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Sunday, July 14, 2019

टाटा से लेकर जिंदल तक भिलाई के बदलते रिश्ते 


उद्योगपति नवीन जिंदल के भिलाई दौरे से उठे तूफान के बहाने 60 साल में 

भिलाई के निजी उद्योगों के साथ उतार-चढ़ाव भरे रिश्तों की एक पड़ताल 


मुहम्मद जाकिर हुसैन 
1959 -जेआरडी टाटा  भिलाई स्टील प्लांट में 
जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड (जेएसपीएल) रायगढ़ के चेयरमैन और उद्योगपति नवीन जिंदल 11 जुलाई को अपने बेटे वेंकटेश जिंदल के साथ भिलाई स्टील प्लांट (बीएसपी) के दौरे पर आए, जाहिर है उनके इस दौरे से तूफान खड़ा होना ही था।
 रेलपांत की आपूर्ति में भिलाई का प्रतिद्वंदी बन कर उभरे जिंदल समूह के चेयरमैन के अचानक भिलाई आने से श्रमिक संगठनों के साथ-साथ भिलाई के आम लोग भी सशंकित हो उठे कि कहीं यह भिलाई को भी बेचने की तैयारी तो नहीं है? दरअसल जिस तरह से मौजूदा केंद्र सरकार ने सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने की अपनी नीति पर खुल कर अमल शुरू कर दिया है और सेल के ही तीन स्टील प्लांट भद्रावती, सेलम  और एएसपी दुर्गापुर की बोली भी लगनी शुरू हो गई है, उससे ऐसी आशंका होना स्वाभाविक है।
 हालांकि दो दिन तक के बवाल के बाद 13 जुलाई को खुद नवीन जिंदल ने स्थिति स्पष्ट की। सोशल मीडिया में  अपने फेसबुक और ट्विटर अकाउंट पर नवीन जिंदल ने तमाम आशंकाओं -अफवाहों पर विराम लगाते हुए साफ किया कि ''भिलाई स्टील प्लांट उनके लिए मंदिर है।'' दूसरी तरफ बीएसपी मैनेजमेंट ने भी इसे एक अनौपचारिक दौरा बताया है। दरअसल मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की माता का निधन इस हफ्ते हुआ है और नवीन जिंदल शोक व्यक्त करने श्री बघेल के भिलाई-तीन स्थित निवास पहुंचे थे। यहां मुख्यमंत्री से मुलाकात करने के बाद वे अपने बेटे के साथ सीधे भिलाई आए और भिलाई स्टील प्लांट की रेल मिल का दौरा किया। 
देश के सार्वजनिक उपक्रमों के भविष्य को लेकर जो चिंताएं दिख रही हैं, ऐसे में नवीन जिंदल के इस दौरे पर सवाल उठना लाजिमी था। हालांकि नवीन जिंदल कोई पहले निजी क्षेत्र के उद्योगपति नहीं है, जो भिलाई आए हैं। 1959 में भिलाई का उत्पादन शुरू होने के बाद से अब तक के 60 साल में कई उद्योगपति और स्टील कारोबारी भिलाई आते-जाते रहे हैं। इनमें टाटा उद्योग समूह के चेयरमैन भारतरत्न जहांगीर रतनजी दादाभाई (जेआरडी) टाटा और स्टील किंग लक्ष्मीनिवास मित्तल का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। जिंदल के इस भिलाई दौरे के बहाने  60 साल में भिलाई और यहां के अफसरों के निजी उद्योगों से रिश्तों पर एक नजर डालना बेहद प्रासंगिक होगा। 

 भिलाई के लिए टाटा हमेशा  'ट्री गार्ड' की भूमिका में रहा

डी आर आहूजा 
टाटा स्टील व्यावसायिक प्रतिद्वंदी होने के बावजूद कभी भी भिलाई के लिए घातक साबित नहीं हुआ। जैसा कि ऐतिहासिक तथ्य है कि दल्ली राजहरा से लेकर रावघाट की लौह अयस्क खदानों की सर्वे रिपोर्ट के आधार पर 1900 से 1907 के दौर मेें जमशेदजी नौशेरवांजी टाटा ने यहां स्टील प्लांट लगाने की योजना बनाई थी। संभवत: उनका स्टील प्लांट आज के डौंडी लोहारा से लगे संबलपुर के आसपास स्थापित होना था। लेकिन तब यहां पानी का कोई बड़ा स्त्रोत नहीं था, इसलिए 1907 में सुवर्णरेखा नदी के किनारे साकची-कालीमाटी नामक गांव के आसपास टाटा स्टील की बुनियाद रखी गई। 
आजादी के बाद दूसरी पंचवर्षीय योजना में भिलाई, दुर्गापुर और राउरकेला में विदेशी सहायता से स्टील प्लांट स्थापना का कार्य शुरू हुआ। इस दौर में टाटा स्टील के  अभिलेखागार में रखी दल्ली राजहरा लौह अयस्क खदान की सर्वे रिपोर्ट के आधार पर भिलाई के लिए दल्ली राजहरा खदान विकसित की गई। इसके अलावा टाटा स्टील ने शुरूआती दौर में भिलाई स्टील प्लांट के लिए कुशल मानव संसाधन की भी मदद भी की। यही वजह है कि जब 1959 में जेआरडी टाटा भिलाई प्रवास पर आए थे तो किसी तरह का ना तो विवाद हुआ था और ना ही कोई सवाल उठा था। क्योंकि टाटा सच्चे अर्थों में भिलाई के हितैषी थे। बीएसपी के शुरूआती दौर के इंजीनियर और बाद मेें बोकारो स्टील प्लांट के मैनेजिंग डायरेक्टर और राष्ट्रीय इस्पात निगम लिमिटेड विशाखापट्टनम के सीएमडी रहे दिलबाग राय आहूजा कहते हैं-भिलाई को बनाने में सोवियत रूस ने तो भरपूर योगदान दिया लेकिन टाटा स्टील हमारे लिए तब एक 'ट्री गार्ड' की भूमिका में था। टाटा से आए कर्मियों ने हमारे कर्मियों को बेहतर ढंग से सिखाया।

कुशल कर्मियों के साथ-साथ भिलाई को दी विश्वकर्मा पूजा की सौगात 

  हितेन भाया    शूटे बनर्जी            सुकू सेन    डॉ  शेखर       वी एन मजुमदार 
निजी क्षेत्र का होने के बावजूद टाटा स्टील ने भिलाई के निर्माण और इसकी तरक्की में अपना अहम योगदान दिया है। इसमें सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि टाटा ने शुरूआती दौर में अपने कई काबिल इंजीनियर भिलाई को दिए। इनमें प्रमुख नाम सुकू सेन का है, जो भिलाई में जनरल सुप्रिंटेंडेंट (ईडी वक्र्स) बन कर आए और कुछ ही वर्ष में यहां जनरल मैनेजर (आज सीईओ का पद) बन गए। इसी तरह प्रख्यात क्रिकेटर शरोबिंदु नाथ (शूटे) बनर्जी भी टाटा स्टील से भिलाई भेजे गए थे। उन्होंने यहां खेल प्रतिभाओं को निखारने में योगदान दिया। भिलाई में डायरेक्टर (परचेस) और हिंदुस्तान स्टील लिमिटेड (एचएसएल) के चेयरमैन रहे हितेन भाया बताते हैं-जब भिलाई स्टील प्लांट की रेल मिल चालू हो गयी थी तब टाटा भी रेल पांत की आपूर्ति भारतीय रेलवे को करता था। इन दिनों भारत सरकार ने रेलपांत के दाम बढ़ा स्टील सेक्टर पर राशनिंग लागू कर दी। तब टाटा स्टील से इस बढ़े हुए दाम को लेकर विवाद हुआ था और टाटा ने रेलपांत बनाने से इनकार कर दिया। 
इसके बाद तब के एचएसएल-भिलाई और भारतीय रेलवे के बीच विशिष्ट अनुबंध हुआ था। भिलाई स्टील प्लांट के दो मरतबा मैनेजिंग डायरेक्टर रहे डॉ. ईआरसी शेखर बताते हैं-चूंकि उस दौर में सारे ग्रेजुएट इंजीनियर तो सोवियत संघ जाकर प्रशिक्षण ले रहे थे लेकिन खेत-खलिहानों और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आ रहे गैरपेशवर कर्मियों को स्टील प्लांट में काम करने का हुनर सिखाने भारतीय लोगों की भी जरूरत थी। ऐसे में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कहने पर टाटा स्टील के सैंकड़ों पेशेवर इंजीनियर और वरिष्ठ कर्मियों ने भी भिलाई आकर अपनी सेवाएं दी। अपने कर्मियों को भिलाई भेजने में टाटा उद्योग समूह के चेयरमैन जेआरडी टाटा ने भी व्यक्तिगत रूचि ली। इसके चलते भिलाई में दूसरी पंक्ति के कर्मियों ने टाटा के सहकर्मियों से स्टील प्लांट के विभिन्न विभागों का हुनर बहुत जल्दी सीख लिया। डॉ. शेखर कहते हैं-जब हमारा पहला ब्लास्ट फर्नेस शुरू हो गया तो 1959 में जेआरडी टाटा खुद भिलाई आए। उन्होंने पूरे प्लांट का दौरा किया। टाटा सच्चे अर्थों में भिलाई के हितैषी थे, इसलिए उनका भिलाई आना  हम युवा इंजीनियरों के लिए यह गर्व का क्षण था। भिलाई के शुरूआती दौर के इंजीनियर रहे वीएन मजुमदार बताते हैं-टाटा स्टील और कुल्टी आयरन वक्र्स के लोगों ने भिलाई आकर कर्मियों को प्रशिक्षित किया और कई तो यहीं भिलाई के होकर रह गए। इन लोगों ने टाटा की परंपरा यहां भी शुरू की। इसमें विश्वकर्मा पूजा का आज जो स्वरूप हम भिलाई में देखते हैं, इसकी शुरूआत टाटा के लोगों ने ही की थी।

जब जेआरडी की गुजारिश को सिर-माथे पर लिया भिलाई ने 

भिलाई स्टील प्लांट के शुरूआती दौर में 1956 से 1959 तक उपमहाप्रबंधक प्रशासन रहे आईएएस अफसर स्व. मेप्पल्ली कृष्णन कुट्टी नायर अपनी आत्मकथा (With malice towards none The chronicle of an Era MKK Nayar ) में भारत रत्न जेआरडी टाटा का भिलाई से जुड़ा संस्मरण दर्ज करते हुए लिखते हैं-हम लोगों ने भिलाई स्टील प्रोजेक्ट की ओर से 5 हजार रूपए के योगदान के साथ इंटर स्टील प्लांट क्रिकेट टूर्नामेंट की योजना बनाई।
 इसके लिए देश के सभी स्टील प्लांट को पत्र लिखा। इनमें सबसे उत्साहजनक जवाब टाटा उद्योग समूह के चेयरमैन जेआरडी टाटा का आया। जिसमें जेआरडी ने लिखा-हमारी दिली इच्छा जमशेदजी नौशेरवांजी टाटा की स्मृति में एक क्रिकेट टूर्नामेंट स्थापित करने की रही है लेकिन कतिपय कारणों से अब तक ऐसा नहीं हो सका। जमशेदजी भारतीय इस्पात उद्योग के संस्थापक होने के साथ-साथ जेआरडी टाटा के दादा भी थे। 
नायर लिखते हैं-चूंकि तब तक हम लोगों ने भिलाई के नाम पर ट्रॉफी की घोषणा कर दी थी, इसलिए उन्होंने पूछा कि क्या भिलाई में जमशेदजी के नाम पर भी ऐसी ट्रॉफी की शुरूआत कर सकते हैं। हम लोगों ने उनके पत्र का सकारात्मक जवाब दिया और भिलाई ट्रॉफी के साथ एक अन्य ट्रॉफी जमशेदजी के नाम पर कर दी। इसके बाद 8 अक्टूबर 1958 को सेक्टर-1 के मैदान में शानदार क्रिकेट प्रतियोगिता का शानदार आगाज हुआ। जिसका उद्घाटन करने प्रख्यात क्रिकेटर कर्नल सीके नायडु भिलाई पहुंचे।

