Sunday, May 31, 2026


 रावघाट का लौह अयस्क भिलाई जाएगा ट्रेन से, दो दशक में हुआ पटरियां बिछाने का काम पूरा  


रावघाट रेलवे स्टेशन का प्रवेश द्वार मई 2026

अंतत: रावघाट लौह अयस्क खदान से भिलाई स्टील प्लांट के लिए कच्चा माल भेजने एक महत्वपूर्ण पड़ाव पूरा हो गया। दो दशक पहले दल्ली राजहरा से रावघाट होते हुए जगदलपुर तक रेल लाइन बिछाने एक महत्वपूर्ण एमओयू 2007 में हुआ था। तब लक्ष्य 5 वर्ष में रेल लाइन बिछाने का था लेकिन सुरक्षागत व अन्य वजहों से अब करीब दो दशक में रावघाट तक रेल लाइन बिछाने का काम पूरा हुआ है। 

फिलहाल रावघाट से अंतागढ़ तक लौह अयस्क सड़क मार्ग से भेजा जा रहा है और वहां से मालगाड़ी में दल्ली राजहरा होते हुए भिलाई भेजा जा रहा है। उम्मीद जताई जा रही है अक्टूबर 2026 से सीधे रावघाट से लौह अयस्क मालगाड़ी से भेजा जा सकेगा। रेलवे और सेल-बीएसपी मैनेजमेंट की तैयारियां पूरी है। फिलहाल रावघाट रेलखंड पर इंजन की सफल रोलिंग की जा चुकी है। अंतत: दल्ली राजहरा से रावघाट तक रेल लाइन का काम लगभग पूरा हो चुका है। 

95 किमी रेल लाइन बिछाना एक जटिल परियोजना 

फिलहाल अंतागढ़ से मालगाड़ी में भेजा जा रहा लौह अयस्क

देखा जाए तो दल्ली राजहरा से रावघाट तक करीब 95 किलोमीटर लंबी यह रेल परियोजना सामान्य निर्माण कार्य नहीं थी। नक्सल प्रभावित और अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र से गुजरने वाली इस लाइन के निर्माण में सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती रही। रेल लाइन और खनन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए वर्ष 2012 में गृह मंत्रालय के समन्वय से दो-दो बटालियन सुरक्षा बलों की तैनाती की गई, जिनमें रेलवे ट्रैक की सुरक्षा के लिए सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) तथा खनन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की बटालियनें शामिल थीं। 
गृह मंत्रालय के निर्देशानुसार दल्लीराजहरा से रावघाट तक के आंतरिक क्षेत्रों में सेल द्वारा 4 अर्ध-स्थायी तथा 21 स्थायी सुरक्षा शिविरों का निर्माण कराया गया, जिस पर स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा 180 करोड़ रुपये से अधिक की राशि व्यय की गई। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सुरक्षा चुनौतियों और बीच-बीच में हुई घटनाओं के बावजूद परियोजना का कार्य लगातार आगे बढ़ता रहा।

कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) निरीक्षण 

सहित पूर्ण कमीशनिंग जून 2026 में प्रस्तावित  

अक्टूबर 2026 में रावघाट से सीधे मालगाड़ी में भेजा जा सकेगा लौह अयस्क 

रेलवे निर्माण कार्य भारतीय रेलवे द्वारा सेल के वित्तीय सहयोग से किया जा रहा है, जबकि निर्माण एजेंसी रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) है। रेल लाइन निर्माण की अनुमानित लागत लगभग 1854 करोड़ रुपये है, जिसमें से सेल-भिलाई इस्पात संयंत्र अब तक लगभग 1720 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुका है। इसके अतिरिक्त रेलवे लाइन के विद्युतीकरण कार्य के लिए भी संयंत्र द्वारा लगभग 180 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि व्यय की गई है। वर्ष 2010 में प्रारंभ हुए इस कार्य में अप्रैल 2026 तक रावघाट स्टेशन भवन, यात्री सुविधाओं तथा सिग्नलिंग एवं दूरसंचार कार्य को छोड़कर अधिकांश निर्माण पूरा किया जा चुका है। कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) निरीक्षण सहित पूर्ण कमीशनिंग जून 2026 में प्रस्तावित है।
20 मई 2026 को रावघाट रेलखंड पर इंजन की सफल रोलिंग इस परियोजना की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आई है। इसके साथ ही रावघाट माइंस से सीधे रेल रेक संचालन का मार्ग लगभग प्रशस्त हो गया है और आगामी कुछ सप्ताहों में रावघाट से रेक डिस्पैच प्रारंभ होने की संभावना है। यह उपलब्धि केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि वर्षों के सतत प्रयास, समन्वय और कठिन परिस्थितियों में किए गए कार्य का परिणाम मानी जा रही है।

यात्री ट्रेन सेवा शुरू हो चुकी 

केवटी से शुरू हुई यात्री ट्रेन 16 जुलाई 2019 

इस परियोजना का प्रभाव अब केवल औद्योगिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है। वर्ष 2022 में दल्ली राजहरा से ताड़ोकी तक यात्री ट्रेन सेवा शुरू होने के बाद बस्तर अंचल के लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और व्यापार के नए रास्ते खुले हैं। आदिवासी समाज के युवाओं के लिए अब दुर्ग, भिलाई और देश के अन्य बड़े शहरों तक पहुंच पहले की तुलना में अधिक सहज हो गई है। स्थानीय नागरिकों के लिए यह रेल लाइन केवल परिवहन का माध्यम नहीं, बल्कि नई संभावनाओं का द्वार बनती जा रही है।
आज भिलाई इस्पात संयंत्र रावघाट स्टेशन को भी भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित कर रहा है। स्टेशन में यात्रियों के लिए तीन प्लेटफॉर्म तथा लौह अयस्क एवं सामग्री परिवहन हेतु एक पृथक गुड्स प्लेटफॉर्म विकसित किया जा रहा है। वर्तमान में लौह अयस्क का परिवहन सड़क मार्ग से अंतागढ़ रेलवे साइडिंग तक तथा वहां से रेल मार्ग द्वारा संयंत्र तक किया जा रहा है। पहली रैक 9 सितंबर 2022 को लोड की गई थी और वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 6000 टन लौह अयस्क अंतागढ़ साइडिंग तक पहुंचाया जा रहा है।

