Thursday, September 20, 2018


मुहर्रम पर हुसैनी ब्राह्मणों की याद और

 एक मर्सिया लता जी की आवाज़ में 


मुहम्मद ज़ाकिर हुसैन 

 मुहर्रम पर हुसैनी ब्राह्मण का जिक्र शायद कुछ लोगों के लिए अजूबा जैसा लगे लेकिन यह सच है। करबला की जंग में ईसार्ई और ब्राह्मणों ने भी इमाम हुसैन के लिए कुरबानी दी थी। टीवी पर अक्सर दिखाई देने वाले मूछों वाले दादाजी का चेहरा तो याद है आपको। 
जी हां, जीडी बख्शी। ये बख्शी साहब हैं हुसैनी ब्राह्मण। ऐसे ही फिल्म अभिनेता दिवंगत सुनील दत्त भी इसी कौम के थे।
 किस्सा मशहूर है कि सुनील दत्त ने क्रिकेटर इमरान खान की मां शौकत की याद में बने कैंसर अस्पताल की डायरी में लिखा था, ''लाहौर जो मांगेगा मैं दूंगा। डोनेशन ही नहीं, खून का आखिरी कतरा भी। जैसा मेरे पूर्वजों ने करबला में इमाम हुसैन के लिए दिया था।'' आज हुसैनी ब्राह्मण दुनिया के हर हिस्से में है। 
भिलाई में भी कुछ हुसैनी ब्राह्मण हैं,जिन्हे मैं जानता हूं लेकिन इन दिनों फिजा में जैसा जहर घोला जा रहा है, उसके चलते ये लोग अपनी पहचान जाहिर नहीं करना चाहते।
हुसैनी ब्राह्मणों के बारे में गूगल से लेकर यू ट्यूब पर सारा सब कुछ मौजूद है। फिर भी मुहर्रम पर कुछ हुसैनी ब्राह्मणों के बारे में- ईरान के शहर कौम में करबला का म्यूजियम बना है,जिसमें २२ मोहयाल यानी हुसैनी ब्राह्मणों के नाम शहीद के तौर पर दर्ज हैं।
पी.एन.बाली की किताब '' हिस्ट्री ऑफ मोहियाल्स- लीजेंड्री पीपुल'', टी.पी.रसेल की किताब ''' हिस्ट्री ऑफ मोहियाल्स- मिलिटेंट ब्राहम्न रेस ऑफ इंडिया'' और शिशिर कुमार मित्र की किताब '' विजन ऑफ इंडिया'' के अध्ययन से पता चलता है कि प्राचीन काल में ब्राह्मणों के एक वर्ग ने सैनिकों का पेशा अपनाया अपनाया।
उस समय परंपरा थी कि राज्य अपने यहां कार्य करने वाले व्यक्तियों को बतौर मजदूरी भूमि प्रदान करता। यह भूमि वंशानुगत होती थी। 
यही लोग भूमि के मालिक हो जाते थे जो मोहियाल कहलाए। मोहियाल शब्द प्राकृत शब्दों मोहि और आल से बना है। मोहि अर्थात् जमीन और आल अर्थात मालिक। पूरा अर्थ भूमि के मालिक होता है। बाद में ब्राह्मणों के इसी वर्ग ने बिहार और उत्तर प्रदेश में मोहियाल का संस्कृत पर्यायवाची अपनाते हुए स्वयं को भूमिहार कहलाया। संयुक्त प्रांत के उत्तर पश्चिमी भागों विशेषकर पंजाब और सरहद आदि क्षेत्रों में इन मोहियाली ब्राह्मणों की सात शाखाएं थीं जिनमें से एक दत्त थे।

