Sunday, September 9, 2018

संकट अब सिर्फ खेती का नहीं बल्कि पूरे

 समाज और उससे भी आगे हमारी  सभ्यता का 


 ''ग्रामीण अर्थव्यवस्थाअसमानता और किसानों की बदहाली''

विषय पर वरिष्ठ पत्रकार पीसाईंनाथ का सेवाग्राम (वर्धा ) में व्याख्यान


मूल व्याख्यान से लिप्यांतरण-मुहम्मद जाकिर हुसैन

सम्बोधित करते हुए पी साईनाथ 
वरिष्ठ पत्रकार पलगुम्मी साईंनाथ को पूरी दुनिया पी. साईंनाथ के नाम से बखूबी जानती है। ग्रामीण पत्रकारिता में साईंनाथ का काम अद्वितीय-अतुलनीय है। उन्होंने ग्रामीण भारत खास कर कृषि पर इतना काम किया है कि अब वो इस विषय के चलते-फिरते एनसाइक्लोपीडिया में तब्दील हो चुके हैं।
 प्रतिष्ठित रेमन मैगसेसे सहित देश और दुनिया के कई सम्मान उन्हें मिल चुके हैं।स्वतंत्रता सेनानी व देश के पूर्व राष्ट्रपति वेंकट वराह गिरी के खानदान से ताल्लुक रखने वाले साईंनाथ की नजर में कृषि का संकट अब महज खेती या किसान का नहीं बल्कि इससे कहीं आगे सभ्यता और मानवता का संकट है। महात्मा गांधी की कर्मस्थली सेवाग्राम (वर्धा) में 19 अगस्त 2018 को साईंनाथ ने ''ग्रामीण अर्थव्यवस्था, असमानता और किसानों की बदहाली'' विषय  पर अद्भुत व्याख्यान दिया।
 मौका था मध्य प्रदेश की संस्था ''विकास संवाद'' की ओर से 12 वें राष्ट्रीय मीडिया संवाद ''गाँधी एक माध्यम या सन्देश '' के  तीन दिवसीय आयोजन के समापन का। मुझे भी इस आयोजन में भाग लेने का अवसर मिला.
करीब सवा घंटे का यह व्याख्यान उनकी अपनी चिर-परिचित दक्षिण भारतीय हिंदी-अग्रेजी की मिश्रित शैली में था। मैनें इसे थोड़ा और सरल करने की कोशिश की है। मूल वक्तव्य साईंनाथ का ही है। इसमें कुछ संदर्भ इंटरनेट से मिल गए थे, इसलिए इन्हें लिंक के साथ में नत्थी कर दिया हूं।
एक बात और, इस साल मार्च में नाशिक महाराष्ट्र के किसान-मजदूरों के मुंबई तक के  सफल पैदल मार्च से उत्साहित विभिन्न संगठनों ने कृषि संकट पर इसी साल नवंबर के आखिरी हफ्ते में इससे कई गुना बड़ा आंदोलन दिल्ली में करने का फैसला किया है।
जाहिर है इस आंदोलन को साईंनाथ का मार्गदर्शन मिल रहा है। साईनाथ ने यहां विषय से संदर्भित अपनी बात रखने के अलावा नवंबर के प्रस्तावित आंदोलन की भी चर्चा की। साईंनाथ ने अपने लम्बे व्याख्यान में जो कुछ कहा उसे तीन हिस्सों में अपने इस ब्लॉग में पोस्ट कर रहा हूँ पहला हिस्सा यहाँ से- 

मत देखिए कि आज खेती में पैदावार कितनी गिरी बल्कि
देखिए कि इसके साथ इंसानियत कितनी गिरती जा रही
व्याख्यान के दौरान 
हम पिछले 20 साल से खेती और किसानों के संकट पर लगातार बात कर रहे हैं। लेकिन अब आपको मानना पड़ेगा कि पिछले 5 साल में मामला इससे कहीं आगे निकल चुका है।
यह संकट अब सिर्फ खेती का नहीं बल्कि पूरे समाज और उससे भी आगे एक सभ्यता का संकट बन गया है। बहुत साल से हम आंकलन कर रहे हैं कि कृषि संकट क्या है।
इसके लिए हम आंकलन करते हैं खेती में पैदावार कितनी गिरी और कितने किसानों ने आत्महत्या की? आज यह मत देखिए कि खेती में पैदावार कितनी गिरी बल्कि यह देखिए कि इसके साथ हमारी इंसानियत कितनी गिरती जा रही है। 20 साल से हम चुपचाप बैठे रहे तब तक पूरे देश में 3 लाख 10 हजार किसान आत्महत्या कर चुके हैं और हम कुछ नहीं कर पाए हैं। यह सबसे बड़ा संकट है। बहुत हद तक देखा जाए तो यह हमारी इंसानियत का संकट है।