जब अमेरिका में भिलाई की याद ताज़ा कर दी स्टील किंग मित्तल ने 

जी एन पुरी 
ऐसा नहीं है कि भिलाई का दौरा करने वाले जिंदल पहले निजी क्षेत्र के उद्योगपति हैं। उनके पहले भी कई उद्योगपति अपने कारोबार के  सिलसिले में भिलाई आते रहे हैं। बीएसपी और सेल में बड़े पदों पर रहने के बाद विश्व बैंक के वरिष्ठ तकनीकी सलाहकार के पद पर सेवा दे चुके अमेरिका निवासी जीएन पुरी बताते हैं-शुरूआती दौर में उद्योगपति मोहनलाल मित्तल अपने बेटे लक्ष्मीनिवास मित्तल के साथ भिलाई आते थे और यहां से ब्लूम-बिलेट व अन्य फेब्रिकेटेड स्टील की खरीदी करते थे।
 कई सालों बाद अमेरिका में विश्व बैंक की किसी बैठक में अचानक जब स्टील किंग लक्ष्मीनिवास मित्तल से मुलाकात हुई तो भिलाई की यादें ताजा हो गई। मित्तल काफी देर तक भिलाई में बिताये अपने दिन याद करते रहे पुरी कहते हैं-तब निजी क्षेत्र की स्टील फैक्ट्री के ज्यादातर लोग भिलाई में कारोबार करने आते थे और तब हितों के टकराव जैसी कोई बात नहीं थी लेकिन अब समय बदल चुका है। 
इधर मौजूदा दौर में भिलाई के अफसरों पर जिंदल का हमदर्द होने का आरोप लग रहा है। इसके पीछे भी ठोस वजह है। पीछे मुड़ कर देखेे तो पहले भी भिलाई स्टील प्लांट से रिटायर होने वाले अफसर आकर्षक पे-पैकेज और अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के फेर में निजी कारोबारियों के हमदर्द रहे हैं। करीब 4 दशक पहले महाराष्ट्र में भंडारा के समीप स्थापित की गई फैक्ट्री मेें भिलाई के कई शीर्षस्थ अफसर निदेशक रहे हैं। इसके अलावा अपने सेवाकाल में ऐसे अफसर निजी क्षेत्र के हितों के लिए भिलाई के हितों को ताक पर रखकर काम करते हैं, उन्हें रिटायरमेंट के बाद ऐसे उद्योग समूहों में अगले 5-7 साल के लिए आसानी से जॉब मिल ही जाती है। भिलाई के कई इंजीनियरों ने सेवानिवृत्ति से पहले या बाद में भी देश-विदेश के कई उद्योग समूह को ज्वाइन किया है। 

जिंदल और भिलाई में टकराव के दो दशक

दरअसल आज जिस तरह नवीन जिंदल के भिलाई स्टील प्लांट दौरे पर सवाल उठ रहे हैं, उसके मूल में दो दशक से चला आ रहा व्यवसायिक टकराव है। इसकी शुरूआत 1999 में हुई थी। तब जेएसपीएल रायगढ़ ने निजी क्षेत्र की पहली रेल मिल स्थापित करने की घोषणा की। इसके बाद जिंदल के अफसरों ने भिलाई आकर रेल मिल के इंजीनियरों के इंटरव्यू लेना शुरू किए। ऊंची तनख्वाह पर कई इंजीनियर एक झटके में भिलाई से रायगढ़ रवाना हो गए।
 इस दौरान सबसे बड़ा धमाका तत्कालीन मैनेजिंग डायरेक्टर विक्रांत गुजराल का इस्तीफा था। जिसमें 2001 में 31 मार्च शनिवार को इस्तीफा देकर श्री गुजराल 2 अप्रैल  सोमवार से जेएसपीएल में उपाध्यक्ष बन गए थे। इसके बाद जिंदल की रेल मिल का युद्ध स्तर पर निर्माण चालू हुआ और अब 19 साल में हालात ये हैं कि जिंदल निजी क्षेत्र का एकमात्र रेलपांत का आपूर्तिकर्ता बन गया है। इस बीच सेल के तीन प्रमुख स्टील प्लांट सेलम, भद्रावती और एएसपी दुर्गापुर के विनिवेश की प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही जनमानस में यह आशंका घर कर गई है कि देर-सबेर भिलाई को बीमार घोषित कर इसे भी बेचने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। 

भिलाई के दम पर फल-फूल रहा जिंदल 

विक्रांत गुजराल            पंकज गौतम 
दो दशक पहले रेलमिल स्थापना के लिए भिलाई स्टील प्लांट के इंजीनियरों को ऊंची तनख्वाह पर तोडऩे वाले जेएसपीएल की अब तक की तरक्की में भिलाई का सर्वाधिक योगदान है। शुरूआत में विक्रांत गुजराल उपाध्यक्ष बन कर जिंदल ग्रुप में गए। गुजराल करीब 15 साल जिंदल के साथ रहे और इसके बाद उन्होंने  शशि रूईया का एस्सार ग्रुप ज्वाइन कर लिया था। वहीं भिलाई स्टील प्लांट के सीईओ रहे पंकज गौतम ने भी हाल के बरसों में जिंदल ग्रुप ज्वाइन किया। आजकल गौतम वहां चीफ आपरेटिंग ऑफिसर हैं। इनके साथ ही जूनियर स्तर के ढेर सारे अफसरों का बीते 19 साल में भिलाई से रायगढ़ पलायन लगातार जारी है।
 एक तरफ भिलाई के इंजीनियरों के दम पर जेएसपीएल की तरक्की संभव हो पा रही है, वहीं दूसरी तरफ भिलाई स्टील प्लांट सेल में अपनी ध्वजवाहक इकाई का तमगा तेजी से खो रहा है। रेलपांत आपूर्ति को लेकर बीते दशक में जिंदल ने सेल-भिलाई स्टील प्लांट को न्यायालय तक खींचा और मामला राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा आयोग में पहुंचा था। जिसमें जिंदल ने सेल-रेलवे के रेलपांत आपूर्ति को लेकर 1960 के अनुबंध को चुनौती दी थी। हालांकि इसमें जिंदल को हार का सामना करना पड़ा था लेकिन वर्तमान में बदली परिस्थिति में ग्लोबल टेंडर में पिछडऩे के बावजूद 'मेक इन इंडिया' के तहत जिंदल को भारतीय रेलवे को रेलपांत आपूर्ति का ठेका मिल ही गया है। इसी तरह ईरान को रेलपांत आपूर्ति का ठेका भी भिलाई के हाथों से फिसल कर जिंदल को मिल चुका है। इन तमाम परिस्थितियों में रेलपांत निर्माण का एकमात्र सार्वजनिक उपक्रम भिलाई स्टील प्लांट लगातार मांग के अनुरूप आपूर्ति में विफल साबित हो रहा है और संसद में लगातार इस मुद्दे पर सवाल उठ रहे हैं। जानकार लोग इसके पीछ गहरा षडय़ंत्र देखते हैं। 

तस्वीर का दूसरा पहलु, आज कोई भी तकनीक गोपनीय नहीं

यह सच है कि भिलाई के दम पर जिंदल को फलने-फूलने का अवसर मिला है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि इंटरनेट के इस दौर मेें कोई भी तकनीक गोपनीय नहीं रह गई है। इसलिए नवीन जिंदल के इस दौरे में जो आशंकाएं जताई जा रही है कि जिंदल ने हमारी तकनीक करीब से देख ली, तो  यह तथ्य पूरी तरह से निराधार है। दरअसल आज सेल स्तर पर नालेज मैनेजमेट पोर्टल है, जिसमें सेल के तमाम स्टील प्लांट अपने यहां की तकनीक और मॉडिफिकेशन को आपस में साझा करते हैं।
 इसी तरह राष्ट्रीय स्तर नेशनल नालेज मैनेजमेट पोर्टल है, जिसमें तमाम निजी और सार्वजनिक क्षेत्र अपने-अपने यहां की तकनीक साझा करते हैं। इसके साथ ही एक और उल्लेखनीय तथ्य यह है कि भिलाई अथवा सेल के किसी भी स्टील प्लांट के पास उसकी खुद की विकसित की हुई कोई भी तकनीक नहीं है। 40 लाख टन क्षमता तक भिलाई की सारी तकनीक तत्कालीन सोवियत संघ की थी लेकिन इसके बाद ग्लोबल टेक्नालॉजी का दौर आया। अब भिलाई की नई यूनिवर्सल रेल मिल में एसएमएस मीर जर्मनी की तकनीक है। मीर कंपनी सिर्फ भिलाई ही नहीं बल्कि जिंदल सहित दुनिया के तमाम स्टील प्लांट को अपनी तकनीक बेचती हैं। आज ग्लोबल टेक्नालॉजी के दौर में  निजी और सार्वजनिक स्टील प्लांट एक दूसरे के यहां अपने कर्मियों को भेज कर प्रशिक्षण भी दिलाते हैं। यह एक नियमित प्रक्रिया है, ऐसे में अब तकनीक की गोपनीयता कहीं नहीं रह गई है। इसलिए महज चंद घंटों के दौरे में जिंदल यहां से कुछ कॉपी कर ले जाएंगे, ऐसा सोचना भी निराधार है। 

..फिर भी जिंदल के मददगार कई
इसमें कहीं कोई शक नहीं कि रेल उत्पादन में भिलाई के प्रतिद्वंदी बन चुके जिंदल समूह को परवान चढ़ाने में भिलाई के कई प्रमुख अफसरों का हाथ रहा है। कुछ साल पहले रेल मिल और क्वालिटी के जीएम रहे एक अफसर के रिटायरमेंट से पूर्व ही जिंदल जाने की चर्चा शुरू हो गई थी। लेकिन ऐन वक्त पर सेल ने उन्हें रिटायर होते ही दो साल के लिए सलाहकार बना दिया। इसके बाद उनका जिंदल जाना टल गया। 
इसी तरह भिलाई के कई उच्च पदस्थ अफसरों पर यहां की तकनीक जिंदल को हाथों-हाथ देने के आरोप लगते रहे हैं। बीते दशक में इस बात की जबरदस्त चर्चा थी कि एक ईडी स्तर के अधिकारी ने भिलाई की रेल एंड स्ट्रक्चरल मिल की रशियन ड्राइंग-डिजाइन कथित तौर पर जिंदल के साथ गुपचुप तरीके से शेयर कर दी है। चूंकि उन दिनों विक्रांत गुजराल भी जिंदल समूह में वाइस प्रेसीडेंट थे,इसलिए इस चर्चा को और ज्यादा बल मिला।  इनके अलावा भी कई ऐसे अफसर हैं जो जिंदल के मददगार रहे हैं। 

..तो क्या इतना आसान है भिलाई का निजीकरण

11  जुलाई 2019 - भिलाई के ब्लास्ट फर्नेस -8  में नवीन जिंदल 
जिंदल के दौरे से भिलाई के निजीकरण को लेकर आशंकाएं जाहिर होना स्वाभाविक है। लेकिन यह मामला इतना भी आसान नही है कि मंडी में पड़े माल को देखने कोई खरीददार आए और बोली लगा ले। यह सच है कि मौजूदा सरकार में निजीकरण और आउटसोर्सिंग की दर 2,4,8 और 16 गुना रफ्तार से बढ़ी है। 
खुद भिलाई स्टील प्लांट और इसकी टाउनशिप की ज्यादातर सेवाएं धड़ल्ले से निजीकरण/आउटसोर्स की भेंट चढ़ाई जा रही है। प्लांट के कई विभागों में तो अब नियमित श्रेणी के तमाम काम ठेका मजदूर कर रहे हैं। बीएसपी के एक अफसर टिप्पणी करते हुए कहते हैं-भिलाई का निजीकरण इतना आसान नहीं है। यह तो लगभग बेवकूफी की बात होगी कि जिंदल यहां आए हैं तो भिलाई  को टटोलने और बोली लगाने की पृष्ठभूमि बन रही है। चूंकि भाजपा की नीति सार्वजनिक उद्योगों के लिए सकारात्मक नहीं रही है, इसलिए यह बिल्कुल माना जा सकता है कि आगे मुनाफे वाले स्टील प्लांट की भी बोली लगा दी जाएगी। लेकिन इसके लिए किसी उद्योगपति को जानबूझकर भिलाई आकर विवाद खड़ा करने की जरूरत क्यों पड़ेगी? अफसर कहते हैं-यह एक अनौपचारिक दौरा था और इसका कोई अर्थ निकालना जल्दबाजी होगी। 

