Wednesday, March 1, 2017

इंसान के चांद पर जाने की खबर सुनने के साथ शुरू हुआ स्पेस से मेरा इश्क 

यंग साइंटिस्ट कांग्रेस में हिस्सा लेने भिलाई पहुंचे इसरो चीफ ने की दिल की बातें 

भिलाई में पत्रकार बिरादरी के साथ डॉ. किरण कुमार 
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के चेयरमैन डॉ. अल्लुरु सिरीन किरण कुमार 28 फरवरी 2017 को भिलाई आए। यहां छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय भिलाई की मेजबानी में छत्तीसगढ़ काउंसिल फॉर साइंस एंड टेक्नालॉजी (सी-कॉस्ट) की 15 वीं यंग साइंटिस्ट कांग्रेस में चीफ गेस्ट के तौर पर पहुंचे डॉ. किरण कुमार ने मिशन मंगल पर अपना आधार वक्तव्य (की-नोट एड्रेस) दिया और प्रेस से बातचीत में कई सवालों के जवाब भी दिए। इस दौरान तकनीकी विवि के कुलपति डॉ. मुकेश कुमार वर्मा भी मौजूद थे। 
सादगी पसंद शख्सियत डॉ. किरण कुमार बातचीत में भी बेहद सरल नजर आए। उन्होंने हिंदी में सारे सवालों के जवाब दिए। 15 फरवरी 2017 को इसरो के प्रक्षेपण यान पीएसएलवी ने श्रीहरिकोटा स्थित अंतरिक्ष केन्द्र से अपने एकल मिशन में देश-विदेश के रिकार्ड 104 उपग्रहों का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया है। इस उल्लेखनीय उपलब्धि के बाद चर्चा में आए इसरो चीफ किरण कुमार यहां भिलाई प्रवास के दौरान लोगों की नजरों में एक हीरो की तरह थे। हर कोई उनसे मिलना चाहता था और उन्होंने निराश भी नहीं किया। यहां तक कि फोटो खिंचवाने और आटोग्राफ देने में भी वह बेहद सहज रहे। पत्रकारों से बातचीत और अपने आधार वक्तव्य में उन्होंने जो कुछ कहा, वो सब कुछ इस अंदाज में-
थुंबा में पहला परीक्षण बिशप की मदद से 
21 नवंबर 1963 को देश का पहला रॉकेट लांच किया गया। इसकी असेम्बलिंग थुम्बा के सेंट मैरी मैगडलिन चर्च में की गई। चूंकि यह पहली बार हो रहा था और इसमें लांचिंग के दौरान तेज आवाज होनी थी। इसलिए इस चर्च के बिशप पीटर बर्नार्ड परेरा को पूरी जानकारी दी गई और उनसे मदद मांगी गई। इसके बाद बिशप ने गांव व आस-पास के मछुवारों को सहमत किया कि यहां जो भी होगा वह आप सबके फायदे के लिए होगा। इससे रॉकेट परीक्षण पूरी तरह शांतिपूर्ण हुआ। 
मछुवारों को दिया वादा निभाया इसरो ने
यहां से भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान का सफर शुरू हुआ। तब मछुआरों से जो वादा बिशप ने किया था, इसरो ने उस वादे के अनुरूप कई सौगातें मछुवारों को दी है। आज देश भर के समुद्री तटवर्तीय मछुवारों के पास जीपीएस प्रणाली है और उन्हें मछली पकडऩे में मौसम के अनुमान की सटीक जानकारी इसरो देता है। तब एक चर्च से शुरू हुआ सफर आज मंगल ग्रह तक पहुंच चुका है। 
हमनें नासा की गलतियों से सीखा, तब मिली सफलता
जब तक हम अपनी या दूसरों की गलतियों से नहीं सीखते, तब तक हमें सफलता नहीं मिलती। मंगल मिशन की शुरूआत अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने की थी। उनसे कुछ गलतियां हुई। यही गलतियां हमारे लिए मील का पत्थर साबित हुई। हमनें इन गलतियों से सीखा और अपनी राह आसान की। मंगल ग्रह से भेजे जा रहे फोटोग्राफ्स पर लगातार अनुसंधान चल रहा है और भविष्य में कई महत्वपूर्ण जानकारियां सामनें आएंगी। 
मंगलयान की कक्षा बदलने में कामयाब
मिशन मंगल में कई महत्वपूर्ण पड़ाव आ रहे हैं। मंगलयान-1 की दिशा परिवर्तन की गई। जनवरी में लंबी अवधि के सूर्य ग्रहण के दौरान मंगलयान की कक्षा में सुधार किया गया है। यदि ऐसा नहीं करते तो यान की बैटरी डिस्चार्ज हो जाती। क्योंकि ग्रहण की वजह से सूर्य की रौशनी उस पर नहीं पड़ती। कक्षा में सुधार कर देने से यान की लाइफ बढ़ गई है। प्रोजेक्ट पांच साल और जारी रहेगा।