अंतागढ़ तक यात्री ट्रेन पहुंची 15 अगस्त 2024

अक्टूबर  2026  से रावघाट से सीधे रैक संचालन प्रारंभ होने की संभावना है, जिससे प्रतिदिन लगभग चार रैक यानी 15 हजार टन लौह अयस्क परिवहन संभव हो सकेगा। वर्ष 2025-26 में अंतागढ़ साइडिंग से 1.74 मिलियन टन आयरन ओर प्राप्त हुआ है, जबकि वर्ष 2026-27 में अंतागढ़ और रावघाट साइडिंग के माध्यम से अतिरिक्त 4 से 5 मिलियन टन लौह अयस्क प्राप्त होने का अनुमान है। परियोजना पूर्ण होने के बाद प्रतिवर्ष 6 से 7 मिलियन टन लौह अयस्क की आपूर्ति संभव होगी।
यह परियोजना भिलाई इस्पात संयंत्र की भविष्य की उत्पादन योजनाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में संयंत्र की लौह अयस्क आवश्यकता लगभग 32 हजार टन प्रतिदिन है। वहीं हॉट मेटल उत्पादन को 6.5 एमटीपीए से बढ़ाकर 7.5 एमटीपीए तथा वर्ष 2031 तक 10.5 एमटीपीए विस्तार लक्ष्य तक पहुंचाने की योजना पर कार्य किया जा रहा है।


रावघाट 1983 से एमओयू तक 

रावघाट रेलवे स्टेशन मई 2026

सेल-भिलाई स्टील प्लांट ने रावघाट खदानों के लिए 1983 में अपना पहला आवेदन किया और 13 साल बाद 1996 में पर्यावरण और वन मंत्रालय (एमओईएफ) ने सैद्धांतिक रूप से पर्यावरणीय मंज़ूरी दी थी।
रेलवे, मध्य प्रदेश राज्य सरकार (जिससे बाद में 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य का गठन किया गया), राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) के बीच 02 अप्रैल 1998 को एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।
2004 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने सेल को वानिकी और पर्यावरण मंजूरी के लिए नए सिरे से आवेदन प्रस्तुत करने को कहा। सेल ने आईबीएम, केंद्रीय खान एवं अनुसंधान संस्थान, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान और अन्य द्वारा अध्ययन करने के बाद 2006 में आवेदन प्रस्तुत किया। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मई 2007 में वन मंजूरी के लिए सेल के प्रस्ताव को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भेजे जाने के बाद, मंत्रालय ने इसे जून 2007 के आसपास सर्वोच्च न्यायालय की अधिकार प्राप्त समिति को भेज दिया।
दल्ली राजहरा-रावघाट-जगदलपुर (235 किमी) ब्रॉड गेज रेल लिंक परियोजना के निर्माण को लागत-साझाकरण के आधार पर कार्यान्वित करने के लिए 11 दिसंबर 2007 को रेल मंत्रालय और छत्तीसगढ़ सरकार, सेल, एनएमडीसी के बीच एक संशोधित समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।
सुप्रीम कोर्ट कमेटी ने अक्टूबर 2008 में रावघाट माइंस के एफ ब्लॉक के लिए वन मंजूरी के लिए अपनी अंतिम सहमति दी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अंतिम मंजूरी के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भेजा गया ।
छत्तीसगढ़ सरकार के खनिज संसाधन विभाग ने अंततः अक्टूबर 2009 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से उचित पर्यावरणीय मंजूरी और वानिकी मंजूरी मिलने के बाद सेल को 20 साल की अवधि के लिए रावघाट माइंस के एफ ब्लॉक के लिए खनन पट्टा प्रदान किया। 

नई रेल लाइन के लिए एमओयू 2007

ताड़ोकी रेलवे स्टेशन के समीप रेलवे ब्रिज 2026

'पब्लिक-पब्लिक पार्टनरशिप' (सार्वजनिक-सार्वजनिक भागीदारी) के एक बेहतरीन उदाहरण के रूप में, रेल मंत्रालय, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल), नेशनल मिनरल्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएमडीसी) और छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार ने मिलकर छत्तीसगढ़ में दल्लीराजहरा से जगदलपुर तक (रावघाट होते हुए) 235 किलोमीटर लंबी एक नई ब्रॉड गेज रेल लाइन बनाने के लिए साझा सहमति पत्र पर 11 दिसंबर 2007 को हस्ताक्षर किए।
इस अवसर पर केंद्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद, केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक तथा इस्पात मंत्री राम विलास पासवान, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और रेल राज्य मंत्री आर. वेलू उपस्थित थे। समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों में रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के.सी. जेना, छत्तीसगढ़ सरकार के मुख्य सचिव शिवराज सिंह, सेल के अध्यक्ष एस.के. रूंगटा और एनएमडीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक राणा सोम शामिल थे। इस अवसर पर रेल मंत्रालय, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, सेल और एनएमडीसी के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।

रेल मंत्री लालू बोले-विकास का मार्ग प्रशस्त करेगी नई रेल लाइन  

अक्टूबर 2009 में रावघाट खदान की माइनिंग लीज मिलने के बाद एमडी आर रामाराजू व अन्य 

इस अवसर पर बोलते हुए, रेल मंत्री लालू प्रसाद ने कहा कि यह नई रेल लाइन एक महत्वपूर्ण परियोजना है जो देश में आर्थिक विकास की गति को तेज करने में मदद करेगी। लालू प्रसाद ने कहा कि यह रेल लाइन बैलाडीला और रावघाट के लौह अयस्क से समृद्ध क्षेत्रों से होकर गुजरेगी, जिससे देश में इस्पात उत्पादन में वृद्धि होगी। मंत्री ने बताया कि यह नई लाइन अयस्कों और खनिजों के परिवहन के साथ-साथ वन उत्पादों के थोक परिवहन को भी सुगम बनाएगी। रेल मंत्री ने आगे कहा कि यह नई लाइन आदिवासी और पिछड़े वर्गों के लोगों को रोजगार के अनेक अवसर प्रदान करेगी और छत्तीसगढ़ के बस्तर तथा नारायणपुर जैसे पिछड़े क्षेत्रों के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगी। 1998 में हस्ताक्षरित पिछले एमओयू का ज़िक्र करते हुए, लालू प्रसाद यादव ने कहा कि कुछ कारणों से पिछले दशक के दौरान यह परियोजना शुरू नहीं हो पाई थी। मंत्री ने बताया कि पिछले महीने उनके मंत्रालय द्वारा बुलाई गई एक विशेष बैठक में इस मुद्दे को सुलझा लिया गया, जिसमें सभी संबंधित एजेंसियां शामिल थीं; इसी से आज के संशोधित समझौता ज्ञापन (एमओयू) का मार्ग प्रशस्त हुआ।

