Saturday, April 22, 2017

 सड़क के रास्ते रावघाट खदान से जाएगा आयरन ओर

पहुंच मार्ग पर ट्राइल रन सफल परियोजना का मील का पत्थर हासिल

भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए भविष्य में लौह अयस्क का सुरक्षित भंडार साबित होने जा रहे रावघाट खदान तक भले ही रेल पटरियां न बिछ पाईं हो लेकिन सेल  बीएसपी ने अब सड़क मार्ग से लौह अयस्क लाने की तैयारी पूरी कर ली है। इस दिशा में 21 अप्रैल 2017 को एक महत्वपूर्ण पड़ाव हासिल हुआ है,जिसमें बीएसपी को आवंटित रावघाट खदान के एफ ब्लॉक से पहुंच मार्ग पर लौह अयस्क से लदे प्रथम ट्रक का ट्राइल रन सफलतापूर्वक संचालित किया गया। 
21 अप्रैल को बीएसपी को आवंटित रावघाट खदान का एफ ब्लॉक से अप्रोच रोड पर लौह अयस्क से लदे प्रथम ट्रक का ट्राइल रन को पीके सिन्हा, कार्यपालक निदेशक (खदान- रावघाट) एवं एमके बर्मन, कार्यपालक निदेशक (कार्मिक एवं प्रशासन) की उपस्थिति मे सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया। 
रावघाट भिलाई इस्पात संयंत्र की पूरी टीम को प्रेरित करने के अलावा,इस ट्रायल रन का उद्देश्य अप्रोच रोड की मजबूती/क्षमता,ढलान, घुमावदार क्षमता को निर्धारित करना था। 
रावघाट में अंतरिम खनन संचालन शुरू करने के लिए यह पहला कदम है।आगे की गतिविधियों में राजहरा से केवटी तक चलने वाली रेलवे लाइन को पूरा करने और रावघाट से केओति तक सड़क द्वारा अयस्क परिवहन की सरकारी अनुमति हासिल करना शामिल है। यह दोनों गतिविधियां अक्टूबर/नवंबर 2017 तक पूरी होने की संभावना है।इसके बाद रावघाट अयस्क को अंतरिम खनन के द्वारा भिलाई को उपलब्ध कराया जाएगा। 
भिलाई इस्पात संयंत्र महारत्न सेल का एकमात्र संयंत्र है जिसकी अपनी  स्वयं की कैप्टिव लौह अयस्क खदानें है और इस लाभ का फ ायदा उठाने के लिएसेल-भिलाई विभिन्न सरकारी एजेंसियों के साथ रावघाट खदान को हासिल करने के लिए सभी आवश्यक और सांविधिक मंजूरी पाने के भरसक प्रयास करता रहा है। 
पहली बार 1983 में खनन हेतु लीज के लिए आवेदन किया था। इसके बाद एक संशोधित आवेदन राज्य सरकार को 2 जून 1988 को प्रस्तुत किया गया। फॉरेस्ट क्लियरेंस का प्रथम चरण अक्टूबर 2008 में और पर्यावरण मंजूरी जून 2009 में प्राप्त की थी।
पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा भिलाई इस्पात संयंत्र को 5 अगस्त 2009 को स्टेज-2 यानि अंतिम फॉरेस्ट क्लियरेंस प्रदान किया गया। 15 सितंबर 2009 को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा भिलाई इस्पात संयंत्र को खनन हेतु लीज प्रदान की गयी जिससे रावघाट 'एफझ् ब्लॉक की लौह अयस्क भंडार से संयंत्र द्वारा खनन का मार्ग खुल गया। 
भिलाई से 185 किमी दक्षिण में स्थित रावघाट एफ ब्लॉक मटला आरक्षित वन क्षेत्र के तहत नारायणपुर और कांकेर के जिलों में फैला हुआ है और यहाँ का अनुमानित लौह अयस्क भंडार 511 मिलियन टन है। बीएसपी वतर्मान में आधुनिकरण एवं विस्तारिकरण कार्यक्रम से गुजर रहा है जिसके फलस्वरूप संयंत्र की हॉट मेटल बनाने की क्षमता 7.5 मिलियन टन तक बढ़ जाएगी। बीएसपीके दल्ली-राजहारा के मौजूदा कैप्टिव लौह अयस्क खदानों का भंडारण तेजी से घट रही है और सभी आवश्यक पर्यावरण और वन संबंधी मंजूरी हासिल करने के बाद खनन लीज के अनुदान से सेल और बीएसपी को बहुत राहत मिली है । हालांकि, रावघाट इलाके के सुरक्षा मुद्दों के चलते परियोजना पर काम वांछितगति प्राप्त नहीं कर पाया।  
फलस्वरूप भिलाई इस्पात संयंत्र की भविष्य की कच्ची सामग्री की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रावघाट परियोजना के महत्व और गंभीरता को समझतेहुए महारत्न सेल ने गृह मंत्रालय को परियोजना मे लगे विभिन्न कमिर्यों और ठेकेदारों की जिंदगी और संपत्ति की सुरक्षा हेतु बल प्रदान करने के लिए अनुरोध किया।रावघाट में खनन परियोजना कार्य को सुनिश्चित करने  के लिए सीमा सुरक्षा बल के दो बटालियन प्रदान किए गए।साथ ही एसएसबी की दो बटालियन प्रदान की गयी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दल्ली-राजहारा से रावघाट तक का रेल लाइन के विभिन्न हिस्सों का कार्य प्रगति कर सके।सेल-बीएसपी ने पैरा-मिलिटरी फोर्सेस को इस क्षेत्र मे कैंप स्थापित करने के लिए सभी जरूरी आधारिक संरचना प्रदान की है।  
कमिर्यों और उपकरणों की सुरक्षा की सुनिश्चिति के साथ, भिलाई इस्पात संयंत्र के रावघाटखदान विभाग के कमर्चारी आगे बढ़ते गए, विशेष रूप से पिछले दो सालों में, बिना कोई कसर छोड़ते हुये कई महत्वपूर्ण कार्यों को अंजाम दिया जैसे पेड़ के कटाई, खदान के लिए अप्रोच मार्ग का निर्माण, रेलवे लाइन के निर्माण और पानी की पाइपलाइनों आदि बिछाने सहित अन्य संबंधित कार्यों सहित कई अन्य मोर्चों पर तेजी से प्रगति दर्ज की है ।  
जबकि एक ओर नए खनन सुविधाओं की स्थापना के लिए सभी गतिविधियां जैसे सड़क निर्माण और रेलवे के चरण-वार बिन्दुओं को गति प्रदान की गयी,सीएसआर की गतिविधियों को बड़े पैमाने पर बीएसपी के खदान-सीएसआर कमिर्यों ने संचालित कर स्थानीय लोगों के दिल मे जगह बना ली।  

