Wednesday, August 19, 2020

 'मास्टर जी' सरोज खान- एक पवन दीवानी


फिल्मी दुनिया मेें 'मास्टर जी' कहलाने वाली सरोज खान अब हमारे बीच नहीं है। 3 जुलाई 2020 को 72 साल की उम्र में मुंबई के एक अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली।

सरोज खान की पूरी जिंदगी बेहद उतार-चढ़ाव वाली रही। हालांकि 'नगीना', 'चांदनी' और 'तेजाब' से उनका जो सितारा चमका तो फिर कोरियाग्राफी की दुनिया में उन्होंने अपनी बादशाहत बीते दशक तक कायम रखी। उनकी जिंदगी के कुछ उतार-चढ़ाव पर एक नजर-

वैजयंती माला ने दिया था सबसे बड़ा इनाम

1962 आते-आते 'मास्टरजी' सरोज खान अपने गुरु बी. सोहनलाल की असिस्टेंट हो चुकी थी। डॉ. विद्या के गीत पवन दीवानी न मानें की शूटिंग चल रही थी और वैजयंती माला को सोहनलाल ने कहा-सरोज जैसा करती है तुम्हे वैसा करना है। 13 साल की बच्ची को देखकर वैजयंती माला भी हैरान थी। 

खैर, इस गाने पर सरोज ने अपने मास्टरजी की बताई हुई तमाम हरकतें हूबहू करने लगीं और जब 'उलझी लट हमारी..' वाला अंतरा आया तो सरोज का नृत्य कौशल देख वैजयंती माला दंग रह गई।

पूरा गाना शूट होने के बाद वैजयंती ने आवाज दी-ए सरोज..उधर से सरोज दौड़ी चली आई और वैजयंती ने खुश होकर 50 रूपए दिए। सरोज इस 50 रूपए को हमेशा अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सम्मान मानती रही।

'ताजमहल' की कव्वाली में देखिए सरोज को

याद कीजिए 'ताजमहल' फिल्म की कव्वाली चांदी का बदन सोने की नजर अगर भूल गए हों तो इसे यू-ट्यूब पर दोबारा ध्यान से देखिए। मीनू मुमताज और खुर्शीद भंवरा के बीच शानदार मुकाबला चल रहा है और मीनू मुमताज के ठीक पीछे बाईं ओर सरोज है।

प्रख्यात मेकअप आर्टिस्ट पंढरी जुकर का यू-ट्यूब पर एक इंटरव्यू मेें बताते हैं-''तब मैंने सरोज की हरकतों को देखकर डायरेक्टर सादिक से कहा कि मीनू के पीछे जो लड़की है उसे देखिए। उसे तो आगे होना चाहिए।

इस पर सादिक बोले-बात तो सही कह रहे हो तुम लेकिन उस लड़की को आगे लाएंगे तो अपनी मेन आर्टिस्ट मीनू मुमताज दब जाएगी। इसलिए उसे वहीं रहने दो।''

खैर, सरोज तब फ्रंट पर नहीं थी लेकिन आज उस कव्वाली को देखिए तो सरोज की अदाकारी से आपका ध्यान नहीं हटेगा।

परछाई को देखकर नाचने वाले निर्मला ऐसे बन गई सरोज

बंटवारे के बाद पाकिस्तान वाले हिस्से से रोजी-रोटी की तलाश में मुंबई आए शरणार्थी किशनचन्द सिद्धू सिंह नागपाल और उनकी बीवी नोनी सिंह के घर 22 नवंबर 1948 को बेटी ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया निर्मला नागपाल।

उस खानदान में किसी का भी नृत्य या कला से कोई लेना देना नहीं था लेकिन 3 साल की उम्र में जब निर्मला अपनी परछाई को देखकर नाचने लगी तो मां पास के एक डाक्टर के पास ले गई कि शायद बच्ची दिमागी तौर पर कुंद तो नहीं है।