         ग्रामीण भारत कहां है हमारे 'नेशनल' मीडिया में..?                                                   
बदहाल किसान 
सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज नई दिल्ली हर साल ग्रामीण भारत को मीडिया मिलने वाले स्पेस पर अपनी रिपोर्ट जारी करता है। इसके लिए वे लोग नेशनल कहे जाने वाले हिंदी और अंग्रेजी के 6-6 न्यूज पेपर टेलीविजन चैनल को लेते हैं।
मेरी नजर में अध्यन के लिए ये बड़ा अजीब तरीका है। अगर किसी अखबार के दो संस्करण निकलते हैं। जिसमें एक दिल्ली से और दूसरा किसी दूसरे शहर से निकलता है तो दिल्ली वाला नेशनल कहलाएगा, अब अगर ये नेशनल हैं तो क्या बाकी एंटी नेशनल हुए..?
खैर, उस रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत की खबरों का इन राष्ट्रीय अखबारों के मुख्य पृष्ठ (फ्रंट पेज) पर प्रतिनिधित्व का पांच साल का औसत महज 0.67 प्रतिशत है। हालांकि वो भी थोड़ा ज्यादा है क्योंकि इन 5 सालों में चुनाव का साल भी जाता है। जिसमें यह प्रतिनिधित्व 2 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। अगर चुनाव रहित कोई एक साल ही लें तो यह प्रतिनिधित्व 0.24 प्रतिशत ही होगा। देख लीजिए, ये हमारी रूचि है ग्रामीण भारत में।

एमएसपी पर चार साल में लगातार
फिसलती रही सरकार की जुबान
मंडी में रखा अनाज 
कृषि संकट पर राजनीतिक संकट भी देख लीजिए। 2014 जब मौजूदा सरकार के लोग विपक्ष में थे तो अपने चुनाव प्रचार में वादा किया था कि सरकार बनने पर हम किसानों को न्यूनमत समर्थन मूल्य (एमएसपी) के नाम पर कास्ट ऑफ प्रोडक्शन 2 प्लस 50 प्रतिशत देंगे।
चुनाव हुआ और फिर सत्ता में आने के बाद 12 महीने के अंदर 2015 में इस सरकार ने एक बार सूचना का अधिकार (आरटीआई) के जवाब में और दूसरी बार न्यायालय में अपने एफिडेविट में दो बार स्वीकारोक्ति की।
इसमें सरकार ने कहा कि-''हम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि इससे मार्केट का डिस्टार्शन (खराबा) होगा।'' मतलब? किसान कितना भी बदहाल हो जाए कोई बात नहीं मार्केट का बिगाड़ नहीं होने देंगे। इसके बाद 2016 में कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने ऐलानिया कहा कि-''हमनें यह वादा कभी नहीं किया।''
इसके बाद 2017 में केंद्र सरकार और उनके समर्थित बौद्धिक जगत (कैप्टिव इंटेलेक्चुअल) ने घोषित कर दिया कि ये स्वामीनाथन रिपोर्ट को छोड़ो और आप मध्यप्रदेश जाकर देखो। वहां शिवराज चौहान उससे भी कहीं आगे चले गए हैं। वहां की भावांतर योजना में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सीधे ट्रांसफर हो रहा है किसानों को।
इस पर उन लोगों ने किताब भी निकाली और यह किताब इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में बड़े धूमधाम से रिलीज भी हुई। जिसमें मध्यप्रदेश मॉडल का जबरदस्त तरीके से स्तुतिगान किया गया। अब देखिए, जिस दिन इस किताब का नई दिल्ली में विमोचन हुआ, उसी  के 24 घंटे के अंदर मध्यप्रदेश के ही मंदसौर में पुलिस की फायरिंग से 5 किसान मारे गए।
इसके बाद अब आप जरा केंद्र सरकार का एक फरवरी 2018 का बजट भाषण भी देख लीजिए। इसमें पैराग्राफ 13 और 14 में अरूण जेटली ने कहा कि-''हां, हमने ये वादा किया और खरीफ में पूरा भी कर दिया।'' इसके बाद जुलाई में यही सरकार घोषणा करती है कि-''हम इसे लागू करने जा रहे हैं।''
तो अब तक इन लोगों ने कहा-हम लागू करेंगे, हम लागू करने जा रहे हैं, यह संभव नहीं, हमने कभी नहीं कहा, हम लागू कर चुके हैं-तो साल दर साल ये अलग-अलग बयान हैं इनके। अब आप खुद तय कर लीजिए कि आप इनकी किस लाइन को स्वीकार करेंगे।

