Sunday, May 31, 2026


 रावघाट का लौह अयस्क भिलाई जाएगा ट्रेन से, दो दशक में हुआ पटरियां बिछाने का काम पूरा  


रावघाट रेलवे स्टेशन का प्रवेश द्वार मई 2026

अंतत: रावघाट लौह अयस्क खदान से भिलाई स्टील प्लांट के लिए कच्चा माल भेजने एक महत्वपूर्ण पड़ाव पूरा हो गया। दो दशक पहले दल्ली राजहरा से रावघाट होते हुए जगदलपुर तक रेल लाइन बिछाने एक महत्वपूर्ण एमओयू 2007 में हुआ था। तब लक्ष्य 5 वर्ष में रेल लाइन बिछाने का था लेकिन सुरक्षागत व अन्य वजहों से अब करीब दो दशक में रावघाट तक रेल लाइन बिछाने का काम पूरा हुआ है। 

फिलहाल रावघाट से अंतागढ़ तक लौह अयस्क सड़क मार्ग से भेजा जा रहा है और वहां से मालगाड़ी में दल्ली राजहरा होते हुए भिलाई भेजा जा रहा है। उम्मीद जताई जा रही है अक्टूबर 2026 से सीधे रावघाट से लौह अयस्क मालगाड़ी से भेजा जा सकेगा। रेलवे और सेल-बीएसपी मैनेजमेंट की तैयारियां पूरी है। फिलहाल रावघाट रेलखंड पर इंजन की सफल रोलिंग की जा चुकी है। अंतत: दल्ली राजहरा से रावघाट तक रेल लाइन का काम लगभग पूरा हो चुका है। 

95 किमी रेल लाइन बिछाना एक जटिल परियोजना 

फिलहाल अंतागढ़ से मालगाड़ी में भेजा जा रहा लौह अयस्क

देखा जाए तो दल्ली राजहरा से रावघाट तक करीब 95 किलोमीटर लंबी यह रेल परियोजना सामान्य निर्माण कार्य नहीं थी। नक्सल प्रभावित और अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र से गुजरने वाली इस लाइन के निर्माण में सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती रही। रेल लाइन और खनन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए वर्ष 2012 में गृह मंत्रालय के समन्वय से दो-दो बटालियन सुरक्षा बलों की तैनाती की गई, जिनमें रेलवे ट्रैक की सुरक्षा के लिए सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) तथा खनन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की बटालियनें शामिल थीं। 
गृह मंत्रालय के निर्देशानुसार दल्लीराजहरा से रावघाट तक के आंतरिक क्षेत्रों में सेल द्वारा 4 अर्ध-स्थायी तथा 21 स्थायी सुरक्षा शिविरों का निर्माण कराया गया, जिस पर स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा 180 करोड़ रुपये से अधिक की राशि व्यय की गई। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सुरक्षा चुनौतियों और बीच-बीच में हुई घटनाओं के बावजूद परियोजना का कार्य लगातार आगे बढ़ता रहा।

कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) निरीक्षण 

सहित पूर्ण कमीशनिंग जून 2026 में प्रस्तावित  

अक्टूबर 2026 में रावघाट से सीधे मालगाड़ी में भेजा जा सकेगा लौह अयस्क 

रेलवे निर्माण कार्य भारतीय रेलवे द्वारा सेल के वित्तीय सहयोग से किया जा रहा है, जबकि निर्माण एजेंसी रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) है। रेल लाइन निर्माण की अनुमानित लागत लगभग 1854 करोड़ रुपये है, जिसमें से सेल-भिलाई इस्पात संयंत्र अब तक लगभग 1720 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुका है। इसके अतिरिक्त रेलवे लाइन के विद्युतीकरण कार्य के लिए भी संयंत्र द्वारा लगभग 180 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि व्यय की गई है। वर्ष 2010 में प्रारंभ हुए इस कार्य में अप्रैल 2026 तक रावघाट स्टेशन भवन, यात्री सुविधाओं तथा सिग्नलिंग एवं दूरसंचार कार्य को छोड़कर अधिकांश निर्माण पूरा किया जा चुका है। कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) निरीक्षण सहित पूर्ण कमीशनिंग जून 2026 में प्रस्तावित है।
20 मई 2026 को रावघाट रेलखंड पर इंजन की सफल रोलिंग इस परियोजना की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आई है। इसके साथ ही रावघाट माइंस से सीधे रेल रेक संचालन का मार्ग लगभग प्रशस्त हो गया है और आगामी कुछ सप्ताहों में रावघाट से रेक डिस्पैच प्रारंभ होने की संभावना है। यह उपलब्धि केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि वर्षों के सतत प्रयास, समन्वय और कठिन परिस्थितियों में किए गए कार्य का परिणाम मानी जा रही है।