अब चांद और मंगल मिशन की तैयारी
अंतरिक्ष में एक साथ 104 उपग्रहों की लॉन्चिंग से अपनी धाक जमाने के बाद अब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) चांद और मंगल मिशन में कामयाबी पाने की तैयारी में है। वैज्ञानिक अब चंद्रयान-2 की तैयारी में जुट गए हैं। पिछले मिशन में चांद की कक्षा का चक्कर लगाने वाला उपग्रह यानी ऑर्बिटर छोड़ा गया था। इस बार वैज्ञानिक ऑर्बिटर के साथ चांद पर रोवर उतारने की भी कोशिश करेंगे। यह मिशन 2018 से शुरू होगा, जिसके 2021-22 तक पूरा होने की उम्मीद है।
बातचीत के दौरान, साथ हैं वाइस चांसलर 
इंसान के चांद पर पहुंचने की खबर से शुरू हुआ मेरा इश्क
अपने ख्वाबों की बात करूं तो स्कूल में मैं भी दूसरे बच्चों की तरह सिर्फ अपने बेहतर माक्र्स और हाइएस्ट परेंटेज चाहता था। हाई स्कूल में फिजिक्स के टीचर नरसिम्हैया सर ने प्रभावित किया। वो हमेशा नई तकनीक के बारे में बताते थे। एक रोज उनके रेडियो पर एक खबर सुनने को मिली कि इंसान के कदम चांद पर पड़े हैं, इससे मैं बेहद रोमांचित हो उठा। यहां से स्पेस टेक्नालॉजी को लेकर जो इश्क हुआ वो लगातार परवान चढ़ता गया और उसी की बदौलत मैं यहां तक पहुंचा।
इस कायनात में हम अकेले नहीं 
धरती से परे जीवन के अभी तक ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं। इस पर लगातार शोध चल रहा है। इसके बावजूद हम यह नहीं कह सकते कि इस समूची कायनात में हम अकेले हैं। उम्मीद रखनी चाहिए कि भविष्य में कुछ चौंकाने वाले नतीजे मिले। 
प्राचीन ग्रंथों को नजर अंदाज नहीं कर सकते
वेद-पुराण या प्राचीन ग्रंथों को हम नजर अंदाज नहीं कर सकते लेकिन विज्ञान के इस दौर में हम अपने आंख-कान खुले रखना चाहिए। विज्ञान की भी एक सीमा है लेकिन प्राचीन ग्रंथों में अगर कुछ उल्लेख है तो उसे परीक्षण की कसौटी पर कसना चाहिए। 
हमारे सामने है चीन की मिसाल 
चीन के झिंझियांग प्रांत की टू यूयू ने अपने शोध से स्पष्ट किया कि एक हजार साल पहले भी मलेरिया का रोग था और उसका उपचार आज की ही तरह किया जाता था। इस पर उन्हें 2015 का नोबेल पुरस्कार दिया गया। इसी तरह हम अपने यहां भी हजारों साल पुराने ग्रंथों/प्रमाणों के आधार पर अपने शोध को दिशा दे सकते हैं। 
फि लहाल अंतरिक्ष में कोई बाहरी मरम्मत कार्य संभव नहीं 
अंतरिक्ष विज्ञान में फि लहाल सिर्फ अवलोकन ही संभव है। उपग्रह के माध्यम से ओजोन परत के नुकसान की मरम्मत या दूसरे ऐसे किसी बाहरी कार्य की संभावनाएं फिलहाल नहीं है। जैसे स्पेस टेक्नालॉजी के माध्यम से भूजल स्त्रोत का पता तो लगाया जा सकता है लेकिन पानी की गुणवत्ता जांचना इससे संभव नहीं है।
अगले दो महीने में एक और प्रक्षेपण
दो महीने के भीतर अप्रैल-मई में कार्टो-2 सीरिज का उपग्रह प्रक्षेपित करने की तैयारी पूरी हो चुकी है। इसके साथ भी अलग-अलग देशों के उपग्रह भी प्रक्षेपित किए जाएंगे लेकिन इनकी संख्या 15 फरवरी जितनी (104) नहीं होगी। लेकिन संभव है कि कुछ ज्यादा वजन के भी उपग्रह भेजे जाएं। जो 40,80 या 100 किग्रा तक के हो सकते हैं। इस तरह साल भर में पीएसएलवी मेें 6 से 7 और जीएसएलवी में 3 उपग्रह प्रक्षेपण की तैयारी है। 
रूंगटा कॉले्ज में अपनी रंगोली के सामने इसरो चीफ
मानव को भेजना या अंतरिक्ष में स्टेशन प्राथमिकता नहीं 