''सीओपी'' का शरारतपूर्ण ढंग
से इस्तेमाल करती हैं सरकारें
कृषि वैज्ञानिक स्वामीनाथन 60 के दशक में 
एक बात और ,ये जो उत्पादन लागत (कास्ट ऑफ प्रोडक्शन-सीओपी) शब्द है,इसका इस्तेमाल बेहद शरारतपूर्ण तरीके से किया जाता है। सीओपी की गणना के लिए -1, सी-1 और बी-1 के अलग-अलग सिस्टम है।
लेकिन तीन सिस्टम  -2 और -2 प्लस एफएल और सीओपी 2 प्लस 50 प्रतिशत ज्यादा  प्रासंगिक है। इसमें सीओपी का अलग-अलग तरीका है।
इस वजह से बहुत से लोग भ्रम में रहते हैं और और जहां भी मैं जाता हूं तो लोग पूछते हैं कि सरकार ने एमएसपी डिक्लियर कर दिया ना..?
अब एक और बात। आप जिस स्वामीनाथन रिपोर्ट की बात करते हैं, उसका सही नाम नेशनल कमीशन ऑन फार्मर्स रिपोर्ट है। इसमें सिर्फ एमएस स्वामीनाथन  नहीं और भी लोग हैं। अब  मीडिया में किसानों से जुड़े सिर्फ दो ही मुद्दे  किसान की ऋण माफी और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) यानि लागत मूल्य के साथ 50 प्रतिशत हैं। लेकिन इसके साथ ही मिट्टी की सेहत और पानी के बंदोबस्त सहित और भी कई मामले हैं।

हम स्टेरायड्स पर चला रहे हैं खेती को
कीटनाशक का दुष्प्रभाव 
खेती की मौजूदा स्थिति को आप समझना चाहते हैं तो इस बारे में मेरे पैतृक राज्य आंध्र प्रदेश में एक किसान ने अच्छी मिसाल दी है।
उस किसान ने मुझसे कहा कि अगर आप जुड़वा भाइयों को समान परिस्थिति में एक ही काम दें। जिसमें एक भाई सामान्य परंपरागत आहार पर और दूसरा स्टेराइड्स के भरोसे रखा जाए तो दोनों में कौन बेहतर रिजल्ट देगा..?
जाहिर है स्टेराइड वाला बेहतर करेगा। अगले 6-8 साल के लिए उसकी उत्पादकता ज्यादा होगी। लेकिन एक समय बाद यह तय है कि स्टेरायड्स वाला मर जाएगा।
वहीं जो भाई सामान्य परिस्थिति और आहार में काम कर रहा था वो तो स्वाभाविक तरीके से काम करता रहेगा। तो मुझे वह किसान यही कहना चाह रहा था कि हम अपनी खेती को स्टेराइड्स पर चला रहे हैं। लेकिन, हमारे नीति निर्माताओं को यह समझ नहीं आता है।
खेती में जो आप इनपुट-आउटपुट देखते हैं, इसके बीच एक जीवंत तत्व (लीविंग आर्गेनिज्म) मिट्टी है। आप इसे अनदेखा नहीं कर सकते और अपना इनपुट-आउटपुट आपरेशन इसे एक तरफ रख कर नहीं चला सकते। इसलिए मेरा कहना है कि आज कृषि का संकट कृषि से बहुत ज्यादा आगे निकल गया है।
अगली क़िस्त यहाँ 
क्रमशः अगले अंक में जारी