जिंदल के प्रवास पर वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार की तल्ख़ टिप्पणी

छत्तीसगढ़ 12 जुलाई 2019 
नवीन जिंदल के भिलाई स्टील प्लांट दौरे पर वरिष्ठ पत्रकार और सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ के प्रधान संपादक सुनील कुमार जी ने अपने 12 जुलाई 2019 के संपादकीय में तीखी टिप्पणी की है। सुनील कुमार लिखते हैं-
'' देश के एक बड़े स्टील निर्माता नवीन जिंदल को कल केन्द्र सरकार के सार्वजनिक उपक्रम भिलाई इस्पात संयंत्र ने जिस तरह अपने कारखाने का दौरा करवाया है वह हैरान करने वाला है। नवीन जिंदल पर केन्द्र सरकार की ही जांच एजेंसी सीबीआई मुकदमा चला रही है कि उन्होंने रिश्वत देकर, गलत तरीके से केन्द्र सरकार से कोयला खदान हासिल की। इस मामले में अपनी कंपनी के सभी बड़े अफसरों के साथ नवीन जिंदल जमानत पर रिहा हैं। केन्द्र सरकार के भला कौन से उपक्रम की यह समझदारी कही जाएगी कि वह केन्द्र सरकार के खिलाफ साजिश करके, भ्रष्टाचार से खदान हासिल करने वाले को मेहमान बनाकर अपना कारखाना दिखाए? और यह बात उस वक्त अधिक गंभीर हो जाती है जब अंतरराष्ट्रीय खुले बाजार में भिलाई इस्पात संयंत्र और नवीन जिंदल एक-दूसरे के मुकाबले खड़े रहते हैं। 
लोगों को याद होगा कि एक वक्त जब बीएसपी के एमडी विक्रांत गुजराल थे, और बीएसपी रेलपांत बनाने के काम में सबसे आगे थी, तब जिंदल ने रेलपांत बनाना शुरू किया था और गुजराल बीएसपी को छोड़कर जिंदल की नौकरी में चले गए थे। 
आज जब मोदी सरकार एक-एक करके बहुत से सार्वजनिक उपक्रम बेचने की अपनी नीयत और तैयारी खुलकर बता चुकी है, तब बीएसपी को इस तरह एक दूसरे कारोबारी के सामने खोलकर रख देना किसी तरह का शिष्टाचार नहीं है, यह सीधे-सीधे बीएसपी के हितों के खिलाफ एक साजिश है, फिर चाहे इसका फैसला किसी भी स्तर पर क्यों न लिया गया हो। 
सरकारी उपक्रम को सोच-समझकर घाटे में लाने की योजना कोई नई नहीं है। जिस बीएसपी से जिंदल उसका एमडी छीनकर ले गया था, उसी बीएसपी में उसी जिंदल के लिए लाल कालीन बिछाकर स्वागत करना वहां के अफसरों की नीयत उजागर करता है, और हो सकता है कि इसके पहले दिल्ली की मंजूरी भी रही हो। यह समझने की जरूरत है कि नवीन जिंदल के अपने कारखाने बिक गए हैं, जिन्हें उनके भाई ने ही खरीदा है। ऐसे में इतनी बड़ी बीएसपी को किस उम्मीद से जिंदल के सामने पेश किया जा रहा है? नेहरू के बनाए हुए देश के इस पहले सबसे बड़े औद्योगिक तीर्थ को एक पशु बाजार में पशु कारोबारी के सामने खड़ा कर दिया गया है, और मानो नवीन जिंदल इसकी देह को टटोलकर इसमें गोश्त का अंदाज लगाने आया हुआ हो। इसके बाद देश में केन्द्र सरकार द्वारा अपराधी साबित करने के लिए जितने लोगों को कटघरे में खड़ा किया गया है, वे भी जमानत मिलने के बाद भिलाई इस्पात संयंत्र आकर मांग कर सकते हैं कि उन्हें भी कारखाना घुमाया जाए। भारत का संविधान दो अभियुक्तों के बीच भेदभाव की इजाजत नहीं देता है, यह एक अलग बात है कि जिन लोगों पर अब तक केन्द्र सरकार के साथ साजिश और भ्रष्टाचार करने का मुकदमा शुरू नहीं हुआ है, और जिन्हें जमानत लेने की जरूरत नहीं पड़ी है, उन लोगों को बीएसपी के अफसर घुमाने से मना भी कर सकते हैं।''   

जिंदल ने दी सफाई , बोले-''बीएसपी हमारे लिए मंदिर के समान, सारे कयास आधारहीन''

फेसबुक पर नवीन जिंदल की पोस्ट 
जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड रायगढ़ के चेयरमैन नवीन जिंदल ने भिलाई स्टील प्लांट दौरे के तीसरे दिन साफ किया है कि उनके इस दौरे को लेकर लगाए जा रहे सारे कयास आधारहीन है। नवीन जिंदल ने सोशल मीडिया पर फेसबुक और ट्विटर के जरिए अपनी बात रखते हुए भिलाई दौरे का मकसद बताया है और भिलाई स्टील प्लांट को एक मंदिर निरुपित किया है।
 नवीन जिंदल ने ट्विट कर कहा कि वे छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की माताजी के निधन पर संवेदना व्यक्त करने गए थे। उसके बाद मैं अपने बेटे वेंकटेश को भिलाई स्टील प्लांट दिखाने ले गया। नवीन जिंदल ने कहा कि भिलाई स्टील प्लांट हमारे लिए एक मंदिर के समान है। इस प्लांट से ही प्रेरणा लेकर हमनें रायगढ़ में रेल मिल लगाई थी और हमें इस बात का गर्व है कि भारत में रेलपांत की आपूर्ति सिर्फ छत्तीसगढ़ से होती है। उन्होंने कहा कि इन खबरों से जो कयास लगाए गए हैं वह आधारहीन हैं। भिलाई स्टील प्लांट के कर्मचारियों और अधिकारियों ने हमें जो सम्मान दिया, उसके लिए हम उनके आभारी हैं। 
उल्लेखनीय है कि नवीन जिंदल अपने बेटे वेंकटेश के साथ संक्षिप्त प्रवास पर गुरुवार 11 जुलाई को भिलाई पहुंचे थे। भिलाई इस्पात संयंत्र के मुख्य कार्यपालक अधिकारी अनिर्बान दासगुप्ता एवं महाप्रबंधक प्रभारी (परियोजनाएँ) एके भट्टा भी इस दौरान उनके साथ उपस्थित थे। अपने दौरे में उन्होंने सर्वप्रथम मेनगेट के निकट स्थापित सेफ्टी एक्सीलेंस सेंटर सुरक्षा कवच का अवलोकन किया। 
इसके बाद नवीन जिंदल ने अत्याधुनिक तकनीक से निर्मित यूनिवर्सल रेल मिल का अवलोकन करते हुए रेल निर्माण एवं रेल लोडिंग की प्रक्रियाओं को देखा। उन्होंने महामाया ब्लास्ट फर्नेस-8, रेल मिल में एण्ड फोर्जिंग प्लांट तथा स्टील मेल्टिंग शॉप-1 का भी अवलोकन किया। उन्होंने संयंत्र के अधिकारियों के साथ आपसी ज्ञान व अनुभव को साझा कर इस्पात उत्पादन व उत्पादकता को बढ़ाने संबंधी प्रयासों पर चर्चा की थी।
@mzh 14719 

Saturday, March 5, 2022

रूस से ज्यादा यूक्रेन करीब रहा है भिलाई के 

 

भिलाई का निर्माण किया यूक्रेन के इंजीनियरों ने, 65 साल 

पहले बने बेहतर रिश्ते आज तनाव-अपमान के शिकार

 

यूक्रेन का अज्वस्ताल स्टील प्लांट, जहां भिलाई के ज्यादातर इंजीनियरों ने तकनीकी प्रशिक्षण लिया- तस्वीर 1960 की

मुहम्मद जाकिर हुसैन 

हम भिलाईवालों से कोई रूसी और यूक्रेनी नागरिकों के बीच फर्क करने कहे तो शायद ही कोई कर पाए। रंग-रूप वेशभूषा और बोली-भाषा भी एक सी होने की वजह से वैसे भी इनमें फर्क करना आसान नहीं। दरअसल, हम लोग भिलाई में जिन्हें 'रशियन' के नाम से जानते हैं उनमें से 90 फीसदी लोग यूक्रेन मूल के ही हैं। आज भी भिलाई में जो बचे हुए 'रशियन' परिवार हैं, उन सभी का रिश्ता यूक्रेन से जुड़ा है। 

यह अलग बात है कि इन सभी की भावनाएं आज भी रूस के साथ जुड़ी हुई है। इन दिनों जबकि रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव चल रहा है, ऐसे में भिलाई में रहने वाले ये सभी वयोवृद्ध भी चिंतित है यूक्रेन-रूस में रहने वाले अपने रिश्तेदारों को लेकर। सभी की वीडियो कॉल पर बातें हो रही हैं और एक दूसरे।

 तनाव के इस माहौल में दूसरा पहलू वर्तमान में यूक्रेन में मेडिकल शिक्षा लेने गए भारतीय स्टूडेंट की सुरक्षित 'घर वापसी' का है। वर्तमान में भारतीय स्टूडेंट के साथ जो सुलूक यूक्रेन में हो रहा है, उसके वीडियो विचलित कर देने वाले हैं। लेकिन हमेशा हालात ऐसे नहीं थे। 

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पहल पर तत्कालीन सोवियत संघ के साथ जो रिश्ता बना, उसके नतीजे में भिलाई स्टील प्लांट का जन्म हुआ। इसके साथ ही तत्कालीन रूसी इंजीनियर भिलाई पहुंचे कारखाना निर्माण के लिए और भिलाई के नौजवान इंजीनियरों को सोवियत संघ भेजा गया स्टील टेक्नालॉजी में महारत हासिल करने। 

आईए, पहले एक नजर डालते हैं तत्कालीन परिस्थितियों पर। हमारे देश की आजादी के साथ ही नेहरू काल में जब हमारे राजनयिक रिश्ते तत्कालीन सोवियत संघ के साथ स्थापित हुए तो सोवियत संघ भी द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से उबर रहा था। इस विश्व युद्ध में आज के रूस और यूक्रेन में स्थित तमाम बड़े स्टील प्लांट पर दुश्मन देशों जर्मन, जापान और इटली का हमला हुआ था। इनमें ज्यादातर स्टील प्लांट के ब्लास्ट फर्नेस को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था।

ऐसी परिस्थिति में सोवियत संघ वहां के सभी स्टील प्लांट में फिर से उत्पादन शुरू करने की जद्दोजहद में जुटा हुआ था। इसके बावजूद हमारे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कोशिश के चलते सोवियत संघ ने भारत में 10 लाख टन उत्पादन क्षमता का स्टील प्लांट लगाने सहमति दे दी। 

तब वैश्विवक महाशक्ति के तौर पर सोवियत संघ भले ही अपना झंडा बुलंद कर रहा था लेकिन वहां का स्टील सेक्टर बहुत अच्छी हालत में नहीं था। इसके बावजूद सोवियत रूस ने अपने स्टील प्लांटों में भारतीय इंजीनियरों को तकनीकी प्रशिक्षण देना स्वीकार किया और अपने तमाम एक्सपर्ट को भिलाई भी भेजा। सोवियत संघ की इस पहल से भिलाई स्टील प्लांट अपने स्वरूप में आ सका।


'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव की टिप्पणी 

 

ज्यादातर स्टील प्लांट यूक्रेन और रूस गणराज्य में 

मेकेयेवका स्टील प्लांट के बाहर भिलाई के इंजीनियर-1960

तत्कालीन सोवियत संघ में ज्यादातर बड़े स्टील प्लांट रूस और यूक्रेन गणराज्य में थे। इनमें भी भिलाई के इंजीनियरों को ज्यादातर यूक्रेन के स्टील प्लांट में प्रशिक्षण के लिए 1956 से 1990 तक  भेजा जाता रहा। 

शुरूआती दौर में जब भिलाई से देश भर के नौजवान सोवियत संघ गए तो यूक्रेन के इन्ही स्टील प्लांट के शहरों में रुमानियत का रिश्ता भी जोड़ लिया। 