अंतरिक्ष में मानव को भेजने हम पूरी तरह सक्षम हैं लेकिन यह हमारी प्राथमिकता सूची में उपर नहीं है। अभी हमें रिमोट सेंसिंग तकनीक और संचार प्रणाली में काफी कुछ करना है। जहां तक अंतरिक्ष में भारत का अपना स्पेस स्टेशन स्थापित करने की संभावनाओं की बात है तो यह बहुत ही शुरूआती स्तर पर प्रस्ताव के रूप में है। इस दिशा में अभी प्राथमिकता से नहीं सोचा गया है। अभी हमारा पूरा ध्यान अर्थ ऑब्जर्वेशन,सेटेलाइट कम्यूनिकेशन, नैविगेशन व क्लाइमेट चेंज पर्यावरण के प्रभाव के अध्यन और अवलोकन पर है।
इसरो की सफलता का श्रेय पूरी टीम को 
अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में इसरो की अब तक की उपलब्धि का श्रेय पूरी टीम को है। यहां टीम वर्क से कार्य होता है और इसरो की सफलता में एक बायोलाजिस्ट से लेकर कंप्यूटर इंजीनियर तक सभी के योगदान को इसका श्रेय जाता है। 
छत्तीसगढ़ के गांवों का डिजिटल डाटा तैयार करने देंगे मदद 
छत्तीसगढ़ के गांवों का डिजिटल डाटा तैयार करने में हम इसरो की तरफ से छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय के स्टूडेंट की मदद करेंगे। उन्हें  सैटेलाइट से मिट्टी-जल परीक्षण, गांवों में शिक्षा का स्तर लाइफ स्टाइल और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे विषयों का डिजिटल डाटा तैयार करने की ट्रेनिंग दी जाएगी। यह डाटा राज्य सरकार को दिया जाएगा। इसकी शुरुआत तकनीकी विवि के 55 गोद लिए गांवों से की जाएगी। इस संबंध में आज ही रूंगटा इंजीनियरिंग कॉलेज परिसर में तकनीकी विवि,सीजीकॉस्ट व कृषि विभाग समेत अन्य शासकीय विभाग के अफ सरों की बैठक हमने की है। जिसके बेहतर नतीजे आने की उम्मीद है। 
निजी कंपनियों के साथ अनुबंध अभी तय नहीं
 सैटेलाइट लांचिंग और अन्य कार्यों के लिए निजी सेक्टर को भी लेने की योजना बनी है, लेकिन अभी बात नहीं बनी है। जल्द ही फैसला हो जाएगा। फिलहाल कोई नाम सामने नहीं है। इंदौर में इसरो का प्रक्षेपण सेंटर सहित कई प्रस्ताव आए हुए हैं, इसको लेकर फिलहाल कोई तैयारी नहीं है।

Sunday, January 22, 2017

आम जनता को खुश करने के लिए नहीं है शास्त्रीय संगीत

खयाल गायक पं. सत्यशील देशपांडेय से  मुहम्मद जाकिर हुसैन की खास बातचीत 

जाने-माने खयाल गायक पं. सत्यशील देशपांडेय 6-7 जनवरी 2017 को भिलाई-दुर्ग आए थे। महान गायक पं. कुमार गंधर्व के शिष्य होने के नाते उनकी अलग पहचान है। शास्त्रीय संगीत पर आधारित पृष्ठभूमि वाली कुछेक हिंदी-मराठी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी आवाज दी है। यहां दुर्ग के शासकीय डॉ. वामन वासुदेव पाटणकर कन्या स्नातकोत्तर कॉलेज में शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक संगोष्ठी में हिस्सा लेने आए पं. देशपांडेय से मेरी लंबी बातचीत हुई। पं. देशपांडेय को प्रख्यात पेंटर सैयद हैदर रजा के नाम पर स्थापित रजा सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। संयोग से बातचीत के दौरान इसी कॉलेज में प्रोफेसर और रजा अवार्ड प्राप्त प्रख्यात चित्रकार योगेंद्र त्रिपाठी भी मौजूद थे। बातचीत के दौरान पं. देशपांडेय ने शास्त्रीय संगीत के शिक्षण-प्रशिक्षण से लेकर रियालिटी शो और फिल्मों तक ढेर सारे सवालों के जवाब बड़े धीरज के साथ दिया। धाराप्रवाह बातचीत के दौरान उन्होंने शास्त्रीय संगीत और उसके व्याकरण पर भी बहुत कुछ कहा। इसलिए इंटरव्यू बनाने के  दौरान मैनें अपने शहर के वरिष्ठ संगीतज्ञ प्रख्यात वायलिन वादक पं. कीर्ति माधव व्यास से भी कुछ जरूरी सलाह ली। जिससे कि तथ्यात्मक गलती न जाए। इसके बाद तैयार हुआ यह पूरा इंटरव्यू-

0 शास्त्रीय संगीत की शिक्षण पद्धति कैसी होनी चाहिए,खास कर बच्चों के लिए ? 