यात्री ट्रेन सेवा शुरू हो चुकी 

केवटी से शुरू हुई यात्री ट्रेन 16 जुलाई 2019 

इस परियोजना का प्रभाव अब केवल औद्योगिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है। वर्ष 2022 में दल्ली राजहरा से ताड़ोकी तक यात्री ट्रेन सेवा शुरू होने के बाद बस्तर अंचल के लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और व्यापार के नए रास्ते खुले हैं। आदिवासी समाज के युवाओं के लिए अब दुर्ग, भिलाई और देश के अन्य बड़े शहरों तक पहुंच पहले की तुलना में अधिक सहज हो गई है। स्थानीय नागरिकों के लिए यह रेल लाइन केवल परिवहन का माध्यम नहीं, बल्कि नई संभावनाओं का द्वार बनती जा रही है।
आज भिलाई इस्पात संयंत्र रावघाट स्टेशन को भी भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित कर रहा है। स्टेशन में यात्रियों के लिए तीन प्लेटफॉर्म तथा लौह अयस्क एवं सामग्री परिवहन हेतु एक पृथक गुड्स प्लेटफॉर्म विकसित किया जा रहा है। वर्तमान में लौह अयस्क का परिवहन सड़क मार्ग से अंतागढ़ रेलवे साइडिंग तक तथा वहां से रेल मार्ग द्वारा संयंत्र तक किया जा रहा है। पहली रैक 9 सितंबर 2022 को लोड की गई थी और वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 6000 टन लौह अयस्क अंतागढ़ साइडिंग तक पहुंचाया जा रहा है।

अंतागढ़ तक यात्री ट्रेन पहुंची 15 अगस्त 2024

अक्टूबर  2026  से रावघाट से सीधे रैक संचालन प्रारंभ होने की संभावना है, जिससे प्रतिदिन लगभग चार रैक यानी 15 हजार टन लौह अयस्क परिवहन संभव हो सकेगा। वर्ष 2025-26 में अंतागढ़ साइडिंग से 1.74 मिलियन टन आयरन ओर प्राप्त हुआ है, जबकि वर्ष 2026-27 में अंतागढ़ और रावघाट साइडिंग के माध्यम से अतिरिक्त 4 से 5 मिलियन टन लौह अयस्क प्राप्त होने का अनुमान है। परियोजना पूर्ण होने के बाद प्रतिवर्ष 6 से 7 मिलियन टन लौह अयस्क की आपूर्ति संभव होगी।
यह परियोजना भिलाई इस्पात संयंत्र की भविष्य की उत्पादन योजनाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में संयंत्र की लौह अयस्क आवश्यकता लगभग 32 हजार टन प्रतिदिन है। वहीं हॉट मेटल उत्पादन को 6.5 एमटीपीए से बढ़ाकर 7.5 एमटीपीए तथा वर्ष 2031 तक 10.5 एमटीपीए विस्तार लक्ष्य तक पहुंचाने की योजना पर कार्य किया जा रहा है।


रावघाट 1983 से एमओयू तक 

रावघाट रेलवे स्टेशन मई 2026

सेल-भिलाई स्टील प्लांट ने रावघाट खदानों के लिए 1983 में अपना पहला आवेदन किया और 13 साल बाद 1996 में पर्यावरण और वन मंत्रालय (एमओईएफ) ने सैद्धांतिक रूप से पर्यावरणीय मंज़ूरी दी थी।
रेलवे, मध्य प्रदेश राज्य सरकार (जिससे बाद में 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य का गठन किया गया), राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) के बीच 02 अप्रैल 1998 को एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।
2004 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने सेल को वानिकी और पर्यावरण मंजूरी के लिए नए सिरे से आवेदन प्रस्तुत करने को कहा। सेल ने आईबीएम, केंद्रीय खान एवं अनुसंधान संस्थान, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान और अन्य द्वारा अध्ययन करने के बाद 2006 में आवेदन प्रस्तुत किया। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मई 2007 में वन मंजूरी के लिए सेल के प्रस्ताव को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भेजे जाने के बाद, मंत्रालय ने इसे जून 2007 के आसपास सर्वोच्च न्यायालय की अधिकार प्राप्त समिति को भेज दिया।
दल्ली राजहरा-रावघाट-जगदलपुर (235 किमी) ब्रॉड गेज रेल लिंक परियोजना के निर्माण को लागत-साझाकरण के आधार पर कार्यान्वित करने के लिए 11 दिसंबर 2007 को रेल मंत्रालय और छत्तीसगढ़ सरकार, सेल, एनएमडीसी के बीच एक संशोधित समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।
सुप्रीम कोर्ट कमेटी ने अक्टूबर 2008 में रावघाट माइंस के एफ ब्लॉक के लिए वन मंजूरी के लिए अपनी अंतिम सहमति दी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अंतिम मंजूरी के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भेजा गया ।
छत्तीसगढ़ सरकार के खनिज संसाधन विभाग ने अंततः अक्टूबर 2009 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से उचित पर्यावरणीय मंजूरी और वानिकी मंजूरी मिलने के बाद सेल को 20 साल की अवधि के लिए रावघाट माइंस के एफ ब्लॉक के लिए खनन पट्टा प्रदान किया। 