दरअसल, तब सोवियत संघ भी द्वितीय विश्व युद्ध से उबरा था और अपनी सख्त पाबंदियों के चलते 'आयरन कर्टेन' कहा जाता था। वहां की वही खबरें बाहर आती थी, जो वहां का कम्युनिस्ट सोवियत प्रशासन चाहता था। दूसरा वहां की महिलाओं को तब विदेश जाने की अनुमति दुर्लभ थी। 

ऐसे में जब भारत के नौजवान यूक्रेन के स्टील प्लांट में प्रशिक्षण लेने गए तो वहां की बहुत सी नवयुवतियां इन्हें अपना दिल दे बैठीं। यह सब उस दौर की बातें हैं, जब तब के सोवियत संघ में उद्योगों का बोलबाला था और इनमें सबसे ज्यादा बड़े स्टील प्लांट संचालित थे। 

 'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर डॉ. सोनाली चक्रवर्ती की टिप्पणी 

 

 सोवियत संघ टूटा और बदल गईं परिस्थितियां

यूक्रेन का एक मेडिकल कॉलेज

एक नाटकीय घटनाक्रम में दिसंबर 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ और सभी गणराज्यों ने खुद को स्वतंत्र देश घोषित कर दिया। यही वह दौर था, जब यूक्रेन और रूस का इस्पात उद्योग चरमरा रहा था। 

 तब नवस्वाधीन यूक्रेन ने अपने यहां शिक्षा पर जोर दिया और देखते ही देखते मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में एक तूफान सा आ गया। इसका सीधा असर हमारे हिंदुस्तान पर भी हुआ। 

91 के पहले तक भिलाई सहित सोवियत प्रभाव वाले भारतीय शहरों में ज्यादातर परिवारों के बच्चे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए रूस-यूक्रेन जाया करते थे। तब इंजीनियरिंग में वहां भिलाई से गए स्टूडेंट को प्राथमिकता भी मिलती थी। लेकिन 91 के बाद वहां इंजीनियरिंग के बजाए फोकस मेडिकल में होने लगा और भारत के बनिस्बत वहां सस्ती मेडिकल शिक्षा की वजह से भारतीय स्टूडेंट का यूक्रेन का रुख करने लगे।

आज की परिस्थिति में बताया जा रहा है कि करीब 20 हजार स्टूडेंट यूक्रेन में मेडिकल कॉलेज में शिक्षा ले रहे हैं। फिलहाल सभी की चिंता यह है कि हमारे स्टूडेंट सुरक्षित अपने घर लौट जाएं। आईए जानते हैं कि तत्कालीन सोवियत संघ के साथ भारत ने कैसे रिश्ते जोड़े और इसके बाद उन दिनों भारतीयों को किस तरह वहां स्पेशल ट्रीटमेंट मिला। 

'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध की टिप्पणी  

 

भिलाई की पृष्ठभूमि और नेहरू का दौरा 

नेहरू-इंदिरा का मग्नितागोर्स्क दौरा (जून-1955)

भारत की स्वतंत्रता के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किस तरह देश के औद्योगिकीकरण के लिए दुनिया के बड़े देशों से हाथ मिलाया, इसका ब्यौरा आपको मेरी किताब 'वोल्गा से शिवनाथ तक' में विस्तार से मिल जाएगा। 

यह प्रधानमंत्री नेहरू ही थे, जिनकी वजह से तब सोवियत संघ ने भारत में एक स्टील प्लांट लगाने न सिर्फ कर्ज बल्कि तमाम तकनीकी सहायता व मशीनरी उपलब्ध कराने हामी भरी थी। जवाहरलाल नेहरू का सोवियत संघ से रिश्ता हमारे देश की आजादी से पहले का था।

 जवाहरलाल नेहरू ने 1947 के पहले और बाद में तीन मरतबा सोवियत संघ का दौरा किया था। पहली बार वह सोवियत सरकार के विशेष आमंत्रण पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि के तौर पर 7 नवंबर 1927 को महान अक्टूबर क्रांति दिवस की 10 वीं सालगिरह के आयोजनों में भाग लेने पहुंचे थे। उनके साथ उनके पिता मोतीलाल नेहरू, छोटी बहन कृष्णा व पत्नी कमला नेहरू भी साथ थे। 

इसके बाद सोवियत संघ का उनका दूसरा दौरा 7 जून से 23 जून 1955 में हुआ। तब उनके साथ उनकी बेटी इंदिरा गांधी भी थी। उन्होंने अपनी यात्रा याकेतरिनबर्ग से शुरू की थी। वह रूस के औद्योगिक शहर मैगनीतोगोर्स्क भी पहुंचे थे और यहां का विशाल स्टील प्लांट देखा था। 'रशिया बियॉन्ड' नाम की एक वेबसाइट के अनुसार '1955 में जब नेहरू और इंदिरा गांधी नदी किनारे बसे औद्योगिक शहर मैगनीतोगोर्स्क पहुँचे थे तो स्टील प्लांट में काम करने वाले कामगार और शहर के स्थानीय लोग उन्हें देखने के लिए दौड़ पड़े थे। 

अपने इस दौरे में नेहरू मास्को से लेनिनग्राद की वृहद यात्रा पर निकले, इस दौरान उन्होंने स्टालिनग्राद, क्रीमिया, जॉर्जिया, अस्काबाद, ताशकंद, समरकंद, अल्टाई क्षेत्र, मग्निागोस्र्क और सवर्दलोव्स्क (याकेतरिनबर्ग)  शहरों का दौरा किया। 

जवाहरलाल नेहरू का तीसरा और अंतिम दौरा 8 सितंबर 1961 को हुआ था। जिसमें नेहरू ने तत्कालीन रूसी प्रधानमंत्री के साथ मॉस्को में इंडो-सोवियत फ्रैंडशिप रैली को संबोधित किया था। जवाहरलाल नेहरू अपने पहले दौरे में रूस की औद्योगिक प्रगति को करीब से देखा था। फिर जब हमारा देश आजाद हुआ तो उन्होंने 10 लाख टन सालाना क्षमता वाले एक स्टील प्लांट के लिए रूस को राजी कर लिया।

 'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर 'हरिभूमि' के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी की टिप्पणी 

 

 ऐतिहासिक समझौते के बाद मंजूरी मिली भिलाई को 

2 फरवरी 1955 को भारत-सोवियत संघ के बीच नई दिल्ली में करार

2 फरवरी 1955 को नई दिल्ली में सोवियत संघ के साथ भारत का ऐतिहासिक समझौता हुआ था। इस समझौते के फलस्वरूप ही हफ्ते भर के भीतर नए स्टील प्लांट के लिए भिलाई के नाम पर भारत सरकार की मंजूरी मिली थी। 

इसके बाद भिलाई स्टील प्रोजेक्ट कंपनी, इस्पात मंत्रालय और हिंदुस्तान स्टील लिमिटेड (सेल की पूर्ववर्ती कंपनी) अस्तित्व में आए।

इन तमाम प्रक्रियाओं के बीच 6 जून 1955 को पायनियर टीम नागपुर होते हुए भिलाई पहुंची। जिसमें सोवियत संघ और भारत के इंजीनियर सहित 11 प्रतिनिधि थे। यह टीम दुर्ग के सर्किट हाउस पहुंची और भिलाई परियोजना पर जमीनी स्तर का काम शुरू हुआ। इसके अगले दिन नई दिल्ली से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मास्को के लिए उड़ान भरी थी। 

 ' वोल्ग से शिवनाथ तक' पर स्कूली छात्रा परी पुरोहित का एक वीडियो

 

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के काम में आई तेजी 

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट निर्माण प्रथम चरण

प्रधानमंत्री नेहरू के जून 1955 के दौरे के बाद सोवियत संघ से इंजीनियर बड़ी तादाद में भिलाई पहुंचे और देश के पहले आधुनिक सरकारी स्टील प्लांट के निर्माण का कार्य तेजी से आगे बढ़ा। 

बाद के दौर में सोवियत संघ ने न सिर्फ स्टील बल्कि दूसरे भारतीय उद्योगों को स्थापित करने में भी अपनी भागीदारी दी। भारत का यह औद्योगिकीकरण तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की दूरदृष्टि का परिणाम थी। वजह इसके पीछे की यह है कि भारत के साथ जिस सोवियत संघ का करार हुआ उसमें रूस और यूक्रेन एक विशाल देश सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करते थे। 

जब भिलाई का निर्माण शुरू हुआ और 40 लाख टन की क्षमता तक कारखाना निर्माण चलता रहा, तब तक हमारे इन्हीं यूक्रेनियन इंजीनियरों ने हम भारतीयों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम किया।

बीएसपी स्कूल सेक्टर-1 भिलाई 1988 बैच का यादगार आयोजन 'गुरुदक्षिणा' 

 

 इंजीनियरिंग शिक्षा में भिलाई के बच्चों को प्राथमिकता मिली यूक्रेन में

वह सोवियत संघ (यूएसएसआर) का दौर था, जब इस विशाल संघ (देश) का हिस्सा रहते हुए रूस, यूक्रेन, जार्जिया, बेलारूस, कजाकिस्तान, अजरबैजान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, लिथुआनिया, मॉल्दोविया, लातविया, आर्मीनिया, तुर्कमेनिया व एस्टोनिया अलग-अलग गणराज्य के तौर पर अस्तित्व रखते थे। उस दौर में सोवियत संघ का 80 फीसदी इस्पात उद्योग यूक्रेन में था।

यही वजह है कि जब 2 फरवरी 1955 को भारत के साथ सोवियत संघ करार हुआ तो इसके बाद भिलाई में स्थापित होने वाले स्टील प्लांट के भारतीय इंजीनियरों को तकनीकी प्रशिक्षण के लिए ज्यादातर यूक्रेन के ही स्टील प्लांट में भेजा गया। हालत तो यह थी कि आज जिस तरह से यूक्रेन में सस्ती मेडिकल पढ़ाई का क्रेज है, उन दिनों भिलाई के संपन्न अफसरों के पास अपने बच्चों को यूक्रेन के विभिन्न संस्थानों में कम दर पर उच्च शिक्षा के लिए भेजने का विकल्प था और इसका लाभ भी भिलाई के बच्चों को खूब मिला। ऐसे बच्चे 1990 तक रूस और यूक्रेन के विभिन्न कॉलेजों/तकनीकी संस्थानों में पढऩे जाते रहे।

भिलाई स्टील प्लांट शिक्षा विभाग का सफरनामा 1955 से

 

यूक्रेन-रूस के स्टील प्लांट, जिनके इंजीनियरों ने बनाया भिलाई

तत्कालीन सोवियत संघ में ज्यादातर स्टील प्लांट यूक्रेन और रूस गणराज्य में थे। भिलाई में 10 लाख टन वार्षिक उत्पादन क्षमता का स्टील प्लांट लगाने हुए समझौते के बाद तमाम इंजीनियर इन्हीं स्टील प्लांट से आए और भिलाई के नौजवान इंजीनियरों को भी इन्हीं स्टील प्लांट में प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। इनमें यूक्रेन के मरियोपोल (पूर्व नाम ज्दानोव) में अज्वस्ताल स्टील प्लांट और इलिच  स्टील एंड आयरन वर्क्स है। यूक्रेन के मेकेयेवका (पूर्व नाम दमित्रविस्क या दमित्रविस्की) में दोनेत्स्क प्रांत से 15 किमी दूर स्थापित मेकेयेवका मेटलर्जिकल प्लांट है। 

दोनेत्स बेसिन (डोनबास) की मशहूर आयरन ओर खदानें भी यहीं है। निपर नदी के किनारे यूक्रेन में ज्पारोशिया दक्षिण-पूर्वी शहर है। यहां क्रिवयी रीह (रोग) आयरन ओर माइंस है। यहीं ज्पारोशिया स्टील प्लांट ज्पारोस्ताल में है, जो 1933 में शुरू हुआ था। क्रिवा रोग स्टील प्लांट पहले सरकारी था, जिसे अब आर्सेलर-मित्तल ले चुका है। 

इनके अलावा रूस में भी स्टील प्लांट हैं, जिनका भिलाई से सीधा रिश्ता रहा है। इनमें रूस के दक्षिण-पश्चिम साइबेरिया में केमेरोवो परिक्षेत्र (ओब्लास्ट) स्थित नोवोकुजनेत्स है। जहां नोवोकुजनेत्स आयरन एंड स्टील प्लांट है। रूस के चेलियाबिन्स्क परिक्षेत्र (ओब्लास्ट) में यूराल पर्वत श्रृंखला के साए तले मग्नितागोर्सके शहर है, जहां मग्नितागोर्सके आयरन एंड स्टील वर्क्स है। 

