिंदी समृद्ध नहीं होगी। 

0 यहां छत्तीसगढ़ में साहित्य के क्षेत्र में दो लाख रुपए का पुरस्कार विवादित हो गया है। आरोप है कि राज्य के सांस्कृतिक सलाहकार अशोक बाजपेयी के खेमे  से कथित रूप से जुड़े लोगों (विनोद कुमार शुक्ल और कृष्ण बलदेव वैद्य) को ही इस पुरस्कार से नवाजा गया। आपकी क्या राय है? 
00 अगर साहित्यकारों को सम्मान मिल रहा तो ये अच्छी बात है। बाकी बेवजह की बातों में कुछ रखा नहीं है। 

0 आज साहित्य में क्रांति जैसी बातें सुनाई नहीं देती? 
00 दरअसल साहित्य से क्रांति नहीं होती है बल्कि जो लोग क्रांति कर सकते हैं साहित्य उनके काम आता है। 

0 साहित्य में किसी वाद या एजेंडे का लेखन क्या मायने रखता है? 
00 एजेंडे का लेखन गलत है।स्त्री विमर्श,दलित विमर्श यह सब क्या है? यह ज्यादा दूर तक नहीं चल सकता। 

0 प्रारंभिक दिनों में आपने पेंटर का काम भी किया और आपका हस्तलेखन बहुत ही कलात्मक है। क्या आज भी पेंटिंग के शौक से रचनात्मक स्तर पर जुड़े हैं? 
00 नहीं पेंटिंग तो अब नहीं करता। क्योंकि एमएफ हुसैन पेंटिंग को जिस ऊंचाई तक ले गए हैं उसके बाद मुझे लगा कि यह मेरे काम की चीज नहीं है। वैसे मेरा मानना है कि क्रिएटिव ग्रेटनेस किसी भी काम को निरंतर करने से कायम रहती है। 

0 आपके समकालीन और पूर्ववर्ती में ऐसे कौन से व्यक्तित्व हैं, जिन्हे देख कर आपको लगता है कि ऐसा नहीं बन सका? 
00 ऐसा तो कोई भी नहीं। क्योंकि मुझे अपने आप पर भरोसा था। हां, प्रभावित जरूर रहा हूं। गणेश शंकर विद्यार्थी से, प्रेमचंद से और निराला के 3 उपन्यासों से। 

0 प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी ने गोवा चिंतन मेें जो हिंदूत्व की परिभाषा दी है उससे आप कितना इत्तेफाक रखते हैं? 
गुड़गांव के निवास में 2004
00 यह तो उनके लिए बड़ी सुविधाजनक चीज है। आप बताईए आखिर हिंदुत्व है क्या चीज? उनके अडवाणी, तोगडिय़ा,सिंघल, मोदी और ठाकरे सब का हिंदुत्व अलग-अलग है।
 पहले बाजपेयी ने अमरीका में खुद को संघ का सच्चा स्वयंसेवक कह दिया फिर भारत आकर संघ का मतलब भारत संघ बता दिया। 
अब गोवा चिंतन आया है तो यह सब उनकी सुविधा के हिसाब से है। कम शब्दों में कहूं तो एक मित्र ने कहा है-'बाजपेयी जी आपने घुटने तो बदलवा लिए लेकिन देश के घुटने तोड़ दिए।' 
गुजरात को लेकर अमरीका में बाजपेयी और इंग्लैंड में अडवाणी ने जब शर्मिंदगी का इजहार किया तो फिर गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की ताजपोशी में कैसे चले गए? अभी प्रवासी दिवस मनाया गया।
 इसमें उन्हीं लोगों को बुलाया गया जो थ्री पीस के नीचे भगवा पहनते हैं। पहले उनके लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था। अब अप्रवासी भारतीयों के साथ इसे अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रवाद का नाम दिया जा रहा है। यह बी हिंसक हिंदुत्व का दूसरा रूप है। 

0 तो आखिर हिंदुत्व है क्या? 
00 दरअसल हिंदुत्व तो सावरकर की किताब से पैदा होता है। जिसमें उन्होंने साफ कहा है कि इसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। तो फिर इसे वही लोग 'डिफाइन' करें। 