नई रेल लाइन के लिए एमओयू 2007

ताड़ोकी रेलवे स्टेशन के समीप रेलवे ब्रिज 2026

'पब्लिक-पब्लिक पार्टनरशिप' (सार्वजनिक-सार्वजनिक भागीदारी) के एक बेहतरीन उदाहरण के रूप में, रेल मंत्रालय, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल), नेशनल मिनरल्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएमडीसी) और छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार ने मिलकर छत्तीसगढ़ में दल्लीराजहरा से जगदलपुर तक (रावघाट होते हुए) 235 किलोमीटर लंबी एक नई ब्रॉड गेज रेल लाइन बनाने के लिए साझा सहमति पत्र पर 11 दिसंबर 2007 को हस्ताक्षर किए।
इस अवसर पर केंद्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद, केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक तथा इस्पात मंत्री राम विलास पासवान, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और रेल राज्य मंत्री आर. वेलू उपस्थित थे। समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों में रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के.सी. जेना, छत्तीसगढ़ सरकार के मुख्य सचिव शिवराज सिंह, सेल के अध्यक्ष एस.के. रूंगटा और एनएमडीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक राणा सोम शामिल थे। इस अवसर पर रेल मंत्रालय, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, सेल और एनएमडीसी के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।

रेल मंत्री लालू बोले-विकास का मार्ग प्रशस्त करेगी नई रेल लाइन  

अक्टूबर 2009 में रावघाट खदान की माइनिंग लीज मिलने के बाद एमडी आर रामाराजू व अन्य 

इस अवसर पर बोलते हुए, रेल मंत्री लालू प्रसाद ने कहा कि यह नई रेल लाइन एक महत्वपूर्ण परियोजना है जो देश में आर्थिक विकास की गति को तेज करने में मदद करेगी। लालू प्रसाद ने कहा कि यह रेल लाइन बैलाडीला और रावघाट के लौह अयस्क से समृद्ध क्षेत्रों से होकर गुजरेगी, जिससे देश में इस्पात उत्पादन में वृद्धि होगी। मंत्री ने बताया कि यह नई लाइन अयस्कों और खनिजों के परिवहन के साथ-साथ वन उत्पादों के थोक परिवहन को भी सुगम बनाएगी। रेल मंत्री ने आगे कहा कि यह नई लाइन आदिवासी और पिछड़े वर्गों के लोगों को रोजगार के अनेक अवसर प्रदान करेगी और छत्तीसगढ़ के बस्तर तथा नारायणपुर जैसे पिछड़े क्षेत्रों के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगी। 1998 में हस्ताक्षरित पिछले एमओयू का ज़िक्र करते हुए, लालू प्रसाद यादव ने कहा कि कुछ कारणों से पिछले दशक के दौरान यह परियोजना शुरू नहीं हो पाई थी। मंत्री ने बताया कि पिछले महीने उनके मंत्रालय द्वारा बुलाई गई एक विशेष बैठक में इस मुद्दे को सुलझा लिया गया, जिसमें सभी संबंधित एजेंसियां शामिल थीं; इसी से आज के संशोधित समझौता ज्ञापन (एमओयू) का मार्ग प्रशस्त हुआ।

रमन ने बताया उत्तर और दक्षिण के बीच  सेतु तो 

पासवान ने कहा पीपीपी का बेहतरीन उदाहरण

मुख्यमंत्री डॉ. रमन को रावघाट खनन की योजना बताते बीएसपी के एमडी  आर. रामाराजू, 
ईडी माइंस मानस कुमार बिंदु, जीएम माइंस पीके सिन्हा व  
प्रदेश के वनमंत्री विक्रम उसेंडी और अन्य अफसर। (2008) 