लेकिन डाक्टर ने समझाया कि बच्ची नार्मल है और अगर नाचना चाहती है तो फिल्मों में क्यों नहीं भेज देते। वैसे भी तुम लोगों को पैसे की जरूरत तो है ही। इस तरह 3 साल की निर्मला जब फिल्मों मेें आई तो माता-पिता नहीं चाहते थे कि फिल्म लाइन की वजह से उनके परिवार पर सवाल उठे, इसलिए निर्मला का नाम बदल कर बेबी सरोज करवा दिया।

'आगोश' और 'हावड़ा ब्रिज' वाली सरोज

चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर सरोज को छोटे-छोटे रोल मिलने लगे। शुरूआती छोटे-छोटे काम के बाद उन्हें पूरा एक गाना मिला फिल्म आगोश (1953) के गीत बांसुरिया काहे बजाई बिन सुने रहा न जाए में, जिसमें सरोज ने राधा और बेबी नाज ने कृष्ण की भूमिका की थी। इस गीत में आप 5 साल की सरोज का नृत्य कौशल देख सकते हैं।

फिर उम्र कुछ और आगे बढ़ तो सरोज को एक्स्ट्रा आर्टिस्ट के तौर पर काम मिलने लगा। फिल्म हावड़ा ब्रिज के गीत आईए मेहरबां में मधुबाला के सामने डांस कर रहे लड़के-लड़कियों की टोली में सबसे आगे लड़की हमीदा के साथ लड़का बनी सरोज साफ नजर आती हैं। 

..और सोहनलाल की असिस्टेंट बन गई सरोज

बैकग्राउंड डांसर सरोज के लिए जल्द ही ऐसा वक्त भी आया जब डांस डायरेक्टर बी. सोहनलाल उनके ग्रुप को रिहर्सल करवा रहे थे और सरोज अपना हिस्सा छोड़ हेलन के हिस्से का अभ्यास कर रही थी।

 सोहनलाल नाराज हुए लेकिन पूछ बैठे कि क्या हेलन को जो करना है वो पूरा करके दिखा सकती हो। सरोज को मौके की तलाश थी, लिहाजा उन्होंने तुरंत ही हेलन वाला पूरा डांस कर सबको हैरान कर दिया। इसके बाद सोहनलाल ने सरोज को तुरंत अपना असिस्टेंट बना लिया।

असिस्टेंड के तौर पर सरोज तब तमाम दिग्गज नायिकाओं को नचा रही थीं। इसी दौरान एक मौका ऐसा भी आया जब सोहनलाल को 'संगम' के 'प्रेम पत्र' वाले गीत के लिए टीम के साथ विदेश जाना पड़ा और इधर 'दिल ही तो है' फिल्म में नूतन पर 'निगाहें मिलाने को जी चाहता है' कव्वाली की शूटिंग सामने थी।

तब उन्हें कव्वाली पर काम करने कहा गया तो उन्होंने असमर्थता जताई लेकिन निर्देशक प्यारेलाल संतोषी ने उन्हें इस कव्वाली की एक-एक लाइन पर अदाकारी का गुरुमंत्र दिया और इसके बाद सरोज तैयार हुई फिर पहली बार पूरी की पूरी इस कव्वाली को सरोज ने संवार दिया। इससे उनके काम को तारीफ भी खूब मिली।

ऐसे हुई पहली शादी, फिर आए सरदार खान

इसके कुछ ही महीने बाद 41 साल के सोहनलाल ने 13 साल की सरोज के गले में काला धागा बांध दिया और सरोज ने भी मान लिया कि उसकी शादी हो गई।

उस वक्त वे नहीं जानती थीं कि सोहनलाल पहले से शादीशुदा और चार बच्चों के पिता हैं। सरोज को यह सब तब पता लगा जब 1963 में वह एक बेटे को जन्म दे चुकी थी।1965 में उनके दूसरे बच्चे का जन्म हुआ, जो 8 महीनों बाद ही गुजर गया। जब सोहनलाल ने सरोज के दोनों बच्चों को अपना नाम देने से इनकार किया, तो इनकी राहें अलग हो गई।