 'वोल्गा से शिवनाथ तक' प्रथम संस्करण का विमोचन 

 

ज्यादातर शीर्ष पदों तक पहुंचे शुरूआती बैच के इंजीनियर

मरियोवपोल में भिलाई के इंजीनियर-1957

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के लिए युवा इंजीनियरों का पहला बैच 10 सितंबर 1956 को भिलाई से रवाना हुआ था। तब से 90 के दौर तक भिलाई के इंजीनियरों के कई बैच उच्च तकनीकी प्रशिक्षण के लिए जाते रहे। इनमें से ज्यादातर इंजीनियर भारतीय स्टील सेक्टर के शीर्ष पदों पर रहे।

 इनमें बहुत से लोगों ने स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) को नेतृत्व दिया तो बहुत से इंजीनियर सेल के विभिन्न स्टील प्लांट में शीर्ष पदों पर पहुंचे। इन इंजीनियरों के पहले बैच से केसी खन्ना, एस. नारायण, एएस मूर्ति, एचसी धारवाड़, ईआरसी शेखर, एचएस अश्वत्थ, निमाई कुमार मित्र, केपी रामचंद्रन, बीएमजी रमन, एबी माथुर, ईएएस मूर्ति, एनसी रामासुब्बु, एस. नारायण, कैलाश बिहारी गोयल, केआर संगमेश्वरन, तेरे देसाई, आर. कृष्णामूर्ति, एस. समरपुंगवन में आधे ज्पारोशिया और आधे ज्दानोव में तकनीकी प्रशिक्षण हेतु भेजे गए थे। 

ज्पारोशे में एस. समरपुंगवन, ईआरसी शेखर, केआर संगमेश्वरन और एके फोतेदार ने प्रशिक्षण लिया, वहीं दिलबाग राय आहूजा, गोपीनाथ पुरी, रघुवीर व पीएच सचदेवा सहित अन्य ने मेकेयवका स्टील प्लांट भेजा गया। तब भिलाई स्टील प्लांट में नियुक्त होने वाले सोवियत चीफ इंजीनियर मेें भी ज्यादातर यूक्रेन के स्टील प्लांट से ही आते थे। 

शुरूआती दौर के चीफ इंजीनियर वीई दिमशित्स ने यूक्रेन की प्रसिद्ध डोनबास की खदानों में भी काम किया था और मरियोवपुल व अज्वस्ताल स्टील प्लांट में सेवाएं दी थी। वहीं शुरूआती दौर के युवा इंजीनियरों में केआर संगमेश्वरन, एस. रामासुब्बुु, ईआरसी शेखर और केबी गोयल को रूस के मग्नितागर्सके में भी प्रशिक्षण का अवसर मिला। बाद के दौर में देखें तो ईडी प्रभारी रहे विनोद अरोरा को रूस मेें साइबेरिया के नोवे कुजनेत्स स्टील प्लांट मेें प्रशिक्षण का अवसर मिला था। 

'वोल्गा से शिवनाथ तक' के दूसरे संस्करण का विमोचन 

 

 तब भिलाई के इंजीनियरों को मिलता था स्पेशल ट्रीटमेंट 

ज्पारोशे में नए साल की पार्टी में भिलाई के इंजीनियर-1958

भिलाई से यूक्रेन और रूस के स्टील प्लांट में उच्च तकनीकी प्रशिक्षण लेने वाले कई वरिष्ठ इंजीनियर आज भी यह बताते नहीं थकते कि उन्हें उस दौर में सोवियत रूस में कैसा वीवीआईपी ट्रीटमेंट मिलता था।

 भिलाई स्टील प्लांट की रेल एंड स्ट्रक्चरल मिल के सुप्रिंटेंडेंट रहे नरेंद्र सिंह छत्री बताते हैं-जब सितंबर 1956 को भिलाई के इंजीनियरों का समूह सोवियत रूस के लिए रवाना हो रहा था तो सांसद व महात्मा गांधी के सचिव रहे सुधीर घोष को खास तौर पर इस्पात मंत्रालय में विशेष कर्त्तव्यस्थ अधिकारी (ओएसडी) नियुक्त किया गया था और पत्राचार व पासपोर्ट सहित हमारी यात्रा का तमाम औपचारिकताएं सुधीर घोष के मार्गदर्शन में हुई। घोष हम लोगोें को खास तौर पर विदा करने एयरपोर्ट भी आए थे। 

छत्री बताते हैं-मास्को उतरने के बाद से अज्वस्ताल, ज्दानोव, ज्पारोशे, मरियोपोल और मग्नितागोर्सके जैसे स्टील प्लांट में समूह को बांट दिया गया। यहां हर शहर में भारतीय को स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता था। शहर में भारतीय युवा यदि सर्कस या मूवी देखने तो वहां के स्थानीय लोग हमें पहले टिकट लेने का मौका देते।

 इसी तरह शहर में होने वाली क्रिसमस व न्यू ईयर सहित तमाम पार्टियों में भी भारतीय युवा खास तौर पर आमंत्रित किए जाते थे। वह ऐसा दौर था जब द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से सोवियत रूस उबर रहा था और जनजीवन सामान्य हो रहा था। ऐसे में भारतीय इंजीनियर भी वहां की जीवनशैली में घुलमिल गए। 

जब भिलाई स्टील प्लांट से निकला पहला 'हीरा'

 

दिल का रिश्ता भी जुड़ता गया यूक्रेन से 

मल्होत्रा-मजुमदार और बलराम सिंह दंपति

जिन दिनों भिलाई स्टील प्रोजेक्ट अपना रूप ले रहा था, उन्हीं दिनों सुदूर यूक्रेन में तकनीकी प्रशिक्षण हासिल करने गए भिलाई के ज्यादातर नौजवानों ने वहां दिल का रिश्ता भी जोड़ लिया। 

1956 से 1985 तक भिलाई में लगभग हर साल ऐसे कई जोड़े आते गए, जिनकी नई जिंदगी की शुरूआत यूक्रेन से हुई। भिलाई के एक युवा इंजीनियर काशीनाथ 1957 में यूक्रेन के ज्पारोशिया में प्रशिक्षण ले रहे थे। वहीं उनकी मुलाकात आना मलाया से हुई। बातें-मुलाकातें हुई और लुदमिला को काशीनाथ इतना भा गए कि उन्होंने साथ जिंदगी बिताने का फैसला कर लिया। 

1959 में भिलाई के इंजीनियर एलआर भटनागर यूक्रेन के मकेयेवका स्टील प्लांट में प्रशिक्षण ले रहे थे। वहीं उनकी मुलाकात एक युवा टेलीफोन ऑपरेटर गलीना से  हुई और दोनों ने एक दूसरे का हाथ थाम लिया।

1960 में मेकेयेवका के स्टील प्लांट में प्रशिक्षण ले रहे भिलाई के युवा इंजीनियर मोती सागर मल्होत्रा का वहीं के अस्पताल में पदस्थ 21 साल की नर्स जीना पर आ गया और जब मल्होत्रा हिंदुस्तान लौटे तो उनके साथ उनकी हमसफर जीना भी थी। 

1962 में यूक्रेन के ज्पारोशे में स्कूली पढ़ाई कर रही क्लेरा और भिलाई से गए युवा इंजीनियर बलराम सिंह की कहानी में भी ऐसी ही रूमानियत थी। क्लेरा और बलराम ने बाद में शादी कर ली और भिलाई में नई जिंदगी की शुरूआत की। सेल के निदेशक प्रोजेक्ट पद से रिटायर हुए बलराम सिंह तो अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन क्लेरा उम्र के 8 वें दशक में भी बेहद सक्रिय हैं और सोशल मीडिया पर रोजाना अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहती हैं। 

 यूक्रेन के ज्दानोव (अब मरियोपोल) के एक आर्थोडोक्स क्रिश्चियन परिवार की बेटी लुद्मिला और भिलाई से वहां स्टील प्लांट में प्रशिक्षण लेने गए युवा इंजीनियर विश्वनाथ नागेश मजुमदार की भी नजरें मिली और प्यार हो गया। हालांकि उनकी शादी में कुछ दिक्कतें आईं लेकिन दोनों ने एक दूसरे का हाथ थाम कर 1963 में शादी के बाद भिलाई में नहीं जिंदगी की शुरूआत की। 

बाद के दौर में 1985 में यूक्रेन के ज्पारोशिया में फैशन डिजाइनर लुद्मिला अरेफयेवा और भिलाई से वहां प्रशिक्षण लेने गए सुब्रत मुखर्जी ने 1985 में एक दूसरे को दिल दे दिया और शादी के बाद भिलाई में नई जिंदगी शुरू की। पेशे से मेकेनिकल इंजीनियर विवेक चतुर्वेदी 1986 में यूक्रेन के मशीन बिल्डिंग इंस्टीटॅयूट ज्पारोशिया में पढ़ रहे थे। वहीं इना लुब्रोनेंको भी इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की तालीम ले रही थीं। दोनों के दिल मिले और रूमानियत का एक नया रिश्ता शुरू हुआ जो आज भी हंसी-खुशी चल रहा है। 


नए दौर में भिलाई को जरूरत नहीं रही रूसी इंजीनियरों की 

भिलाई स्टील प्लांट का 40 लाख टन सालाना हॉट मेटल उत्पादन क्षमता तक का विस्तारीकरण अकेले सोवियत रूस के दम पर हुआ था। जाहिर है, इसमें रूसी तकनीक और मशीनरी इस्तेमाल हुई। इस वजह से एक दौर ऐसा भी रहा जब रशियन टेक्नीकल एक्सपर्ट बड़ी तादाद में भिलाई में हुआ करते थे। 

इनमें से 90 फीसदी एक्सपर्ट यूक्रेन के स्टील प्लांट से ही आया करते थे। इन सभी एक्सपर्ट को उपलब्ध कराने की जवाबदारी रूसी फर्म त्याशप्रोम एक्सपोर्ट (टीपीई) की हुआ करती थी। लेकिन देखते ही देखते दौर बदलने लगा। 


टीपीई का दफ्तर बंद, इस्माइल स्वदेश लौटे और यनोद का निधन 

टीपीई के दफ्तर में मेरी दाईं ओर इस्माइल और बाईं ओर यनोद

सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत सरकार के फैसले के अनुरूप भिलाई सहित तमाम सरकारी स्टील प्लांट के विस्तारीकरण में ग्लोबल टेंडर के जरिए अलग-अलग देशों की तकनीक अपनाने  की शुरूआत हुई। 

तब जर्मन, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, चीन और इटली सहित विभिन्न देशों की तकनीक का भिलाई में प्रवेश हुआ। ऐसे में रशियन एक्सपर्ट की संख्या लगातार घटने लगी। 

2018 में स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) ने एक अहम फैसला लेते हुए 2020 तक रशियन एक्सपर्ट की तादाद को घटाते हुए शून्य करने का फैसला लिया। इसके अनुरूप ही अब भिलाई सहित सेल के किसी भी स्टील प्लांट में रशियन एक्सपर्ट की जरूरत नहीं रही। 

भिलाई में एक्सपांशन बिल्डंग स्थित टीपीई का दफ्तर अब बंद हो चुका है। टीपीई के भारत प्रमुख इस्माइल मजयानेव ने बीएसपी मैनेजमेंट की ओर से सेक्टर-7 रशियन काम्पलेक्स में आवंटित सभी बंगले लौटा कर पिछले ही साल अपने देश रवाना हो चुके हैं। वहीं टीपीई दफ्तर की पहचान रहे यहां के केयर टेकर यनोद कुमार का भी कैंसर से देहांत हो चुका है। 


अब भारतीय स्टूडेंट से हो रहा व्यवहार चिंताजनक 

पोलैंड सीमा पर परेशान हाल भारतीय स्टूडेंट-28 फरवरी 2022

एक तरफ जिस यूक्रेन में शांतिकाल के दौरान भिलाई से गए इंजीनियरों को उन दिनों वीवीआईपी ट्रीटमेंट मिलता था तो दूसरी तरफ अब युद्धकाल में उसी यूक्रेन में भारतीय नौजवान स्टूडेंट के साथ दुव्र्यवहार की चिंताजनक खबरें आ रही हैं। 