अश्वत्थामा का वंशज पहुंचा था पैगम्बर के दर
मोहियाल या हुसैनी ब्राह्मणों में माना जाता है कि महाभारत के युद्ध में घायल अश्वत्थामा किसी तरह बच निकला और इराक (मेसोपोटामिया) पहुंचकर वहीं बस गया। बाद में इन्हीं अश्वत्थामा वंश के दत्त ब्राह्मणों ने इराक में अपनी बहादुरी का सिक्का जमाया।
वे अरब, मध्य एशिया, अफ गानिस्तान और इराक में फैल गए। पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब के काल में दत्त ब्राह्मणों का राजा राहिब सिद्ध दत्त था। कुछ संदर्भ ग्रंथों में राहिब दत्त को लाहौर का बड़ा व्यापारी बताया गया है,जिसका व्यापार के सिलसिले में अरब आना-जाना लगा रहता था।
खैर, नि:संतान सिद्ध दत्त मुहम्मद साहब से संतान का आशीर्वाद मांगने मदीना गया।वहां उसे पता चला कि उसके भाग्य में औलाद नहीं है। मायूस हो कर वह लौट रहा था कि उसी समय मुहम्मद साहब के छोटे नाती हुसैन अपने नाना के साथ वहां रहे थे। वह निराश सिद्धदत्त को दोबारा मुहम्मद साहब के पास ले गए। नाना से सारी बात सुनकर इमाम हुसैन ने उसे सात औलादों की दुआ दी।

बेऔलाद को मिली बेटों की खुशी
सिद्ध दत्त खुशी खुशी वापस गया। इसके बाद उनके घर सात बेटों का जन्म हुआ, जिनके नाम सहस राय, हर्ष राय, शेर खां, राय पुन, राम सिंह, चारू और पुरु रखे गए। पुत्र रत्न की प्राप्ति के बाद सिद्ध दत्त मुहम्मद साहब के खानदान का मुरीद हो गया। इमाम हुसैन के वालिद (पिता) हजरत अली के विरुद्ध लड़ी गई जमल की जंग में हजरत अली ने खजाने की सुरक्षा दत्त ब्राह्मणों के सशस्त्र दस्ते को सौंपी। 
करबला की दुखद घटना के समय अकेले बगदाद मे १४०० ब्राह्मण रहते थे। राहिब सिंह दत्त इमाम हुसैन का एहसान नहीं भूला था। इसीलिए जब इमाम हुसैन का दस्ता करबला की ओर जा रहा था उसके सैनिकों का दस्ता इमाम के साथ गया। बाद में इमाम हुसैन के कहने पर दस्ता लौट गया क्योंकि इमाम हुसैन काफिले को सेना में नहीं बदलना चाहते थे।
रास्ते में एक जगह पड़ाव पर रात में यजीदी सैनिकों ने उन्हें घेर लिया और हुसैन के सिर की मांग की। सिद्ध दत्त ने इमाम का सिर बचाने के लिए अपने पुत्र का सिर काट कर दे दिया पर सैनिक नहीं माने। हुसैन का सिर बचाने के लिए सिद्ध दत्त ने अपने सातों पुत्रों का सिर काट डाला लेकिन सैनिकों ने उन्हें हुसैन का सिर मानने से इंकार कर दिया।  दत्त ब्राह्मणों के दिल में इमाम हुसैन के कत्ल का बदला लेने की आग भड़क रही थी। इसी कारण वे अमीर मुख्तार के साथ मिल गए।
बहादुरी से लड़ते हुए चुन चुन कर हुसैन के कातिलों से बदला लिया। कूफे के गवर्नर इब्ने जियाद के किले पर कब्जा कर उसे गिरा दिया गया।  जब दस अक्टूबर ६८० को करबला की घटना घटी और सिद्ध दत्त को पता चला तो उसे बहुत क्षोभ हुआ। जब उसे पता चला कि यजीदी फ़ौज इमाम हुसैन के सिर को लेकर कूफा में वहां के यजीदी गर्वनर इब्ने जियाद के महल ला रहे हैं तो उसने यजीदी दस्ते का पीछा कर हुसैन का सिर छीना और दमिश्क की ओर बढ़ा।

कुरबान कर दिए अपने सभी बेटे
रास्ते में एक जगह पड़ाव पर रात में यजीदी सैनिकों ने उन्हें घेर लिया और हुसैन के सिर की मांग की। सिद्ध दत्त ने इमाम का सिर बचाने के लिए अपने पुत्र का सिर काट कर दे दिया पर सैनिक नहीं माने। 
हुसैन का सिर बचाने के लिए सिद्ध दत्त ने अपने सातों पुत्रों का सिर काट डाला लेकिन सैनिकों ने उन्हें हुसैन का सिर मानने से इंकार कर दिया।
दत्त ब्राह्मणों के दिल में इमाम हुसैन के कत्ल का बदला लेने की आग भड़क रही थी। इसी कारण वे अमीर मुख्तार के साथ मिल गए। बहादुरी से लड़ते हुए चुन चुन कर हुसैन के कातिलों से बदला लिया। कूफे के गवर्नर इब्ने जियाद के किले पर कब्जा कर उसे गिरा दिया गया।

