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Sunday, May 31, 2026


 रावघाट का लौह अयस्क भिलाई जाएगा ट्रेन 

 

से, दो दशक में पटरियां बिछाने का काम पूरा  


रावघाट रेलवे स्टेशन का प्रवेश द्वार मई 2026

अंतत: रावघाट लौह अयस्क खदान से भिलाई स्टील प्लांट के लिए कच्चा माल भेजने एक महत्वपूर्ण पड़ाव पूरा हो गया। दो दशक पहले दल्ली राजहरा से रावघाट होते हुए जगदलपुर तक रेल लाइन बिछाने एक महत्वपूर्ण एमओयू 2007 में हुआ था। तब लक्ष्य 5 वर्ष में रेल लाइन बिछाने का था लेकिन सुरक्षागत व अन्य वजहों से अब करीब दो दशक में रावघाट तक रेल लाइन बिछाने का काम पूरा हुआ है। 

फिलहाल रावघाट से अंतागढ़ तक लौह अयस्क सड़क मार्ग से भेजा जा रहा है और वहां से मालगाड़ी में दल्ली राजहरा होते हुए भिलाई भेजा जा रहा है। उम्मीद जताई जा रही है अक्टूबर 2026 से सीधे रावघाट से लौह अयस्क मालगाड़ी से भेजा जा सकेगा। रेलवे और सेल-बीएसपी मैनेजमेंट की तैयारियां पूरी है। फिलहाल रावघाट रेलखंड पर इंजन की सफल रोलिंग की जा चुकी है। अंतत: दल्ली राजहरा से रावघाट तक रेल लाइन का काम लगभग पूरा हो चुका है। 

95 किमी रेल लाइन बिछाना एक जटिल परियोजना 

फिलहाल अंतागढ़ से मालगाड़ी में भेजा जा रहा लौह अयस्क

देखा जाए तो दल्ली राजहरा से रावघाट तक करीब 95 किलोमीटर लंबी यह रेल परियोजना सामान्य निर्माण कार्य नहीं थी। नक्सल प्रभावित और अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र से गुजरने वाली इस लाइन के निर्माण में सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती रही। रेल लाइन और खनन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए वर्ष 2012 में गृह मंत्रालय के समन्वय से दो-दो बटालियन सुरक्षा बलों की तैनाती की गई, जिनमें रेलवे ट्रैक की सुरक्षा के लिए सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) तथा खनन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की बटालियनें शामिल थीं। 
गृह मंत्रालय के निर्देशानुसार दल्लीराजहरा से रावघाट तक के आंतरिक क्षेत्रों में सेल द्वारा 4 अर्ध-स्थायी तथा 21 स्थायी सुरक्षा शिविरों का निर्माण कराया गया, जिस पर स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा 180 करोड़ रुपये से अधिक की राशि व्यय की गई। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सुरक्षा चुनौतियों और बीच-बीच में हुई घटनाओं के बावजूद परियोजना का कार्य लगातार आगे बढ़ता रहा।

कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) निरीक्षण 

सहित पूर्ण कमीशनिंग जून 2026 में प्रस्तावित  

अक्टूबर 2026 में रावघाट से सीधे मालगाड़ी में भेजा जा सकेगा लौह अयस्क 

रेलवे निर्माण कार्य भारतीय रेलवे द्वारा सेल के वित्तीय सहयोग से किया जा रहा है, जबकि निर्माण एजेंसी रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) है। रेल लाइन निर्माण की अनुमानित लागत लगभग 1854 करोड़ रुपये है, जिसमें से सेल-भिलाई इस्पात संयंत्र अब तक लगभग 1720 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुका है। इसके अतिरिक्त रेलवे लाइन के विद्युतीकरण कार्य के लिए भी संयंत्र द्वारा लगभग 180 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि व्यय की गई है। वर्ष 2010 में प्रारंभ हुए इस कार्य में अप्रैल 2026 तक रावघाट स्टेशन भवन, यात्री सुविधाओं तथा सिग्नलिंग एवं दूरसंचार कार्य को छोड़कर अधिकांश निर्माण पूरा किया जा चुका है। कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) निरीक्षण सहित पूर्ण कमीशनिंग जून 2026 में प्रस्तावित है।
20 मई 2026 को रावघाट रेलखंड पर इंजन की सफल रोलिंग इस परियोजना की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आई है। इसके साथ ही रावघाट माइंस से सीधे रेल रेक संचालन का मार्ग लगभग प्रशस्त हो गया है और आगामी कुछ सप्ताहों में रावघाट से रेक डिस्पैच प्रारंभ होने की संभावना है। यह उपलब्धि केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि वर्षों के सतत प्रयास, समन्वय और कठिन परिस्थितियों में किए गए कार्य का परिणाम मानी जा रही है।

यात्री ट्रेन सेवा शुरू हो चुकी 

केवटी से शुरू हुई यात्री ट्रेन 16 जुलाई 2019 

इस परियोजना का प्रभाव अब केवल औद्योगिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है। वर्ष 2022 में दल्ली राजहरा से ताड़ोकी तक यात्री ट्रेन सेवा शुरू होने के बाद बस्तर अंचल के लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और व्यापार के नए रास्ते खुले हैं। आदिवासी समाज के युवाओं के लिए अब दुर्ग, भिलाई और देश के अन्य बड़े शहरों तक पहुंच पहले की तुलना में अधिक सहज हो गई है। स्थानीय नागरिकों के लिए यह रेल लाइन केवल परिवहन का माध्यम नहीं, बल्कि नई संभावनाओं का द्वार बनती जा रही है।
आज भिलाई इस्पात संयंत्र रावघाट स्टेशन को भी भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित कर रहा है। स्टेशन में यात्रियों के लिए तीन प्लेटफॉर्म तथा लौह अयस्क एवं सामग्री परिवहन हेतु एक पृथक गुड्स प्लेटफॉर्म विकसित किया जा रहा है। वर्तमान में लौह अयस्क का परिवहन सड़क मार्ग से अंतागढ़ रेलवे साइडिंग तक तथा वहां से रेल मार्ग द्वारा संयंत्र तक किया जा रहा है। पहली रैक 9 सितंबर 2022 को लोड की गई थी और वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 6000 टन लौह अयस्क अंतागढ़ साइडिंग तक पहुंचाया जा रहा है।