Tuesday, July 31, 2018


देश में रफी साहब का यादगार कंसर्ट हुआ था राजहरा में 


छत्तीसगढ़ी फिल्मों और भिलाई से भी जुड़ी कुछ बातें और यादें उस कंसर्ट की


मुहम्मद जाकिर हुसैन 
शंकर-रफी 
 सुर सम्राट मुहम्मद रफी साहब के गुजरने के 38 साल बाद भी उनके दीवानों की कभी कोई कमी नहीं रही। रफी साहब का छत्तीसगढ़ से आत्मीयता का नाता रहा है। जहां शुरूआती दौर की छत्तीसगढ़ी फिल्मों 'कहि देबे संदेस' और 'घर द्वार' के गीतों को उन्होंने अपनी आवाज दी। 
वहीं अब तक की ज्ञात जानकारी के मुताबिक देश के भीतर आखिरी विशाल सार्वजनिक कार्यक्रम रफी साहब ने भिलाई स्टील प्लांट (बीएसपी) की लौह अयस्क खदान नगरी दल्ली राजहरा में 26 अप्रैल 1980 को दिया था। 
दल्ली राजहरा के बाद देश में उनका आखिरी स्टेज परफार्मेंस 15 मई 1980 को मुंबई के षण्मुखानंद हॉल में हुआ था। फिर तीन दिन बाद भारत के बाहर आखिरी सार्वजनिक शो श्रीलंका में 18 मई 1980 को हुआ था और इसके बाद रमजान का महीना लग चुका था। जिसमें रफी साहब स्टेज प्रोग्राम नहीं देते थे। और रमजान के महीने में ही रफी साहब ने 31 जुलाई 1980 को आखिरी सांस ली थी।  
परचा 1980 का
रफी साहब की छत्तीसगढ़, भिलाई और दल्ली-राजहरा से जुड़ी कई यादें हैं, जो आज भी लोगों के जहन में ताजा है।
 दल्ली राजहरा में यह पहला और आखिरी बड़ा कार्यक्रम हुआ था, जिसमें न सिर्फ  तत्कालीन मध्यप्रदेश बल्कि महाराष्ट्र और ओडिशा से भी लोग हजारों की तादाद में आए थे। दल्ली राजहरा में रफी साहब का कार्यक्रम आयोजित करने का श्रेय जाता है,वहां के व्यवसायी शांतिलाल जैन को। 
तब मध्यप्रदेश में अकाल के हालात थे और राहत कोष के लिए श्री जैन की पहल पर राजहरा के जवाहरलाल नेहरू फुटबॉल स्टेडियम में 26 अप्रैल 1980 को शंकर-जयकिशन नाइट रखी गई थी।
 इसके लिए अकालग्रस्त सहायता और चिकित्सालय निर्माण समिति का गठन किया गया था। जिसके अध्यक्ष बीएसपी खदान विभाग के महाप्रबंधक सीआर शिवास्वामी और सचिव शांतिलाल जैन थे। संगीतकार शंकर-जयकिशन जोड़ी के जयकिशन पहले ही दिवंगत हो चुके थे। इसलिए आयोजन में रफी साहब के साथ संगीतकार शंकर पहुंचे थे। 
वहीं गायक मन्ना डे, गायिका शारदा, ऊषा तिमोथी, नायिका सोनिया साहनी और कॉमेडियन जॉनी व्हिस्की सहित अन्य लोग भी आए थे। इसके लिए तैयारियां महीना भर से शुरू हो गई थी, जिसमें हजारों की तादाद में परचे छपवाए गए थे। इनमें से कुछ परचे आज दल्ली राजहरा में रफी साहब के चाहने वाले अनिल वैष्णव आज भी धरोहर की तरह संभाल कर रखे हैं। 
इस प्रोग्राम में स्टेज डेकोरेशन का जिम्मा चरित्र अभिनेता पी. जयराज की कंपनी को मिला था। इसके लिए जयराज खुद दल्ली राजहरा पहुंचे थे और अपने सामने स्टेज निर्माण करवाया था।
 चूंकि पहली बार इतना बड़ा आयोजन हो रहा था, इसलिए स्टेडियम के मैदान के लिए करीब एक लाख कुर्सियों की जरूरत थी। इसके लिए नागपुर से विशेष तौर पर कुर्सियां मंगाई गई थी। कार्यक्रम बेहद सफल रहा और लोगों के जहन में कई यादें छोड़ गया। 

जब एक विवाद के चलते रफी साहब का भिलाई दौरा टल गया

 मुखर्जी और सहगल 
1969 में भिलाई स्टील प्लांट के खेल एवं मनोरंजन विभाग ने सेक्टर-1 स्थित नेहरू कल्चर हाउस में मोहम्मद रफी नाइट रखी थी। शुरूआती बातचीत के बाद तारीख तय हो गई थी और इस बीच अचानक रफी साहब के निजी सचिव से पैसों के लेन-देन को लेकर बीएसपी के अफसरों का विवाद हुआ और बात यहां तक पहुंची कि रफी साहब ने अफसरों को कोर्ट में घसीटने की धमकी तक दे दी थी।
बीएसपी की तरफ से रफी साहब के सचिव से तब के एसआरजी प्रमुख जसवंत सिंह सहगल बात कर रहे थे। रफी नाइट की तैयारियां प्रख्यात सितार वादक और तब बीएसपी के माइंस विभाग में इंजीनियर पं. बिमलेंदु मुखर्जी के नेतृत्व में चल रही थी। मुखर्जी और सहगल ने बीते दशक में इस संबंध में इन पंक्तियों के लेखक को विस्तार से जानकारी दी थी।
दोनों रिटायर अफसरोंं  के मुताबिक तारीख तय होने के बाद शहर में जगह-जगह होर्डिंग लगा दिए गए और परचे भी बांटे जाने लगे। इस बीच पैसों को लेकर दोनों पक्षों के बीच विवाद हुआ। उनकी तरफ से रेट बढ़ा दिया गया, जिसे एक सरकारी कंपनी होने के नाते बीएसपी के लिए मानना संभव नहीं था।
उनकी कुछ और शर्तें भी थी। इधर होर्डिंग लगाए जाने और परचे बांटने की खबर जब रफी साहब के निजी सचिव को लगी तो उन्होंने नाराजगी जाहिर की कि जब शर्तें ही फाइनल नहीं हुई है तो प्रचार कैसे शुरू कर दिया गया..? इसके बाद विवाद बढ़ गया और अंतत: तमाम तैयारियों के बावजूद कार्यक्रम रद्द कर दिया गया। इसके बाद ना तो बीएसपी मैनेजमेंट ने रफी साहब का प्रोग्राम दोबारा करवाने की कोशिश की और ना ही रफी साहब के सचिव की तरफ से भी कोई पहल हुई।

पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म के लिए रफी साहब की दरियादिली