रमन ने बताया उत्तर और दक्षिण के बीच  सेतु तो 

पासवान ने कहा पीपीपी का बेहतरीन उदाहरण

मुख्यमंत्री डॉ. रमन को रावघाट खनन की योजना बताते बीएसपी के एमडी  आर. रामाराजू, 
ईडी माइंस मानस कुमार बिंदु, जीएम माइंस पीके सिन्हा व  
प्रदेश के वनमंत्री विक्रम उसेंडी और अन्य अफसर। (2008) 

अपने संबोधन में, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा कि इस नई रेल कनेक्टिविटी को पिछड़े बस्तर क्षेत्र की जीवन रेखा कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह उत्तर और दक्षिण के बीच एक सेतु (पुल) का काम भी करेगी। इस क्षेत्र के सुंदर, अत्यंत सघन और अद्वितीय वनों का ज़िक्र करते हुए, डॉ. रमन सिंह ने कहा कि यह नई रेल लाइन पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होगी। डॉ. सिंह ने कहा कि यह नई लाइन रेलवे की कमाई में भी काफी हद तक इज़ाफ़ा करेगी। 

अपने संबोधन में, केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक तथा इस्पात मंत्री राम विलास पासवान ने कहा कि यह नई रेल लाइन स्थानीय लोगों की लंबे समय से लंबित मांग को पूरा करेगी। उन्होंने यह भी बताया कि आज का एमओयू 'सार्वजनिक-सार्वजनिक भागीदारी' (पीपीपी) का एक बेहतरीन उदाहरण है। उन्होंने कहा कि यह सराहनीय है कि रेल मंत्रालय देश के पिछड़े क्षेत्रों के विकास की अवधारणा को आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि देश का सार्वजनिक क्षेत्र पूरी दक्षता के साथ कार्य कर रहा है, और उन्होंने उनसे आह्वान किया कि वे अपने मुनाफ़े का एक निश्चित प्रतिशत उस मद पर खर्च करें जिसे 'कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व' (सीएसआर) के रूप में जाना जाता है।
अपने स्वागत संबोधन में, रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के.सी. जेना ने कहा कि रेल मंत्री द्वारा की गई विशेष पहलों के कारण भारतीय रेलवे में एक ज़बरदस्त बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान एमओयू इसी पहल का एक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि इस एमओयू  पर हस्ताक्षर होने के साथ ही, देश में लौह अयस्क और इस्पात के सुगम परिवहन के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात होगा, और इससे आदिवासी बहुल बस्तर क्षेत्र का बहुप्रतीक्षित सामाजिक-आर्थिक विकास सुनिश्चित होगा।

दो चरणों में होगा निर्माण, 58 वैगन की होगी मालगाड़ी

रावघाट रेलवे स्टेशन का शानदार नजारा मई 2026

इस परियोजना का निर्माण दो चरणों में किया जाएगा। पहला चरण दल्लीराजहरा से रावघाट तक 95 किलोमीटर लंबा है, जबकि दूसरा चरण रावघाट से जगदलपुर तक 140 किलोमीटर लंबा है। वर्ष 2004-05 के मूल्य स्तरों के आधार पर, इस परियोजना की लागत 968.60 करोड़ रुपये है। पहला चरण पाँच साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है और इसका पूरा खर्च, जो कि 304 करोड़ रुपये है, सेल उठाएगी। दूसरे चरण पर 640 करोड़ रुपये का खर्च आएगा, जिसे भारतीय रेलवे (376 करोड़ रुपये – 57%), सेल (141 करोड़ रुपये – 21%), छत्तीसगढ़ राज्य सरकार (76 करोड़ रुपये – 12%) और एनएमडीसी (70 करोड़ रुपये – 10%) मिलकर साझा करेंगे। पहले चरण के लिए ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। इस नई रेलवे लाइन में 460 मीटर लंबी एक सुरंग, 46 रोड अंडर-ब्रिज, 16 रोड ओवर-ब्रिज, 42 बड़े पुल और 303 छोटे पुल शामिल होंगे। रेलवे ने शुरू में 10 स्टेशन बनाने की योजना बनाई है।
खनिजों और अयस्कों के परिवहन के अलावा, जो इस परियोजना का मुख्य कार्य होगा, इस रेल लाइन के माध्यम से स्थानीय क्षेत्र के वन उत्पादों, खाद्यान्नों आदि के परिवहन का भी प्रस्ताव है। इन वस्तुओं को संभालने के लिए पर्याप्त लोडिंग और अनलोडिंग की सुविधाएँ प्रदान की जाएँगी। लौह अयस्क, डोलोमाइट, बॉक्साइट आदि जैसे खनिज अयस्कों के परिवहन के लिए, रेलवे ने डीज़ल इंजन वाली मालगाड़ियाँ चलाने की योजना बनाई है, जिनमें 58 वैगन होंगे। उद्योग जगत की विशेष माँगों पर अतिरिक्त निजी साइडिंग्स की व्यवस्था करने पर भी विचार किया जा सकता है।

Tuesday, February 24, 2026

 "भिलाई जिंदाबाद" का विमोचन किया फिल्मकार अनुराग बसु ने



 इस्पात नगरी भिलाई के लेखक व पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन की नई किताब "भिलाई जिंदाबाद, कुछ किस्से-कहानियां" का विमोचन फिल्मकार अनुराग बसु ने रविवार 25 जनवरी 2026 को किया किया। राजधानी नवा रायपुर स्थित पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित साहित्य उत्सव के समापन समारोह में अनुराग ने यह विमोचन किया। उन्होंने इस्पात नगरी भिलाई पर आधारित रोचक सामग्री को सराहा और लेखक को अपनी शुभकामनाएं दी।
उल्लेखनीय है कि वैभव प्रकाशन नई दिल्ली-रायपुर से प्रकाशित इस किताब में इस्पात नगरी भिलाई के स्थापना काल सेे अब तक के प्रमुख व रोचक घटनाक्रम को लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने कलमबद्ध किया है। इसके पूर्व  लेखक की "भिलाई एक मिसाल" और "वोल्गा से शिवनाथ तक" किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो इस्पात नगरी भिलाई के इतिहास पर केंद्रित है।

"भिलाई जिंदाबाद.." में क्या खास है..? 


