Sunday, September 16, 2012

भिलाई की 'मुस्कान' से लिया है अनुराग ने 'बरफी' का आइडिया

  फिल्म के ज्यादातर फ्रेम में नजर आता है अनुराग का भिलाई


न्यू बसंत टाकिज  में बर्फी देखने उमड़े दर्शक 14 सितम्बर 2012
अनुराग बसु कोई फिल्म बनाएं और उसमें उनका शहर भिलाई नजर न आए ऐसा हो नहीं सकता। शुक्रवार को रिलीज हुई अनुराग की फिल्म 'बरफी' को क्रिटिक और दर्शकों दोनों की तारीफ मिल रही है। बहुत कम लोगों को मालूम है कि अनुराग ने अपनी 'बरफी' का बेसिक आइडिया भिलाई के ही एक मानसिक विकलांग स्कूल से लिया है। इसके अलावा भी फिल्म में कई ऐसे फ्रेम हैं, जहां अनुराग और उनका भिलाई जीवंत हो उठता है।
अनुराग की 'बरफी' एक जिंदादिल मूक-बधिर युवक की कहानी है। फिल्म भले ही दार्जिलिंग और कोलकाता के माहौल में शूट की गई है लेकिन उसका मूल भिलाई से उठाया गया है। सेक्टर-2 में बीएसपी की प्राथमिक शाला क्रमांक 19 में मुस्कान मानसिक विकलांग विद्यालय एवं पुनर्वास केंद्र चल रहा है। इस स्कूल से जुड़े ज्यादातर सदस्य अनुराग बसु व उनके परिवार के करीबी रहे हैं। अपने पिता व भिलाई के प्रख्यात रंगकर्मी सुब्रत बोस के गुजरने के बाद अक्टूबर 07 में भिलाई आए अनुराग ने खास तौर पर इस स्कूल का दौरा किया था। इसके बाद सितंबर 2010 में 'सुरता सुबरत के' आयोजन में भिलाई आए अनुराग ने इस स्कूल के बच्चों के साथ कुछ वक्त बिताया था। इस स्कूल के संचालकों में से एक बीएसपी के अफसर अजयकांत भट्ट ने बताया कि उस वक्त अनुराग ने हल्का सा हिंट दिया था कि वह इन बच्चों की गतिविधियों को अपने जहन में बसा कर ले जा रहे हैं।

आज जब फिल्म रिलीज हुई तो 'मुस्कान' संस्था से परिचित ज्यादातर लोगों को भी हैरत हुई कि अनुराग ने अपनी फिल्म में मंदबुद्धि किरदार निभा रही झिलमिल (प्रियंका चोपड़ा) के स्कूल का नाम भी 'मुस्कान' ही रखा है। इसके अलावा शुरूआती दृश्य में जब बरफी (रणबीर कपूर)  साइकिल में मरफी का रेडियो लटकाए जाते रहता है तो विविध भारती से फरमाइश में अनुराग ने भिलाई और रायपुर से अपने दोस्तों के नाम बुलवाए हैं। बसु परिवार के करीबी और अंचल के रंगकर्मी यश ओबेरॉय बताते हैं कि फिल्म में जहां-जहां बरफी और उसके पिता के भावनात्मक दृश्य आए हैं। उसमें अनुराग और उनके पिता सुब्रत बसु के आपसी रिश्तों को पहचाना जा सकता है। दोनों पिता पुत्र भी इसी तरह एक दूसरे के बेहद करीब थे। एक दृश्य जहां बरफी के पिता को अटैक आता है, वह भी पूरा का पूरा अनुराग ने अपने निजी जीवन से उठाया है। यश ने बताया कि दो दशक पहले मुंबई में एक रात अचानक सुब्रत बसु को अटैक आया था और लगभग कुछ ऐसी ही हालत में घर वालों को उन्हें अस्पताल लेकर जाना पड़ा था। फिल्म में और भी कई फ्रेम हैं, जिनमें  भिलाई या अनुराग के निजी जीवन की झलकियां नजर आती है।

Saturday, September 8, 2012

'गोदान' शुरू हुई थी बलराज साहनी-निरुपा राॅय के साथ लेकिन 

बनी राजकुमार-कामिनी को लेकर, भावुक हो गई थीं शिवरानी


'गोदान 'का मुहूर्त, सबसे ऊपर नजर आ रहे हैं बलराज साहनी और ठीक बीच में बेबी नाज

मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचना 'गोदान' पर बनी फिल्म शुरू हुई थी बलराज साहनी-निरुपा राय और बेबी नाज को लेकर लेकिन हालात कुछ ऐसे बने कि मुहूर्त के बाद इन तीनों कलाकारों की जगह निर्माता-निर्देशक त्रिलोक जेटली को इसमें राजकुमार-कामिनी कौशल और शुभा खोटे को लेना पड़ा। फिल्म पूरी हुई और आज भी इसे एक क्लासिक के तौर पर माना जाता है। 