00 आज बच्चों को शास्त्रीय संगीत के नाम पर व्याकरण ज्यादा बताया जाता है। ऐसे में हमारे बच्चे शास्त्रीय संगीत को सरलता से कैसे आत्मसात कर पाएंगे? मैं बच्चों को बताऊं कि भूप में मध्यम और निषाद वज्र्य है और तीन ताल की मात्राएं 16 हैं तो बच्चे बोर हो जाएंगे। अगर मैं राग भूप के तराने से ही शुरूआत करूं तो बेहतर होगा। दरअसल आज लोगों के पास आधे-पौन घंटे की बंदिश सुनने का भी धीरज नहीं है। इसलिए मैनें फाइव मिनिट्स क्लासिकल म्यूजिक (एफएमसीएम) का कंसेप्ट दिया हैै। 
0 तराना ही क्यों..? 
इंटरव्यू के दौरान पं. देशपांडेय और योगेंद्र त्रिपाठी के साथ 
00 मेरा मानना है कि आपकी मातृभाषा अलग-अलग हो तो भी आप तराना गा सकते हैं। मैनें पांच मिनट में शास्त्रीय संगीत (एफएमसीएम) की जो अवधारणा दी उसमें  एक-एक राग का एक-एक तराना स्कूली बच्चों को बताया जाता है। महाराष्ट्र के स्कूलों में यह प्रयोग चल रहा है। इसके लिए करीब 20 तराने मैनें गाए हैं और 30 अन्य कलाकारों से गवाए हैं। मैनें स्पिक मैके के प्रोग्राम में एक लोकप्रिय गीत 'कजरारे-कजरारे' लिया और उसे 8 मात्रा के एक चक्र के बजाए 8-8 मात्रा के दो चक्र (16 मात्रा) में गा कर बताया। इससे बच्चे भी खुश हो गए और उनकी हमारे संगीत की विविधता भी समझ में आ गई। बात सिर्फ 'कजरारे-कजरारे' की नहीं है,आप आज का कोई भी लोकप्रिय गाना लेकर आइए मैं उसे एक ताल या तीन ताल में बनाके बच्चों को बताउंगा तो उसमें बच्चे एन्ज्वाए करेंगे और संगीत को भी समझेंगे। 
0 बच्चों का शिक्षण तो ठीक है लेकिन आम जनमानस तक शास्त्रीय संगीत को पहुंचाने कलाकार का दायित्व कितना है? 
00 देखिए,हमारे शास्त्रीय संगीत में असीमित संभावनाएं हैं और वो किसी भी सच्चे कलाकार को हमेशा प्रेरित करती है। इससे कलाकार तो आनंदित होता ही है लेकिन ज्यादा से ज्यादा श्रोताओं तक पहुंचने का काम प्रतिभाशाली कलाकार कर नहीं पाते हैं। क्योंकि वो तो अपने परफ ार्मेंस और रियाज में व्यस्त रहते हैं। इसलिए सबसे बड़ी जवाबदारी अकादमिक क्षेत्र के लोगों की है। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में जो लोग संगीत के शिक्षण से जुड़े हैं और आज की पीढ़ी के सीधे संपर्क में हैं, यह उनका दायित्व है कि हमारे शास्त्रीय संगीत के प्रति युवा पीढ़ी में समझ पैदा करे और ज्यादा से ज्यादा लोगों को संगीत से जोड़ें। 
0 आजादी से पहले और बाद के दौर में शास्त्रीय संगीत और कलाकारों को लेकर क्या बदलाव देखते हैं? 