इस्पात नगरी भिलाई के निर्माण काल से अब तक कुछ रोचक और हैरतअंगेज घटनाक्रमों को लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने अपनी इस किताब में दर्ज किया है। विगत तीन दशकों के लगातार शोध के बाद लेखक ने अपनी इस किताब में भिलाई से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रम को दर्ज किया है। यह सब किस्से और कहानियों की शैली है। 

इनमें फिल्मी दुनिया, राजनीति से लेकर विभिन्न क्षेत्रों के अतिविशिष्ट लोगों के इस्पात नगरी आगमन से लेकर ऐसे बहुत से तनाव भरे दिन और हादसों का भी विस्तार से उल्लेख है जिन्होंने भिलाई को कई बार झकझोर दिया। इसके साथ ही विदेश में भिलाई का परचम फहराने वाली कुछ हस्तियों का भी जिक्र है।


इस्पात नगरी का रोचक इतिहास प्रमाणित तथ्यों 

के साथ रखती है किताब भिलाई जिंदाबाद: उमाकांत

हमारी अगली पीढ़ी जानना चाहेगी तो बेहतर माध्यम 

साबित होगी किताब भिलाई जिंदाबाद : मेश्राम

सेक्टर-4 में हुआ समीक्षा गोष्ठी का आयोजन, बदलते 

भिलाई की चुनौतियों पर भी हुई चर्चा

गोष्ठी में उपस्थित विशिष्ट समुदाय

मूलनिवासी कला साहित्य और फिल्म फेस्टिवल भिलाई, डॉ अंबेडकर एग्जीक्यूटिव फ्रेटरनिटी भिलाई. डॉ अंबेडकर वेलफेयर सोसायटी छत्तीसगढ़ और एनस्टेप के संयुक्त तत्वावधान में समीक्षा गोष्ठी का आयोजन रविवार 8 फरवरी 2026 की शाम सेल एससी एसटी ओबीसी फेडरेशन भवन, सड़क नंबर 8, सेक्टर 4 में किया गया। जिसमें लेखक एवं पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन की  हालिया प्रकाशित किताब "भिलाई जिंदाबाद, कुछ किस्से-कुछ कहानियां" पर प्रमुख वक्ताओं ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने भिलाई को जानने समझने के लिए इसे एक जरूरी किताब बताया।
अतिथियों के स्वागत के उपरांत आधार वक्तव्य रखते हुए प्रसिद्ध कहानीकार मिर्जा हफीज बेग ने कहा कि कई मायनों में उन्हें यह किताब अपनी आपबीती भी लगती है क्योंकि भिलाई में जन्म लेने और भिलाई स्टील प्लांट का सेवानिवृत्त कर्मी होने के नाते इनमें से बहुत से घटनाक्रम से वह खुद भी रूबरू हुए है। उन्होंने कहा कि यह किताब लेखक की पिछली कृति "वोल्गा से शिवनाथ तक" के आगे का सिलसिला है और उसमें रह गई कमियों को पूरा करती है।

आधार वक्तव्य रखते हुए कहानीकार मिर्जा हफीज बेग 

वरिष्ठ रंगकर्मी राकेश बम्बार्डे ने कहा कि जिन्हें अपने शहर भिलाई से प्यार है और जो भिलाई को जानना-समझना चाहता है,वह सभी इस किताब को जरूर पढ़ेंगे। शायर मुमताज ने भिलाई की संस्कृति को किताब के माध्यम से सामने लाने के लिए लेखक की सराहना की और चंद अशआर सुनाए। ऑल पीएसयू एससी-एसटी एम्पलाइज फेडरेशन के चेयरमैन सुनील हरिशचंद्र रामटेके ने कहा कि लेखक ने पिछली किताब "वोल्गा से शिवनाथ तक" में भिलाई के योगदान पर भारतीय और रूसी लोगों के योगदान पर बेहद रोचक ढंग से तथ्यों को रखा था। वही शैली इस किताब में बरकरार है और जिस तरह लेखक ने भिलाई के शुरूआती दौर से अब तक की  तमाम हस्तियों से मिलकर उनका साक्षात्कार लेकर सबके सामने प्रस्तुत किया है, यह सबके बस की बात नहीं। 

उन्होंने दोहराया कि आज जिस तरह भिलाई के सामने नए दौर की चुनौतियां है, उनका सामना करने हमको अपने इतिहास के बारे जानना बेहद जरूरी है। भिलाई स्टील प्लांट के ऊर्जा प्रबंधन विभाग में जनरल मैनेजर कमल टंडन ने कहा कि भिलाई सही मायनों में लघु भारत है और इसका रोचक इतिहास जानने यह किताब सहायक होगी। कवि लक्ष्मीनारायण कुम्भकार ने कहा कि इतिहास को रोचक ढंग से प्रस्तुत करना भी एक चुनौती है और इसे लेखक ने बखूबी पूरा किया है। आकाशवाणी रायपुर के कार्यक्रम प्रमुख पंकज मेश्राम ने कहा कि एक पत्रकार का न केवल स्वतंत्र होना जरूरी है बल्कि उसका निर्भिक  होना और निष्पक्ष होना उतना ही जरूरी है। वो सारे गुण लेखक में मौजूद है। भिलाई पर अगर प्रमाणिक जानकारी चाहिए तो आपको लेखक की इस किताब से जरूर रूबरू होना चाहिए।

संचालनकर्ता रिटायर अपर कलेक्टर विश्वास मेश्राम ने भी रखी अपनी बात 

संचालन कर रहे सेवानिवृत्त अपर कलेक्टर विश्वास मेश्राम ने कहा कि जिस भिलाई को हमने देखा और जीया है, आज वह बदल रहा है।  आज के भिलाई की जो तस्वीर हम देखते हैं, उसे देखकर बहुत खुशी नहीं होती बल्कि एक दर्द सा उठता है। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में जब  हमारी अगली पीढ़ी हमारे भिलाई को ढूंढना चाहेगी तो इस किताब में ही पाएगी।
बीएसपी पावर इंजीनियरिंग एंड मेंटेनेंस विभाग में जनरल मैनेजर पीएस खोब्रागड़े ने कहा कि आज सोशल मीडिया और एआई का दौर है और इंटरनेट पर हम तलाशेंगे तो   इतनी प्रमाणित जानकारी नहीं मिल सकती जितनी लेखक ने अपनी किताब "भिलाई जिंदाबाद" में तथ्यों को जुटा कर दी है। 