अंतागढ़ तक यात्री ट्रेन पहुंची 15 अगस्त 2024

अक्टूबर  2026  से रावघाट से सीधे रैक संचालन प्रारंभ होने की संभावना है, जिससे प्रतिदिन लगभग चार रैक यानी 15 हजार टन लौह अयस्क परिवहन संभव हो सकेगा। वर्ष 2025-26 में अंतागढ़ साइडिंग से 1.74 मिलियन टन आयरन ओर प्राप्त हुआ है, जबकि वर्ष 2026-27 में अंतागढ़ और रावघाट साइडिंग के माध्यम से अतिरिक्त 4 से 5 मिलियन टन लौह अयस्क प्राप्त होने का अनुमान है। परियोजना पूर्ण होने के बाद प्रतिवर्ष 6 से 7 मिलियन टन लौह अयस्क की आपूर्ति संभव होगी।
यह परियोजना भिलाई इस्पात संयंत्र की भविष्य की उत्पादन योजनाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में संयंत्र की लौह अयस्क आवश्यकता लगभग 32 हजार टन प्रतिदिन है। वहीं हॉट मेटल उत्पादन को 6.5 एमटीपीए से बढ़ाकर 7.5 एमटीपीए तथा वर्ष 2031 तक 10.5 एमटीपीए विस्तार लक्ष्य तक पहुंचाने की योजना पर कार्य किया जा रहा है।


रावघाट 1983 से एमओयू तक 

रावघाट रेलवे स्टेशन मई 2026

सेल-भिलाई स्टील प्लांट ने रावघाट खदानों के लिए 1983 में अपना पहला आवेदन किया और 13 साल बाद 1996 में पर्यावरण और वन मंत्रालय (एमओईएफ) ने सैद्धांतिक रूप से पर्यावरणीय मंज़ूरी दी थी।
रेलवे, मध्य प्रदेश राज्य सरकार (जिससे बाद में 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य का गठन किया गया), राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) के बीच 02 अप्रैल 1998 को एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।
2004 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने सेल को वानिकी और पर्यावरण मंजूरी के लिए नए सिरे से आवेदन प्रस्तुत करने को कहा। सेल ने आईबीएम, केंद्रीय खान एवं अनुसंधान संस्थान, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान और अन्य द्वारा अध्ययन करने के बाद 2006 में आवेदन प्रस्तुत किया। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मई 2007 में वन मंजूरी के लिए सेल के प्रस्ताव को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भेजे जाने के बाद, मंत्रालय ने इसे जून 2007 के आसपास सर्वोच्च न्यायालय की अधिकार प्राप्त समिति को भेज दिया।
दल्ली राजहरा-रावघाट-जगदलपुर (235 किमी) ब्रॉड गेज रेल लिंक परियोजना के निर्माण को लागत-साझाकरण के आधार पर कार्यान्वित करने के लिए 11 दिसंबर 2007 को रेल मंत्रालय और छत्तीसगढ़ सरकार, सेल, एनएमडीसी के बीच एक संशोधित समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।
सुप्रीम कोर्ट कमेटी ने अक्टूबर 2008 में रावघाट माइंस के एफ ब्लॉक के लिए वन मंजूरी के लिए अपनी अंतिम सहमति दी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अंतिम मंजूरी के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भेजा गया ।
छत्तीसगढ़ सरकार के खनिज संसाधन विभाग ने अंततः अक्टूबर 2009 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से उचित पर्यावरणीय मंजूरी और वानिकी मंजूरी मिलने के बाद सेल को 20 साल की अवधि के लिए रावघाट माइंस के एफ ब्लॉक के लिए खनन पट्टा प्रदान किया। 

नई रेल लाइन के लिए एमओयू 2007

ताड़ोकी रेलवे स्टेशन के समीप रेलवे ब्रिज 2026

'पब्लिक-पब्लिक पार्टनरशिप' (सार्वजनिक-सार्वजनिक भागीदारी) के एक बेहतरीन उदाहरण के रूप में, रेल मंत्रालय, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल), नेशनल मिनरल्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएमडीसी) और छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार ने मिलकर छत्तीसगढ़ में दल्लीराजहरा से जगदलपुर तक (रावघाट होते हुए) 235 किलोमीटर लंबी एक नई ब्रॉड गेज रेल लाइन बनाने के लिए साझा सहमति पत्र पर 11 दिसंबर 2007 को हस्ताक्षर किए।
इस अवसर पर केंद्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद, केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक तथा इस्पात मंत्री राम विलास पासवान, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और रेल राज्य मंत्री आर. वेलू उपस्थित थे। समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों में रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के.सी. जेना, छत्तीसगढ़ सरकार के मुख्य सचिव शिवराज सिंह, सेल के अध्यक्ष एस.के. रूंगटा और एनएमडीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक राणा सोम शामिल थे। इस अवसर पर रेल मंत्रालय, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, सेल और एनएमडीसी के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।