आज भारतीय स्टूडेंट अपनी जान बचाने बंकरों में किसी तरह रह रहे हैं। युद्धग्रस्त क्षेत्र से निकलना सबसे बड़ी चुनौती है। 

ऐसे में यूक्रेनी लोग भारतीय स्टूडेंट को ट्रेन में चढऩे नहीं दे रहे हैं। वहीं पोलैंड सीमा पर भारतीय स्टूडेंट से वहां की सेना द्वारा मारपीट करने के वीडियो भी वायरल हो रहे हैं। भारत सरकार के सारे इंतजाम शांति वाले देशों में हैं। स्टूडेंट से कहा जा रहा है कि किसी तरह युद्धग्रस्त क्षेत्र से निकल जाएं। हालांकि संकटग्रस्त इलाके से बाहर निकालने के लिए किसी तरह का कोई इंतजाम भारत सरकार की तरफ से नहीं हो रहा है। ऐसे में भारतीय स्टूडेंट बेहद चुनौतीपूर्ण हालात का सामना कर रहे हैं। 

अब तो भारतीय स्टूडेंट की मौत की खबरें भी आ रही हैं। कर्नाटक के नवीन शेखरप्पा ज्ञानगौदर की यूक्रेन के खारकीव में मंगलवार 1 मार्च को हमले में मौत हो गई। पंजाब के बरनाला का रहने वाले चंदन कुमार की बुधवार 2 मार्च को को मौत हो गई। चंदन की मौत की वजह बीमारी बताई गई है और वह लंबे समय से अस्पताल में भर्ती थे। वहीं 4 मार्च को पंजाब के रहने वाले हरजोत सिंह को क्रास फायर में गोली लगी है और अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है।

Monday, January 20, 2014

नए साल का संकल्प

पद्मभूषण तीजन बाई

हम कलाकारों की बिरादरी हमेशा यही चाहती है कि दर्शकों का भरपूर प्यार मिलता रहे। साल 2013 में कई उपलब्धियां मेरे खाते में आई। विभिन्न सरकारी-गैर सरकारी संस्थाओं ने सम्मान दिया। अपने राज्य में अगले महीने एक और डि-लिट् मुझे मिल रही है। उम्मीद है, नया साल भी ईश्वर की कृपा से अच्छा ही होगा। नए साल के लिए कोई विशेष संकल्प तो नहीं है, हां बस इतना ही चाहती हूं कि सद्भावना बनी रहे और लोक कला व कलाकार ऊंचाईयां तय करते रहे। 

पद्मश्री जॉन मार्टिन नेलसन 

2013 की तरह 2014 भी सद्भावना मिशन को समर्पित रहेगा। आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले में स्थित सालूर गांव में अपना सद्भावना मिशन के तहत मैं एक महत्वाकांक्षी परियोजना से जुड़ा हूं। यहां एक पर्वत पर देश के महापुरुषों की प्रतिमाएं स्थापित करने की पहल की है। पहले इसे क्रूस का पहाड़ कहा जाता था, अभी तक मैनें महात्मा गांधी, मदर टेरेसा और विवेकानंद की प्रतिमाएं भेज दी है। आगे और भी भेजनी है। इसे अब सद्भावना पर्वत कहा जा रहा है। नए साल में भी सभी का आपस में प्रेम बना रहे, बस यही आकांक्षा है। 

फिल्म निर्देशक अनुराग बसु 

2013 में परिवार सहित अपने शहर भिलाई आया। कोशिश है अपनी अगली फिल्म 'जग्गा जासूसÓ के प्रमोशन के लिए भी छत्तीसगढ़ और भिलाई आऊं। भिलाई में थियेटर को लेकर काफी कुछ करने की प्लानिंग है। अक्सर देश-विदेश में शूटिंग के दौरान कहीं कोई अपना भिलाई वाला मिल जाता है तो दिल से खुशी होती है। हमारे भिलाई के लोगों ने हर जगह अपना झंडा बुलंद किया है। नए साल के लिए मेरे अपने भिलाईवासियों को ढेर सारी शुभकामनाएं।

 

साल 2013 में ये रही अच्छी खबरें 

नौकरियों का पिटारा खुला 

साल 2013 में भिलाई स्टील प्लांट ने थोक में नौकरियां जारी की। 13 फरवरी को एक साथ 934 पदों पर खुली भर्ती की अधिसूचना जारी की गई है। इसमें एस-1 और एस-3 ग्रेड पर नियुक्ति की सारी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और चयनित उम्मीदवार अब ज्वाइनिंग भी दे रहे हैं। इसके बाद दूसरी बड़ी वेकेंसी 3 अक्टूबर को निकाली गई। जिसमें आपरेटर कम टेक्नीशियन ट्रेनी (ओसीटी) के 330 पदों पर खुली भर्ती की प्रक्रिया शुरू हुई। 
राज्य का पहला सर्वर बेस्ड टेलीकॉम लगाने काम शुरू 
छत्तीसगढ़ का पहला सर्वर बेस्ड टेलीकाम एक्सचेंज भिलाई में लगाने 14 फरवरी को भूमिपूजन हुआ। इसके तहत भिलाई स्टील प्लांट का दूर संचार विभाग संयंत्र और टाउनशिप क्षेत्र के 34 स्थानों पर एक्सचेंज (मीडिया गेट वे) की स्थापना कर रहा है। जिससे दूरसंचार और इंटरनेट की सुविधा के अंतर्गत स्पष्ट आवाज, डाटा एवं वीडियो कॉलिंग की अनवरत सुविधा मिल सकेगी। 
सुपेला ओवर ब्रिज को मंजूरी मिली  
25 फरवरी को रेलवे बजट में इस्पात नगरी को सुपेला क्रासिंग में ओवरब्रिज की मंजूरी मिल गई। साथ ही दुर्ग जयपुर एक्सप्रेस साप्ताहिक करने और साजा से भाठापारा में नई रेल लाइन के सर्वे की भी मंजूरी मिली। सांसद सरोज पांडेय का कहना है कि रेल बजट 2013 में बहुत थोड़ी ही सही लेकिन कुछ आकांक्षाएं पूरी हुई। सुपेला चौक के रेल्वे क्रासिंग में ओवरब्रिज के निर्माण एवं सिरसा गेट के गेट नं. 439 में अंडरब्रिज निर्माण हेतु 06.61 करोड़ रू. की स्वीकृति बजट में की गई है। 
दुनिया का सबसे बड़ा तंबूरा हमारे भिलाई में बनेगा
इस्पात नगरी फिर एक बार विश्व रिकार्ड में अपना नाम दर्ज करने जा रही है। भिलाई स्टील प्लांट की पहल पर लोककला वाद्य संग्राहक रिखी क्षत्रिय ने मैत्रीबाग में दुनिया का सबसे विशाल तंबूरा बनाने का काम शुरू कर दिया है। इसकी औपचारिक शुरूआत 18 अप्रैल को सिविक सेंटर स्थित नगर प्रशासन विभाग की वर्कशॉप में  की गई थी। 
ट्रेनीज को भी नियमित कर्मियों की तरह सुविधाएं 
भिलाई स्टील प्लांट में स्थाई नौकरी से पूर्व प्रशिक्षण ले रहे युवाओं को पहली बार नियमित कर्मी की तरह सुविधाएं शुरू कर दी गई हैं। मेडिकल और मकान सहित तमाम सुविधाएं इसमें शामिल हैं। इस अहम फैसले के बाद सेल बोर्ड ने अक्टूबर में ट्रेनीज के हक में एक महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए बीएसपी में करीब 600 प्रशिक्षुओं में प्रत्येक को 8330 रुपए का भुगतान बोनस के तौर देना तय किया। 
तालपुरी में सिर्फ भूखंड पर रजिस्ट्री
छत्तीसगढ़ हाउसिंग बोर्ड की तालपुरी इंटरनेशनल कॉलोनी के 3500 से ज्यादा आवंटियों ने राहत की सांस ली है। सिर्फ भूखंड पर रजिस्ट्री के आदेश की शासकीय अधिसूचना 13 अगस्त को जारी हो गई। इसके बाद यहां के आवासधारियों की अब रजिस्ट्री सिर्फ भूखंड पर होगी, जबकि इससे पहले हाउसिंग बोर्ड ने निर्मित मकान की लागत को भी इसमें जोड़ दिया था। छत्तीसगढ़ शासन के फैसले से लोगों अधिकतम 4 लाख तक की बचत होगी। 
इस संबंध में 28 जून को राज्य कैबिनेट ने फैसला लिया था। जिसके करीब डेढ़ महीने बाद संयुक्त सचिव वाणिज्य कर (पंजीयन) विभाग एपी त्रिपाठी के हस्ताक्षर से यह अधिसूचना जारी हो गई। 2008 की यह परियोजना 2010 में पूरी होनी थी लेकिन अभी तक इसका निर्माण अधूरा है। दूसरी तरफ हाउसिंग बोर्ड ने नियमों का हवाला देते हुए सिर्फ भूखंड पर रजिस्ट्री से इनकार कर दिया था। इसके बाद तालपुरी इंटरनेशनल कॉलोनी एसोसिएशन ने इस मुद्दे पर हाउसिंग बोर्ड कमिश्नर, मुख्य सचिव व मुख्यमंत्री से गुहार लगाई थी।

खबर जिसने चौंकाया

25 अप्रैल-सीबीआई ने सेक्टर-9 अस्पताल के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. एसके सक्सेना 10 हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया। इस घटना की भिलाई बिरादरी में व्यापक प्रतिक्रिया हुई। मैनेजमेंट ने डॉ. सक्सेना को निलंबित कर दिया। डॉ.सक्सेना को बीएसपी कर्मी सोमेन कोले की शिकायत पर सीबीआई ने 25 अप्रैल की रात रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया।
आईडी एक्ट लागू, लाल झंडा बना मितान
भिलाई स्टील प्लांट में पहली बार केंद्रीय औद्योगिक विवाद अधिनियम (आईडी एक्ट) के तहत यूनियन चुनाव 10 मई को हुए। जिसमें हिंदुस्तान स्टील एम्पलाइज यूनियन (सीटू) ने 44 फीसदी मत लेकर अपनी शानदार जीत हासिल की है। इस्पात श्रमिक मंच 28 फीसदी मतों के साथ दूसरे स्थान पर रहा वहीं स्टील एम्पलाइज यूनियन इंटक को 19 फीसदी मतों के साथ तीसरे स्थान पर रहा। इसके साथ ही भिलाई में करीब डेढ़ दशक से श्रमिक यूनियन की राजनीति में चली आ रही शून्यता की स्थिति खत्म हो गई। 
आफिसर्स एसोसिएशन में फेरबदल 
बीएसपी आफिसर्स एसोसिएशन के चुनाव में इस बार चौंकाने वाले नतीजे रहे। लगातार दो कार्यकारिणी में अध्यक्ष रहे टीआर यादव इस बार मैदान से बाहर थे और उनके प्रत्याशी के तौर मैदान में उतरे एनके बंछोर को पूर्व महासचिव केडी प्रसाद से शिकस्त मिली। वहीं महासचिव बने के. के. यादव ने 900 से ज्यादा मत हासिल कर अपनी जीत से सबको चौंका दिया। 
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2014 की उम्मीदें 