0 प्रिंट मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश से क्या खतरा देखते हैं? 
00 खतरा तो अंग्रेजी पत्रकारिता को होगा, हिंदी पत्रकारिता को नहीं। हां, इससे भाषाई भगवाकरण का खतरा जरूर बढ़ रहा है। 

0 इन दिनों आप क्या लिख रहे हैं? 
00 एक उपन्यास लिख रहा हूं। गुजरात में जो मानवीय त्रासदी हुई, यह उसी पर आधारित है। 
(रविवार 12 जनवरी 2003 को भिलाई निवास में लिया गया इंटरव्यू 13 जनवरी 2003 के हरिभूमि भिलाई-दुर्ग संस्करण में प्रमुखता से प्रकाशित)
 
परिचय
इंटरव्यू के मिनिएचर पर आटोग्राफ
कमलेश्वर (पूरा नाम-कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना) का जन्म 6 जनवरी 1932 को मैनपुरी उत्तरप्रदेश में हुआ। लेकिन, वे अपनी उम्र के साथ भारत की पिछले पांच हजार वर्षों की सांस्कृतिक उम्र को जोडऩा कभी नहीं भूलते। 
अपनी स्कूली पढ़ाई के बाद कमलेश्वर ने इलाहाबाद से इंटर-बीए और फिर हिंदी में एमए की पढ़ाई पूरी की। उनका पहला उपन्यास 'एक सडक़ सत्तावन गलियां' पहले 'हंस' में और फिर 'बदनाम गली' शीर्षक से भी छपा। 
उन्होंने शिक्षा पूरी करने के बाद जीविका के लिए कुछ ऐसे कार्य भी किए जो अब बेहद अविश्वसनीय लग सकते हैं। मसलन किताबों एवं लघु पत्र-पत्रिकाओं के लिए प्रूफ रीडिंग, कागज के डिब्बों पर डिजाइन और ड्राइंग बनाने का काम,ट्यूशन पढ़ाना, पुस्तकों की सप्लाई से लेकर चाय के गोदाम में रात की पाली में चौकीदारी तक शामिल है। 
सन 1948 में पहली कहानी 'कॉमरेड' से लेकर अब तक इनकी साहित्यिक यात्रा में ढेरों कहानियां, उपन्यास, यात्रा संस्मरण, नाटक व आलोचनाएं प्रकाशित हो चुके हैं। पत्रिका 'सारिका' के संपादक (1967-78)के रूप में उन्होंने हिंदी कहानी के समानांतर आंदोलन का नेतृत्व किया। 
उनके कई उपन्यास छपने से पहले पत्रिकाओं में छप कर चर्चित हुए हैं साथ ही फिल्मों के लिए भी उन्होंने खूब लिखा। उनके उपन्यास 'काली आंधी' पर गुलकाार ने 'आंधी' नाम से बेहद सशक्त फिल्म बनाई। 
इसके अलावा उन्होंने मौसम, अमानुष, फिर भी, सारा आकाश जैसी कलात्मक फिल्मों से लेकर 'मि. नटवरलाल','सौतन', 'द बर्निंग ट्रेन' और 'राम-बलराम' जैसी मसाला फिल्मों सहित उन्होंने कुल 99 फिल्मों के लिए लेखन किया। इन दिनों वे इंदिरा गांधी पर बनने वाली महत्वाकांक्षी फिल्म के लिए लेखन कार्य में जुटे हुए हैं।
 दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक (1980-82) रहने के अलावा उन्होंने मीडिया के समस्त क्षेत्रों में काम किया है। दूरदर्शन के लिए अछूते विषयों और सवालों से पूरे देश को झकझोर देने वाले 'परिक्रमा' कार्यक्रम (जिसे यूनेस्को ने दुनिया के 10 सर्वश्रेष्ठ टेलीविजन कार्यक्रम माना था) में कमलेश्वर ने ज्वलंत मुद्दों पर खुली और गंभीर बहस करने की दिशा में साहसिक पहल की थी। 
बीसवीं सदी अवसान की बेला में प्रकाशित उनका उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' आज भी बेस्ट सेलर है। इन दिनों राष्ट्रीय दैनिक में संपादन के अलावा स्वतंत्र लेखन के साथ निजी टीवी चैनल को वे अपनी सेवाएं दे रहे हैं।  27 जनवरी 2007 को फरीदाबाद में उन्होंने आखिरी सांस ली।