रेल मंत्री लालू बोले-विकास का मार्ग प्रशस्त करेगी नई रेल लाइन  

अक्टूबर 2009 में रावघाट खदान की माइनिंग लीज मिलने के बाद एमडी आर रामाराजू व अन्य 

इस अवसर पर बोलते हुए, रेल मंत्री लालू प्रसाद ने कहा कि यह नई रेल लाइन एक महत्वपूर्ण परियोजना है जो देश में आर्थिक विकास की गति को तेज करने में मदद करेगी। लालू प्रसाद ने कहा कि यह रेल लाइन बैलाडीला और रावघाट के लौह अयस्क से समृद्ध क्षेत्रों से होकर गुजरेगी, जिससे देश में इस्पात उत्पादन में वृद्धि होगी। मंत्री ने बताया कि यह नई लाइन अयस्कों और खनिजों के परिवहन के साथ-साथ वन उत्पादों के थोक परिवहन को भी सुगम बनाएगी। रेल मंत्री ने आगे कहा कि यह नई लाइन आदिवासी और पिछड़े वर्गों के लोगों को रोजगार के अनेक अवसर प्रदान करेगी और छत्तीसगढ़ के बस्तर तथा नारायणपुर जैसे पिछड़े क्षेत्रों के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगी। 1998 में हस्ताक्षरित पिछले एमओयू का ज़िक्र करते हुए, लालू प्रसाद यादव ने कहा कि कुछ कारणों से पिछले दशक के दौरान यह परियोजना शुरू नहीं हो पाई थी। मंत्री ने बताया कि पिछले महीने उनके मंत्रालय द्वारा बुलाई गई एक विशेष बैठक में इस मुद्दे को सुलझा लिया गया, जिसमें सभी संबंधित एजेंसियां शामिल थीं; इसी से आज के संशोधित समझौता ज्ञापन (एमओयू) का मार्ग प्रशस्त हुआ।

रमन ने बताया उत्तर और दक्षिण के बीच  सेतु तो 

पासवान ने कहा पीपीपी का बेहतरीन उदाहरण

मुख्यमंत्री डॉ. रमन को रावघाट खनन की योजना बताते बीएसपी के एमडी  आर. रामाराजू, 
ईडी माइंस मानस कुमार बिंदु, जीएम माइंस पीके सिन्हा व  
प्रदेश के वनमंत्री विक्रम उसेंडी और अन्य अफसर। (2008) 

अपने संबोधन में, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा कि इस नई रेल कनेक्टिविटी को पिछड़े बस्तर क्षेत्र की जीवन रेखा कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह उत्तर और दक्षिण के बीच एक सेतु (पुल) का काम भी करेगी। इस क्षेत्र के सुंदर, अत्यंत सघन और अद्वितीय वनों का ज़िक्र करते हुए, डॉ. रमन सिंह ने कहा कि यह नई रेल लाइन पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होगी। डॉ. सिंह ने कहा कि यह नई लाइन रेलवे की कमाई में भी काफी हद तक इज़ाफ़ा करेगी। 

अपने संबोधन में, केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक तथा इस्पात मंत्री राम विलास पासवान ने कहा कि यह नई रेल लाइन स्थानीय लोगों की लंबे समय से लंबित मांग को पूरा करेगी। उन्होंने यह भी बताया कि आज का एमओयू 'सार्वजनिक-सार्वजनिक भागीदारी' (पीपीपी) का एक बेहतरीन उदाहरण है। उन्होंने कहा कि यह सराहनीय है कि रेल मंत्रालय देश के पिछड़े क्षेत्रों के विकास की अवधारणा को आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि देश का सार्वजनिक क्षेत्र पूरी दक्षता के साथ कार्य कर रहा है, और उन्होंने उनसे आह्वान किया कि वे अपने मुनाफ़े का एक निश्चित प्रतिशत उस मद पर खर्च करें जिसे 'कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व' (सीएसआर) के रूप में जाना जाता है।
अपने स्वागत संबोधन में, रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के.सी. जेना ने कहा कि रेल मंत्री द्वारा की गई विशेष पहलों के कारण भारतीय रेलवे में एक ज़बरदस्त बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान एमओयू इसी पहल का एक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि इस एमओयू  पर हस्ताक्षर होने के साथ ही, देश में लौह अयस्क और इस्पात के सुगम परिवहन के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात होगा, और इससे आदिवासी बहुल बस्तर क्षेत्र का बहुप्रतीक्षित सामाजिक-आर्थिक विकास सुनिश्चित होगा।

दो चरणों में होगा निर्माण, 58 वैगन की होगी मालगाड़ी

रावघाट रेलवे स्टेशन का शानदार नजारा मई 2026


इस परियोजना का निर्माण दो चरणों में किया जाएगा। पहला चरण दल्लीराजहरा से रावघाट तक 95 किलोमीटर लंबा है, जबकि दूसरा चरण रावघाट से जगदलपुर तक 140 किलोमीटर लंबा है। वर्ष 2004-05 के मूल्य स्तरों के आधार पर, इस परियोजना की लागत 968.60 करोड़ रुपये है। पहला चरण पाँच साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है और इसका पूरा खर्च, जो कि 304 करोड़ रुपये है, सेल उठाएगी। दूसरे चरण पर 640 करोड़ रुपये का खर्च आएगा, जिसे भारतीय रेलवे (376 करोड़ रुपये – 57%), सेल (141 करोड़ रुपये – 21%), छत्तीसगढ़ राज्य सरकार (76 करोड़ रुपये – 12%) और एनएमडीसी (70 करोड़ रुपये – 10%) मिलकर साझा करेंगे। पहले चरण के लिए ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। इस नई रेलवे लाइन में 460 मीटर लंबी एक सुरंग, 46 रोड अंडर-ब्रिज, 16 रोड ओवर-ब्रिज, 42 बड़े पुल और 303 छोटे पुल शामिल होंगे। रेलवे ने शुरू में 10 स्टेशन बनाने की योजना बनाई है।
खनिजों और अयस्कों के परिवहन के अलावा, जो इस परियोजना का मुख्य कार्य होगा, इस रेल लाइन के माध्यम से स्थानीय क्षेत्र के वन उत्पादों, खाद्यान्नों आदि के परिवहन का भी प्रस्ताव है। इन वस्तुओं को संभालने के लिए पर्याप्त लोडिंग और अनलोडिंग की सुविधाएँ प्रदान की जाएँगी। लौह अयस्क, डोलोमाइट, बॉक्साइट आदि जैसे खनिज अयस्कों के परिवहन के लिए, रेलवे ने डीज़ल इंजन वाली मालगाड़ियाँ चलाने की योजना बनाई है, जिनमें 58 वैगन होंगे। उद्योग जगत की विशेष माँगों पर अतिरिक्त निजी साइडिंग्स की व्यवस्था करने पर भी विचार किया जा सकता है।