Friday, March 10, 2017

भिलाई स्टील प्लांट के नए ब्लास्ट फर्नेस-8 की स्टोव हीटिंग शुरू 


भिलाई स्टील प्लांट के नए ब्लास्ट फर्नेस-8 में 7 मार्च 2017 को स्टोव लाइटिंग की गई। 
इसके साथ ही स्टोव हीटिंग प्रक्रिया का शुभारंभ होने से सेल-भिलाई इस्पात संयंत्र अपने अत्याधुनिक एवं विस्तार कार्यक्रम के अन्तर्गत संयंत्र के 7.5 मिलियन टन हॉट मेटल उत्पादन क्षमता में वृद्धि की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील के पत्थर को पार कर लिया।
बीएसपी के सीईओ एम रवि सहित ईडी माइंस पी के सिन्हा, ईडी मटेरियल मैनेजमेेंट हृदय मोहन, ईडी वक्र्स टी बी सिंह, ईडी पीएंडए एमके बर्मन, ईडी प्रोजेक्ट कार्पोरेट आफिस एके माथुर एवं बीएसपी व परियोजनाएं विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, तकनीकी एवं उपकरण आपूर्तिकर्ता मेसर्स पॉल वर्थ, इटली एवं कंसोर्टियम पार्टनर, मेसर्स एलएंडटी व मेसर्स पॉलवर्थ, इण्डिया के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में स्टोव हीटिंग की प्रक्रिया को प्रारंभ किया गया। 
भिलाई इस्पात संयंत्र का यह नया ब्लास्ट फर्नेस-8 देश के सबसे बड़े ब्लास्ट फर्नेसों में से एक है, इसकी वार्षिक हॉट मेटल उत्पादन क्षमता 2.8 मिलियन टन है। अत्याधुनिक तकनीक से सुसज्जित इस ब्लास्ट फर्नेस में प्रति दिन 8000 टन से अधिक हॉट मेटल का उत्पादन किया जा सकता है।
नये ब्लास्ट फर्नेेस में तीन हॉट ब्लास्ट स्टोव का निर्माण किया गया है जिसमें वेल्डेड स्टील शेल्स एवं रिफ्रैक्ट्री चेकर ब्रिक्स बिछाया गया है। सिरामिक बर्नर्स के डिजाइन के साथ इन्टरनल कम्बश्चन टाइप स्टोव को मशरूम डोम का आकार दिया गया है, इसकी आपूर्ति मेसर्स पॉल वर्थ द्वारा की गई है, जिसमें 1250 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान के हॉट ब्लास्ट सप्लाई की पर्याप्त व्यवस्था होगी। हॉट ब्लास्ट स्टोव सिस्टम में फ्यूल गैस एवं कम्बश्चन एयर, फ्यूल गैस एग्जास्ट, फ्यूल चिमनी, कोल्ड ब्लास्ट आदि के साथ वॉल्व व कंट्रोल जैसी सुविधाएँ हैं। इसके अलावा वेस्ट हीट रिकवरी सिस्टम जो ब्लास्ट फर्नेस गैस व कम्बश्चन एयर के तापमान को नियंत्रित कर ऊर्जा संरक्षण सुनिश्चित करता है, जैसी सुविधाएँ भी इस स्टोव में हैं। स्टोव से जुड़े हुए कोल्ड ब्लास्ट लाइन का प्रेशर टेस्टिंग का सफलतापूर्वक परीक्षण 6 मार्च 2017 की शाम को किया गया। नए ब्लास्ट फर्नेस के स्टोव की लाइटिंग के बाद हीटिंग प्रक्रिया शुरू होने से अब आने वाले दिनों में जल्द ही नए ब्लास्ट फर्नेस के हीटिंग प्रक्रिया को प्रारंभ किया जा सकेगा। 