अपने संबोधन में, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा कि इस नई रेल कनेक्टिविटी को पिछड़े बस्तर क्षेत्र की जीवन रेखा कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह उत्तर और दक्षिण के बीच एक सेतु (पुल) का काम भी करेगी। इस क्षेत्र के सुंदर, अत्यंत सघन और अद्वितीय वनों का ज़िक्र करते हुए, डॉ. रमन सिंह ने कहा कि यह नई रेल लाइन पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होगी। डॉ. सिंह ने कहा कि यह नई लाइन रेलवे की कमाई में भी काफी हद तक इज़ाफ़ा करेगी। 

अपने संबोधन में, केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक तथा इस्पात मंत्री राम विलास पासवान ने कहा कि यह नई रेल लाइन स्थानीय लोगों की लंबे समय से लंबित मांग को पूरा करेगी। उन्होंने यह भी बताया कि आज का एमओयू 'सार्वजनिक-सार्वजनिक भागीदारी' (पीपीपी) का एक बेहतरीन उदाहरण है। उन्होंने कहा कि यह सराहनीय है कि रेल मंत्रालय देश के पिछड़े क्षेत्रों के विकास की अवधारणा को आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि देश का सार्वजनिक क्षेत्र पूरी दक्षता के साथ कार्य कर रहा है, और उन्होंने उनसे आह्वान किया कि वे अपने मुनाफ़े का एक निश्चित प्रतिशत उस मद पर खर्च करें जिसे 'कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व' (सीएसआर) के रूप में जाना जाता है।
अपने स्वागत संबोधन में, रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के.सी. जेना ने कहा कि रेल मंत्री द्वारा की गई विशेष पहलों के कारण भारतीय रेलवे में एक ज़बरदस्त बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान एमओयू इसी पहल का एक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि इस एमओयू  पर हस्ताक्षर होने के साथ ही, देश में लौह अयस्क और इस्पात के सुगम परिवहन के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात होगा, और इससे आदिवासी बहुल बस्तर क्षेत्र का बहुप्रतीक्षित सामाजिक-आर्थिक विकास सुनिश्चित होगा।

दो चरणों में होगा निर्माण, 58 वैगन की होगी मालगाड़ी

रावघाट रेलवे स्टेशन का शानदार नजारा मई 2026

इस परियोजना का निर्माण दो चरणों में किया जाएगा। पहला चरण दल्लीराजहरा से रावघाट तक 95 किलोमीटर लंबा है, जबकि दूसरा चरण रावघाट से जगदलपुर तक 140 किलोमीटर लंबा है। वर्ष 2004-05 के मूल्य स्तरों के आधार पर, इस परियोजना की लागत 968.60 करोड़ रुपये है। पहला चरण पाँच साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है और इसका पूरा खर्च, जो कि 304 करोड़ रुपये है, सेल उठाएगी। दूसरे चरण पर 640 करोड़ रुपये का खर्च आएगा, जिसे भारतीय रेलवे (376 करोड़ रुपये – 57%), सेल (141 करोड़ रुपये – 21%), छत्तीसगढ़ राज्य सरकार (76 करोड़ रुपये – 12%) और एनएमडीसी (70 करोड़ रुपये – 10%) मिलकर साझा करेंगे। पहले चरण के लिए ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। इस नई रेलवे लाइन में 460 मीटर लंबी एक सुरंग, 46 रोड अंडर-ब्रिज, 16 रोड ओवर-ब्रिज, 42 बड़े पुल और 303 छोटे पुल शामिल होंगे। रेलवे ने शुरू में 10 स्टेशन बनाने की योजना बनाई है।
खनिजों और अयस्कों के परिवहन के अलावा, जो इस परियोजना का मुख्य कार्य होगा, इस रेल लाइन के माध्यम से स्थानीय क्षेत्र के वन उत्पादों, खाद्यान्नों आदि के परिवहन का भी प्रस्ताव है। इन वस्तुओं को संभालने के लिए पर्याप्त लोडिंग और अनलोडिंग की सुविधाएँ प्रदान की जाएँगी। लौह अयस्क, डोलोमाइट, बॉक्साइट आदि जैसे खनिज अयस्कों के परिवहन के लिए, रेलवे ने डीज़ल इंजन वाली मालगाड़ियाँ चलाने की योजना बनाई है, जिनमें 58 वैगन होंगे। उद्योग जगत की विशेष माँगों पर अतिरिक्त निजी साइडिंग्स की व्यवस्था करने पर भी विचार किया जा सकता है।

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