भिलाई स्टील प्लांट टेलीकम्युनिकेशन विभाग के पूर्व प्रमुख और रिटायर जनरल मैनेजर एल. उमाकांत ने कहा कि लेखक ने जिन घटनाक्रमों को इस किताब में उल्लेखित किया है, उनमें से ज्यादातर के वे गवाह रहे हैं। उन्होंने बताया कि 6 जनवरी 1986 को जिस वक्त हादसा हुआ तो तब भिलाई होटल में दूरसंचार विभाग का एक कार्यक्रम चल रहा था और एमडी के आर संगमेश्वरन भी हमारे साथ उस कार्यक्रम में ही थे। हम सबने उस धमाके की आवाज सुनी थी। उन्होंने कहा कि भिलाई को जानने-समझने इस किताब से बेहतर माध्यम और कोई नहीं है। 

संगोष्ठी में अपनी बात रखते हुए लेखक-पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन 

अंत में लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने इस किताब की सृजन यात्रा के बारे में विस्तार से जानकारी दी और कहा कि पाठकों का प्रोत्साहन ही उन्हे आगे भी भिलाई के रोचक इतिहास से रूबरू कराने की प्रेरणा देगा। 

इस अवसर पर  भिलाई नगर मस्जिद ट्रस्ट के सदर मिर्जा आसिम बेग,रंगकर्मी एल. रुद्र मूर्ति, मोहन कुमार नामदेव, मुक्तानंद साहू, बिनितोष बाला, गंगा भाऊ जांभुलकर, विजया जांभुलकर, संगीता मेश्राम, उषा मेश्राम, फैजान खान, शारिक खान, चित्रसेन कोसरे, जयश्री मोहन नागदेवे, राजेंद्र सुनगरिया और गजेंद्र सायतोड़े सहित अनेक लोग मौजूद थे। अंत में धन्यवाद ज्ञापन बीएसपी कर्मचारी और रंगकर्मी वासुदेव ने दिया।

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भिलाई की अस्मिता और गौरव का शंखनाद है 'भिलाई ज़िंदाबाद'

समीक्षा- डॉ. सुधीर शर्मा 



भारत के औद्योगिक इतिहास में कुछ शहर केवल नक्शे पर दर्ज नाम नहीं होते, वे अपने भीतर एक युग की स्मृतियाँ, संघर्ष और सपने सँजोए रहते हैं। छत्तीसगढ़ की धरती पर बसा भिलाई ऐसा ही शहर है, जिसकी पहचान केवल एक औद्योगिक नगर के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण की जीवंत प्रयोगशाला के रूप में रही है। यहाँ की मिट्टी में श्रम की गंध है, यहाँ की सड़कों पर इतिहास के पदचिह्न हैं और यहाँ की हवा में उस दौर की प्रतिध्वनि सुनाई देती है जब राष्ट्र निर्माण एक सामूहिक संकल्प हुआ करता था।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने जिस समाजवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाया, उसमें भारी उद्योगों को राष्ट्र की रीढ़ माना गया। इसी सोच के केंद्र में रहा भिलाई इस्पात संयंत्र, जिसकी स्थापना केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की आकांक्षा का प्रतीक थी। 

1950 के दशक में जब देश योजनाबद्ध विकास की राह पर अग्रसर हुआ, तब भिलाई का नाम राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उभरने लगा। यह वह समय था जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भारी उद्योगों को आधुनिक भारत के ‘नए मंदिर’ कहा करते थे। भिलाई उन्हीं मंदिरों में से एक बना, जहाँ मशीनों की गड़गड़ाहट के साथ भविष्य की रूपरेखा गढ़ी जा रही थी।
भिलाई की स्थापना की कहानी केवल सरकारी फाइलों या योजनाओं में सीमित नहीं है। यह उन गाँवों की कहानी भी है जिनकी जमीन अधिग्रहित हुई, उन परिवारों की कहानी है जिन्होंने अपनी पुरानी दुनिया छोड़कर नई बस्तियों में जीवन बसाया। कोटराभाठा, सोंठभाठा, बोरिया, हिंगना और मरौदा जैसे गाँवों की स्मृतियाँ आज भी बुज़ुर्गों की बातचीत में जीवित हैं। खेतों की हरियाली के स्थान पर जब सेक्टरों की व्यवस्थित रेखाएँ खिंचीं, तब एक ग्रामीण भूगोल शहरी परिदृश्य में बदल गया। 

यह परिवर्तन सहज नहीं था, परंतु समय की धारा में वह अपरिहार्य बन गया। भिलाई का एक विशेष पक्ष उसकी बहुसांस्कृतिक संरचना है। देश के कोने-कोने से आए इंजीनियर, तकनीशियन और श्रमिक यहाँ एक साथ बसे। बंगाल, पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और दक्षिण भारत से आए लोगों ने अपनी-अपनी भाषाएँ, खान-पान और त्योहार साथ लाए। 