Wednesday, March 1, 2017

इंसान के चांद पर जाने की खबर सुनने के साथ शुरू हुआ स्पेस से मेरा इश्क 

यंग साइंटिस्ट कांग्रेस में हिस्सा लेने भिलाई पहुंचे इसरो चीफ ने की दिल की बातें 

भिलाई में पत्रकार बिरादरी के साथ डॉ. किरण कुमार 
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चेयरमैन डॉ. अलुरु सिरी किरण कुमार 28 फरवरी 2017 को भिलाई आए। यहां छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय भिलाई की मेजबानी में छत्तीसगढ़ काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नालॉजी (सी-कॉस्ट) की 15 वीं यंग साइंटिस्ट कांग्रेस में चीफ गेस्ट के तौर पर पहुंचे डॉ. किरण कुमार ने मिशन मंगल पर अपना आधार वक्तव्य (की-नोट एड्रेस) दिया और प्रेस से बातचीत में कई सवालों के जवाब भी दिए। इस दौरान तकनीकी विवि के कुलपति डॉ. मुकेश कुमार वर्मा भी मौजूद थे। 
सादगी पसंद शख्सियत डॉ. किरण कुमार बातचीत में भी बेहद सरल नजर आए। उन्होंने हिंदी में सारे सवालों के जवाब दिए। 15 फरवरी 2017 को इसरो के प्रक्षेपण यान पीएसएलवी ने श्रीहरिकोटा स्थित अंतरिक्ष केन्द्र से अपने एकल मिशन में देश-विदेश के रिकार्ड 104 उपग्रहों का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया है। इस उल्लेखनीय उपलब्धि के बाद चर्चा में आए इसरो चीफ किरण कुमार यहां भिलाई प्रवास के दौरान लोगों की नजरों में एक हीरो की तरह थे। हर कोई उनसे मिलना चाहता था और उन्होंने निराश भी नहीं किया। यहां तक कि फोटो खिंचवाने और आटोग्राफ देने में भी वह बेहद सहज रहे। पत्रकारों से बातचीत और अपने आधार वक्तव्य में उन्होंने जो कुछ कहा, वो सब कुछ इस अंदाज में-
थुंबा में पहला परीक्षण बिशप की मदद से 
21 नवंबर 1963 को देश का पहला रॉकेट लांच किया गया। इसकी असेम्बलिंग थुम्बा के सेंट मैरी मैगडलिन चर्च में की गई। चूंकि यह पहली बार हो रहा था और इसमें लांचिंग के दौरान तेज आवाज होनी थी। इसलिए इस चर्च के बिशप पीटर बर्नार्ड परेरा को पूरी जानकारी दी गई और उनसे मदद मांगी गई। इसके बाद बिशप ने गांव व आस-पास के मछुवारों को सहमत किया कि यहां जो भी होगा वह आप सबके फायदे के लिए होगा। इससे रॉकेट परीक्षण पूरी तरह शांतिपूर्ण हुआ। 
मछुवारों को दिया वादा निभाया इसरो ने
यहां से भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान का सफर शुरू हुआ। तब मछुआरों से जो वादा बिशप ने किया था, इसरो ने उस वादे के अनुरूप कई सौगातें मछुवारों को दी है। आज देश भर के समुद्री तटवर्तीय मछुवारों के पास जीपीएस प्रणाली है और उन्हें मछली पकडऩे में मौसम के अनुमान की सटीक जानकारी इसरो देता है। तब एक चर्च से शुरू हुआ सफर आज मंगल ग्रह तक पहुंच चुका है। 
हमनें नासा की गलतियों से सीखा, तब मिली सफलता
जब तक हम अपनी या दूसरों की गलतियों से नहीं सीखते, तब तक हमें सफलता नहीं मिलती। मंगल मिशन की शुरूआत अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने की थी। उनसे कुछ गलतियां हुई। यही गलतियां हमारे लिए मील का पत्थर साबित हुई। हमनें इन गलतियों से सीखा और अपनी राह आसान की। मंगल ग्रह से भेजे जा रहे फोटोग्राफ्स पर लगातार अनुसंधान चल रहा है और भविष्य में कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामनें आएंगी। 