पैदाईश के वक्त बच्चे की गरदन पर लगाते थे चीरा
इस कुरबानी को याद रखने के लिए दत्त ब्राह्मणों ने दर्जनों दोहे रचे जो मुहर्रम में उनके घरों में पढ़े जाते थे। कुछ घरों में आज भी यह दोहे पढ़े जाते हैं और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में ये हुसैनी ब्राह्मण बाकायदा मुहर्रम की मातम मजलिस मेें शरीक भी होते हैं। 
करबला की जंग के बाद वहां शासकों ने शिया लोगों के साथ हुसैनी ब्राह्मणों पर भी जुल्म ढाना शुरू किया तो वे सीरिया, एशिया का चक और बसरा होते हुए अफगानिस्तान की ओर आए वहां उन्होंने गजनी, बल्ख, बुखारा, और कंधार पर कब्जा कर लिया।कालांतर में सिंध के अटक क्षेत्र से होते हुए वह पंजाब गए। दत्त सुल्तानों के बारे में कहा जाता है कि वह आधे हिंदू और आधे मुसलमान हैं। 
इनके वंशज दुनिया के हर हिस्से में हैं तो भिलाई इनसे अछूता कैसे रह सकता है। वैसे खास बात यह है कि हुसैनी ब्राह्मणों के यहां पैदाईश के बाद बच्चे के गरदन के पास हल्का सा चीरा लगाया जाता था। यही चीरा इस कौम की पहचान हुआ करती थी। 
आज भी बुजुर्ग हुसैनी ब्राह्मणों की गरदन पर यह हल्का सा चीरे का निशान दिख सकता है। हालांकि नए दौर में हुसैनी ब्राह्मण इस रवायत को भूल भी रहे हैं। इन सबके बावजूद करबला की जंग और ईमाम हुसैन के साथ अपना रिश्ता कायम रखे हुए हैं। ये लोग इसका कभी ढिंढोरा नहीं पीटते।

.... और आखिर में एक मर्सिया लता जी की आवाज़ में
इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत को याद करने के अपने-अपने तरीके हैं। शिया समुदाय में मुहर्रम के १० दिनों में मर्सिया  (शोकगीत) पूरी शिद्दत से गाया और सुना जाता है। साल 1977 में आई फिल्म "शंकर हुसैन" में मीर अनीस का लिखा और खय्याम साहेब की तर्ज़ पर एक पारम्परिक मर्सिया लता जी  ने गाया था। जिसके बोल इस तरह से है-

हुसैन जब के चले बाद दोपहर रन को
ना था कोई के जो थामे रकाबे तौसन को
सकीना झाड़ रही थी .बा के दामन को
हुसैन चुप के खड़े थे झुकाए गरदन को
ना आसरा था कोई शाह--करबलाई को
फकत बहन ने किया था सवार भाई को
हुसैन जब के चले बाज दोपहर रन को
इसका वीडिओ इस लिंक पर मौजूद है.

Sunday, September 16, 2018


ये अच्छी बात है कि अब आत्महत्या
के बजाए प्रदर्शन कर रहे हैं किसान


''ग्रामीण अर्थव्यवस्थाअसमानता और किसानों की बदहाली''


विषय पर वरिष्ठ पत्रकार पीसाईंनाथ का सेवाग्राम (वर्धा ) में व्याख्यान



मूल व्याख्यान से लिप्यांतरण-मुहम्मद जाकिर हुसैन

सेवाग्राम में अपने व्याख्यान के दौरान वरिष्ठ पत्रकार पी साईनाथ ने किसान आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखते हुए कई पहलुओं पर रौशनी डाली। खास कर नाशिक मार्च की सफलता और उसके बाद इस साल नवम्बर में होने वाले दिल्ली के किसान आंदोलन पर विस्तार से जानकारी दी। उनके लम्बे व्याख्यान की पांचवी और आखिरी क़िस्त,,,