रावघाट परियोजना:-2009 में माइनिंग लीज हासिल करने के बाद सेल-बीएसपी मैनेजमेंट की तैयारी 2012-13 तक रावघाट आयरन ओर प्रोजेक्ट शुरू करने की थी। लेकिन ऐसा हो ना सका। साल 2013 में परियोजा का डीपीआर तैयार नहीं हो पाया है। अर्धसैनिक बलों की टुकडिय़ां सुरक्षा के लिए यहां पहुंच रही है। नारायणपुर और अंतागढ़ के इलाके में बीएसपी अपनी पैठ बनाने सेवा कार्य में भी जुटी है। लेकिन जमीनी हालात ठीक इसके विपरीत है। कनेरा में टाउनशिप निर्माण की तैयारी चल रही है। रेल लाइन का काम साल में कुछ माह रुकने के बाद फिर शुरू हो गया है। इस बीच सेल-बीएसपी ने रावघाट को अपनी प्राथमिकता सूची में रखते हुए अलग से ईडी की नियुक्ति कर दी है। भिलाई स्टील प्लांट में ईडी माइंस पी. के. सिन्हा को अब स्वतंत्र रूप से ईडी रावघाट बना दिया गया है। श्री सिन्हा रावघाट माइंस की लीज हासिल करने से लेकर अब तक सारी प्रक्रियाओं के साक्षी हैं। उम्मीद की जा रही है कि 2014 में रावघाट परियोजना मूर्त रूप ले सकेगी। 
विस्तारीकरण अभी और दूर 
भिलाई स्टील प्लांट की सालाना हॉट मेटल उत्पादन क्षमता 50 लाख टन से बढ़ाकर 70 लाख टन करने आधुनिकीकरण व विस्तारीकरण परियोजना कई रुकावटों के बाद अब फिर से गति पकडऩे लगी है। साल 2013 में प्रोजेक्ट एरिया में कई हादसे हुए। दो जानें भी गईं। पूरे साल भर में प्रोजेक्ट की एक बड़ी उपलब्धि  के रूप में कोक ओवन बैटरी-11 की हीटिंग 14 सितंबर को सीईओ एस. चंद्रशेखरन के हाथों हुई। 17 हजार करोड़ की पूरी परियोजना में नई ब्लास्ट फर्नेस-8, यूनिवर्सल रेल मिल, बार एंड रॉड मिल, स्टील मेल्टिंग शॉप-3 और नई सिंटर मशीन की स्थापना जैसे कार्य अभी भी निर्माण अवस्था में है। नई परियोजना के लिहाज से सिंटर प्लांट जैसे कुछ विभागों मॉडेक्स पूल के तहत अन्य विभागों से भेजे गए कर्मियों की वजह से विवाद की स्थिति भी बन रही है। इन सारी परिस्थितियों में बीएसपी का विस्तारीकरण फिलहाल दो साल और दूर है। 
कवर्धा एमओयू में होगा बदलाव 
नए साल की उम्मीदों में भिलाई स्टील प्लांट का कवर्धा प्रोजेक्ट भी शामिल है। कबीर धाम जिले की अकलीआमा-चेलिकआमा लौह अयस्क खदान हासिल करने सेल-बीएसपी ने छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम के साथ 4 नवंबर 12 को एमओयू किया है। इस साल ज्वाइंट वेंचर बनाने की दिशा में दोनों पक्षों की कई बैठकें हुई और सेल बोर्ड ने इस संबंध में प्रारूप बनाकर राज्य सरकार को भेज भी दिया है। अब विधानसभा चुनाव के बाद बदली राजनीतिक परिस्थितियों में इस प्रारूप में बदलाव की संभावनाएं बढ़ गई हैं। इसके बाद ही ज्वाइंट वेंचर बनेगा और कवर्धा तक रेल लाइन जैसी महत्वपूर्ण पहल को अमली जामा मिलेगा। 
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2013 में सुर्खियों में रहे ये भिलाइयन 

अरुंधति भट्टाचार्य- भारतीय स्टेट बैंक पहली महिला चेयरमैन के तौर पर ओहदा संभालने वाली अरुंधति भट्टाचार्य का बचपन इस्पात नगरी भिलाई 4 ए, स्ट्रीट-26, सेक्टर-10 में गुजरा। उनके पिता प्रद्युम्न कुमार मुखर्जी भिलाई स्टील प्लांट में प्रोजेक्ट इंजीनियर थे। इंग्लिश प्राइमरी स्कूल सेक्टर-9 (अब ईएमएमएस-9) से प्राइमरी और इंग्लिश मीडियम हायर सेकंडरी स्कूल सेक्टर-7 (अब सी.से. स्कूल-7) से 8 वीं तक पढऩे के बाद अरुंधति ने आगे की पढ़ाई बोकारो और कोलकाता से की। 
सुनील सोनी- ईपीएस सेक्टर-9 और सीनियर सेकंडरी स्कूल सेक्टर-7 के बाद 1972 में सीनियर सेकंडरी स्कूल सेक्टर-10 से पास आउट सुनील सोनी (आईएएस) ने महाराष्ट्र में करीब 3 दशक की लंबी सेवाओं के बाद इस साल 2 जुलाई को नई दिल्ली में भारतीय मानक ब्यूरो के महानिदेशक का पद संभाला। श्री सोनी ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान आईईएस में पूरे देश में दूसरा स्थान लाकर 1978 में भिलाई का नाम रोशन कर दिया था। इस दौरान वह भारतीय रेलवे में असिस्टेंट मेकेनिकल इंजीनियर के तौर पर भिलाई स्टील प्लांट में ही पदस्थ हुए। यहां सेवा देते हुए उन्होंने आईएसएस की तैयारी की और देश भर में 24 वें स्थान के साथ सफलता दर्ज की। महाराष्ट्र के बाद श्री सोनी 2012 से प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली में है। इस दौरान वह केंद्रीय वित्त मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव भी रहे। उनके पिता स्व. चरणजीत लाल सोनी भिलाई स्टील प्लांट के वित्त विभाग में अफसर थे और सेल में अतिरिक्त निदेशक (वित्त) के पद से सेवानिवृत्त हुए। 
मनीष खारबीकर- कर्नाटक स्थित जैनतीर्थ मूड़भद्री से पुरातात्विक व धार्मिक महत्व की जैन प्रतिमाओं की चोरी का खुलासा करने वाले मैंगलुरू के पुलिस कमिश्नर मनीष खारबीकर इस साल सुर्खियों में रहे। चोरी की इस घटना की देश भर के जैन समुदाय में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और इस अंतरराष्ट्रीय तस्करी के तार दुर्ग-भिलाई से भी जुड़े थे। मनीष मूलत: भिलाई के हैं और उनकी स्कूली शिक्षा भिलाई विद्यालय से पूरी हुई है। उनकी मां पीएन खारबीकर बीएसपी शिक्षा विभाग में पदस्थ थी और पिता स्व. एनवी खारबीकर पुलिस विभाग में थे। 
कविता कृष्णन-सीनियर सेकंडरी स्कूल सेक्टर-10 से 1990 में पास आउट कविता की गिनती अब दुनिया के चुनिंदा विचारको में हो रही है। अमेरिकी पत्रिका फॉरेन पॉलिसी ने रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे, आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, ईरान के राष्ट्रपति हसन रुहानी, ईसाई धर्मगुरु पोप फ्रांसिस, फेसबुक के संस्थापक मार्क जकरबर्ग और संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त नवी पिल्लई सहित दुनिया भर की 100 हस्तियों के साथ कविता का नाम ग्लोबल थिंकर के तौर पर शामिल किया है। कविता के पिता स्व. एएस. कृष्णन भिलाई स्टील प्लांट के बीबीएम में डीजीएम थे। मां प्रो. लक्ष्मी कृष्णन अंग्रेजी की प्राध्यापक व संगीत की जानकार हैं।
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भिलाइयन जो इस साल हमसे बिछड़ गए

डॉ. मोहिनी ताराचंद- भिलाई की पहली चिकित्सक डॉ. मोहिनी ताराचंद का 94 साल की उम्र में इस साल 11 जनवरी को गुडग़ांव में निधन हो गया। भिलाई स्टील प्रोजेक्ट की शुरूआत के दौरान जब ना तो कोई अस्पताल था ना ही किसी डॉक्टर की नियुक्ति हुई थी। ऐसे में 1956 में तत्कालीन सुप्रिंटेंडेंट (ट्रेनीज) कर्नल ताराचंद की पत्नी डॉ. मोहिनी ताराचंद ने भिलाई हाउस (आज का बीआईटी और सियान सदन) के एक कमरे में अपना अस्पताल शुरू किया था। उन्होंने 1959 तक भिलाई की श्रमिक बिरादरी और उनके परिवारों को नि:शुल्क चिकित्सा सेवा दी। 
सुब्रमण्यम समरपुंगवन-भिलाई स्टील प्लांट में एक ग्रेजुएट इंजीनियर से सेल चेयरमैन के पद तक पहुंचने वाले पहले भिलाईयन सुब्रमण्यम समरपुंगवन का 26 फरवरी को अमेरिका में निधन हो गया। भिलाई से सोवियत संघ जाकर तकनीकी प्रशिक्षण लेने वाले भिलाई के इंजीनियरों के पहले समूह का नेतृत्व श्री समरपुंगवन ने किया था। उन्होंने सेल चेयरमैन बनने से पहले सेल की अन्य इकाइयों बोकारो और इस्को बर्नपुर स्टील प्लांट में बतौर एमडी अपनी सेवाएं दी थी। पीएम ट्र्ॉफी चयनकर्ता समूह के प्रमुख के तौर पर भी उन्होंने भिलाई के कई दौरे किए थे। 
डॉ. विशेष मोहबे-छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय के लिए नैनो टेक्नोलॉजी पाठ्यक्रम तैयार करने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले वरिष्ठ विज्ञान लेखक डॉ. विशेष मोहबे का 21 नवंबर को ह्दयघात से निधन हो गया। भौतिकी के प्रोफेसर होने के साथ उन्होंने समाज में वैज्ञानिक चेतना के प्रचार-प्रसार के लिए काफी काम किया। 
सीएल दुबे- भिलाई की श्रमिक राजनीति में पहली पीढ़ी के आखिरी स्तंभ में से एक सीएल दुबे का 30 जनवरी को निधन हो गया। श्री दुबे के इंटक कोषाध्यक्ष पद पर रहते हुए ही स्टील वर्कर्स यूनियन का विशाल भवन श्रम शक्ति सदन सेक्टर 6 में निर्मित किया गया था। श्रमिकों से संबंधित विभिन्न बहुपक्षीय समझौतों में श्री दुबे की विशेष भूमिका होती थी।
प्रफुल्ल भाई त्रिवेदी-इस्पात नगरी भिलाई के प्रथम आवास के आवंटी प्रफुल्ल भाई त्रिवेदी (80) का 2१दिसंबर को निधन हो गया। बीएसपी के प्रथम महाप्रबंधक श्रीनाथ मेहता के साथ भिलाई आए स्व. त्रिवेदी 11 जून 1956 से 17 जून 1984 तक स्टोर विभाग में पदस्थ थे। 1956 में जब सेक्टर-1 और सेक्टर-10 निर्माणाधीन थे। उस दौरान 3 दिसंबर 1956 को उन्हें एक अन्य कर्मी ओवरसियर पीतांबर श्रीवास्तव के साथ सेक्टर-1, एवेन्यू बी का 1 ए आवास आबंटित किया था। यह टाउनशिप के किसी भी आवास का पहला आवंटन था। 
रोबिन दत्ता-भिलाई की श्रमिक राजनीति में रोबिन दत्ता एक बड़ा नाम थे। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से इंटक तक उन्होंने श्रमिकों का बखूबी नेतृत्व किया। एचएससीएल में उन्होंने श्रमिकों की समस्याओं को दिल्ली तक उठाने में मुख्य भूमिका निभाई इस साल 25 अक्टूबर को उन्होंने आखिरी सांस ली। 
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साल-2013 के हादसे 