रावघाट रेल लाइन पर हुआ तकनीकी ट्रायल


17 जून 2026 को तकनीकी ट्रायल
दल्लीराजहरा- रावघाट रेल परियोजना ने 17 जून 2026 को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की, जब रावघाट रेलखंड पर नियंत्रित गति और सीमित भार के साथ तकनीकी ट्रायल प्रारंभ किया गया। इस ट्रायल में 58 BOXN रैक का उपयोग किया गया। 

यह ट्रायल आगामी दिनों में विभिन्न चरणों में जारी रहेगा और रेल लाइन की परिचालन क्षमता, संरचनात्मक सुरक्षा तथा तकनीकी मानकों का परीक्षण किया जाएगा। इस प्रगति के साथ रावघाट रेल परियोजना अब अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है।

इस परियोजना में सेल द्वारा अब तक करीब 1800 करोड़ रुपये रेल लाइन निर्माण पर तथा रावघाट परियोजना के समग्र विकास पर लगभग 2000 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है। जून 2026
तक रेल लाइन निर्माण का अधिकांश कार्य पूर्ण हो चुका है। 

इस समय रावघाट स्टेशन भवन, यात्री सुविधाओं तथा सिग्नलिंग एवं दूरसंचार (एस एंड टी) से जुड़े कार्यों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। जुलाई 2026 के अंत तक स्टेशन परिसर के शेष कार्य पूर्ण होने की संभावना जताई गई है। इसके बाद कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) द्वारा निरीक्षण और सुरक्षा स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
रेलवे अधिकारियों के अनुसार तकनीकी ट्रायल का उद्देश्य रेल लाइन की परिचालन तैयारियों का आकलन करना है। विभिन्न गति और भार स्थितियों में परीक्षण किए जाने के बाद आवश्यक अनुमतियां प्राप्त होंगी। सीआरएस की स्वीकृति मिलने के उपरांत इस रेलखंड पर यात्री ट्रेन संचालन का मार्ग भी प्रशस्त हो जाएगा, जिसका लंबे समय से बस्तर क्षेत्र के लोग इंतजार कर रहे हैं।
इस परियोजना का प्रभाव पहले से ही दिखाई देने लगा है। वर्ष 2022 में दल्लीराजहरा से ताड़ोकी तक यात्री ट्रेन सेवा शुरू की गई थी। आगे अब रावघाट तक रेल संपर्क स्थापित होने के बाद यह लाभ और व्यापक होगा तथा बस्तर के दूरस्थ क्षेत्रों की पहुंच राज्य और देश के प्रमुख शहरों तक और अधिक सुगम हो जाएगी।

महाप्रबंधक ने किया  मड़ोदा–ताड़ोकी रेल सेक्शन का मुआयना

ताड़ोकी रेलवे स्टेशन में महाप्रबंधक तरूण प्रकाश-26 जून 2026
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे रायपुर रेल मंडल में 26 जून 2026 को महाप्रबंधक तरुण प्रकाश ने मड़ोदा से ताड़ोकी रेल सेक्शन का संरक्षा एवं रेल विकासात्मक कार्यों का निरीक्षण किया गया। 

निरीक्षण के दौरान महाप्रबंधक ने मरौदा रेलवे स्टेशन पर चल रहे अमृत भारत स्टेशन योजना के  विकासात्मक कार्य, अप्रोच रोड़, आर आर आई, रेलवे स्टेशन परिसर का गहनता से निरीक्षण कर संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। 

उन्होंने बालोद रेलवे स्टेशन, दल्लीराजहरा रेलवे स्टेशन में चल रहे अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत कार्यों को देखा। जिसमें यात्री सुविधाओं में वृद्धि, रेलवे स्टेशनों में सुगम्य प्रवेश आसानी से टिकट लेने, प्रतीक्षालय की व्यवस्था, रेल परिचालन संबंधित, यात्री सुविधा  व संरक्षा संबंधित कार्यों पर आवश्यक दिशा निर्देश दिए। 

वहीं रेल कर्मियों तथा रेलवे ट्रैक पर काम कर रहे ट्रैकमेनो से  पर संवाद किये। इस निरीक्षण में मंडल रेल प्रबंधक दयानंद सहित बिलासपुर मुख्यालय के प्रधान मुख्य विभागाध्यक्ष रायपुर रेल मंडल के अधिकारी उपस्थित रहे।


 

Tuesday, February 24, 2026

 "भिलाई जिंदाबाद" का विमोचन किया फिल्मकार अनुराग बसु ने



 इस्पात नगरी भिलाई के लेखक व पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन की नई किताब "भिलाई जिंदाबाद, कुछ किस्से-कहानियां" का विमोचन फिल्मकार अनुराग बसु ने रविवार 25 जनवरी 2026 को किया किया। राजधानी नवा रायपुर स्थित पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित साहित्य उत्सव के समापन समारोह में अनुराग ने यह विमोचन किया। उन्होंने इस्पात नगरी भिलाई पर आधारित रोचक सामग्री को सराहा और लेखक को अपनी शुभकामनाएं दी।
उल्लेखनीय है कि वैभव प्रकाशन नई दिल्ली-रायपुर से प्रकाशित इस किताब में इस्पात नगरी भिलाई के स्थापना काल सेे अब तक के प्रमुख व रोचक घटनाक्रम को लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने कलमबद्ध किया है। इसके पूर्व  लेखक की "भिलाई एक मिसाल" और "वोल्गा से शिवनाथ तक" किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो इस्पात नगरी भिलाई के इतिहास पर केंद्रित है।

"भिलाई जिंदाबाद.." में क्या खास है..? 