एक लम्बे और उपयोगी व्याख्यान
 के बाद  एक सेल्फी तो बनती है 
आज आप लोगों ने जितनी बातें सुनी उनसे सवाल उठता है कि आखिर  इन परिस्थितियों में हम सब मध्यम वर्ग के लोग क्या करें? इसलिए मैं बार-बार जोर देकर कह रहा हूं कि कृषि संकट अब खेती का नहीं बल्कि सभ्यता और समाज का संकट बन गया है।
आज देखिए इसी वजह से किसान प्रदर्शन कर रहे हैं और घर से बाहर निकल रहे हैं सड़क पर आ रहे हैं। आखिर इस हालत पर इन्हे किसने पहुंचाया । ज़िम्मेदारी तो तय करनी होगी इस बदहाली की ।
 वैसे, मेरी समझ में ये बहुत अच्छा कदम है कि बजाए आत्महत्या करने के हमारे किसान लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। आखिर 20 साल में सिवाय आत्महत्या के क्या मिला किसानों को । किसानो का प्रदर्शन करना  है।

नाशिक मार्च ने देश को एक सबक दिया

इस मार्च महीने में हम सभी देशवासियों को एक बेहतरीन सबक सीखने मिला। जब सबसे गरीब किसान मजदूर नाशिक से मुंबई तक 182 किमी पैदल चल कर आए। आज आप कल्पना कर सकते हैं की उन किसानो ने कितनी मुसीबत के साथ ये सफर तय किया होगा ।
जब यह मार्च नाशिक में शुरू हुआ तो 12 हजार के करीब लोग थे लेकिन मुंबई आते तक 40 हजार हो गया और जब आजाद मैदान की तरफ किसान-मजदूर बढ़े तो यह तादाद 50 हजार से उपर पहुंच गई।
जब किसानों ने नाशिक में मार्च शुरू किया तो वहां तापमान 38 डिग्री था और जब ये लोग हाईवे पर आए थे इनके पैरों में जूत-चप्पल तक नहीं थे। इस मार्च के कई पहलु ध्यान देने योग्य है। उस भरी गर्मी में सबके पैर डामर की सड़क का 40 डिग्री तक का तापमान झेल रहे थे।

        मालूम हुआ कि यहाँ बच्चों  की परीक्षा है तो बदल दिया इरादा 

नाशिक किसान मार्च के दौरान अन्नदाता की हालत 
ये लोग इतने संकल्प के साथ आए कि जूता-चप्पल नहीं था, पैर कट रहे थे तो सेलो टैप लेकर लगा लिए। इतने मुश्किल सफर के बाद ये लोग 11 मार्च को मुंबई पहुंचे।
इनकी तैयारी 12 मार्च को सुबह 8 बजे एतिहासिक आजाद मैदान में पहुंचने की थी लेकिन अचानक इनका मंसूबा बदला।
थक कर चूर होने के बावजूद इन लोगों ने फैसला लिया कि 12 मार्च की सुबह आजाद मैदान पहुंचने के बजाए सभी 11 मार्च की रात को अंधेरे में बिना नारा और शोरगुल के चुपचाप निकलेंगे। क्योंकि 12 मार्च की सुबह लाखों बच्चों की बोर्ड परीक्षा थी और ये लोग नहीं चाहते कि किसी एक भी बच्चे की परीक्षा प्रभावित हो।
इन लोगों से मैं मिला था और जब मैनें पूछा कि आप लोगों ने आराम क्यों नहीं किया तो उनमें से एक रूक्मा बाई बोली-हमारे बच्चे भी परीक्षा देते हैं तो इन बच्चों की परीक्षा हम क्यों प्रभावित करें। अगर परीक्षा नहीं होती तो हम जरूर सुबह मार्च करते लेकिन जब हमको पता लगा तो हमने फैसला बदल दिया।

