Saturday, March 3, 2018

परछा की परछाईंयां...

फकीरों और संतों ने भी बख्शी है भिलाई को रौनक

इस्पात नगरी भिलाई को बनाने और बसाने में सरकारी पहल अपनी जगह है लेकिन उस दौर में बहुत से पीर-फकीर और संत भी थे, जिनकी वजह से भी हमारा भिलाई आबाद हुआ और मिनी इंडिया बन पाया। गौर कीजिए वह दौर कैसा होगा जब पहली बार बड़ी-बड़ी मशीनें देख दुर्ग व आसपास के ज्यादातर ग्रामीण कारखाना को ''कालखाना'' मानते हुए नौकरी करने से पीछे हट रहे थे। ऐसे में तब अफसर ग्रेड की नौकरी के लिए तो अखबारों के विज्ञापन सहारा थे लेकिन सोचिए देश के अलग-अलग हिस्सों में दूर-दराज के गांव में रहने वालों को भिलाई में लोहे का कारखाना खुलने और रोजगार मिलने की खबर कैसे लगी होगी..? इस सिलसिले में अभी तक मुझे देश के दो प्रमुख हिस्सों की जानकारी मिल पाई है। 
अपनी तरह की पहली मिसाल मौदहा (उप्र) की है। भिलाई के शुरूआती दौर 1955-56 के दौरान मौदहा में बुजुर्ग हस्ती हजरत बाबा निजामी थे। जिनके मानने वालों में हिंदू-मुस्लिम दोनों थे। उस दौर में बाबा ने इन सारे लोगों को हुक्म दिया कि-''चले जाओ दक्खिन (दक्षिण) की तरफ।'' इसके बाद देखते ही देखते लोग मौदहा से 4 बार ट्रेन बदलने की तकलीफ  उठाते हुए एक नए ''परदेस'' भिलाई आते गए। आज मौदहा और इसके आस-पास के 12 गांव को छोड़ कर भिलाई आने वाले लोग छत्तीसगढ़ की आबोहवा में पूरी तरह घुलमिल गए हैं। भिलाई में आज भी हर साल बाबा निजामी की उर्स पूरी शान के साथ जगह-जगह मनाया जाता है। 
हाल ही में मुझे बाबा निजामी की दरगाह में हाजिरी देने की खुशकिस्मती हासिल हुई। मौके से दरगाह के खादिम सज्जादा नशीन हाफिज लाल मुहम्मद निजामी मिल गए। हाफिज साहब से जिक्र निकला भिलाई का तो बताने लगे-''तब बाबा ने दक्खिन (दक्षिण) की तरफ जाने का हुक्म दिया था। क्योंकि यहां से छत्तीसगढ़ (भिलाई) तो दक्षिण में है। तो जिन्होंने बाबा का हुक्म माना, वो चले गए और उन्हें बाबा की दुआओं से कामयाबी मिली। यह सिलसिला लंबे अरसे तक चला। 14 सितंबर 1964 को बाबा निजामी परदा कर गए।''
कुछ ऐसा ही परछा गांव में भिलाई के ही एक बुजुर्ग शायर रमजान खान ''साहिल'' साहब बता रहे थे। उन्होंने बताया-वहां रायपुर का मौदहा पारा तो पहले से था ही। इसलिए बहुत से लोगों का आना-जाना था। सीधी ट्रेन नहीं थी तो 4 बार ट्रेन बदलनी पड़ती थी। फिर भी लोगों ने तकलीफ उठा कर बाबा के हुक्म से भिलाई जाना मंजूर किया और फिर वहीं के होकर रह गए। जो लोग भिलाई में नौकरी पाते गए फिर वो अपने लोगों को चिट्ठी भेज कर बुलाते थे। इस तरह मौदहा और आसपास के 12 गांव के लोगों ने भिलाई का रुख किया। 