इस्पात नगरी भिलाई के निर्माण काल से अब तक कुछ रोचक और हैरतअंगेज घटनाक्रमों को लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने अपनी इस किताब में दर्ज किया है। विगत तीन दशकों के लगातार शोध के बाद लेखक ने अपनी इस किताब में भिलाई से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रम को दर्ज किया है। यह सब किस्से और कहानियों की शैली है। 

इनमें फिल्मी दुनिया, राजनीति से लेकर विभिन्न क्षेत्रों के अतिविशिष्ट लोगों के इस्पात नगरी आगमन से लेकर ऐसे बहुत से तनाव भरे दिन और हादसों का भी विस्तार से उल्लेख है जिन्होंने भिलाई को कई बार झकझोर दिया। इसके साथ ही विदेश में भिलाई का परचम फहराने वाली कुछ हस्तियों का भी जिक्र है।


इस्पात नगरी का रोचक इतिहास प्रमाणित तथ्यों 

के साथ रखती है किताब भिलाई जिंदाबाद: उमाकांत

हमारी अगली पीढ़ी जानना चाहेगी तो बेहतर माध्यम 

साबित होगी किताब भिलाई जिंदाबाद : मेश्राम

सेक्टर-4 में हुआ समीक्षा गोष्ठी का आयोजन, बदलते 

भिलाई की चुनौतियों पर भी हुई चर्चा

गोष्ठी में उपस्थित विशिष्ट समुदाय

मूलनिवासी कला साहित्य और फिल्म फेस्टिवल भिलाई, डॉ अंबेडकर एग्जीक्यूटिव फ्रेटरनिटी भिलाई. डॉ अंबेडकर वेलफेयर सोसायटी छत्तीसगढ़ और एनस्टेप के संयुक्त तत्वावधान में समीक्षा गोष्ठी का आयोजन रविवार 8 फरवरी 2026 की शाम सेल एससी एसटी ओबीसी फेडरेशन भवन, सड़क नंबर 8, सेक्टर 4 में किया गया। जिसमें लेखक एवं पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन की  हालिया प्रकाशित किताब "भिलाई जिंदाबाद, कुछ किस्से-कुछ कहानियां" पर प्रमुख वक्ताओं ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने भिलाई को जानने समझने के लिए इसे एक जरूरी किताब बताया।
अतिथियों के स्वागत के उपरांत आधार वक्तव्य रखते हुए प्रसिद्ध कहानीकार मिर्जा हफीज बेग ने कहा कि कई मायनों में उन्हें यह किताब अपनी आपबीती भी लगती है क्योंकि भिलाई में जन्म लेने और भिलाई स्टील प्लांट का सेवानिवृत्त कर्मी होने के नाते इनमें से बहुत से घटनाक्रम से वह खुद भी रूबरू हुए है। उन्होंने कहा कि यह किताब लेखक की पिछली कृति "वोल्गा से शिवनाथ तक" के आगे का सिलसिला है और उसमें रह गई कमियों को पूरा करती है।

आधार वक्तव्य रखते हुए कहानीकार मिर्जा हफीज बेग 

वरिष्ठ रंगकर्मी राकेश बम्बार्डे ने कहा कि जिन्हें अपने शहर भिलाई से प्यार है और जो भिलाई को जानना-समझना चाहता है,वह सभी इस किताब को जरूर पढ़ेंगे। शायर मुमताज ने भिलाई की संस्कृति को किताब के माध्यम से सामने लाने के लिए लेखक की सराहना की और चंद अशआर सुनाए। ऑल पीएसयू एससी-एसटी एम्पलाइज फेडरेशन के चेयरमैन सुनील हरिशचंद्र रामटेके ने कहा कि लेखक ने पिछली किताब "वोल्गा से शिवनाथ तक" में भिलाई के योगदान पर भारतीय और रूसी लोगों के योगदान पर बेहद रोचक ढंग से तथ्यों को रखा था। वही शैली इस किताब में बरकरार है और जिस तरह लेखक ने भिलाई के शुरूआती दौर से अब तक की  तमाम हस्तियों से मिलकर उनका साक्षात्कार लेकर सबके सामने प्रस्तुत किया है, यह सबके बस की बात नहीं। 

उन्होंने दोहराया कि आज जिस तरह भिलाई के सामने नए दौर की चुनौतियां है, उनका सामना करने हमको अपने इतिहास के बारे जानना बेहद जरूरी है। भिलाई स्टील प्लांट के ऊर्जा प्रबंधन विभाग में जनरल मैनेजर कमल टंडन ने कहा कि भिलाई सही मायनों में लघु भारत है और इसका रोचक इतिहास जानने यह किताब सहायक होगी। कवि लक्ष्मीनारायण कुम्भकार ने कहा कि इतिहास को रोचक ढंग से प्रस्तुत करना भी एक चुनौती है और इसे लेखक ने बखूबी पूरा किया है। आकाशवाणी रायपुर के कार्यक्रम प्रमुख पंकज मेश्राम ने कहा कि एक पत्रकार का न केवल स्वतंत्र होना जरूरी है बल्कि उसका निर्भिक  होना और निष्पक्ष होना उतना ही जरूरी है। वो सारे गुण लेखक में मौजूद है। भिलाई पर अगर प्रमाणिक जानकारी चाहिए तो आपको लेखक की इस किताब से जरूर रूबरू होना चाहिए।

संचालनकर्ता रिटायर अपर कलेक्टर विश्वास मेश्राम ने भी रखी अपनी बात 

संचालन कर रहे सेवानिवृत्त अपर कलेक्टर विश्वास मेश्राम ने कहा कि जिस भिलाई को हमने देखा और जीया है, आज वह बदल रहा है।  आज के भिलाई की जो तस्वीर हम देखते हैं, उसे देखकर बहुत खुशी नहीं होती बल्कि एक दर्द सा उठता है। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में जब  हमारी अगली पीढ़ी हमारे भिलाई को ढूंढना चाहेगी तो इस किताब में ही पाएगी।
बीएसपी पावर इंजीनियरिंग एंड मेंटेनेंस विभाग में जनरल मैनेजर पीएस खोब्रागड़े ने कहा कि आज सोशल मीडिया और एआई का दौर है और इंटरनेट पर हम तलाशेंगे तो   इतनी प्रमाणित जानकारी नहीं मिल सकती जितनी लेखक ने अपनी किताब "भिलाई जिंदाबाद" में तथ्यों को जुटा कर दी है। 