24 जनवरी-निर्माणाधीन ब्लास्ट फर्नेस-8 स्थल में झारखंड पलामू जिले से आए ठेका मजदूर शंकर शर्मा की ऊंचाई से गिरने से मौत के बाद बाकी मजदूरों ने जमकर उत्पात मचाया। इन मजदूरों ने ठेका कंपनी के दफ्तर में तोड़-फोड़ की। दूसरे दिन भी हादसे की जगह तनाव बरकरार रहा। बड़े बवाल की आशंका के चलते सभी ठेका मजदूरों को दो दिन तक छुट्टी दे दी गई। 
31 जनवरी-बीएसपी के विस्तारीकरण परियोजना स्थल पर नई कोक ओवन बैटरी क्रमांक-11 में एक चाइनीज टावर क्रेन 30 टन वजनी भारी भरकम जॉब सहित मजदूरों पर गिर गई। कैंप-1 निवासी ठेका मजदूर संतोष सिंह की मौके पर मौत हो गई। अन्य घायलों में कृष्णा देवांगन की हफ्ते भर बाद अस्पताल में मौत हो गई। दो अन्य घायलों हरमीत सिंह व प्रशांत भूषण तिवारी उपचार के बाद स्वस्थ होकर घर लौटे। 
3 अप्रैल-निगम पार्षद व महापौर परिषद सदस्य गफ्फार खान के भाई जमालुद्दीन के परिवार के 5 सदस्यों की नाव पलटने से मौत हो गई। रात के वैवाहिक आयोजन के बाद सुबह दुर्ग के ग्राम चंगोरी स्थित तालाब में नाव पलटने से मोहम्मद हबीब (38), रोशनी (25), गुडिय़ा(4), तहजीम(4), तहसीन(1) की मौत हो गई। इन सभी मृतकों का सामूहिक अंतिम संस्कार 5 अप्रैल की दोपहर रामनगर स्थित मुस्लिम कब्रिस्तान में किया गया। जहां सैकड़ों की तादाद में मौजूद लोगों ने अंतिम विदाई दी। 
5 मई-बीएसपी के आधुनिकीकरण व विस्तारीकरण क्षेत्र के नए वैगन टिपलर एरिया में परीक्षण के दौरान वैगन पलटने पर हुई जोरों की आवाज से पास के प्लेटफार्म पर खड़े जीएम प्रोजेक्ट अनिल टूटेजा, डीजीएम चंदन रक्षित और एचईसी कंपनी में कार्यरत ठेका मजदूर बीरेश ठाकुर दहशत में नीचे कूद गए। इनमें ठेका मजदूर बीरेश ठाकुर को गंभीर चोटें आई और उसकी महीने भर बाद सेक्टर-9 अस्पताल में मौत हो गई।
17 मई-बीएसपी के सेक्टर-9 अस्पताल में आईसीयू में जगह नहीं मिलने से सड़क हादसे के घायल बीएसपी कर्मी की मौत हो गई। इस लापरवाही से बिफरी सीटू यूनियन ने अस्पताल में हंगामा किया। बजरंग पारा कोहका निवासी और बीएसपी टाउनशिप इलेक्ट्रिकल विभाग में कार्यरत मुन्नालाल साहू (45) और उनकी पत्नी मंजू उर्फ मोहरबाई साहू (42) बिटाल (बालोद) के पास सुबह ट्रक की ठोकर से घायल हो गए थे। सेक्टर-9 अस्पताल की केजुअल्टी में घायलों की गंभीर हालत के बावजूद आईसीयू के बजाए वार्ड में भेज दिया गया। शाम 4 बजे मुन्ना लाल की मौत हो गई। अस्पताल में विरोध-प्रदर्शन के बाद आनन-फानन में आखिरी सांसे ले रही मृतक की पत्नी को आईसीयू में भेजा गया। हालांकि दो दिन बाद महिला की भी मौत हो गई।
25 जून-उत्तरांचल में आई बाढ़ में भिलाई के दो दंपतियों ने अपनी जान गंवाई। एसीसी जामुल में अफसर प्रसन्न कुमार पिल्लई अपनी पत्नी लता पिल्लई और हाउसिंग बोर्ड 32 एकड़ क्षेत्र में निवासरत एसीसी के रिटायर अफसर पी. राधाकृष्णन और उनकी पत्नी वी. सती देवी 8 जून को भिलाई से 4 धाम की यात्रा पर रवाना हुए थे। दोनों के परिजनों से उनकी 12 जून की रात आखिरी बार बात हुई थी। उसके बाद चारों की कोई खबर नहीं मिली। अंतत: हादसे के हफ्ते भर बाद कोई पता नहीं चलने पर चारों की मौत की पुष्टि उत्तरांचल सरकार ने की। 
6 जुलाई-भिलाई स्टील प्लांट के रोल टर्नर शॉप (आरटीएस) में पदोन्नति विवाद ने तीसरे दिन उग्र रूप ले लिया। अपनी मांग पूरी न होते देख विभाग के करीब 120 कर्मियों ने दोपहर में काम ठप कर दिया। उत्पादन ठप होते देख हड़बड़ाए मैनेजमेंट ने बैठकें कर बीच का रास्ता निकाला। प्रभावित 4 कर्मियों को अलग-अलग एलओपी (लाइन ऑफ प्रमोशन) के साथ प्रमोशन दे दिया गया। फिलहाल चारों कर्मी उसी विभाग में कार्य करेंगे लेकिन जल्द ही इनमें से दो को स्थानांतरित किया जाएगा।
13 जुलाई-भिलाई स्टील घ्लांट के अंदर शनिवार को कोल हैंडलिंग घ्लांट (सीएचपी) में खराब सड़क और पीने का पानी नहीं मिलने को लेकर कर्मियों ने हंगामा किया। तकरीबन तीन घंटे तक यह सब चला और सड़क जाम रही। बीएसपी के विस्तारीकरण के चलते सीएचपी में मार्ग को परिवर्तित किया गया है। कर्मियों की शिकायत है कि इस मार्ग पर निर्माण  कार्य का मलबा डाला जा रहा है, जिससे आए दिन यहां हादसे हो रहे हैं। वहीं सीएचपी में पिछले तीन दिन से पीने के पानी की भी कोई व्यवस्था नहीं है। 
17 जुलाई-भिलाई स्टील प्लांट के निर्माणाधीन सिंटर प्लांट-3 के सब स्टेशन 41सी में केबल बिछाने के दौरान करंट की चपेट में आए शांति नगर डुंडेरा निवासी चिन्ना राम साहू (36) अर्धकुशल ठेका श्रमिक की मौत हो गई। मेसर्स इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट (इंडिया) लिमिटेड के अधीन कार्यरत इस युवक की मौत के बाद विभिन्न श्रमिक संगठनों ने मैनेजमेंट के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इससे हड़बड़ाए मैनेजमेंट ने स्थिति को शांत करवाने मृतक के आश्रित को नौकरी के प्रावधान की घोषणा कर दी। 
17-18 जुलाई-सेक्टर-9 अस्पताल के आईसीयू में फिर एक बार जगह नहीं मिलने पर बीएसपी कर्मी की मौत हो गई। ब्लास्ट फर्नेस-7 में कार्यरत सेक्टर-1 एवेन्यू सी निवासी बीएसपी कर्मी घनश्याम यादव (42) को सुबह सीने में दर्द की शिकायत के बाद सेक्टर-9 अस्पताल लाया गया था। यहां उसे ए-3 वार्ड में दाखिल कर दिया गया था। उनका रूटीन एक्स-रे शाम को 4 बजे लिया गया। तब तक उनकी तबियत और बिगड़ चुकी थी। इसके बाद ज्यादा हालत बिगडऩे पर आनन-फानन में उन्हें आईसीयू में शिफ्ट किया गया,जहां उनकी मौत हो गई। इस मौत के बाद श्रमिक संगठनों ने जम कर बवाल मचाया। दूसरे दिन प्लांट के अंदर ब्लास्ट फर्नेस में हुए प्रदर्शन के दौरान सीटू नेताओं की सीआईएसएफ के साथ झड़प हुई। 
26 जुलाई-ब्लास्ट फर्नेस-3 में हुए हादसे में  सीनियर टेक्नीशियन आरएस नायडू को गैस लग गई। उन्हें गंभीर हालत में सेक्टर-9 के आईसीयू में दाखिल कराया गया। बाद में मैनेजमेंट ने और बेहतर इलाज के लिए उन्हें वेलोर भेजा। 
3 अगस्त-भिलाई स्टील प्लांट के अंदर और बाहर हुए हादसों में दो महिला ठेका मजदूरों की मौत हो गई। जोरातराई गेट के समीप प्लांट के अंदर मेन स्टेप डाउन सब स्टेशन (एमएसडीएस-2) के पास शाम 5 बजे कन्वर्टर शॉप से अपनी ड्यूटी पूरी कर लौट रही जोरातराई निवासी सुरमणि बाई (52) फाउलर की चपेट में आ गई। इसके करीब घंटे भर के बाद दूसरा हादसा इक्विपमेंट चौक से खुर्सीपार जाने वाले नए रास्ते पर हुआ। यहां सीईडी में काम करने वाली ठेका मजदूर मीरा बाई (५०) को एक फाउलर ने अपनी चपेट में ले लिया। 
16 अगस्त-टाउनशिप में डेंगू से एक बच्चेे की मौत हो गई। भिलाई स्टील प्लांट के कर्मी और सेक्टर-5, स्ट्रीट 16, क्वार्टर नं. 9 बी निवासी अशरफ अली के 4 साल के बेटे अजीम अली को बुखार के बाद 11 अगस्त को सेक्टर-9 अस्पताल में दाखिल कराया गया था। मासूम अजीम की मौत के बाद टाउनशिप के घर-घर से साधारण बुखार वाले मरीजों की भी डेंगू के शक में जांच की गई। करीब दो माह तक चले अभियान में १२१ मरीजों में डेंगू का संदेह था। इनमें ३३ का इलाज सेक्टर-9 अस्पताल में हुआ। डेंगू को लेकर दो माह तक टाउनशिप में दहशत की स्थिति रही और इसकी वजह से बीएसपी नगर सेवाएं विभाग को विशेष सफाई अभियान चलाना पड़ा। 
10 सितंबर-ब्लास्ट फर्नेस-5 में हुए हादसे में तीन श्रमिक बुरी तरह झुलस गए। टैप होल नं. 2 में कूलिंग सेक्शन में कार्यरत नियमित कर्मी भुवनेश्वर यादव (45) के साथ ठेका मजदूर सालिक राम (38) और अभिषेक तुरतर (25) व अन्य मजदूर लास्ट फर्नेस से पिघला लोहा (हॉट मेटल) निकलने के बाद टेपिंग की खाली नालियों की सफाई कर रहे थे। इसके लिए जैसे ही पानी की धार पड़ी वहां मौजूद हाट मेटल से जोर का विस्फोट हुआ। जिससे पिघला लोहा छिटका और दहशत में कर्मचारी भागने लगे। तीनों ठेका मजदूरों का महीने भर तक सेक्टर-9 अस्पताल में इलाज चला। 
6 अक्टूबर-जमीन से 150 फीट नीचे पंप हाउस में बेहोश पाए गए भिलाई स्टील घ्लांट के कर्मी की सेक्टर-9 अस्पताल में मौत हो गई। बीएसपी के जल प्रबंधन विभाग (डब्ल्यूएमडी) में आपरेटर उमरपोटी निवासी मंसाराम (59) पंप हाउस-34 में 29 सितंबर को बेहोश मिले थे।
31 अक्टूबर- बीएसपी की रेल एंड स्ट्रक्चरल मिल में 950 स्टैंड का पिनियन जमीन से उखड़ गया। रूसी तकनीक पर आधारित इस पिनियन के उखडऩे से पूरी मिल का ऑपरेशन 9 नवंबर तक रोक दिया गया। इस दौरान पूरी मिल को कैपिटल रिपेयर में लिया गया और 10 नवंबर से उत्पादन सामान्य हो पाया। 
2 नवंबर-भिलाई स्टील प्लांट के भीतर पखवाड़े भर पहले एक ठेका मजदूर दुष्कर्म की शिकार हो गई। पीडि़ता को आरोपी सुपरवाइजर धमकाता रहा यहां तक कि पति ने भी उसे मायके छोड़ दिया था। मजदूरों की एकजुटता के बाद न सिर्फ कानूनी कार्रवाई हुई, बल्कि आरोपी को थाने पहुंच कर आत्मसमर्पण करना पड़ा। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर दिन भर भ_ी थाना में गहमा-गहमी रही। घटना 20 अक्टूबर को दोपहर बाद 3:30 बजे की। जोरातराई से लगे ग्रामीण क्षेत्र से आने वाली 27 वर्षीय ठेका मजदूर ठेकेदार के चंद्रशेखरन के अधीन कंटीन्युअस कास्टिंग विभाग में काम कर रही थी। घटना वाले दिन महिला मजदूर अपना काम खत्म कर घर जाने की तैयारी कर रही थी। इसी दौरान सुपरवाइजर खुर्सीपार निवासी जनक लाल वर्मा ने पास के एक कमरे में बुलाया और उससे दुष्कर्म किया। 
7 नवंबर-सेक्टर-9 अस्पताल में मरीज की मौत के बाद परिजनों ने डॉक्टरों की पिटाई कर दी। खुर्सीपार निवासी 39 वर्षीय युवक का उपचार चल रहा था। मरीज की बीमारी को लेकर परिजनों की डॉक्टरों के साथ बहस हुई और इस दौरान आरोपी सुदर्शन अग्रवाल व अन्य लोगों ने डॉ. सौरव मुखर्जी और डॉ. संजय सिंह से मारपीट कर दी।