समाज का हर वर्ग आगे आया किसानों  के लिए 

मदद को उठे हाथ 
बच्चो की परीक्षा के चलते किसानों द्वारा आंदोलन को लेकर फैसला बदलने की खबर मुंबई के स्थानीय लोगों को मिली। इसके बाद तो लोग अपनी महंगी गाडिय़ों में पानी, खाने के पैकेट और दूसरे सामान लेकर इनके पास पहुंचे और थैंक्यू बोलकर गए।
तो समाज की सहानुभूति है क्योंकि सभी को मालूम है कि आज किसान और मजदूर के साथ अन्याय हो रहा है।मैं तो यह देख कर दंग रह गया केईएम अस्पताल से डाक्टरों की टीम खुद से चली आई और आकर कैंप शुूरू कर दिया।
जब नाशिक से किसान-मजदूर लोगों ने मार्च शुरू किया था तो उस समय सांसद पूनम महाजन ने कहा था कि ''किसानों का यह आंदोलन शहरी माओवादियों के द्वारा संचालित'' है।
इसके बाद जब यही लोग एकजुटता के साथ आजाद मैदान मेें आकर खड़े हुए तो सारे नेता वहां पहुंच गए और महाराष्ट्र सरकार ने उनकी सारी मांग पूरी कर दी सरकार को झुकना पड़ा।
मैं तो यह देखकर दंग था कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और संजय निरुपम जैसे नेता वहां किसान-मजदूरों के साथ खड़े होकर लाल सलाम और इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगा रहे हैं।

किसानों का मार्च होगा नवंबर मेंहम चाहते हैं 21 दिन इस मुद्दे पर चले संसद

नाशिक के किसान-मजदूरों का यह मार्च देखकर हम लोग बहुत ज्यादा प्रभावित हुए। नाशिक मार्च में हमारा योगदान शून्य था तब भी इन लोगों ने इसे सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचाया।
हम लोगों नें कहा कि अगर 40 हजार लोग मुंबई पहुंच कर सरकार को सबक सिखा सकते हैं तो क्या होगा अगर लाखों लोग दिल्ली में चले गए। यहां से मूल विचार आया।
इस तरह नवंबर में संसद के सामने होने वाले बड़े मार्च की रूपरेखा बनीं। हालांकि मैं साफ कर दूं कि नवंबर वाले आंदोलन का मैं संगठनकर्ता नहीं हूं। इस आंदोलन का आह्वान 201 किसान और मजदूर संगठनों की 14 जुलाई को हुई बैठक के बाद किया गया है।
हम चाहते हैं कि किसान अपनी मांग को लेकर जंतर मंतर या लाल किले में नहीं बल्कि संसद में डट जाए। तैयारी के मुताबिक यह अब तक का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक प्रदर्शन होगा।
किसान-मजदूर के 201 संगठनों ने मांग रखी है कि 21 दिन यानि तीन हफ्ते की संसद की बैठक बुलाई जाए और कृषि संकट और उससे जुड़े मुद्दों पर चर्चा की जाए। जिसमें स्वामीनाथन रिपोर्ट, पानी का संकट का मुद्दा भी शामिल है। आप जिसे सूखा कहते हैं, मैं उसे वृहद जल संकट कहता हूं। इसमें पूरा महाराष्ट्र बुरी तरह फंसा हुआ है। यह इकलौता राज्य है जो बिना एक बूंद पानी बिना पाए 70 हजार करोड़ रूपए सिंचाई पर खर्च कर देता है।

 दलित-आदिवासी किसान और  महिला किसान  के मुद्दों को भी लाना होगा सामने 

किसानों  की हालत पर news-18 पर प्रकाशित caricature 
मेरा मानना है कि आप कृषि संकट को तब तक हल नहीं कर सकते जब तक आप महिला किसान और दलित-आदिवासी किसान के मुद्दों को सामने नहीं लाते हैं।
महिला किसान का संपत्ति पर अधिकार, खेती पर अधिकार, उसकी पहचान जैसे मुद्दे और दलित-आदिवासी किसान,जंगल पर अधिकार खेती से जुड़े मुद्दे जब तक आप सामने नहीं लाते हैं तो कृषि संकट हल नहीं किया जा सकता।
2011 में एमएस स्वामीनाथन ने महिला किसानों की स्थिति को लेकर निजी हैसियत से संसद में बिल प्रस्तावित किया था। क्योंकि इनकी पहचान भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है।
हमें दलित और आदिवासी का मुद्दा भी उठाना होगा, तब ये न्याय की बात होगी। आपको कर्जा माफी नहीं बल्कि कर्ज के सिस्टम की बात करनी होगी। जैसा अभी चीन में लो इंटरेस्ट (कम ब्याज) और नो इंटरेस्ट (शन्यू ब्याज) का सिस्टम है।
कुछ क्षेत्र में वहां शून्य ब्याज में ऋण दिया जाता है तो कुछ में न्यूनतम ब्याज में। एमएस स्वामीनाथन ने भारत के संदर्भ में भी ऐसा प्रस्ताव दिया था। कृषि संकट को समझने के लिए 2005 में स्वामीनाथन जी के साथ मैनें विदर्भ का दौरा भी किया था।