मलय चक्रवर्ती, रफी साहब और मनु नायक 
1964 का वाकया है- छत्तीसगढ़ से मुंबई जाकर पहचान बनाने संघर्ष कर रहे युवा मनु नायक पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म कहि देबे संदेस शुरू कर चुके थे। अपने सीमित बजट की वजह से गीतकार डॉ.एस.हनुमंत नायडू 'राजदीप' और संगीतकार मलय चक्रवर्ती पर मनु नायक राज जाहिर नहीं करना चाहते थे कि वह बड़े गायक-गायिका को नहीं ले सकेंगे। 
लेकिन, होनी को कुछ और मंजूर था। तब मलय चक्रवर्ती धुन तैयार करने के बाद पहला गीत रफी साहब की आवाज में ही रिकार्ड करने की तैयारी कर चुके थे और उनकी रफी साहब के सेक्रेट्री से इस बाबत बात भी हो चुकी थी। मनु नायक उस दौर को याद करते हुए बताते हैं-सेक्रेट्री रफी साहब की तयशुदा फीस से सिर्फ 500 रूपए कम करने राजी हुआ था। सीमित बजट के बावजूद एक धुन तो थी, इसलिए मलय दा को लेकर मैं सीधे फेमस स्टूडियो ताड़देव पहुंचा। यहां रफी साहब किसी अन्य गीत की रिकार्डिंग में व्यस्त थे। जैसे ही रफी साहब रिकार्डिंग पूरी कर बाहर निकले, मैनें उनके वक्त की कीमत जानते हुए एक सांस में सब कुछ कह दिया।
 मैनें अपने बजट का जिक्र करते हुए कहा कि मैं पहली फिल्म बना रहा हूं, अगर आप मेरी फिल्म में छत्तीसगढ़ी का गीत गाएंगे तो यह क्षेत्रीय बोली-भाषा की फिल्मों को नई राह दिखाने वाला कदम साबित होगा। चूंकि रफी साहब मुझसे पूर्व परिचित थे, इसलिए वह मुस्कुराते हुए बोले-कोई बात नहीं, तुम रिकार्डिंग की तारीख तय कर लो।
फिर रफी साहब रिकार्डिंग के लिए स्टूडियो पहुंचे तो उन्होंने पूछा-कहां है आपके छत्तीसगढ़ी साहब जिनका मुझे गीत गाना है। मैं समझ गया कि रफी साहब छत्तीसगढ़ी मतलब गीतकार का नाम समझ रहे हैं। इस पर मैनें उन्हें बताया कि छत्तीसगढ़ी बोली का नाम है। 
इसके बाद रफी साहब ने रिहर्सल की और इस तरह रफी साहब की आवाज में पहला छत्तीसगढ़ी गीत 'झमकत नदिया बहिनी लागे' रिकार्ड हुआ। फिर दूसरा गीत 'तोर पैरी के झनर-झनर' भी उन्होंने रिकार्ड करवाया। खास बात यह रही कि रफी साहब ने मुझसे किसी तरह का कोई एडवांस नहीं लिया और रिकार्डिंग के बाद मैनें जो थोड़ी सी रकम का चेक उन्हें दिया, उसे उन्होंने मुस्कुराते हुए रख लिया।
मेरी इस फिल्म में मन्ना डे, सुमन कल्याणपुर, मीनू पुरूषोत्तम और महेंद्र कपूर भी गा रहे थे और जब रफी साहब ने बेहद मामूली रकम लेकर मेरी हौसला अफज़ाई की तो उनकी इज्जत रखते हुए इन सभी सारे कलाकारों ने भी उसी अनुपात में अपनी फीस घटा दी। 
इस तरह रफी साहब की दरियादिली के चलते मैं पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म में इन बड़े और महान गायकों से गीत गवा पाया। रफी साहब के छत्तीसगढ़ी गीतों को सुनने और इन गीतों से जुड़े तथ्य व विस्तृत जानकारी पर मेरा आलेख छत्तीसगढ़ी गीत-संगी पर पढ़ सकते हैं।

रफी साहब का दिया सबक मैं भूल नहीं पाया

राकेश मोहन विरमानी
दल्ली राजहरा में शंकर-जयकिशन नाइट की शुरूआती कंपेयरिंग करने वाले राकेश मोहन विरमानी तब स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की सेक्टर-1 भिलाई शाखा में पदस्थ थे। भिलाई से खास कर उन्हें इस कार्यक्रम की कंपेयरिंग के लिए बुलाया गया था।
इन दिनों भोपाल में रह रहे विरमानी बताते हैं-याद तो नहीं है कि मुझे कैसे, कब और किसने इस जिम्मेदारी के लिए चुना था लेकिन जब वहां पहुंचा तो स्टेज के पीछे ग्रीन रूम में मुझे रफी साहब से मिलवाया गया।
इतनी बड़ी शख्सियत को सामने देख मुझे यकीन नहीं हो रहा था, मैं थोड़ा नर्वस भी हो गया लेकिन खुद को संभालते हुए मैनें कहा-'रफी साहब आदाब।'
मुझे अच्छी तरह याद है रफी साहब ने मुझे टोका और कहा-'अगर मैं मुसलमान हूं तो क्या आप आदाब करेंगे। हमारे मुल्क की पहचान गंगा-जमनी तहजीब से है और आप मुझे नमस्कार भी कर सकते हैं।' इसके बाद रफी साहब मुस्कुराए और कहा-'मेरी तरफ से आपको हाथ जोड़ कर नमस्कार जी।' विरमानी कहते हैं-रफी साहब का दिया यह सबक मैं कभी नहीं भूल पाया।