आजादी से पहले संपर्क माध्यम उतने नहीं थे। ऐसे में समाज से शास्त्रीय संगीतकारों की अपेक्षाएं सिर्फ यही थी कि उसकी साधना में कोई बाधा न आए। तब कलाकार को लोकप्रिय होने की जरुरत नहीं थी। तब कलाकारों-पहलवानों को राजा-महाराजा का संरक्षण मिलता था। इसलिए जनता को खुश करने की तब नौबत नहीं आई थी। लेकिन स्वातंंत्र्य के बाद जब राजा-महाराजा का दौर खत्म हुआ तो भरण-पोषण के लिए कलाकारों का पाला जनता जनार्दन से पड़ा। ऐसे में कलाकारों ने नई तरकीबें ढूंढ निकाली। जैसे अतिगद्रुत तराने गाना या झाला बजाना। 
0 ...तो क्या शास्त्रीय संगीत आम जनता के लिए नहीं है? 
00 मेरा मानना है कि हमारे शास्त्रीय संगीत का स्वभाव आपस की गुफ्तगू जैसा है। मसलन एक कमरे में 10-20 लोग बैठे हैं और कलाकार गा या बजा रहा है तो वहां राग की बारीकियां उभर कर आएगी। अब वही कलाकार हजारों लोगों के बीच परफार्म करे तो पता नहीं कितने लोग इन बारीकियों को पकड़ पाएंगे। हमारा संगीत जनता को खुश करने के लिए नहीं है बल्कि यह बहुत हद तक स्वांत: सुखाय जैसा है। मैनें अपने जीवन में अपने गुरु पं. कुमार गंधर्व के अलावा पं. रविशंकर और पं. भीमसेन जोशी जैसे कलाकारों को सुना है तो उनका सर्वोत्तम मुझे घरेलू महफिलों में ही मिला है। 
0 तो शास्त्रीय संगीत फिर जनता विमुख हुआ ना?
00 देखिए, आम जनता को तो द्रुत गति का संगीत ज्यादा आकर्षित करेगा। हमारा शास्त्रीय संगीत एक अलग तबीयत का है वो बहुत ही नाजुक है और मौन की तरफ ले जाता है। आबादी बढ़ी है तो जनता को आकर्षित करने की तरकीबें भी निकाली गई हैं। जरूरी नहीं कि उससे सच्चा कलाकार भी खुश हो। मान लो मेरी महफिल हो रही है तो उसमें मैं एक हजार लोगों को खुश करूं, उससे बेहतर होगा कि मैं समझ रखने वाले 5 लोगों के लिए अपना संगीत पेश करुं। मैं ग्रेट ब्रिटेन कई बार गया हूं। वहां शेक्सपियर को पढऩे वाले लोग वहां की आबादी के हिसाब से 1-2 प्रतिशत ही होंगे। हमारी शास्त्रीय कलाएं हमेशा सीमित लोगों तक रही हैं और इसमें वो लोग खुश थे। जनता अभिमुख कला का होना ये तो आजादी के बाद आया है और ये कोई उत्कृष्टता की कसौटी नहीं है। 
0 सुगम संगीत का अपना श्रोता वर्ग है और वो शास्त्रीय संगीत की अपेक्षा कहीं ज्यादा बड़ा है? 
00 वह तो होगा ही। सुगम संगीत और शास्त्रीय संगीत में फ र्क ये है कि सुगम संगीत पूर्व निश्चित है। जैसे 'आधा है चंद्रमा रात आधी' गाना किसी सिचुएशन से बना है। अब ये गाना आपको 2017 में भी अच्छा लगता है तो मैं ईष्र्या करुंगा कि क्या खुश आदमी है ये कि इसको उसी गाने से तृप्ति मिल जाती है। लेकिन जिसकी सांगीतिक आत्मा तड़पती है तो उसको शास्त्रीय संगीत तक आना पड़ता है। हमारे शास्त्रीय संगीत में दो वैश्विक रिदम छह मात्रा का दादरा और 8 मात्रा का कहरवा है। इसके दुगुने मात्रा के ताल हमारे ख्याल संगीत में बनें। ताल का पहला आधा और दूसरा आधा ये कंसेप्ट दुनिया के किसी भी संगीत में नहीं है मैं इस संगीत को श्रेष्ठ बताने का दावा नहीं कर रहा हूं,इसकी खासियत बता रहा हूं। 
0 शास्त्रीय संगीत में खास कर गायन में किन तत्वों का समावेश होता है और श्रोता वर्ग इनसे किस हद तक प्रभावित होता है? 