मंगलयान की कक्षा बदलने में कामयाब
मिशन मंगल में कई महत्वपूर्ण पड़ाव आ रहे हैं। मंगलयान-1 की दिशा परिवर्तन की गई। जनवरी में लंबी अवधि के सूर्य ग्रहण के दौरान मंगलयान की कक्षा में सुधार किया गया है। यदि ऐसा नहीं करते तो यान की बैटरी डिस्चार्ज हो जाती। क्योंकि ग्रहण की वजह से सूर्य की रौशनी उस पर नहीं पड़ती। कक्षा में सुधार कर देने से यान की लाइफ बढ़ गई है। प्रोजेक्ट पांच साल और जारी रहेगा।
अब चांद और मंगल मिशन की तैयारी
अंतरिक्ष में एक साथ 104 उपग्रहों की लॉन्चिंग से अपनी धाक जमाने के बाद अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) चांद और मंगल मिशन में कामयाबी पाने की तैयारी में है। वैज्ञानिक अब चंद्रयान-2 की तैयारी में जुट गए हैं। पिछले मिशन में चांद की कक्षा का चक्कर लगाने वाला उपग्रह यानी ऑर्बिटर छोड़ा गया था। इस बार वैज्ञानिक ऑर्बिटर के साथ चांद पर रोवर उतारने की भी कोशिश करेंगे। यह मिशन 2018 से शुरू होगा, जिसके 2021-22 तक पूरा होने की उम्मीद है।
बातचीत के दौरान, साथ हैं वाइस चांसलर 
इंसान के चांद पर पहुंचने की खबर से शुरू हुआ मेरा इश्क
अपने ख्वाबों की बात करूं तो स्कूल में मैं भी दूसरे बच्चों की तरह सिर्फ अपने बेहतर माक्र्स और हाइएस्ट परेंटेज चाहता था। हाई स्कूल में फिजिक्स के टीचर नरसिम्हैया सर ने प्रभावित किया। वो हमेशा नई तकनीक के बारे में बताते थे। एक रोज उनके रेडियो पर एक खबर सुनने को मिली कि इंसान के कदम चांद पर पड़े हैं, इससे मैं बेहद रोमांचित हो उठा। यहां से स्पेस टेक्नालॉजी को लेकर जो इश्क हुआ वो लगातार परवान चढ़ता गया और उसी की बदौलत मैं यहां तक पहुंचा।
इस कायनात में हम अकेले नहीं 
धरती से परे जीवन के अभी तक ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं। इस पर लगातार शोध चल रहा है। इसके बावजूद हम यह नहीं कह सकते कि इस समूची कायनात में हम अकेले हैं। उम्मीद रखनी चाहिए कि भविष्य में कुछ चौंकाने वाले नतीजे मिले। 
प्राचीन ग्रंथों को नजर अंदाज नहीं कर सकते
वेद-पुराण या प्राचीन ग्रंथों को हम नजर अंदाज नहीं कर सकते लेकिन विज्ञान के इस दौर में हम अपने आंख-कान खुले रखना चाहिए। विज्ञान की भी एक सीमा है लेकिन प्राचीन ग्रंथों में अगर कुछ उल्लेख है तो उसे परीक्षण की कसौटी पर कसना चाहिए। 
हमारे सामने है चीन की मिसाल 
चीन के झिंझियांग प्रांत की टू यूयू ने अपने शोध से स्पष्ट किया कि एक हजार साल पहले भी मलेरिया का रोग था और उसका उपचार आज की ही तरह किया जाता था। इस पर उन्हें 2015 का नोबेल पुरस्कार दिया गया। इसी तरह हम अपने यहां भी हजारों साल पुराने ग्रंथों/प्रमाणों के आधार पर अपने शोध को दिशा दे सकते हैं। 
फि लहाल अंतरिक्ष में कोई बाहरी मरम्मत कार्य संभव नहीं 