भिलाई स्टील प्लांट टेलीकम्युनिकेशन विभाग के पूर्व प्रमुख और रिटायर जनरल मैनेजर एल. उमाकांत ने कहा कि लेखक ने जिन घटनाक्रमों को इस किताब में उल्लेखित किया है, उनमें से ज्यादातर के वे गवाह रहे हैं। उन्होंने बताया कि 6 जनवरी 1986 को जिस वक्त हादसा हुआ तो तब भिलाई होटल में दूरसंचार विभाग का एक कार्यक्रम चल रहा था और एमडी के आर संगमेश्वरन भी हमारे साथ उस कार्यक्रम में ही थे। हम सबने उस धमाके की आवाज सुनी थी। उन्होंने कहा कि भिलाई को जानने-समझने इस किताब से बेहतर माध्यम और कोई नहीं है। 

संगोष्ठी में अपनी बात रखते हुए लेखक-पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन 

अंत में लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने इस किताब की सृजन यात्रा के बारे में विस्तार से जानकारी दी और कहा कि पाठकों का प्रोत्साहन ही उन्हे आगे भी भिलाई के रोचक इतिहास से रूबरू कराने की प्रेरणा देगा। 

इस अवसर पर  भिलाई नगर मस्जिद ट्रस्ट के सदर मिर्जा आसिम बेग,रंगकर्मी एल. रुद्र मूर्ति, मोहन कुमार नामदेव, मुक्तानंद साहू, बिनितोष बाला, गंगा भाऊ जांभुलकर, विजया जांभुलकर, संगीता मेश्राम, उषा मेश्राम, फैजान खान, शारिक खान, चित्रसेन कोसरे, जयश्री मोहन नागदेवे, राजेंद्र सुनगरिया और गजेंद्र सायतोड़े सहित अनेक लोग मौजूद थे। अंत में धन्यवाद ज्ञापन बीएसपी कर्मचारी और रंगकर्मी वासुदेव ने दिया।

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भिलाई की अस्मिता और गौरव का शंखनाद है 'भिलाई ज़िंदाबाद'

समीक्षा- डॉ. सुधीर शर्मा 



भारत के औद्योगिक इतिहास में कुछ शहर केवल नक्शे पर दर्ज नाम नहीं होते, वे अपने भीतर एक युग की स्मृतियाँ, संघर्ष और सपने सँजोए रहते हैं। छत्तीसगढ़ की धरती पर बसा भिलाई ऐसा ही शहर है, जिसकी पहचान केवल एक औद्योगिक नगर के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण की जीवंत प्रयोगशाला के रूप में रही है। यहाँ की मिट्टी में श्रम की गंध है, यहाँ की सड़कों पर इतिहास के पदचिह्न हैं और यहाँ की हवा में उस दौर की प्रतिध्वनि सुनाई देती है जब राष्ट्र निर्माण एक सामूहिक संकल्प हुआ करता था।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने जिस समाजवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाया, उसमें भारी उद्योगों को राष्ट्र की रीढ़ माना गया। इसी सोच के केंद्र में रहा भिलाई इस्पात संयंत्र, जिसकी स्थापना केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की आकांक्षा का प्रतीक थी। 

1950 के दशक में जब देश योजनाबद्ध विकास की राह पर अग्रसर हुआ, तब भिलाई का नाम राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उभरने लगा। यह वह समय था जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भारी उद्योगों को आधुनिक भारत के ‘नए मंदिर’ कहा करते थे। भिलाई उन्हीं मंदिरों में से एक बना, जहाँ मशीनों की गड़गड़ाहट के साथ भविष्य की रूपरेखा गढ़ी जा रही थी।
भिलाई की स्थापना की कहानी केवल सरकारी फाइलों या योजनाओं में सीमित नहीं है। यह उन गाँवों की कहानी भी है जिनकी जमीन अधिग्रहित हुई, उन परिवारों की कहानी है जिन्होंने अपनी पुरानी दुनिया छोड़कर नई बस्तियों में जीवन बसाया। कोटराभाठा, सोंठभाठा, बोरिया, हिंगना और मरौदा जैसे गाँवों की स्मृतियाँ आज भी बुज़ुर्गों की बातचीत में जीवित हैं। खेतों की हरियाली के स्थान पर जब सेक्टरों की व्यवस्थित रेखाएँ खिंचीं, तब एक ग्रामीण भूगोल शहरी परिदृश्य में बदल गया। 

यह परिवर्तन सहज नहीं था, परंतु समय की धारा में वह अपरिहार्य बन गया। भिलाई का एक विशेष पक्ष उसकी बहुसांस्कृतिक संरचना है। देश के कोने-कोने से आए इंजीनियर, तकनीशियन और श्रमिक यहाँ एक साथ बसे। बंगाल, पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और दक्षिण भारत से आए लोगों ने अपनी-अपनी भाषाएँ, खान-पान और त्योहार साथ लाए। 