00 शास्त्रीय संगीत में एक कलाकार का स्वभाव, उसके संस्कार, उसकी तालीम और उसकी तत्काल स्वस्फूर्तता जैसे तत्वों से प्रस्तुति का रूप बनता है। इसलिए हमारे संगीत की ये परंपरा रही है कि उसी गायक के उसी राग को ताल में गाए जाने वाले उसी बंदिश को सुनने के लिए वही श्रोता इस उम्मीद पर बार-बार जाते हैं कि अब कुछ नया होगा। यह बात आप दूसरे संगीत में नहीं पा सकते। हमारे संगीत का वैभव और इसकी ऊंचाई है कि हर स्तर पर किसी भी उम्र में लोग बंदिशों का आनंद ले सकते हैं। शास्त्रीय संगीत में नवनिर्माण की खासियत है और जिसको इसका चस्का पड़ जाए तो यही आनंद उसके लिए बहुत है। इसके बाद दस हजार लोगों को संगीत अच्छा लगता है कि नहीं इससे उसे क्या वास्ता...?
अपने गुरू पं. कुमार गंधर्व के साथ संगत करते हुए
0 आपके गुुरू पं. कुमार गंधर्व इस बारे में क्या सोचते थे? उनकी शिक्षण पद्धति कैसी थी? 
00 पं. कुमार गंधर्व को करोड़ों लोगों ने सुना पर उन्होंने कभी जनता के लिए समझौता नहीं किया। कोई उनकी कोई नकल करे या उनका कोई घराना बने ये उनकी इच्छा कभी नहीं थी। वो कहते थे कि मेरा सौंदर्य विचार, मेरा सांगीतिक विचार है। जब वो सिखाने बैठते थे तो हम लोगों को कोई विशिष्ट राग के साथ उससे जुड़ी परंपरा और अन्य पहलू भी समझाते थे। उसके बाद कहते थे-मैनें आपको बता दिया, अब आप अपना रास्ता ढंूढो और इसलिए ही मैं उनके श्रेष्ठ गुरू मानता हूं। उनकी जगह कोई और होता तो रटवा लेता। लेकिन उनका भी शिक्षण ऐसा ही हुआ था। हमारे पंडित जी के गुरूजी पं. बीआर देवधर जी ने भी ऐसे ही गायकी का हर रंग बताने के बाद कहा था कि-अब आप अपना गाना बनाओ। गुरूजी पं. कुमार गंधर्व का कहना था कि जब आप गाने बैठते हैं तो अष्टांग का प्रदर्शन नहीं लगना चाहिए। वे मानते थे कि गाना अष्टांग के लिए नहीं बना है कि हमें आलाप,बोल आलाप और बोलतान सब कुछ मालूम है और हम सभी का प्रदर्शन कर दें। ऐसा जरूरी नहीं बल्कि जो बंदिश आप गा रहे हैं उसमें जो अनुकूल व प्रभावशाली है, वही प्रदर्शित करें। उनका मानना था कि गायिकी किसी भी अंग की अति न करो। 
0 ऐसे में आप पश्चिमी संगीत को किस पैमाने पर रखते हैं? 
00 पश्चिमी संगीत दरअसल पूर्व निश्चित होता है। महान संगीतकार जुबिन मेहता की सिंफ नी सुनिए,वहां आप हमेशा आउटसाइडर रहेंगे। वहां सवा सौ लोगों की टीम है। जिसमें 15 वायलिन, 10 फ्ल्यूट,16 ड्रम और 20 सैक्सोफोन सहित तमाम वाद्य हंै और इन सबके मिलने से बहुत ही सुंदर सिम्फ नी बनती है लेकिन यह सब तो पूर्व निश्चित है। वो लोग स्कोर बोर्ड में लिखा हुआ पढ़ कर स्कोर बजाते हैं। मैं उनके संगीत को छोटा नहीं बता रहा हूं लेकिन वहां तत्काल में अपना कुछ देने के लिए कलाकार के पास गुंजाइश नहीं होती। इसके विपरीत हमारे यहां तो सामने कुछ भी लिखा हुआ नहीं होता। यहां तो कलाकार का मूड, उसकी तालीम,उसके संस्कार और उसकी तात्कालिक समझ ये सब मिल कर हमेशा एक नई सर्जना रचते हैं। हमारे संगीत में जो क्षमताएं हैं,वो चिरंतन है। इसलिए इसको ज्यादा लोकप्रिय होने की तमन्ना कभी नहीं रही। 
0 आपने महज तीन चुनिंदा फिल्मों में पाश्र्वगायन किया। इसकी क्या वजह थी? 