इस विविधता ने भिलाई को केवल औद्योगिक नगर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संगम बना दिया। दुर्गा पूजा से लेकर गणेशोत्सव और छत्तीसगढ़ी लोकपर्वों तक, यहाँ उत्सवों की एक साझा परंपरा विकसित हुई। इस मेलजोल ने एक ऐसी नागरिक संस्कृति को जन्म दिया, जिसमें स्थानीय और राष्ट्रीय दोनों रंग समाहित हैं।
समय के साथ भिलाई ने केवल विकास ही नहीं, संकट भी देखे। औद्योगिक दुर्घटनाएँ, श्रमिक आंदोलन, बिजली और कोयले के संकट, आर्थिक उदारीकरण के बाद की चुनौतियाँ—इन सबने इस नगर को झकझोरा। 1990 के दशक में जब देश ने उदारीकरण की नीति अपनाई, तब सार्वजनिक उपक्रमों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगने लगे। निजीकरण और आउटसोर्सिंग की प्रक्रियाओं ने पुराने ढाँचे को चुनौती दी। भिलाई भी इससे अछूता नहीं रहा। उत्पादन के नए मानदंड, तकनीकी आधुनिकीकरण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ने इस इस्पात नगरी को आत्ममंथन के लिए विवश किया।
फिर भी, यह उल्लेखनीय है कि भिलाई ने हर संकट के बाद स्वयं को पुनर्गठित किया। यहाँ की श्रमिक चेतना और प्रबंधन की सामूहिक समझ ने कई बार संभावित ठहराव को नई गति में बदला। इस्पात की तरह ही इस शहर की आत्मा भी तपकर मजबूत हुई। भिलाई की पहचान केवल उत्पादन के आँकड़ों से नहीं, बल्कि उस मानवीय रिश्ते से है जो यहाँ के लोगों को जोड़ता है। सेक्टरों की योजनाबद्ध बस्तियाँ, स्कूल, अस्पताल, पार्क और सांस्कृतिक भवन—ये सब उस कल्याणकारी सोच के प्रतीक हैं, जिसने इस नगर को आकार दिया।
आज जब डिजिटल युग में सूचना और संचार के साधन बदल रहे हैं, तब भी भिलाई का इतिहास हमें यह सिखाता है कि विकास केवल तकनीकी उन्नति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों की निरंतरता भी है। यहाँ की पीढ़ियाँ बदल रही हैं; पुराने श्रमिकों की जगह नई तकनीकी दक्षता वाले युवा ले रहे हैं। फिर भी, शहर की स्मृतियों में वह दौर जीवित है जब इस्पात संयंत्र के सायरन के साथ दिन की शुरुआत होती थी और शाम को श्रमिक कॉलोनियों में जीवन की चहल-पहल गूँजती थी।
भिलाई की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि औद्योगिक नगर केवल आर्थिक इकाइयाँ नहीं होते, वे सामाजिक और सांस्कृतिक प्रयोगशालाएँ भी होते हैं। यहाँ श्रम और सपनों का संगम हुआ, यहाँ संघर्ष और सहयोग का संतुलन बना। यह शहर आज भी अपने अतीत के गौरव और वर्तमान की चुनौतियों के बीच संतुलन साधते हुए आगे बढ़ रहा है।
समय के बदलते परिदृश्य में जब सार्वजनिक उपक्रमों की भूमिका पर बहस जारी है, तब भिलाई एक जीवंत उदाहरण की तरह सामने खड़ा है। यह शहर हमें बताता है कि यदि दूरदृष्टि, सामाजिक प्रतिबद्धता और तकनीकी नवाचार साथ हों, तो कोई भी औद्योगिक परियोजना केवल कारखाना नहीं रहती, वह समाज का धड़कता हुआ हृदय बन जाती है।
भिलाई की गाथा दरअसल उस भारत की गाथा है जिसने कठिनाइयों के बीच अपने लिए रास्ता बनाया। यह उस विश्वास की कहानी है कि विकास केवल मशीनों से नहीं, मनुष्यों से होता है। इस फौलादी नगर की आत्मा में आज भी वही उम्मीद धड़कती है—कि समय चाहे जैसा भी हो, श्रम, साहस और सामूहिकता की शक्ति से भविष्य गढ़ा जा सकता है।
प्रस्तुत पुस्तक ''भिलाई ज़िंदाबाद, कुछ किस्से-कुछ कहानियां'' के लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने भिलाई को जीया है, बचपन से लेकर अपनी जवानी की सांसें भिलाई को दी हैं। वे एक रचनात्मक और सकारात्मक पत्रकारिता तथा लेखन के सच्चे श्रमिक हैं। 

अपने अनुभव और भिलाई को ढालने वाले अनेक विभूतियों से सुनकर तथा समझकर उन्होंने यह पुस्तक लिखी है। बीते बीस-तीस बरस के देखे-सुने किस्सों का यह संग्रह है। 'भिलाई ज़िंदाबाद' सही मायनों में भिलाई की अस्मिता और गौरव का शंखनाद है। लेखक को इसके लिए साधुवाद है। ये किस्से आनेवाली पीढ़ी के लिए इतिहास से लेकर वर्तमान की गाथा है। भविष्य के सपनों को पूरा करने का मंत्र है। बधाई जाकिर और धन्यवाद उन किस्सागोई व्यक्तित्वों का जो इसके गवाह हैं।

 (डॉ सुधीर शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई छत्तीसगढ़) 

Monday, February 10, 2025


मां के साथ मजदूरी की, ईंटें ढोईं और खुद लिखी अपनी किस्मत

 

अरबपति कारोबारी भगवान गवई आज तेल और रियल इस्टेट के क्षेत्र में बड़ा नाम


सिरपुर में लेखक/पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन (बाएं) के साथ उद्योगपति भगवान गवई (दाएं)

देश के एक प्रमुख उद्योगपति भगवान गवई की दास्तां संघर्षों का डट कर सामना कर अपनी किस्मत खुद लिखने की है। दलित समुदाय से आने वाले गवई समूचे समाज के लिए एक मिसाल है। 

आज भी वह अपने संघर्षों के दिनों को भूले नहीं है और उनकी कोशिश रहती है कि वंचित समुदाय के नौजवान भी उद्यमशीलता का रास्ता अपनाएं और अपना भविष्य तय करें।

हाल ही में 18 और 19 जनवरी 2025 को अंबेडकर भवन (पुराना बीएसपी स्कूल) सेक्टर-6 में दो दिवसीय करियर गाइडेंस, उद्यमिता विकास और संविधान जानो कार्यशाला का आयोजन किया गया।  डॉ अंबेडकर एक्जीक्यूटिव फ्रेटरनिटी भिलाई, सोशल जस्टिस एंड लीगल फाउंडेशन छत्तीसगढ़ ,एनस्टेप छत्तीसगढ़ और मूलनिवासी कला साहित्य और फिल्म फेस्टिवल भिलाई के संयुक्त तत्वावधान में हुए इस आयोजन में हिस्सा लेने भिलाई पहुंचे भगवान गवई से मुझे साक्षात्कार का मौका मिला। इस दौरान उन्होंने अपने जीवन संघर्ष से लेकर विभिन्न मुद्दों पर लंबी बातचीत की। इस लंबे साक्षात्कार में उन्होंने जो कुछ बताया, सब उन्हीं के शब्दों में- 