इस विविधता ने भिलाई को केवल औद्योगिक नगर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संगम बना दिया। दुर्गा पूजा से लेकर गणेशोत्सव और छत्तीसगढ़ी लोकपर्वों तक, यहाँ उत्सवों की एक साझा परंपरा विकसित हुई। इस मेलजोल ने एक ऐसी नागरिक संस्कृति को जन्म दिया, जिसमें स्थानीय और राष्ट्रीय दोनों रंग समाहित हैं।
समय के साथ भिलाई ने केवल विकास ही नहीं, संकट भी देखे। औद्योगिक दुर्घटनाएँ, श्रमिक आंदोलन, बिजली और कोयले के संकट, आर्थिक उदारीकरण के बाद की चुनौतियाँ—इन सबने इस नगर को झकझोरा। 1990 के दशक में जब देश ने उदारीकरण की नीति अपनाई, तब सार्वजनिक उपक्रमों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगने लगे। निजीकरण और आउटसोर्सिंग की प्रक्रियाओं ने पुराने ढाँचे को चुनौती दी। भिलाई भी इससे अछूता नहीं रहा। उत्पादन के नए मानदंड, तकनीकी आधुनिकीकरण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ने इस इस्पात नगरी को आत्ममंथन के लिए विवश किया।
फिर भी, यह उल्लेखनीय है कि भिलाई ने हर संकट के बाद स्वयं को पुनर्गठित किया। यहाँ की श्रमिक चेतना और प्रबंधन की सामूहिक समझ ने कई बार संभावित ठहराव को नई गति में बदला। इस्पात की तरह ही इस शहर की आत्मा भी तपकर मजबूत हुई। भिलाई की पहचान केवल उत्पादन के आँकड़ों से नहीं, बल्कि उस मानवीय रिश्ते से है जो यहाँ के लोगों को जोड़ता है। सेक्टरों की योजनाबद्ध बस्तियाँ, स्कूल, अस्पताल, पार्क और सांस्कृतिक भवन—ये सब उस कल्याणकारी सोच के प्रतीक हैं, जिसने इस नगर को आकार दिया।
आज जब डिजिटल युग में सूचना और संचार के साधन बदल रहे हैं, तब भी भिलाई का इतिहास हमें यह सिखाता है कि विकास केवल तकनीकी उन्नति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों की निरंतरता भी है। यहाँ की पीढ़ियाँ बदल रही हैं; पुराने श्रमिकों की जगह नई तकनीकी दक्षता वाले युवा ले रहे हैं। फिर भी, शहर की स्मृतियों में वह दौर जीवित है जब इस्पात संयंत्र के सायरन के साथ दिन की शुरुआत होती थी और शाम को श्रमिक कॉलोनियों में जीवन की चहल-पहल गूँजती थी।
भिलाई की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि औद्योगिक नगर केवल आर्थिक इकाइयाँ नहीं होते, वे सामाजिक और सांस्कृतिक प्रयोगशालाएँ भी होते हैं। यहाँ श्रम और सपनों का संगम हुआ, यहाँ संघर्ष और सहयोग का संतुलन बना। यह शहर आज भी अपने अतीत के गौरव और वर्तमान की चुनौतियों के बीच संतुलन साधते हुए आगे बढ़ रहा है।
समय के बदलते परिदृश्य में जब सार्वजनिक उपक्रमों की भूमिका पर बहस जारी है, तब भिलाई एक जीवंत उदाहरण की तरह सामने खड़ा है। यह शहर हमें बताता है कि यदि दूरदृष्टि, सामाजिक प्रतिबद्धता और तकनीकी नवाचार साथ हों, तो कोई भी औद्योगिक परियोजना केवल कारखाना नहीं रहती, वह समाज का धड़कता हुआ हृदय बन जाती है।
भिलाई की गाथा दरअसल उस भारत की गाथा है जिसने कठिनाइयों के बीच अपने लिए रास्ता बनाया। यह उस विश्वास की कहानी है कि विकास केवल मशीनों से नहीं, मनुष्यों से होता है। इस फौलादी नगर की आत्मा में आज भी वही उम्मीद धड़कती है—कि समय चाहे जैसा भी हो, श्रम, साहस और सामूहिकता की शक्ति से भविष्य गढ़ा जा सकता है।
प्रस्तुत पुस्तक ''भिलाई ज़िंदाबाद, कुछ किस्से-कुछ कहानियां'' के लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने भिलाई को जीया है, बचपन से लेकर अपनी जवानी की सांसें भिलाई को दी हैं। वे एक रचनात्मक और सकारात्मक पत्रकारिता तथा लेखन के सच्चे श्रमिक हैं। 

अपने अनुभव और भिलाई को ढालने वाले अनेक विभूतियों से सुनकर तथा समझकर उन्होंने यह पुस्तक लिखी है। बीते बीस-तीस बरस के देखे-सुने किस्सों का यह संग्रह है। 'भिलाई ज़िंदाबाद' सही मायनों में भिलाई की अस्मिता और गौरव का शंखनाद है। लेखक को इसके लिए साधुवाद है। ये किस्से आनेवाली पीढ़ी के लिए इतिहास से लेकर वर्तमान की गाथा है। भविष्य के सपनों को पूरा करने का मंत्र है। बधाई जाकिर और धन्यवाद उन किस्सागोई व्यक्तित्वों का जो इसके गवाह हैं।

 (डॉ सुधीर शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई छत्तीसगढ़) 

Thursday, January 9, 2025

तब कोचिंग-ट्यूशन थे नहीं, स्कूल में टीचर ने तैयारी करवाई और 

भिलाई से 5 स्टूडेंट ने इतिहास रच दिया आईआईटी में सफलता का

 

साल 1974 में भिलाई के शिक्षा जगत हासिल की थी पहली बड़ी उपलब्धि 


मुहम्मद जाकिर हुसैन

गौतम, कामेश राव, वसंत और सहगल के साथ लेखक

यह इस्पात नगरी भिलाई की शिक्षा के क्षेत्र में पहली बड़ी सफलता थी। पांच दशक पहले इस्पात नगरी भिलाई में आज की तरह कोई कोचिंग-ट्यूशन नहीं थे। स्कूल में टीचर ने जो पढ़ाया और होमवर्क दिया, बस उतना ही काफी था। 

तब साल 1974 में अचानक से ‘तूफान’ आया और बीएसपी सीनियर सेकंडरी स्कूल सेक्टर-10 से एक साथ कुल 5 स्टूडेंट भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) की प्रवेश परीक्षा में सफल हो गए। इतनी बड़ी सफलता के बावजूद तब कोई शोर-शराबा नहीं हुआ था। 