ऐसी ही दूसरी मिसाल केरल की भी है। केरल उस दौर में भी जागरुक और पढ़े-लिखे लोगों का राज्य था इसलिए शुरूआती दौर में अफसर ग्रेड के बहुत से मलयाली वहां से आकर नौकरी करने लगे लेकिन मजदूर श्रेणी के कर्मियों को केरल से भिलाई भेजने का श्रेय आध्यात्मिक संत मन्नथ पद्मनाभन को जाता है। इस बारे में शुरूआती दौर के डीजीएम एडमिनिस्ट्रेशन (1957-59) एमकेके नायर अपनी आत्मकथा में लिखते हैं-तब मन्नथ पद्मनाभन हर धर्म, जाति व संप्रदाय के मलयाली लोगों को हजारों की तादाद में मेरे पास अपनी एक सिफारिशी चिट्ठी के साथ भेजते थे। तब इतने लोगों को नौकरी देना हमारे लिए आसान था, इसलिए सभी को नौकरी मिली और भिलाई में एक लाख के करीब मलयाली हो गए। भिलाई में आज भी संत मन्नथ पद्मनाभन की जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। 
'इज्जत घर' से 'गमन' तक के नजारे 
उत्तर प्रदेश में हमीरपुर जिले के मौदहा तहसील का परछा गांव। चारों तरफ खेत और खेतों में लहराती पीली-पीली सरसों की फसलें। पक्के मकान और हर मकान के सामने 'इज्जत घर'। गांव के कच्चे-पक्के मकान और रहन-सहन का नजारा ऐसा मानों मुजफ्फर अली 2018 में 'गमन' का सीक्वल बनाने यहां पहुंच चुके हों और खेत ऐसे कि यश चोपड़ा बस अभी 'डीजीएलजे' का गाना शूट करने ही वाले हों। 
कुछ तो बसंती मौसम का असर था और बाकी शादी के माहौल ने मिलकर ऐसा ताना-बाना रचा, जो बिल्कुल यादगार बन गया। दरअसल भिलाई में मेरे बेहद अजीज छोटे भाई ताहिर इकबाल के निकाह में शामिल होने मुझे 2 फरवरी 2018 को परछा जाने का मौका मिला। शादी की रौनक तो थी ही लेकिन इसके अलावा भी यहां बहुत कुछ था, जिन पर नजरें जा कर टिक गईं। 
मसलन खुबसूरत सी दो मस्जिदों के बाद नजर यहां बनें पक्के कुओं पर जाकर ठहरती है। ये कुएं शायद पूरे मौदहा क्षेत्र की खास पहचान हैं और ऐसे पक्के कुएं अपने भिलाई में कैम्प-खुर्सीपार क्षेत्र में मौदहा से आए लोगों ने भी बनाए थे।
भिलाई से गए हम लोगों को 'इज्जत घर' ने भी थोड़ा चौंकाया। पास जाकर देखनेे पर पता चला कि स्वच्छ भारत मिशन में यहां बनाए जा रहे टॉयलेट को ऐसा इज्जत से भरा नाम बख्शा गया है। परछा और मौदहा सहित आस-पास के 12 गांव में बहुत से बुजुर्गों की मजारें भी हैं।
परछा के प्रधान (सरपंच) मेरे हमनाम थे और हम भिलाईवालों के लिए ठहरने का इंतजाम प्रधानजी के घर में ही था। पूरे 3 दिन हसीब भाई, अतहर भाई, गुलरेज भाई,शीबू भाई, फैय्याज,बाबू और सलमान सहित तमाम लोगों ने खेत में लगे पंप में जी भर के नहाने से लेकर सुबहो-शाम शादी की तमाम रस्मों में हिस्सेदारी करने तक अपने-अपने मोबाइल फोन पर कई यादगारें इकट्ठा  कीं। 