कुछ सालों बाद सोहनलाल को हार्ट अटैक आया, तब सरोज उनके करीब आईं। इस दौरान सरोज ने बेटी कुकु को जन्म दिया। बेटी के जन्म के बाद सोहनलाल हमेशा के लिए सरोज की जिंदगी से अलग हो गए और मद्रास चले गए। इसके बाद सरोज ने दोनों बच्चों की परवरिश अकेले की।

सोहनलाल से अलग होने के बाद सरोज ने 1975 में कारोबारी सरदार रोशन खान से दूसरी शादी की। सरदार रोशन खान ने सरोज के दोनों बच्चों को अपना नाम दिया।

 इसके बाद सरोज ने इस्लाम धर्म अपना लिया और सरोज खान हो गईं। सरदार रोशन और सरोज की एक बेटी सकीना खान है, जो फिलहाल दुबई में डांस इंस्टीट्यूट चलाती हैं।

वहीं सरोज के मास्टर सोहनलाल से दो बच्चों को भी सरदार खान ने अपना नाम दिया। इनमें राजू (हामिद) खान आज जाने-माने कोरियोग्राफर हैं। वहीं बेटी कुकू खान मेकअप आर्टिस्ट थीं, जिनका 2011 में देहांत हो गया।

पहला ब्रेक साधना ने दिया, राह बनाई सुभाष घई ने

सरोज की जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आते रहे। इस बीच उन्हें पहला ब्रेक दिया साधना ने 1974 में अपनी फिल्म 'गीता मेरा नाम' से। इस फिल्म से वह स्वतंत्र कोरियोग्राफर बन गई। 

इसके बाद उन्होंने राजश्री फिल्म्स के बैनर तले राज बब्बर की पहली फिल्म जज्बात की। हालांकि मंजिल अभी भी दूर थी। उनकी कीमत पहचानी निर्माता-निर्देशक सुभाष घई ने, जिन्होंने 1982 में अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म 'हीरो' में स्वतंत्र रूप से नृत्य निर्देशन का मौका दिया।

इसके बाद 1986 में आई फिल्म 'नगीना' सरोज के लिए मील का पत्थर साबित हुई। इस फिल्म में सरोज ने श्रीदेवी को 'मैं तेरी दुश्मन गाने' पर नृत्य कराया, जो काफी हिट साबित हुआ और इसी गाने की वजह से सरोज को फेम मिला। 

यही वह दौर था, जब सरोज खान के नाम का सिक्का चल निकला। चांदनी, तेजाब, मिस्टर इंडिया, लम्हे चालबाज, खलनायक, हम दिल दे चुके सनम, देवदास तक सरोज खान पूरी तरह स्थापित हो चुकी थी।

कई सम्मान हासिल किए, दक्षिण ने भी पूछा उन्हें

2002 में आई 'देवदास', 2006 की तमिल फिल्म 'श्रृंगारम' और 2007 में रिलीज 'जब वी मेट' में बेहतरीन कोरियोग्राफी के लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड मिला। श्रृंगारम की सबसे खास बात यह है कि इसमें एक गीत की महज एक लाइन में सरोज खान ने नायिका से 16 भाव दिखाए हैं। इससे दक्षिण के कई दिग्गजों ने उनकी कला को सराहा।

इस दौरान उन्हें चेन्नई की प्रतिष्ठित श्रीकृष्णा गान सभा बुलाकर सम्मानित किया। फिल्मी दुनिया से सरोज खान पहली ऐसी हस्ती थी, जिन्हें शास्त्रीयता में रची-बसी एक प्राचीन संस्था ने बुलाकर सम्मानित किया था। इसी तरह तेजाब के एक दो तीन के साथ रोचक तथ्य यह जुड़ा है कि इस गीत के साथ फिल्मफेयर ने पहली बार बेस्ट कोरियोग्राफर की केटेगरी रखी और पहला अवार्ड सरोज खान को दिया। इसके बाद उन्होंने 8 फिल्मफेयर अवॉड्र्स जीते। वहीं 2001 में आई 'लगान' के लिए उन्हें अमेरिकन कोरियोग्राफी अवॉर्ड मिला था।