अंतरिक्ष विज्ञान में फि लहाल सिर्फ अवलोकन ही संभव है। उपग्रह के माध्यम से ओजोन परत के नुकसान की मरम्मत या दूसरे ऐसे किसी बाहरी कार्य की संभावनाएं फिलहाल नहीं है। जैसे स्पेस टेक्नालॉजी के माध्यम से भूजल स्त्रोत का पता तो लगाया जा सकता है लेकिन पानी की गुणवत्ता जांचना इससे संभव नहीं है।
अगले दो महीने में एक और प्रक्षेपण
दो महीने के भीतर अप्रैल-मई में कार्टो-2 सीरिज का उपग्रह प्रक्षेपित करने की तैयारी पूरी हो चुकी है। इसके साथ भी अलग-अलग देशों के उपग्रह भी प्रक्षेपित किए जाएंगे लेकिन इनकी संख्या 15 फरवरी जितनी (104) नहीं होगी। लेकिन संभव है कि कुछ ज्यादा वजन के भी उपग्रह भेजे जाएं। जो 40,80 या 100 किग्रा तक के हो सकते हैं। इस तरह साल भर में पीएसएलवी मेें 6 से 7 और जीएसएलवी में 3 उपग्रह प्रक्षेपण की तैयारी है। 
रूंगटा कॉले्ज में अपनी रंगोली के सामने इसरो चीफ
मानव को भेजना या अंतरिक्ष में स्टेशन प्राथमिकता नहीं 
अंतरिक्ष में मानव को भेजने हम पूरी तरह सक्षम हैं लेकिन यह हमारी प्राथमिकता सूची में उपर नहीं है। अभी हमें रिमोट सेंसिंग तकनीक और संचार प्रणाली में काफी कुछ करना है। जहां तक अंतरिक्ष में भारत का अपना स्पेस स्टेशन स्थापित करने की संभावनाओं की बात है तो यह बहुत ही शुरूआती स्तर पर प्रस्ताव के रूप में है। इस दिशा में अभी प्राथमिकता से नहीं सोचा गया है। अभी हमारा पूरा ध्यान अर्थ ऑब्जर्वेशन,सेटेलाइट कम्यूनिकेशन, नैविगेशन व क्लाइमेट चेंज पर्यावरण के प्रभाव के अध्यन और अवलोकन पर है।
इसरो की सफलता का श्रेय पूरी टीम को 
अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में इसरो की अब तक की उपलब्धि का श्रेय पूरी टीम को है। यहां टीम वर्क से कार्य होता है और इसरो की सफलता में एक बायोलाजिस्ट से लेकर कंप्यूटर इंजीनियर तक सभी के योगदान को इसका श्रेय जाता है। 
छत्तीसगढ़ के गांवों का डिजिटल डाटा तैयार करने देंगे मदद 
छत्तीसगढ़ के गांवों का डिजिटल डाटा तैयार करने में हम इसरो की तरफ से छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय के स्टूडेंट की मदद करेंगे। उन्हें  सैटेलाइट से मिट्टी-जल परीक्षण, गांवों में शिक्षा का स्तर लाइफ स्टाइल और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे विषयों का डिजिटल डाटा तैयार करने की ट्रेनिंग दी जाएगी। यह डाटा राज्य सरकार को दिया जाएगा। इसकी शुरुआत तकनीकी विवि के 55 गोद लिए गांवों से की जाएगी। इस संबंध में आज ही रूंगटा इंजीनियरिंग कॉलेज परिसर में तकनीकी विवि,सीजीकॉस्ट व कृषि विभाग समेत अन्य शासकीय विभाग के अफ सरों की बैठक हमने की है। जिसके बेहतर नतीजे आने की उम्मीद है। 
निजी कंपनियों के साथ अनुबंध अभी तय नहीं
 सैटेलाइट लांचिंग और अन्य कार्यों के लिए निजी सेक्टर को भी लेने की योजना बनी है, लेकिन अभी बात नहीं बनी है। जल्द ही फैसला हो जाएगा। फिलहाल कोई नाम सामने नहीं है। इंदौर में इसरो का प्रक्षेपण सेंटर सहित कई प्रस्ताव आए हुए हैं, इसको लेकर फिलहाल कोई तैयारी नहीं है।