'हमदम' आर्केस्ट्रा और जुगाड़ टेक्नालॉजी का नजारा
अब कुछ बातें ताहिर की बारात की। परछा में निकली इस बारात की कई बातें निराली थीं। मसलन सुबह बारात निकलने से पहले एक साथ सजे-धजे 6-7 घोड़े देखकर पहली नजर में तो लगा कि ये सब दूल्हे के साथ कुछ खास मेहमानों के लिए तो नहीं है..? लेकिन, मेरे पास बैठे हसीब भाई ने बताया कि इनमें कोई नहीं बैठेगा, ये सिर्फ नचाने के लिए हैं। इसके बाद तो पूरी बारात मेें घोड़े नाचे और जम कर नाचे। लेकिन इन सबसे हट कर इस बारात का खास नजारा तो अनुराग कश्यप के 'इश्टाइल' वाले 'हमदम आर्केस्ट्रा' का था। याद कीजिए अनुराग की 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' में यशपाल शर्मा का 'हमदम' आर्केस्ट्रा या फिर पिछले महीने रिलीज हुई 'मुक्काबाज' में उसी अंदाज में नवाजुद्दीन सिद्दीकी का नजर आना। 
कुछ ऐसा ही नजारा परछा में दिखा। कानपुर से आए आर्केस्ट्रा के सिंगर ने नात शरीफ से सिलसिला शुरू कर 'देदे प्यार दे', 'हाल क्या है दिलों का' और 'जोहरा जबीं' तक तमाम फड़कते हुए गाने गा कर लोगों को नाचने और झूमने पर मजबूर कर दिया। आर्केस्ट्रा के नजारे देखकर आप आसानी से समझ सकते हैं कि फिल्मों के कुछ डायरेक्टर समाज पर कितनी पैनी नजर रखते हैं। 
बारात और निकाह तो अपनी जगह है लेकिन परछा के कुछ और नजारे भी बेहद दिलचस्प रहे। मसलन हम भिलाई के लोगों के लिए बिजली गुल होना खबर होती है तो वहां आज भी बिजली आना खबर है। इस वजह से यहां जुगाड़ टेक्नालॉजी भी बखूबी काम करती है। पूरे गांव में बिजली से चलने वाली आटा चक्की के बारे में आप सोच भी नहीं सकते। इसलिए जुगाड़ टेक्नालॉजी से एक साहब ने ट्रैक्टर के इंजिन के साथ ही आटा चक्की अटैच कर दी है और इनका आने दिन गांव में तय रहता है। जैसे ही ट्रैक्टर वाली अटैच आटा चक्की गांव पहुंचती है, गांव वाले अनाज पिसवाने आ जाते हैं। सच पूछिए तो इस जुगाड़ वाली आटा चक्की को देखकर मुझे अपने भिलाई के रिटायर अफ सर टीएस क्षत्रिय जी की याद हो आई। क्षत्रिय साहब के हाथों में वो हुनर है कि वो स्कूटर के इंजिन से छोटी बोट बना कर शिवनाथ नदी मेें फर्राटे से दौड़ा सकते हैं। 
खैर, वापस परछा लौटें तो एक खास रस्म मुझे बड़ी अनूठी लगी। बारात में नाचते हुए घोड़े सबसे आगे थे और जैसे ही लड़की वालों के घर बारात पहुंची तो एक मोहतरमा सिर पर ज्योति कलश लिए खड़ी थीं। उनके साथ दो और महिलाएं थी। जिनमें एक के हाथ में हल्दी की थाली और दूसरे के हाथ में गुड़ की भेली थी। एक एक कर घोड़े वहां पहुंचते रहे और महिलाएं घोड़े को हल्दी लगाकर घोड़े वाले को गुड़ देते जा रही थी। ये रंग हमारी गंगा-जमनी तहजीब का रंग था। 