कम होती गई सक्रियता, मकाम बनाया अपना

भले ही सरोज 2000 से ज्यादा गानों को कोरियोग्राफ कर चुकी हैं। लेकिन दशक भर से उनकी सक्रियता में कमी आई थी। आखिरी बार पिछले साल माधुरी दीक्षित की फिल्म कलंक में उन्होंने तबाह हो गए गीत का नृत्य संयोजन किया। 

इससे पहले 2014 में 'गुलाब गैंग' और 2015 की 'तनु वेड्स मनु रिटन्र्स' जैसी चुनिंदा फिल्मों में उन्हें अपना काम दिखाने का मौका मिला। वहीं सरोज खान कई रियलिटी शो में बतौर जज जुड़ी थीं। इसमें 'नच बलिए', 'उस्तादों के उस्ताद', 'नचले वे विद सरोज खान', 'बूगी-वूगी', 'झलक दिखला जा' जैसे शो शामिल हैं।

आज सरोज खान हमारे बीच नहीं है लेकिन 90 के दौर से बीते दशक तक उन्होंने अपना जो मकाम बनाया वह हमेशा खाली रहेगा। अपनी मौत से कुछ दिन पहले उन्होंने एक वीडियो रिकार्ड करवाया था। उसे लिंक पर देख-सुन सकते हैं

 कुमकुम (जैबुन्निसा), तेरा जलवा
   जिसने देखा वो तेरा हो गया.......


बीते जमाने की मशहूर अदाकारा और नृत्यांगना कुमकुम (मूल नाम-जैबुन्निसा) ने 28 जुलाई 2020 मंगलवार को मुंबई में 86 साल की उम्र में आखिरी सांस ली। 

कुमकुम बीते करीब 4 दशक से फिल्मी चकाचौंधी के जीवन से दूर अपने घर-परिवार में जिंदगी बसर कर रही थी। 

उनके गुजरने की खबर मशहूर एक्टर जॉनी वॉकर के बेटे नासिर और जगदीप के बेटे नावेद ने सोशल मीडिया पर जानकारी दी।

कुमकुम के योगदान पर लिखने को ढेर सारी फिल्मों के नाम दिए जा सकते हैं लेकिन कुछ उल्लेखनीय फिल्मों की बात करें तो उनकी धमाकेदार इंट्री हुई थी ''आर-पार'' के गीत ''कभी आर कभी पार लागा तीरे नजर.. से।''

निर्देशक गुरुदत्त ने पहले यह गीत 15 साल के जगदीप पर फिल्माया था लेकिन सेंसर बोर्ड ने गाने के बोल और जगदीप की उम्र को देखते हुए एतराज जताते हुए गाना निकालने कह दिया। इस पर गुरुदत्त ने बीच का रास्ता निकाला और फिर कुमकुम को तैयार कर उन पर यह गीत फिल्मा लिया। इसके बाद तो कुमकुम की फिल्मों में सक्रियता बढ़ती गई।

जिन गीतों पर उनके नृत्य की धूम मची

परदे पर उनके नृत्य कौशल के नाम से जिन गानों की धूम मची उनमें ''कोहेनूर'' में ''मधुबन में राधिका नाची रे'' को आप सबसे उपर रख सकते हैं। इसके बाद ''मदर इंडिया'' में ''होली आई रे'' गीत का शुरूआती हिस्सा देखिए, जिसमेें सितारा देवी के साथ कुमकुम की अद्भुत जुगलबंदी नजर आएंगी।

वैसे ही ''नया दौर'' में मीनू मुमताज के साथ ''रेशमी सलवार कुरता जाली दा'' गीत में छा जाती है। इसके साथ ही ''दगा दगा वई वई'' (काली टोपी लाल रुमाल), ''तेरा जलवा जिसने देखा वो तेरा हो गया'' (उजाला) और ''मेरा नाम है चमेली, मैं हूं मालन अलबेली'' (राजा और रंक) सहित एक लंबी फेहरिस्त है। ऐसे ही गीतों के लिए अखबारों में फिल्मों के इश्तिहार के नीचे लिखा जाता था कि गाने के दौरान परदे पर चिल्हर न फेंके।