00 क्योंकि इन तीनों फि ल्मों में शास्त्रीय संगीत की पृष्ठभूमि पर आधारित ही प्रसंग था। फि र वो लोग मुझे जानते भी थे। इसलिए उन्होंने मुझे चुना तो मुझे हट के कुछ नहीं करना पड़ा। शशि कपूर की 'विजेता' फि ल्म में रेखा ''भीनी-भीनी भोर आई'' गीत में अपने उस्ताद से संगीत सीख रही है। वहीं फिल्म 'लेकिन' में हेमा मालिनी के मुजरे के दौरान ''झूठे नैना बोले सांची बतिया'' गीत में उस्ताद जी भी साथ दे रहे हैं। ये 'झूठे नैना' वाली बंदिश मेरी ही तैयार की हुई थी। इन दोनों गीतों में मैनें आशा भोंसले के साथ पाश्र्वगायन किया। वहीं 1996-97 में आई मराठी फि ल्म 'हे गीत जीवनाची' भी शास्त्रीय संगीत की पृष्ठभूमि पर बनी थी। जिसमें मैनें लता मंगेशकर के साथ पाश्र्वगायन किया। इसके बावजूद फिल्मों में गाना मेरे लिए कोई बहुत ''ग्रेट'' चीज नहीं है। 
0 शास्त्रीय संगीत के बहुत से कलाकार फि ल्मों से दूर रहना पसंद करते हैं, इसकी क्या वजह है? 
00 पहली बात तो अब ऐसी फि ल्में नहीं बनती जिसमें हमारे शास्त्रीय संगीत के लिए ठीक-ठाक भी गुंजाइश हो। फि र जिसे एक मुक्त इंप्रोवाइजेशन का चस्का लग जाए यानि कि आप एक रटा हुआ फ ार्मूला पेश नहीं कर रहे हैं और अपने संगीत को हर बार अलग-अलग ढंग से पेश कर रहे हैं तो आपको फिल्मों के ऐसे पूर्व निश्चित 3-4 मिनट के गाने में रूचि नहीं रहेगी। किशोरी अमोणकर को भी तो ऐसे मौके आए थे पर उनका मन नहीं लगा। मुझे भी नहीं लगता कि मैं किसी प्रोड्यूसर के पास जाउं या उनको बुलाऊं या उनसे संबंध रखूं, जिससे वो मुझे भी प्लेबैक दें। प्लेबैक से मुझे कोई फ र्क नहीं पड़ता। मैं अपनी बात नहीं कहता। हर शास्त्रीय संगीत के कलाकार को फिल्मों का आकर्षण होता ही नहीं है। 
0 लेकिन फिल्मी गायन को लेकर आप जैसे कलाकारों में इतनी तल्खियां क्यों है ?
00 हमारे यहां फिल्मों में आज कल जो चेहरे दिखते हैं उन पर तो भले आदमियों की आवाज सूट नहीं होगी। मैं नाम नहीं लूंगा लेकिन फि ल्मी संगीत में जो आज के दौर में हैं, ऐसे लोगों की जीवन शैली में ही संगीत नहीं है। आज विडम्बनाएं बहुत सी हैं। मेरे मित्र सुरेश वाडेकर कितना सुरीले गाने वाले हैं लेकिन आज उनको कोई काम नहीं है। ये अलग बात है कि सुरेश वाडेकर अपना विद्यालय चलाते हैं और संगीत शिक्षण में व्यस्त हैं। उनका आनंद इसी में है। 
0 टेलीविजन चैनलों पर संगीत के रियालिटी शो को आप किस नजरिए से देखते हैं? 
सैयद हैदर रजा के हाथों रजा सम्मान प्राप्त करते हुए
00 मेरी समझ में नहीं आता कि इन रियालिटी शो में बैठे ज्यादातर निर्णायकों को ऐसा क्यों लगता है कि गाना यानि किसी की हू ब हू नकल करना है। होना तो ये चाहिए कि अगर रफ ी साहब या लता जी का गाना है तो उसे आप प्रतियोगी के तौर पर कैसे गाते हैं। अब जो जज बैठे होते हैं वे भी कहते हैं कि लता जी की तरह उसने अच्छा गाया। ये तो नकल की बात हुई ना,आपकी अपनी बात कहां आई इसमें? ऐसा इसलिए है कि ये जो जज बनाए गए हैं, वे इन प्रतियोगियों से उम्र में ज्यादा और थोड़े बेहतर हैं। इसके अलावा क्या है इनके पास? जरूरी नहीं कि ये उन प्रतियोगी बच्चों से ज्यादा टैलेंटेड हों। 
0 लेकिन टेलीविजन चैनल भी तो श्रोताओं तक पहुंचने का माध्यम है? 