ठेठ गंवई दावत और ''दंबूकबाजों'' की ठांय-ठांय
मौदहा में बारात निकले और दोनाली न गरजे, ऐसा तो हो नहीं सकता। लिहाजा परछा में ताहिर इकबाल की बारात में कमोबेश वैसा ही हुआ। इधर बारात के लिए दूल्हा घर से निकला नहीं कि पूरा शादीघर फायरिंग रेंज में तब्दील हो गया। हम लोग भिलाई में ऐसा नजारा बहुत कम देख पाते हैं। इसलिए आग उगल रही दोनाली पर भिलाई से पहुंचे हम लोग भी हाथ आजमाने से नहीं चूके। याद कीजिए,करीब 46 साल पहले ''दुश्मन'' फिल्म में मुमताज ऐसी ही एक बंदूक को देख ''दंबूक से डर लागे'' गा रही थी। 
वैसे शादी के माहौल में ठांय-ठांय के अलावा भी बहुत कुछ था। मौदहा में मौका दावत का हो तो यहां दालचा-नान ही मिलेगा। हम छत्तीसगढिय़ा लोग भले ही ऐसे मौकों पर भी चांवल खोजते रहें लेकिन नान और दालचे का जायका वहां नेअमत से कम नहीं। जिसके आगे चांवल की चमक भी फीकी पड़ जाती है। 
खैर, हम लोगों के लिए चांवल भी पकवाए गए थे लेकिन वाकई दालचा-नान का जायका लाजवाब था। हम यहां दालचा के मायने सिर्फ  मसाले से भरपूर दाल को जानते थे लेकिन वहां जा कर पता लगा कि दो बड़े-बड़े खुले कड़ाहे में दाल और गोश्त का सालन अलग-अलग खास तरीके से पकाने के बाद इन दोनों को मिलाने से दालचा बनता है। खैर, इतना ज्यादा दालचा बनाने की वजहों का खुलासा कुछ देर बाद हो गया। 
जिस वक्त गांव के एक चचा (मैं उनका नाम नहीं पूछ पाया) दालचा पका रहे थे तो मेरे पास ही मेरे हमनाम परछा के प्रधान भी बैठे थे। प्रधान साहब मेरे पूछे पर कहने लगे-आप लोग शहर में अपने हिसाब से चुन-चुन के दावत दे सकते हैं लेकिन गांव में तो सभी अपने हैं। इसलिए हमारे यहां ये चचा ही पूरे गांव को दावत देते हैं। जिसमें ये गांव की हर गली में जाकर बा आवाजे बुलंद ऐलान कर देते हैं और उसके बाद दोपहर से शाम तक पूरा गांव आकर खा कर जाता है। 
शाम को एक बार फिर चचा गांव मेें ऐलान करते हैं, जिससे अगर कोई छूट गया हो तो वो आकर खा ले। वाकई चचा का दावत देने का अंदाज भी निराला था। इसके अलावा दावत में आने वाली हर बहू-बेटी को भी दालचा और नान घर के लिए बांध कर दिया जाता है। खैर, दावतों का दौर और 3 दिन के सफर के बाद किस्सा मुख्तसर ये कि परछा के ये यादगार लम्हे भुलाए न जा सकेंगे, फिलहाल इतना ही। चलते-चलते ताहिर इकबाल को नई जिंदगी की शुरूआत पर ढेर सारी मुबारकबाद....
(इति सिद्धम)