उनकी कुछ और उल्लेखनीय फिल्मों में 'मिस्टर एक्स इन बॉम्बे','सन ऑफ इंडिया', 'बसंत बहार', 'एक सपेरा, एक लुटेरा','आंखें','गंगा की लहरें','गीत', 'ललकार','एक कंवारा, एक कंवारी', 'जलते बदन' और 'किंग कॉन्ग' शामिल हैं।

प्रेरणा थी पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म की

कुमकुम का योगदान सिर्फ हिंदी फिल्मों में नहीं है बल्कि वह 1963 में आई पहली भोजपुरी फिल्म ''गंगा मइया तोहे पीयरी चढ़इबो'' की नायिका थीं। यही वह फिल्म थी,जिसने रायपुर से जाकर बंबई में संघर्ष कर रहे युवा मनु नायक को पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म ''कहि देबे संदेस'' बनाने की प्रेरणा मिली थी। 

मनु नायक छत्तीसगढ़ी फिल्म में कुमकुम को नायिका और  उस वक़्त अपनी  बनाने पहचान बनाने संघर्ष कर रहे युवा सलीम खान (सलमान के पिता ) को नायक लेना चाहते थे। 

मनु नायक बताते हैं कि दोनों से बात हुई लेकिन कई वजहों से यह बात नहीं जमी। खैर, कुमकुम बाद के दिनों में कई भोजपुरी फिल्मों में नजर आईं और कुछ फिल्में उन्होंने बनाई भी।

निजी जिंदगी उथल-पुथल से भरी, गोविंदा की खाला हैं कुमकुम..?

अब कुछ बातें कुमकुम की निजी जिंदगी को लेकर। दरअसल कई सवाल उनके जाने के बाद भी बरकरार हैं। लगभग सभी वेबसाइट और अखबारों ने उन्हें हुसैनाबाद (बिहार) के नवाब मंजूर हुसैन खां की बेटी लिखा है और कुमकुम का भी एक इंटरव्यू जो मेरी नजर से गुजरा है, उसमें वह खुद भी अपनी पहचान यही जाहिर करती हैं।

लेकिन फिल्म इतिहासकार शिशिर कृष्ण शर्मा ने अपने ब्लॉग बीते हुए दिन  में जो इंटरव्यू शामिल किया है, उससे इस तथ्य की पुष्टि होती हैं कि कुमकुम दरअसल बीते दौर की शास्त्रीय संगीत की गायिका निर्मला देवी की बहन और अभिनेता गोविंदा की खाला हैं।

इस इंटरव्यू में उन्होंने मशहूर नृत्यांगना सितारा देवी के हवाले से बताया है कि कुमकुम और निर्मला देवी के पिता एक हैं मां अलग-अलग। उनके पिता तबला वादक वासुदेव नारायण सिंह (वासुदेव महाराज) की पहली हिंदू पत्नी की बेटी निर्मला देवी हैं तो दूसरी मुस्लिम पत्नी (जिन्हें सितारा देवी मुन्नन आपा बताती हैें) की दो बेटियां कुमकुम और राधा हुई।

वैसे कुछ दूसरी वेबसाइट खंगालने पर यह उल्लेख भी सामने आता है कि मुस्लिम महिला से दूसरा विवाह करने के साथ ही कुमकुम के पिता ने इस्लाम धर्म कुबूल कर लिया था। हालांकि कहीं भी यह साफ नहीं होता कि वासुदेव नारायण सिंह और नवाब मंजूर हुसैन खां एक ही व्यक्ति है या अलग-अलग...।

खैर, अब न तो कुमकुम इस दुनिया में हैं ना ही उनकी बहन और गोविंदा की माता निर्मला देवी। वहीं सितारा देवी भी गुजर चुकी हैं। इसलिए जब तक कोई और जानकारी न आए, तब तक इसे ऐसे ही छोड़ देना बेहतर है।