वो पल, जब मैनें रफी साहब के पैर छुए                       

अनिल वैष्णव
दल्ली राजहरा निवासी बीएसपी कर्मी अनिल वैष्णव उन खुशकिस्मत रफी भक्तों में से एक हैं,जिन्होंने 1980 के उस कंसर्ट में रफी साहब से मुलाकात की थी। तब वे मैट्रिक पढ़ रहे थे।
अनिल बताते हैं कि शंकर-जयकिशन नाइट के लिए रफी साहब और संगीतकार शंकर 25 अप्रैल की दोपहर में ही दल्ली राजहरा पहुंच गए थे और उन्हें बीएसपी के गेस्ट हाउस में रुकवाया गया था। 
इस दौरान आयोजक शांतिलाल जैन के निवास पर शाम को रफी साहब की एक घरेलू महफिल जमी। आवाज तो बाहर तक आ रही थी इसलिए जैसे-जैसे खबर मिली, शांतिलाल जी के घर के पास हजारों की भीड़ जमा हो गई।
तब पुलिस ने बड़ी मुश्किल से भीड़ को काबू में किया था। अनिल बताते हैं कि अगली सुबह उनके जीवन में अविस्मरणीय दिन लेकर आई। तब गेस्ट हाउस के पास अचानक सुबह-सुबह देखा तो कुरता-पायजामा में रफी साहब और संगीतकार शंकर टहल रहे थे। 
हालांकि उस वक्त मैं सिर्फ उन्हें देखते रहा और कुछ सूझा ही नहीं कि पास जाऊं या कुछ कहूं। इसके बाद शाम को जब कार्यक्रम हुआ तो हमारा पूरा समूह मौजूद था।

 राजहरा स्टेडियम
प्रोग्राम के तुरंत बाद मैं अपने समूह के साथ स्टेज के पास गया और रफी साहब के पैर छू कर उनसे आशीर्वाद लिया। रफी साहब मुस्कुरा दिए। मैनें उन्हें बताया कि उनके गाने हम लोग शौकिया तौर पर गाते हैं। रफी साहब ने सिर्फ इतना ही कहा खूब मेहनत करो, अच्छे से पढ़ाई पूरी करो। अनिल वैष्णव कहते हैं रफी साहब का यह आशीर्वाद उनके लिए जीवन भर की पूंजी बन गया। 
तब तक हमारा आर्केस्ट्रा ग्रुप सरगम म्यूजिकल के नाम से जाना जाता था लेकिन रफी साहब से मुलाकात और उनका आशीर्वाद लेने के बाद हम लोगों ने अपने समूह का नाम आर्केस्ट्रा मोहम्मद रफी नाइट कर दिया।
अनिल बताते हैं दल्ली राजहरा के उस प्रोग्राम की शुरूआत रफी साहब ने फिल्म 'समझौता' के गीत 'बड़ी दूर से आए हैं, प्यार का तोहफा लाएं हैं' से की थी। तब से हम लोगों ने भी नियम बना लिया है और अपने प्रोग्राम की शुरूआत रफी साहब के इसी गीत से करते हैं।
अनिल बताते हैं कि रफी साहब उस प्रोग्राम के बाद 27 अप्रैल को अपनी टीम के साथ रवाना हुए। मुख्य आयोजक शांतिलाल जैन की कार में रफी साहब और मन्ना डे दल्ली राजहरा से नागपुर गए थे। तब इस कार को महालिंगम जी ड्राइव कर रहे थे। महालिंगम वर्तमान में बीएसपी दल्ली माइंस में सेवारत हैं। 

रफी साहब हमारे सामने गा रहे थे, यकीन करना मुश्किल था

बीएस पाबला                     ज्ञान चतुर्वेदी
दल्ली राजहरा में पले-बढ़े प्रसिद्ध ब्लॉगर बीएस पाबला भी उस प्रोग्राम में मौजूद थे। वर्तमान में रिसाली सेक्टर भिलाई में निवासरत  पाबला बताते हैं-मैं बिल्कुल सामने वाली लाइन में बैठा था।
 रफी साहब उस रात बेहद मूड में थे और दर्शकों ने भी हर गीत पर तालियों और सीटियों से पूरे माहौल को जीवंत बना दिया था। तब मेरी उम्र 20 साल थी और यकीन करना मुश्किल हो रहा था कि सामने रफी साहब गा रहे हैं। तब मेरे पास अपना कैमरा था, जिससे मैनें बहुत सी तस्वीरें भी खींचीं। 
इनके नेगेटिव आज भी मेरे पास हैं।पाबला बताते हैं तब रफी साहब ने 'तुमसा नहीं देखा', 'ओ दुनिया के रखवाले', 'मेरी दोस्ती मेरा प्यार', 'ओ मेरी महबूबा', 'चाहे कोई मुझे जंगली कहे' सहित बहुत से नग्मे सुनाए थे। दर्शकों की फरमाइश पर उन्होंने 'कन्यादान' का 'लिखे जो खत तुझे' गीत दो बार सुनाया था। 
दल्ली राजहरा के उस प्रोग्राम में मौजूद रहे बीएसपी के रिटायर डीजीएम और संगीत प्रेमी ज्ञान चतुर्वेदी बताते हैं-वो रात हम सबके लिए यादगार और ऐतिहासिक थी। इतनी बड़ी शख्सियत, जिन्हें हम सब देवता मानते हैं, को अपनी नजरों के सामने देखना सचमुच में एक यादगार लम्हा रहा। 
मैं अपनी लैम्ब्रेटा स्कूटर से दल्ली राजहरा गया था और रात में 2 बजे भिलाई लौटा। मेरी बड़ी ख्वाहिश थी कि रफी साहब से मिलूं और उनका आशीर्वाद लूं लेकिन कुछ निजी परेशानियों के चलते मुझे भिलाई लौटने की जल्दी थी। इसलिए मैं रफी साहब से मिल ना पाया, इसका मुझे हमेशा अफसोस रहेगा।