Thursday, February 8, 2018

दहक उठी भिलाई की सबसे बड़ी भट्ठी

सीईओ एम रवि के हाथों ब्लास्ट फर्नेेस-8 (महामाया) का ब्लोइंग इन


सेल-भिलाई इस्पात संयंत्र अपने 70 लाख टन अत्याधुनिकीकरण एवं विस्तारीकरण कार्यक्रम के तहत ब्लास्ट फर्नेस क्रमाँक-8 के सम्पूर्ण स्थापना कार्य के साथ एक महत्वपूर्ण मील के पत्थर को पार कर लिया। बीएसपी के सीईओ एम रवि ने 2 फरवरी को नए ब्लास्ट फनेस-8 का ब्लोइंग इन किया।     इस अवसर पर सीईओ एम रवि ने टीम भिलाई पर विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि संयंत्र के कर्मठ कार्मिकों ने हर क्षण मुझे प्रतिबद्धता के साथ सहयोग किया है। उन्होंने आशान्वित होते हुए कहा कि भिलाई की सृजनात्मक कार्यसंस्कृति बहुत जल्द ही उत्कृष्टता के साथ अपनी साख को बनाये रखने में सफल होगी।
     कार्यक्रम के दौरान जनसम्पर्क विभाग द्वारा निर्मित ब्लास्ट फर्नेस-8 से संबंधित लघु फिल्म का प्रदर्शन किया गया। जिसमें ब्लास्ट फर्नेस-8 के भूमिपूजन से लेकर अब तक के सफर को प्रदर्शित किया गया। 
     महामाया के नाम से नामांकित संयंत्र का नया ब्लास्ट फर्नेस अत्याधुनिक डिजाइन से तैयार किया गया है, जिसका विस्तार क्षेत्र 4060 क्यूबिक मीटर है और प्रतिदिन 8030 टन के साथ वार्षिक हॉट मेटल उत्पादन क्षमता 2.8 मिलियन टन है। इस नये ब्लास्ट फर्नेस के प्रारंभ हो जाने से भिलाई इस्पात संयंत्र से वर्तमान में प्रतिवर्ष 5 मिलियन टन हॉट मेटल उत्पादन से 7.5 मिलियन टन उत्पादन क्षमता बढ़ जाएगी।
नये ब्लास्ट फर्नेस-8 में कास्ट हाउस व स्टॉक हाउस डी-डस्टिंग सिस्टम, टॉप रिकवरी टर्बाइन, (टीआरटी), पल्वराइज्ड कोल इंजेक्शन (पीसीआई), कार्बन ब्लाक के माध्यम से माडर्न हीट ट्राँसमिशन सिस्टम, सिरेमिक कप व एसजीआई तथा क्यू-स्टोव और अत्याधुनिक तकनीक से एनर्जी-एफिशिएंट तथा प्रदूषण नियंत्रण उपकरण जिसमें वेस्ट हीट रिकवरी सिस्टम भी शामिल है जैसी अत्याधुनिक तकनीकी विशेषताओं का समावेश है। विदित हो कि संयंत्र के परियोजना विभाग के ब्लास्ट फर्नेस जोन द्वारा सतत्  सुपरविजन एवं मेसर्स पॉल वर्थ इटली (पीडब्ल्यूआईटी) के कंसोर्टियम में मेसर्स पॉल वर्थ, इण्डिया (पीडब्ल्यूआईएन) तथा मेसर्स एल एंड टी द्वारा नये ब्लास्ट फर्नेस के स्थापना कार्य को सफलतापूर्वक पूरा किया गया। साथ ही इस परियोजना के विभिन्न साइट में सिविल, मेकेनिकल, स्ट्रक्चरल एवं उपकरण निर्माण का कार्य बड़े पैमाने पर पूर्ण किया गया। बीएसपी के ब्लास्ट फर्नेस-8 परियोजना कार्य के लिए सेल मुख्यालय, नई दिल्ली से महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्राप्त होता रहा है। साथ ही संयंत्र के सभी विभागों ने इस कार्य को सम्पन्न करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। 
इस अवसर पर सेल के निदेशक (परियोजनाएँ) डॉ गणेश विश्वकर्मा एवं सलाहकार व पूर्व प्रबंध निदेशक बी के सिंह तथा ब्लास्ट फर्नेसेस के पूर्व अधिकारी श्री धींगरा  सहित संयंत्र के कार्यपालक निदेशक (कार्मिक एवं प्रशासन) एम के बर्मन, कार्यपालक निदेशक (परियोजनाएँ) ए के माथुर, कार्यपालक निदेशक (संकार्य) टी बी सिंह, कार्यपालक निदेशक (सामग्री प्रबंधन) रीता बैनर्जी, कार्यपालक निदेशक (वित्त एवं लेखा) बी पी नायक एवं संयंत्र के महाप्रबंधकगण, अन्य विभागों के वरिष्ठ अधिकारी, परियोजनाएँ एवं ब्लास्ट फर्नेसेस विभाग के सदस्यों तथा बड़ी संख्या में संयंत्र के कर्मचारीगण उपस्थित थे।  

Wednesday, November 1, 2017

55 साल का नाता छूट न सका तो केरल में बना लिया 'भिलाई हाउस'