रांची था ससुराल, शिया परंपरा का पूरी तरह किया पालन

1975 में कुमकुम की शादी सज्जाद अकबर खान से हुई। इस बारे में रांची के पत्रकार-लेखक सैयद शहरोज कमर  ने उर्दू अदीब हुसैन कच्छी के हवाले से लिखा हैं कि-कुमकुम की शादी रांची के नौजवान सज्जाद अकबर खान उर्फ पिंकी खान से हुई थी। 

शहरोज के मुताबिक शादी के बाद कुछ दिनों तक कुमकुम रांची आकर रहीं भी। मूलत: इलाहाबाद के रहने वाले पिंकी के पिता अकबर हुसैन खान हैवी इंजीनियरिंग कार्पोरेशन (एचईसी) में उच्च पदाधिकारी थे। 

यह परिवार एचईसी के सेक्टर-3 में रहता था। पिंकी का फिल्मी नगरी आना-जाना होता था। इसी दौरान कुमकुम से मुलाक़ात हुई और बाद में बात निकाह तक आ पहुंची। 

शादी करके जब दोनों रांची आये तो हम दोस्तों ने उनका इस्तक़बाल किया। दोनों की एक बेटी अंदलीब है। वहीँ पत्रकार फज़ल इमाम मालिक लिखते हैं कि कुमकुम के परिवार में उनका बेटा हादी अली अबरार फिल्मों से जुड़ा  हैं ।

कुछ और माध्यमों से भी जानकारी मिलती है कि सज्जाद-जैबुन्निसा (कुमकुम) कुछ दिनों बाद सऊदी अरब चले गए। वहां 20 बरस गुजारने के बाद 1995 में यह जोड़ा मुंबई लौटा और तब से कुमकुम शिया मुस्लिम परिवार की परंपरा का पूरी तरह निर्वहन करते हुए रह रही थी। उनके पति बिल्डर रहे हैं और कुमकुम अपना बुटीक चलाती थी।

अभिनेत्री कुमकुम पर फेसबुक में एक पेज मौजूद है। जिसमें उनका एक वीडियो भी देख सकते हैं। बहरहाल एक कुशल नृत्यांगना और बेहतरीन अभिनेत्री कुमकुम को श्रद्धांजलि।


 छह दशक का वैभव समेटे सूना हुआ बीएसपी जनसंपर्क
 का फोटो सेक्शन, आखिरी फोटोग्राफर जोशी भी रिटायर


तत्कालीन ईडी जी उपाध्याय  के साथ  दाएं से कल्बे हसन, प्रमोद यादव, राकेश यदु, अनिल कामड़े ,राजकुमार सिंह और सुधीर जोशी 

भिलाई इस्पात संयंत्र के जनसंपर्क विभाग का फोटो सेक्शन अपनी छह दशक की सक्रियता भरी उपलब्धियों के साथ अब सूना हो गया। यहां के आखिरी फोटोग्राफर सुधीर मधुकर जोशी 31 जुलाई 2020 को अपनी 36 साल की सेवा के बाद रिटायर हो गए। 

संभव है मैनेजमेंट अब जरूरत पड़ने पर वीडियो सेक्शन या बीएसपी के दूसरे विभागों से फोटोग्राफरों की सेवा ले। वरिष्ठ फोटोग्राफर जोशी के रिटायरमेंट पर इसी विभाग में सुदीर्घ सेवा दे चुके अंचल के प्रख्यात फोटोग्राफर प्रमोद यादव ने सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट लिखी है। जिसमें उन्होंने विभाग से जुड़ी यादें बांटी है।

प्रमोद यादव लिखते हैं-देखते ही देखते दिन कैसे गुजर जाते हैं,पता ही नहीं चलता। मुझे वो दिन भी याद है जब एक मई 1980 को मैने फोटो सेक्शन ज्वाइन किया, तब भरा-पूरा विभाग था फोटो सेक्शन। 

तब यहां 7-8 कार्मिक हुआ करते थे। तीन सीनियर फोटोग्राफर, दो जूनियर,एक आफिस असिस्टेंट, एक प्यून और एक स्टोर कीपर भी जिसके जिम्मे फोटो सेक्शन के सारे सामान हुआ करते। 