Wednesday, July 11, 2018

नेकदिल बल्लो, भिलाई वाली खाला और पुत्तर संजू


(''संजू ''देखने के बाद जो कहने का दिल हुआ )


----मुहम्मद जाकिर हुसैन ----

सुनील दत्त-संजय दत्त, नरगिस और सावित्री बख्शी
सुनील दत्त का वास्तविक नाम बलराज दत्त था और वो बड़े फख्र के साथ ये जिक्र ऐलानिया करते थे कि उनकी रगों में उस हुसैनी (मोहियाल) ब्राह्मण कौम का खून है, जिन्होंने जंगे करबला में इमाम हुसैन के साथ अपनी शहादत दी।
 दत्त आज के पाकिस्तान के हिस्से में पडऩे वाले झेलम के पिंडदादन के मूल निवासी थे। बंटवारे के खून-खराबे में उनके खानदान के चंद जिंदा बचे लोगों में एक उनकी खाला (मौसी) सावित्री बख्शी भी थीं, जो बाद के दौर में दिल्ली से अपने पति तीरथराम बख्शी के साथ भिलाई आ गईं थीं।
 बख्शी साहब भिलाई स्टील प्लांट में इंजीनियर थे। पति के गुजरने के बाद श्रीमती बख्शी यहां 38 ओल्ड नेहरू नगर नेहरू नगर में अपने बेटों के साथ रहती थीं। वे सुनील दत्त के पिता दीवान रघुनाथ दत्त के बड़े भाई दीवान पिंडी दास दत्त की पत्नी कौशल्या की सगी बहन थीं।
 श्रीमती बख्शी से सुनील दत्त और संजय दत्त प्रकरण पर मेरी 2-4 बार बात हुई थी। सुनील दत्त इनके संपर्क में हमेशा रहे और जब भी वो भिलाई या रायपुर आए तो वक्त निकाल कर नेहरू नगर उनसे मिलने उनके घर भी गए थे श्रीमती बख्शी ने ही मुझे बताया था कि बलराज दत्त (सुनील दत्त) का घर का नाम बल्लो था।बल्लो की नेकदिली की ना सिर्फ दुनिया कायल थी बल्कि घर-परिवार के लोगों के बीच भी उनका मरतबा काफी ऊंचा था। 25 मई 2005 को सुनील दत्त गुजरे तो उस रोज शाम को मेरी श्रीमती बख्शी से लंबी बातचीत हुई थी।


नरगिस का आखिरी सफर और ''दर्द का रिश्ता'' 

 तब बंटवारे का दौर याद करते हुए उन्होंने बताया था कि बल्लो सहित हम कुछ ही लोग दंगे में बच पाए थे। हम लोगों ने हिंदुओं का जैसा कत्लेआम वहां देखा,ठीक वैसे ही यहां मुसलमानों का कत्लेआम चल रहा था। इसलिए बल्लो ने भारत पहुंचने के बाद उस दौर में विभाजन के पीडि़त हिंदु-मुस्लिम की मदद के लिए दिन रात एक कर दिया था।
उसकी यही नेकदिली आखिरी दम तक रही। तब नरगिस दत्त (मूल नाम-फातिमा रशीद) के अंतिम संस्कार का भी जिक्र निकला था। परिवार के सदस्य के तौर पर मौजूद रहीं श्रीमती बख्शी ने उस दुखद घड़ी के बारे में बताया था ।
उनके मुताबिक 4 मई 1981 को दोनों परिवारों के आपसी समझौते के तहत नरगिस के शव को घर से हिंदु सुहागन के तौर पर सारे रीति-रिवाज के साथ निकाला गया था।  कुछ दूर चलने के बाद दोनों पक्षों की मौजूदगी में मुंबई के बड़ा कब्रिस्तान में जनाजे की नमाज के बाद उन्हें मुस्लिम परंपरा के अनुसार दफन किया गया था।
संजय दत्त की बात निकलने पर श्रीमती बख्शी ने एक ही शब्द कहा था-''बल्लो का बेटा गलत सोहबत की वजह से बिगड़ा।'' उनके यही शब्द बाद में ''हरिभूमि'' में संजय दत्त पर मेरी एक स्टोरी की हेडिंग बने थे।
 आर्य समाज भिलाई की संस्थापक सदस्य रहीं सावित्री बख्शी का 8 नवंबर 2011 को 94 साल की उम्र में कैंसर से निधन हो गया था। वे सतीश चंद्र छिब्बर, सुभाष चंद्र छिब्बर, जितेंद्र बख्शी और सुमन बाली की मां थीं। उनके इकलौते भाई रिटायर लेफ्टिनेंट कर्नल मदन मोहन बाली देहरादून में रहते हैं।
इतना लंबा लिखने की वजह यह थी कि संजू देखते वक्त 2-3 बातें मेरे दिमाग में चल रही थी। एक हद तक यह संजय दत्त की पीआर फिल्म भी लगी लेकिन इसमें दर्शकों का 'दर्द का रिश्ता' सुनील दत्त के साथ ज्यादा जुड़ता है, यह मैनें अनुभव किया। 