भिलाई में अपनी आधी जिंदगी बिताने वाले अबूबक्र का केरल का घर है एक मिसाल  

केरल में अबूबक्र अपने भिलाई हाउस के सामने 
इस्पात नगरी भिलाई से अपना लगाव सुदूर केरल जाकर भी भुला नहीं पाए अबूबक्र। आज भले ही वो अपने जन्मस्थान में लौट गए हैं लेकिन रह-रह कर उन्हें अपने भिलाई की याद सताती है।
भिलाई में बिताए दिनों की याद कुछ ज्यादा ही परेशान करने लगी तो केरल में अबूबक्र ने अपने मकान का नाम ही 'भिलाई हाउस' रख दिया। आज उनका यह भिलाई हाउस' सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों के बीच खासा चर्चित हो गया है वहां के लोगों के लिए एक लैंडमार्क बन गया है।
केरल के त्रिशूर जिले के काटूर गांव निवासी एए अबूबक्र 1958 में अपने दूसरे रिश्तेदारों के साथ भिलाई पहुंचे थे। यहां उन्होंने भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी तो नहीं की लेकिन रोजी-रोटी के लिहाज से भिलाई-तीन में टेलरिंग की एक छोटी सी दुकान खोल ली।
शुरूआत में उनका इरादा कुछ साल बाद केरल लौट जाने का था लेकिन बाद देखते ही देखते बरस बीतते गए और अबूबक्र व उनका परिवार पूरी तरह भिलाई का ही हो कर रह गया। उनके बच्चे  और दूसरे रिश्तेदार भिलाई स्टील प्लांट, निजी व्यवसाय सहित अलग-अलग क्षेत्रों में व्यस्त हैं। करीब 55 साल बाद इस वृद्धावस्था में जब उन्हें अपने जन्मस्थान लौटना पड़ा तो उनके लिए एक पीड़ादायक अनुभव था। पुरखों की जमीन में लौटते हुए अबूबक्र अपने साथ भिलाई की यादें लेकर गए।
चार साल पहले वहां जब उन्होंने अपने नए मकान में कदम रखा तो भिलाई की उन्हीं यादों को ताजा करते हुए इसका नाम 'भिलाई हाउस' रख दिया। पिछले हफ्ते भिलाई स्टील प्लांट के रिटायर डीजीएम जीएस सेंगर अपने पारिवारिक मित्र और यहां सीआईएसएफ  में कार्यरत सीएम रफीक के साथ केरल पहुंचे तो भिलाई हाउस देखकर उनकी भी खुशी का ठिकाना न रहा।
अबूबक्र दरअसल रफीक की अम्मी के मामा लगते हैं। सेंगर ने बताया कि भिलाई का नाम आते ही अबूबक्र बेहद भावुक हो जाते हैं। खास कर अगर कोई भिलाई से पहुंच जाए तो अबूबक्र के लिए वह दिन बेहद खुशी का होता है। सेंगर के मुताबिक अबूबक्र ने मेहमान नवाजी में कोई कसर नहीं छोड़ी साथ ही भिलाई में बिताए दिनों को हर पल याद करते रहे।
रफीक बताते हैं कि अबूबक्र यहां भिलाई-तीन मेें 50 साल रहे हैं। वहीं अब भी बहुत से रिश्तेदार भिलाई में रहते ही हैं। इसलिए भिलाई से रिश्ता तो बना हुआ है और इसी रिश्ते की पहचान के तौर पर उन्होंने अपने घर का नाम 'भिलाई हाउस' रखा है। रफीक ने बताया कि अक्सर त्रिशूर जिले में भिलाई से रिटायर हो कर गए लोग उनके मकान की नेमप्लेट देखकर अंदर जरूर आते हैं और फिर भिलाई की यादें मिल बैठकर ताजा करते हैं।
भिलाई की यादों के सहारे लगता है यहां मन 
हरिभूमि भिलाई 6 अक्टूबर 2017 में प्रकाशित खबर 
केरल से फोन पर चर्चा करते हुए एए अबूबक्र ने बताया कि 1958 में जब वो भिलाई पहुंचे थे तो भिलाई स्टील प्लांट कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था। बहुत सारे मजदूरों को मैं देखता था कि सब जाते अच्छे कपड़ों में हैं और लौटते हुए ग्रीस-आइल में लिपे-पुते आते हैं तो मुझे कुछ अटपटा लगा। फिर उन दिनों मजदूरों की मौत बहुत ज्यादा होती थी। इसलिए भले ही मेरे सारे रिश्तेदार बीएसपी में लग गए लेकिन मैनें नौकरी नहीं की। हालांकि भिलाई का माहौल मुझे भा गया तो वहीं रहने लग गया।
55 साल में पूरे 45 साल मैं किराए के मकान में रहा। इस दौरान मैं कैम्प-4 (खुर्सीपार) और तितुरडीह दुर्ग में भी रहा। भिलाई तीन में टेलरिंग की शॉप से परिवार चल गया, इसलिए कहीं जाने का सवाल ही नहीं था। अभी भी मेरा बड़ा बेटा नौशाद कवर्धा में और छोटा बेटा शाहजहां भिलाई-तीन में रहते हैं।
पुरखों की जमीन में केरल लौटना था, इसलिए आना पड़ा। अपने घर का नाम 'भिलाई हाउस' रख लिया जिससे कि भिलाई की याद ताजा होती रहे और किसी को पता पूछने में दिक्कत न हो। सच बताऊं तो यहां उतना मन नहीं लगता है। गांव के ज्यादातर लोगों के बच्चे गल्फ  में हैं। मेरे बच्चों के बच्चे भी दूसरे शहरों में पढ़ रहे हैं। बहुत कम मौका आता है, जब पूरा परिवार इकट्ठा होता है। नहीं तो भिलाई की यादों के सहारे दिन कटते हैं।