 

बचपन में पिता गुजरे तो मां के साथ मजदूरी में हाथ बंटाया

सिरपुर में एडवोकेट सुरेश माने का भी साथ रहा

हम लोग मूल रूप से महाराष्ट्र के बुलढाणा जिला, सिरखेड़ तालुका के रहने वाले हैं। माता-पिता के साथ चार भाई और एक बहन का हमारा परिवार था। 1964 की बात है, मैं कक्षा दूसरी में था तो पिता का अचानक निधन हो गया। स्वाभाविक है परिवार पर संकट आ गया। मां पढ़ी लिखी नहीं थी और उनके सामने परिवार को पालने की जवाबदारी थी। ऐसे में हम सब बॉम्बे कांदीवली आ गए। 

यहां  महिंद्रा एंड महिंद्रा की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर मां को काम मिल गया। तब हम सभी के लिए परिस्थितियां बेहद विषम थी, इसलिए मुझे भी शुरूआती 2-3 साल अपनी मां के साथ मजदूरी करनी पड़ी। उनके साथ मैं भी ईंटे ढोता था। इस बीच स्कूली पढ़ाई छूट रही थी और  इसका मुझे भी ध्यान था, इसलिए एक रोज खुद से पास के स्कूल में जाकर मैनें कक्षा तीसरी में दाखिला ले लिया। 

दरअसल, तब कांदीवली में चारों तरफ जंगल था और रास्ते दुर्गम थे। जंगली जानवरों के संभावित खतरे को देखते हुए वहां स्कूल में छोटे बच्चों को दाखिला नहीं देते थे। इसलिए मुझे 2-3 साल बाद जब थोड़ी और समझ आई तो वहां स्कूल जाकर दाखिला ले लिया। इसके बाद बेहतर काम की तलाश में परिवार को खोपोली, फिर नासिक और फिर रत्नागिरी जाना पड़ा। तब तक  छठवीं की पढ़ाई हो चुकी थी। 

अंक अच्छे थे तो मुझे रत्नागिरी के प्राइवेट स्कूल में दाखिला मिल गया। यहां 10 वीं तक वहां रहा। इस दौरान छोटे-छोटे काम कर मैं अपनी पढ़ाई का खर्च निकाल लेता था। फिर बड़े भाई ने भी भवन निर्माण में ईंटा जोड़ाई का काम लेना शुरू कर दिया था। घर के हालात थोड़े बेहतर हुए तो मां ने मजदूरी छोड़ सब्जी बेचना शुरू किया। 

 

धीरे-धीरे सुधरे हालात, मिली सरकारी नौकरी

भिलाई के कार्यक्रम में एल. उमाकांत के साथ

इसके बाद मैनें मुंबई में कामर्स में ग्रेजुएशन किया। इसी दौरान लार्सन एंड टुब्रो में अकाउंट विभाग में नौकरी लग गई।यहां नौकरी करते-करते मैनें पब्लिक सेक्टर में सेवा के लिए तैयारी जारी रखी। जिसके चलते साल 1982 में  हिंदुस्तान पेट्रोलियम लिमिटेड (एचपीएल) में मैनेजमेंट ट्रेनी के तौर पर एक नई शुरूआत हुई। एचपीएल की सेवा मेरे करियर के लिए बहुत ज्यादा लाभकारी रही। 

यहां रहते हुए मुझे कंपनी की ओर से इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट  (आईआईएम) कोलकाता में एक प्रशिक्षण कार्यक्रम में हिस्सा लेने का मौका मिला और यहाँ तीन महीने एक्ज़ीक्यूटिव ट्रेनिंग प्रोग्राम में बिजनेस के सारे गुर सीखने का अवसर मिला। कंपनी में प्रमोशन भी मिला लेकिन कतिपय विवादों के चलते यहां 10 साल  की सेवा के बाद मैनें इस्तीफा दे दिया। 

 

भारत से 20 गुना ज्यादा वेतन पर बहरीन गया, साझेदारी में शुरू किया कारोबार

सिरपुर तिवरदेव बौद्ध विहार में प्रतिनिधिमंडल के साथ

इसके बाद मैनें मध्यपूर्व देशों का रुख किया। बहरीन में कैलटेक्स ऑइल जॉइन में उन्हें एचपीसीएल से 20 गुना ज़्यादा वेतन पर रख लिया । फिर दुबई में एमिरेटस नेशनल ऑइल कंपनी (इनोक) की नई रिफाईनरी से उन्हें बुलावा आया।मध्यपूर्व के देशों में कई तरह के अनुभव हुए। मैनें देखा कि कई अनपढ़ लोग तेल से जुड़ा कारोबार कर रहे थे। 

मुझे अपनी कंपनी शुरू करने का विचार आया। तब मेरी  मुलाक़ात वहां के एक तेल व्यवसायी बकी मोहम्मद से हुई। जिनसे प्रेरणा लेकर उन्होंने बिज़नेस की दुनिया में कदम रखने का निर्णय लिया। साल 2003 में मैनें बकी के साथ मिलकर “बकी फुएल कंपनी” की शुरुआत की इसमें मेरा शेयर 25 प्रतिशत था। बकी की मार्केट में अच्छी जान-पहचान थी, इस वजह से तेल का कारोबार चल निकला।  हम दोनों पार्टनर रिफाईनरी से तेल खरीदकर दुनिया-भर में बेचते थे।

 

कारोबार में धोखे खाए लेकिन सीखा भी

सिरपुर तिवरदेव बौद्ध विहार में प्रतिनिधिमंडल के साथ

हमारा कारोबार अच्छी तरह चल रहा था तभी बकी की मां का निधन हो गया और उन्होंने कारोबार समेट लिया। इससे उनका कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ। इन्हीं दिनों कज़ाकिस्तान में एमराल्ड एनर्जी नामक कंपनी के मालिक ने यही काम अपने साथ करने का ऑफर दे दिया और एक-डेढ़ साल में शेयर देने का वादा भी किया। 

वही साल 2008 तक इस कंपनी का टर्न ओवर 400 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया। लेकिन शेयर देने के वक़्त कंपनी का मालिक मुकर गया, इससे आहत होकर मैनें फैसला किया कि अब स्वतंत्र तौर पर अपनी कंपनी शुरू करेंगे। एक औऱ बात मैं बताऊं, कारोबार के इन तमाम उतार-चढ़ाव के बीच मेरा ध्यान हमेशा वंचित समुदाय के उत्थान के प्रति रहता है। 