फूलचंद मिश्रा
फिल्म 'गोदान' से जुड़े ऐसे कई तथ्य दस्तावेज व फोटोग्राफ सहित मौजूद है इस्पात नगरी भिलाई के सेक्टर-9 में निवासरत प्रख्यात फोटोग्राफर व रिटायर बैंक अफसर फूलचंद मिश्रा के पास। 'गोदान' फिल्म के निर्माता-निर्देशक 
त्रिलोक जेटली दरअसल मिश्रा के बहनोई थे। इस लिहाज से इस फिल्म से मिश्रा पारिवारिक कारणों से जुड़े और उन्होंने प्रोडक्शन विभाग का जिम्मा संभाला था।
मिश्रा बताते हैं कि कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान पर बनीं फिल्म देखकर उनकी पत्नी शिवरानी प्रेमचंद बेहद भावुक हो गई थी। बाद में उन्होंने फिल्म के निर्माता-निर्देशक त्रिलोक जेटली को पत्र लिखकर इसे मुंशीजी की भावनाओं की सही अभिव्यक्ति बताया था। 

इस फिल्म की परिकल्पना, निर्माण से लेकर रिलीज तक सारी जवाबदारी निभाने वाले मिश्र ने मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर 'गोदान' से जुड़ी ऐसी बहुत सी यादें बांटीं। रायपुर में बैंक की अफसरी से सेवानिवृत्ति के बाद मिश्र अब शौकिया फोटोग्राफी करते हैं। 

मुंशी प्रेमचंद की कृति पर राजकुमार और कामिनी कौशल को लेकर बनीं फिल्म 'गोदान' अब अपने प्रदर्शन के 50 साल पूरे करने जा रही है। मिश्र ने बताया कि उनके बहनोई त्रिलोक जेटली और बहन कृष्णा जेटली की कोशिशों के चलते 'गोदान' को सेल्युलाइड पर साकार किया जा सका था। 
इसके लिए मुंशी प्रेमचंद के बेटे श्रीपत राय से अधिकार लिए गए थे। सारी तैयारियों के बाद 17 अप्रैल 1959 को मुंबई में मुहूर्त शॉट दिया 'गोदान' के रूसी संस्करण की प्रस्तावना लिखने वाले प्रख्यात रूसी साहित्यकार आईगर कंपंतसेव ने।
 इसके फोटोग्राफ्स दिखाते हुए मिश्र बताते हैं कि तब तक फिल्म के मुख्य पात्र होरी का किरदार बलराज साहनी, उनकी पत्नी की भूमिका निरूपा रॉय को दी गई थी और बेटी की बेबी नाज को। लेकिन बाद में बहुत से फेरबदल हुए।
 बलराज साहनी की जगह राजकुमार, निरूपा रॉय की जगह कामिनी कौशल और बेबी नाज की जगह शुभा खोटे आ गए  इसके बाद भी विभिन्न दिक्कतों की वजह से फिल्म की शूटिंग शुरू नहीं हो पा रही थी। इसी दौरान भारत सरकार ने फिल्म फाइनेंस कार्पोरेशन (अब एनएफडीसी) की स्थापना की थी। तब 'गोदान' ऐसी पहली फिल्म थी जिसे इस संस्था ने फाइनेंस किया।  

रिकार्डिंग के दौरान जेटली, आशा, रविशंकर और पीसी मिश्र
फिल्म ने सफलता के कई कीर्तिमान बनाए। इसे कई अवार्ड मिले और कार्लो वेरी फिल्म फेस्टिवल के साथ-साथ अमेरिका में भी इसकी स्क्रीनिंग हुई।
बाद में जेटली ने फिल्म के मूल प्रिंट साउंड ट्रैक सहित पुणे के राष्ट्रीय फिल्म अभिलेखागार को इस आधार पर सौंप दिए कि यह फिल्म भी मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं की तरह राष्ट्र की धरोहर है।
रफी की नजाकत और रविशंकर की महानता गोदान के गीतों की रिकार्डिंग से जुड़ी यादें शेयर करते हुए मिश्र ने बताया कि मोहम्मद रफी ने पंजाबी पृष्ठभूमि के बावजूद जिस कुशलता से 'पिपरा के पतवा और 'होरी खेलत नंदलाल' गीतों को गाया, उसे सुन कर हम सब वाह-वाह कर रहे थे लेकिन रिकार्डिंग के बाद बाहर निकले रफी साहब ने अदब से सिर्फ शुक्रिया और मालिक का करम कह कर सलाम अर्ज कर दिया।