00 बिल्कुल है और मैं इन चैनलों की भूमिका से इनकार नहीं कर रहा हूं। मैं दरअसल रियालिटी शो की रियालिटी पर बात कर रहा था। वैसे मैं बताऊं अढ़ाई महीना पहले ठीक दीवाली के दिन जब लोग पटाखों और रोशनाई में वक्त बिताना चाहते हैं, तब 'जी मराठी' ने मेरे डेढ़ घंटे के दो सेशन टेलीकास्ट किए। इसके बाद मुझे हजारों लोगों की प्रतिक्रियाएं आई। सोशल मीडिया में बधाई मिली। तो मैं मानता हूं कि सैटेलाइट चैनल भी श्रोताओं तक पहुंचने का बड़ा माध्यम है। 
0 अपने अब तक के संगीत जीवन को किस तरह परिभाषित करना चाहेंगे? कुल जमा हासिल और आगे की चाहत? 
00 महान संगीतकार पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी ने अपना गायन प्रदर्शन छोड़ कर शास्त्रीय संगीत के प्रचार कार्य के लिए खुद को समर्पित कर दिया था। लेकिन हमारी पीढ़ी के लोग ऐसा नहीं कर पाए। हम लोगों ने अपने तरीके से शास्त्रीय संगीत को पल्लवित करने में योगदान दिया। मैं संगीत पर कुछ लिख पाया हूं। खुद को अभिव्यक्त करने मैनें संगीत को माध्यम बनाया। मैं कुछ प्रमुख रागों की रचना कर पाया हूं, जिसे मेरे समकालीन और नई पीढ़ी के लोग गाते हैं। ये अच्छी बात है कि वे लोग मेरी नकल नहीं करते हंै। मेरा मानना है कि हमारी बंदिशों में वो गुण होना चाहिए कि आप उसे अपने तरीके से गा सकें। उम्र के इस पड़ाव में भी मैं वही राग फिर से गाऊं और उसमें मुझे कुछ नया दिखता है, तो मैं गाता रहूंगा और जिस दिन मुझे नई बात नहीं दिखेगी तो नहीं तो गाना बंद कर दूंगा। 

Saturday, January 14, 2017


वोल्गा से शिवनाथ तक, ऐसे हुई शुरुआत

भिलाई से रूसियों का लगाव जग-जाहिर है। एक वक्त था जब भिलाई में रशियन परिवार बहुतायत नजर आते थे। अपनी पत्रकारिता के शुरूआती दौर में शायद 1997 की बात है, एक दिन रायपुर से दैनिक भास्कर के सीनियर पत्रकार नवाब फाजिल भिलाई ऑफिस आए। नवाब भाई भिलाई के पत्रकार साथियों से बात कर रहे हैं। मैं एक जूनियर पत्रकार होने के नाते पास बैठा विज्ञप्ति बना रहा था। इसी दौरान बातों-बातों में नवाब भाई के मुंह से निकला कि आप लोग यहां के रशियन लोगों पर स्टोरी क्यों नहीं बनाते..? बात आई-गई हो गई। लेकिन ये बात कहीं न कहीं मेरे जहन में थी। मैं कई इस उधेड़-बुन में लगा रहा कि भिलाई बिरादरी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करने वाले हमारे रशियन इंजीनियरों और उनके परिवार वालों से कैसे मुलाकात हो सकती है। शुरूआती कुछ नाकाम कोशिश हुई। जिसमें दूसरी तरफ  से साफ तौर पर 'ना' का जवाब आया। लेकिन संयोग से साल 2003 में मेरा परिचय रशियन इंटरप्रेटर (अनुवादक) विष्णु प्रभाकर तोपखानेवाले से हुआ। विष्णु एक अनूठी शख्सियत के मालिक थे। रूसी भाषा में वह इस कदर सहज थे कि अक्सर मजाक में कहते थे-सपने में भी मैं रशियन में ही बात करता हूं। विष्णु अब इस दुनिया में नहीं है। विष्णु की मदद से रूसी परिवारों से मिलने का सिलसिला शुरू हुआ, जो विष्णु के जाने के बाद भी बरकरार है। 2003 में इन्हीं मुलाकातों पर केंद्रित श्रृंखला 'वोल्गा से शिवनाथ तक' मैंनें अपने तब के अखबार 'हरिभूमि' के लिए लिखा था। यहां मैं खास तौर पर कंप्यूटर विभाग के अपने तत्कालीन दो साथियों अशोक प्रजापति और संदीप दीवान का शुक्रिया अदा करना चाहूंगा कि उन दोनों की वजह से इस कॉलम का टैक्स्ट मैटर फोटो सहित आज भी मेरे पास है। शुरूआत एक रूमानियत से भरी कहानी से- (सर्वाधिकार ©मुहम्मद जाकिर हुसैन-2003)