ऐसे ही एक सामूहिक प्रयास का मैं यहां जिक्र करना चाहूंगा। 2006 में मैत्रेयी डेवलपर्स की स्थापना  दलित समुदाय के हम 50 लोगों ने की। जिसमें सभी ने एक-एक लाख लगाकर 50 लाख के निवेश के साथ कंपनी बनाई। इसमें हम सब बराबर के भागीदार हैं। 

कंपनी फिलहाल मेन्यूफ़ेक्चरिंग का काम करती है।  2009 में मैंनें आइल सेक्टर में कारोबार के इरादे से खुद की कंपनी शुरू की और दुबई में अपना ऑफिस खरीदा। अब आज के समय में मेरी मलेशिया में भी दो और कंपनियां हैं, जो ऑइल और कोयले की खरीद-फरोख्त करती हैं। 

इसके अलावा मैत्रेयी डेवलपर्स और बीएनबी लॉजिस्टिक्स में भी हिस्सेदारी है।  कोरोना काल में हमनें रियल इस्टेट पर ध्यान दिया। फिलहाल पनवेल में एक रियल इस्टेट प्रोजेक्ट पूरा हो गया है। भविष्य की और भी महत्वाकांक्षी योजनाएं है। 

 

किसी की हिम्मत नहीं हुई मुझे नीचा दिखाने की, लेकिन

 दूसरे साथियों की प्रताड़ना के मुद्दों पर किया संघर्ष

भिलाई में आयोजित कार्यक्रम में अतिथिगण

वंचित-दलित समुदाय से आने के बावजूद स्कूल और कॉलेज में मुझे कभी भेदभाव महसूस नहीं हुआ। सभी से मिल कर रहता था और अपनी काबिलियत पर भरोसा था। ऐसे में किसी की हिम्मत नहीं हुई मुझे नीचा दिखाने की। मेरा मानना है कि जब आप बेस्ट परफार्म करते हो तो किसी को आपको नीचा दिखाने की हिम्मत नही हो सकती। 

लेकिन मैं यह नहीं कहता कि समाज में भेदभाव बिल्कुल नहीं है। हिंदुस्तान पेट्रोलियम लिमिटेड के सेवाकाल में मैं एससी-एसटी एम्पलाइज एसोसिएशन  का जनरल सेक्रेट्री था और अपने समुदाय के दूसरे कर्मियों के साथ ऐसा भेदभाव अक्सर देखने में आता था। 

इनमें जातीय उत्पीड़न, प्रमोशन रोकने, सीआर खराब करने सहित प्रताड़ना के कई मामले थे। मैनें ऐसे 100 से ज्यादा मामले मैनेजमेंट के सामने उठाए। मेरी कार्यशैली मैनेजमेंट से सीधे भिड़ने की नहीं बल्कि बात कर रास्ता निकालने की थी। इसलिए  ऐसे मामलों में मैं अपने साथियों को इंसाफ दिलाने में सफल रहा।  

 

बेटे को जॉब पर रखा,  बीएसएस गठन कर बढ़ाई सक्रियता


जिस तरह विपरीत हालातों का सामना मैनें अपने जीवन में किया है, तो मेरा मानना रहा है कि मेरे बच्चे भी संघर्षों से आगे बढ़े और खुद को साबित करें। दो बेटियां और एक बेटे ने अपनी इच्छा अनुसार विषय चुनकर उच्च शिक्षा हासिल की। 

मैं चाहता तो पढ़ाई पूरी कर लौटे बेटे को अपनी कंपनियों में आसानी से निदेशक या कोई और पद देकर रख सकता था लेकिन मैनें ऐसा करने के बजाए जॉब पर रखा, जिससे  बेटा पहले जमीनी काम सीखे, खुद को साबित करे और इसके बाद वह कंपनियों की बागडोर सम्हाले। 

बेटियां भी अलग-अलग क्षेत्र में सक्रिय हैं। अपने समाज के स्तर पर भी हम लोग बहुत कुछ कर रहे हैं। हमनें समान विचारधारा के लोगों को मिलाकर एक सामाजिक संगठन बहुजन समाज संघ (बीएसएस) भी शुरू किया। 

जिसमें सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक सशक्तिकरण की दिशा में काम कर रहे हैं। इसमें 15 विंग विकसित किए हैं और अनुभवी लोगों को शामिल किए हैं। हमारा प्रयास समाज के वंचित समुदाय के कल्याण के लिए ज्यादा से ज्यादा कार्यक्रम बनाएं और इन्हें क्रियान्वित करें। इसमें हमें दलित समुदाय के विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिनिधियों का पूरा सहयोग मिल रहा है।

 


युवा उद्यमी बनाने महाराष्ट्र में लगातार दे रहे हैं प्रशिक्षण


बिरबिरा (महासमुंद) स्थित बौद्ध विहार में

मेरी एक कंपनी इंडियन एक्सपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड है। जिसके माध्यम से हम लोगों ने महाराष्ट्र में कोरोनाकाल में 600 युवाओं को इंटरप्रेन्योर डेवलपमेंट प्रोग्राम (ईडीपी) के अंतर्गत नि:शुल्क ट्रेनिंग दी है। इसमें हम लोगों ने एजुकेशन, आयरन एंड गैस, एनर्जी और कृषि सहित अलग सेक्टर में बिजनेस मॉडल का प्रशिक्षण अपने विशेषज्ञों के माध्यम दिलाया। 

इसे विस्तार देते हुए अब हम महाराष्ट्र में स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थियों के बीच  अपनी कंपनी के माध्यम से इंटरप्रेन्योर डेवलपमेंट प्रोग्राम (ईडीपी) चला रहे हैं। वहीं नौजवानों को उद्यमशीलता के क्षेत्र में तमाम मार्गदर्शन भी दे रहे हैं। 

महाराष्ट्र के 36 जिलों में 18 हजार उद्यमी तैयार करने के वहां की राज्य सरकार के एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम को भी हम क्रियान्वित कर रहे हैं।  इंटर्न एक्सपर्ट प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की  हमारी वेबसाइट है। जिसके माध्यम से नौजवान संपर्क कर सकते हैं। 

'हरिभूमि' में 6 फरवरी 2025 को प्रकाशित