बीएसपी के शुरुआती  फोटोग्राफर हरीश जे (स्कूटर पर )के साथ टीम 
हमें फोटो प्रिंटिंग पेपर, रोल,डेवलेपर और हाइपो डेवलपिंग ट्रे आदि की जरूरत होती तो वे ही इश्यू करते। 
उन दिनों नायर हुआ करते स्टोर कीपर, फिर बाद में उनकी जगह पिल्ले और फिर पीसी छाबड़ा आए। आफिस की पूरी व्यवस्था पीसी श्रीवास्तव की होती। वे ही सारे फोन अटेंड करते। 

सारे फोटो-कवरेज डायरी में नोट करते, टाउनशिप गैरेज में फोन कर वाहन भी लाइनअप करते। कुछ विशेष कवरेज को छोड़ वह यह भी तय करते कि किस फोटोग्राफर को कहा भेजना है।

 हमारे विभाग के नियमित टाइपिस्ट थे लंबोदर सिंह ठाकुर जो घंटे दो घंटे के लिए ऊपर फोटो सेक्शन में जरूर आया करते थे।

यादव ने लिखा-कहते है सेक्शन में पहले दो प्यून हुआ करते थे लेकिन मैं जब जुड़ा तो सिर्फ राधेश्याम ही थे। बड़े ही भोले और अंतरमुखी से लेकिन काम में माहिर और किसी काम को 'ना' नहीं कहते।

 जब कभी हम किसी वीआईपी के विजिट पर उन्हें देने एलबम बनाया करते तो पूरे रात वो हमारे साथ हमारी मदद करते, निगेटिव सूखाते,फोटो धोते फिर उन्हें एलबम में बेहद सलीके से चस्पा भी करते।

तब ब्लैक एंड वाइट का जमाना था। एलबम तैयार होते-होते सुबह के चार-पांच बज जाते फिर राधेश्याम के हाथों ही उसे फ़ोटो आफिसर के निवास पहुंचाते और वे बीएसपी के चीफ जीएम/एमडी को सौंपते, जो वीआईपी को भेंट करते।

करीब 65 साल पहले भिलाई के शुरूआती दौर में किशन सोनी 'निशा' सीनियर फोटो आफिसर और जे.हरीश जूनियर फोटो आफिसर फोटो सेक्शन के आधार स्तंभ थे। 

फिर स्व.राजा बाबू पिल्ले वरिष्ठ फोटोग्राफर, उनके बाद राकेश यदु और अनिल कामड़े फोटोग्राफर। तब पूरे सेल की किसी भी यूनिट में फोटो प्रभाग नहीं होने से अक्सर विशेष अवसरों पर भिलाई के फोटोग्राफर ही जाते। 

दोनों सीनियर ऑफिसरों सोनी व हरीश ने विशिष्ट हस्तियों के बहुत ही कवरेज किए। इनमें नेहरू,दिमशित्स, ख्रुश्चेव,डॉ.राजेन्द्र प्रसाद हो,मोरारजी देसाई, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री,बीजू पटनायक और सरदार स्वर्ण सिंह सहित बहुत लंबी सूची है।

यादव कहते हैं-इसमें कोई शक नहीं कि भिलाई का आरंभिक इतिहास सोनी व हरीश ने ही फोटो के माधयम से बनाया,इन्होंने भिलाई को अपना बेस्ट दिया। राजा बाबू पिल्ले हरफन मौला फोटोग्राफर थे। बहुत ही ईमानदार और स्पष्ट वक्ता। उन्होंने हमें खूब सिखाया। 

हमारे ढेर सारे काम वे ही कर दिया करते। शाम के बाद का कवरेज अक्सर वे ही करते। अफसोस कि एक दिन यूं ही सुबह किसी कवरेज में जाने तैयार घर पर बैठे थे कि एकाएक दिल का दौरा पड़ा और वे चल बसे।

यादव कहते हैं-राकेश व कामड़े मेरे ही हमउम्र थे। इनसे अच्छी निभी और हम हमेशा साथ रहे। हरीश के रहते तीन और फोटोग्राफर राज कुमार सिंह,कल्बे हसन और सुधीर जोशी भर्ती हुए। फिर एक और फोटो अफसर टीके घोषाल प्लांट से आए,पर वे ज्यादा दिन यहां नही रहे।