हमें कृषि के भविष्य पर भी सोचना होगा

www.kudumbashree.org
आज चर्चा इस पर होनी चाहिए कि आने वाले 20-30 साल में कार्पोरेट आधारित कृषि होनी चाहिए या फिर समुदाय आधारित। महाराष्ट्र में खानदानी तो को-आपरेटिव खेती है। यहां 15 हजार सदस्य हो गए तो एक परिवार अन्यथा दो परिवार इसे नियंत्रित करते हैं।
हमारे देश में कई अनूठी पहल होती रहती हैं। जैसे केरल में कुडुंबश्री कार्यक्रम चल रहा है। यह दुनिया का अनूठा वृहद स्तर पर लैंगिग न्याय और गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम है, जिसमें 43 लाख महिला सदस्य हैं।
उसमें भूमिहीन महिलाओं का 57 हजार संघ कृषि (कलेक्टिव फार्मिंग ग्रुप) समूह है और उनका क्रेडिट सिस्टम इतना ज्यादा सफल है कि बहुत सारे गांव में महिला ही बैंक में मेन डिपॉजिटर है और बैंक उसे मूर्ख नहीं बना सकता।
इस योजना में महिलाएं सिर्फ खेती नहीं करती बल्कि और भी दूसरे काम करतीं। त्रिशूर में हाईवे पर 6-7 आटो गैरेज है जिसे महिलाएं संचालित करती हैं। इसलिए मेरा फिर कहना है कि अब हमें तय करना है कि हमें कृषि को स्टेयराइड पर रखना है कि परंपरागत प्राकृतिक तरीके पर।


देश के हर हिस्से से किसान पहुंचेंगे दिल्ली

नवंबर के आंदोलन को लेकर हमारी योजना है कि दिल्ली के 100 किमी के परिधि क्षेत्र में गाजियाबाद-अंबाला सहित 10 अलग-अलग दिशाओं से मार्च आए और दिल्ली में प्रवेश करे। मेरा सुझाव था कि यह आंदोलन फरवरी-मार्च 19 में होना चाहिए।
लेकिन संगठनों ने फैसला लिया कि नवंबर आखिरी हफ्ते में होगा।  लोग इसलिए नवंबर पर राजी हुए हैं कि फरवरी में ज्यादा ठंड होती है।
फिर जो लोग दिल्ली में बैठे हैं, वो तो चुनाव की घोषणा दिसंबर में भी कर सकते हैं। इसे लेकर भाजपा में चर्चा भी चल रही है। मुझे जो जानकारी है, उसके मुताबिक इस वक्त भाजपा में चुनाव को लेकर दो विचार चल रहे हैं।
एक विचारधारा जो विदर्भ में बैठी है, उसका विचार है कि अपना टर्म आखिरी सेकंड तक पूरा करो क्योंकि हर मिनट एक करोड़ रूपए बना सकते हैं तो इतनी जल्दी संसद का अवसान मत करो 
वहीं दूसरा विचार जो दिल्ली में बैठा है, का मानना है कि इसके पहले कि विपक्ष एकजुट हो जाए, आप 5 महीने का बलिदान करो और अगला 5 साल हासिल कर लो। इसलिए जल्द से जल्द संसद भंग कर चुनाव करवा लो।
इसे देखते हुए आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं ने नवंबर में तीन दिन 28 से 30 तक  की तिथि तय की है। मैं 22 नवंबर से  दिल्ली में रहूंगा।
वहां तैयारियां करनी है। इसके लिए मिडिल क्लास के बैनर होंगे डाक्टर फॉर फार्मर, लॉयर्स फॉर फामर्स, स्टूडेंट फॉर फार्मर और फिर ये सारे समूह मिलकर नेशन फॉर फार्मर बन जाएंगे। जल्द ही इसकी वेबसाइट दिल्ली चलो के नाम से लांच हो जाएगी। जो बहुभाषी होगी। इस आंदोलन में हर देशवासी अपना योगदान दे सकेगा।
समाप्त
mzhbhilai@yahoo.co.in