'बिरजू'' का अवतार और कौन होगा वो राजनेता..?

विश्व सिनेमा की धरोहर महबूब खान की ''मदर इंडिया''  में विद्रोही बिरजू की भूमिका सुनील दत्त ने की थी,जिसमें राधा (नरगिस) गांव की इज्जत पर आंच आते देख अपने बेटे बिरजू को गोली मार कर खुद इंसाफ कर देती है नरगिस और सुनील दत्त ने ऐसा कभी नहीं सोचा होगा कि बिरजू उनकी गोद आए। हालांकि नरगिस तो अपने बेटे को ''बिरजू'' के अवतार में पूरा ढलते नहीं देख पाई लेकिन सुनील दत्त ने अपनी आखिरी सांस तक अपने पुत्तर बिरजू की सारी ''कलाएं'' देखी।
हकीकत की जिंदगी अगर सिनेमा होती तो मुमकिन था कि सुनील दत्त खुद ''मदर इंडिया'' बन कर अपने बिरजू का ''इंसाफ'' कर देते लेकिन हकीकत और फसाने के बीच की महीन लकीर का यही बड़ा फर्क है। फिल्म देखते हुए कुछ कोड को डि-कोड करने की कोशिश कर रहा था। मसलन दिल्ली में संजू अपने दोस्त के साथ जिस राजनेता से मिलने जाता है, वो कौन हो सकता है..?  अंटा गफील हालत में छड़ी थामे बैठे इस राजनेता की भूमिका अंजन श्रीवास्तव ने बेहद प्रभावी ढंग से की है।
वह पूरा दृश्य देखकर नेता प्रतिपक्ष (1993-1997 ) रहे अटल बिहारी बाजपेयी, कांग्रेस अध्यक्ष (1996 से 1998) रहे सीताराम केसरी और केंद्रीय गृहमंत्री (1991-1996) रहे शंकरराव भाऊराव चव्हाण की तरफ मेरा ध्यान गया लेकिन अभी भी समझ नहीं आ रहा है कि वो घाघ राजनेता इन तीनों में से एक था या कोई और..?

छूट गए बहुत से प्रसंग, हीरानी के जरिए संजू ने कही अपने मन की बात

दर्शक और समीक्षक संजय दत्त के जीवन के दूसरे कई प्रसंग भी परदे पर देखना चाहते थे लेकिन हीरानी ने ''भाईचारा'' निभाते हुए बहुत कुछ गायब कर दिया है। संजू की पहली प्रेमिका (अब बड़े घर की बहू) का अंदाज लगाने उन्होंने मामला दर्शकों के विवेक पर छोड़ दिया है।
दर्शक होने के नाते मेरा भी मानना है कि इसमें बाल ठाकरे वाला प्रसंग होना था। लेकिन हीरानी इससे भी बचे हैं। हालांकि फिल्म रिलीज होने के बाद उस रोज का यह वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है।जिसमें मध्यस्थता करने वाले शत्रुघ्न सिन्हा सहज भाव से बाल ठाकरे के बाजू बैठे हैं और सुनील दत्त पूरी क्लिप में बेहद असहज नजर आ रहे हैं। 
ध्यान से देखेंगे तो एक जगह सुनील दत्त के ठीक बाजू उनके समधी जुबली स्टार राजेंद्र कुमार भी नजर आते हैं। किस्सा मुख्तसर ये कि संजू बाबा जैसे उत्पाती बच्चे हर दौर में हर घर या खानदान में जन्म लेते रहते हैं। लेकिन सभी को सुनील दत्त जैसा बाप और राजकुमार हिरानी जैसा फिल्म निर्माता-निर्देशक नहीं मिलता।  वैसे भी सिनेमा आधी हकीकत आधा फसाना का बेजोड़ संगम है। इसलिए हीरानी के जरिए संजू बाबा ने अपनी कहानी कह दी। इसे दिल पे नई लेने का...