वक्त गुजरता गया और सेक्शन में इंचार्ज के तौर पर क्रमशः एचएस कलार्थी और,श्रीमती रूखमणी सिंह आये। वक्त का पहिया घूमता रहा और एक दिन राकेश का ट्रांसफर सीएसआर में हो गया। इस दौरान राधेश्याम भी एकाएक चल बसे। यहीं से सेक्शन का विघटन शुरू हो गया। 

फिर हम केवल पांच थे। ऐसे में स्टाफ घटता गया और आधुनिकीकरण के चलते कवरेज बढ़ता गया। हमें आखिरी तक एक फुल टाइम प्यून नहीं मिला।

प्रमोद यादव कहते हैं- इन परिस्थितियों में मैं 2009 में फोटो और वीडियो सेक्शन का इंचार्ज बना। कवरेज में जाने का अवसर मेरे लिए कम होता गया और मैं केवल व्यवस्थापक की तरह हो गया। समन्वय स्थापित करना ही मेरा काम रह गया। 

खैर,मेरे रहते 2010 में एक दिन एकाएक वरिष्ठ फोटोग्राफर राजकुमार सिंह भी दिल का दौरा पड़ने से हम सबसे बिछुड़ गए। फिर 2012 में मैं सेवानिवृत्त हो गया। तीन साल बाद कामड़े रिटायर हुए। बचे केवल हसन और जोशी। पिछले साल हसन रिटायर हुए और ठीक एक साल बाद अब जोशी।


ससम्मान दी विदाई, लगातार तीन प्रधानमंत्रियों 

सहित कई यादगार फोटोग्राफी की जोशी ने


सुधीर जोशी का विदाई समारोह 
3 फरवरी 1984 को बीएसपी की सेवा से संबद्ध हुए वरिष्ठ फोटोग्राफर सुधीर मधुकर जोशी ने अपने 36 साल से अधिक के सेवाकाल में कई यादगार फोटोग्राफी की।
 सेवानिवृत्ति पर जोशी ने कहा कि उन्होंने अपना पूरा कार्यकाल एनज्वाय किया और डूब कर काम किया। जिसकी उन्हें संतुष्टि है।
जोशी ने बताया कि हाल के दौर में लगातार एक के बाद एक प्रधानमंत्री बनने वाली तीन विशिष्ट हस्तियों अटल बिहारी बाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी के भिलाई आगमन पर फोटो खींचने का यादगार अवसर उन्हें मिला। जोशी के रिटायरमेंट पर जनसंपर्क विभाग ने उन्हें ससम्मान विदाई दी। 

इस अवसर पर विभाग प्रमुख महाप्रबंधक जेकब कुरियन, महाप्रबंधक एस के दरिपा,सहायक महाप्रबंधक अपर्णा चन्द्रा, वरिष्ठ प्रबंधक सत्यवान नायक, वरिष्ठ प्रबंधक जवाहर वाजपेयी सहित विभाग के कर्मचारीगण उपस्थित थे। 

जोशी के योगदान का स्मरण करते हुए उपस्थित लोगों ने कहा कि वे जनसम्पर्क के बेहतरीन फोटोग्राफरों में से एक हैं जिनकी पैनी व कलात्मक दृष्टि फोटो को जीवंत कर देती है।

 उल्लेखनीय है कि जोशी ने भिलाई स्टील प्लांट के कई ऐतिहासिक पलों को अपने कैमरे में कैद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

 विभाग में 5 एस के क्रियान्वयन में जोशी ने उत्कृष्ट योगदान दिया है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री श्रम पुरस्कार एवं विश्वकर्मा पुरस्कार हेतु आवेदन करने वाले कार्मिकों के मॉडिफिकेशन को बड़े ही बेहतरीन ढंग से अपने कैमरे में कैद कर इन आवेदनों को गुणवत्तापूर्ण बनाने में महती भूमिका निभाई है। संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन वरिष्ठ प्रबंधक सत्यवान नायक ने किया।