इनमें से बी के कामेश राव, गौतम सदाशिव, डॉ. वसंत जोशी और डॉ. अनिल सहगल ने अलग-अलग आईआईटी में दाखिला लिया और एक स्टूडेंट अनिल पटेल निजी कारणों से परिवार के साथ गुजरात चले गए थे। कालांतर में ये चारों स्टूडेंट देश-विदेश के प्रमुख संस्थानों में शीर्ष पद पर पहुंचे। आज जब 50 साल बाद यही चारों स्टूडेंट भिलाई लौटे तो इनकी आंखों में चमक थी अपने बचपन को फिर से जी लेने की।

इस बीच जब बात इनके स्कूली जीवन की सबसे बड़ी सफलता की निकली तो चारों ने बिल्कुल सहज होकर कहा-तब कहीं कोई जश्न जैसी बात ही नहीं थी। 

हां,हमारे प्रिंसिपल ए. एस रिजवी सर और सारे टीचर्स ने पीठ जरूर थपथपाई लेकिन इसके बाद सभी अपने-अपने एडमिशन की तैयारी में जुट गए। आज 50 साल बाद अपनी यादों को बांटते हुए इन सभी को उम्मीद है कि भिलाई का आईआईटी अपनी अलग पहचान बनाएगा। 

सत्र 1973-74 में हेड ब्वाॅय रहे आर. अशोक कुमार और हेड गर्ल रहीं पूनम सारस्वत शर्मा का भी मानना है कि सभी बच्चों का करियर संवारने में सबसे ज्यादा योगदान तब के प्रिंसिपल ए. एस. रिजवी सर का था। उन्हें भिलाई स्टील प्लांट के तब के जनरल मैनेजर पृथ्वीराज आहूजा खास तौर पर रायपुर के राजकुमार कॉलेज से वाइस प्रिंसिपल का दायित्व छोड़कर सेक्टर-10 स्कूल आने प्रस्ताव दिया था।    


मैथ्स टीचर ने तीन महीने स्कूल में करवाई तैयारी, तब मिली सफलता

 मैथ्स टीचर श्रीमती पोट्‌टी के साथ बेंगलुरू में गौतम (दिसंबर-24)
1974 बैच के स्टूडेंट अपनी मैथ्स की टीचर श्रीमती शांता शंकरन पोट्टी को हमेशा याद करते हैं। श्रीमती पोट्टी वर्तमान में बेंगलुरु में रहती है और अपने इन सभी स्टूडेंट्स के संपर्क में हैं। 

डॉ.जोशी, डॉ.सहगल, कामेश और गौतम बताते हैं, तब केमिस्ट्री एमएन बोरले और फिजिक्स एसके साहू पढ़ाते थे। लेकिन इन सबसे हट कर मैथ्स की टीचर श्रीमती शांता ने दिसंबर तक स्कूल का कोर्स पूरा करवा दिया और बाकी बचे तीन महीने में हम सबको विशेष तैयारी करवाई। जिसमें पिछले 10 साल के अनसाल्वड क्वेश्चन पेपर हल करवाए और जेईई पाठ्यक्रम के अनुरूप तैयारी करवाई। 

तब बाहर कोई ट्यूशन-कोचिंग नहीं था और हमारे कोई भी टीचर अलग से ट्यूशन नहीं लेते थे। हमारी सारी तैयारी स्कूल में ही हुई। गौतम सदाशिव बताते हैं, हाल ही में उन्होंने अपनी मैथ्स टीचर से उनके बेंगलुरु स्थित घर जाकर मुलाकात की थी। आज भी हम सब मानते हैं कि मैडम पोट्टी के मार्गदर्शन के बिना हम लोग तब आईआईटी में सफलता हासिल नहीं कर पाते थे।  

तब पोस्टमैन टेलीग्राम लेकर पहुंचा था, जिसमें सिर्फ रैंक का उल्लेख था

15 जुलाई 2013 को आखिरी बार हुआ था टेलीग्राम का इस्तेमाल

पांच दशक पहले आईआईटी के परीक्षा परिणाम को लेकर कोई शोर-शराबा नहीं था। बीके कामेश राव बताते हैं रिजल्ट कोई अखबार में नहीं आया था बल्कि पोस्टमैन घर पर टेलीग्राम लेकर पहुंचा था। 

जब मद्रास आईआईटी गए तो वहां रिक्त सीटों की स्थिति बताते हुए ब्रांच के बारे में पूछा। तब तक देश में  5 आईआईटी थे और यहां बीटेक में कुल 1500 स्टूडेंट लेते थे।

 इनमें हर आईआईटी में 300 सीटें होती थी। डॉ.वसंत जोशी बताते हैं- तब आईआईटी प्रवेश परीक्षा सभी 5 आईआईटी की फैकल्टी के एक समूह द्वारा आयोजित की गई थी। इसे संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) कहा जाता था। उस साल मार्च में हमारे 11 वीं बोर्ड के इम्तिहान हुए थे और इसके दो माह बाद 3-4 मई 1974 को जेईई हुई थी। वसंत जोशी बताते हैं कि तब रायपुर और नागपुर भी परीक्षा केंद्र थे लेकिन उन्होंने कानपुर सेंटर चुना था। उनका रिजल्ट भी डाक से घर पहुंचा था।

प्रिंसिपल रिजवी सर ने किया प्रोत्साहित, प्रेरणा बने 1973 बैच के रामचंद्रन

प्रिंसिपल ए.एस. रिजवी और 1973 बैच के रामचंद्रन

चारों स्टूडेंट बताते हैं उनसे ठीक पहले साल 1973 में समूचे भिलाई से उनके सेक्टर-10 स्कूल से एकमात्र स्टूडेंट रामचंद्रन वसंत कुमार का चयन आईआईटी के लिए हुआ।  

तब वसंत कुमार की सबसे ज्यादा चर्चा होती थी। हमारे प्रिंसिपल ए. एस रिजवी सर भी हम सबको प्रोत्साहित करते थे। इसलिए हमारे अंदर भी एक जज्बा था कि कुछ करना जरूर है। 

 हमारे सामने रामचंद्रन ही रोल मॉडल थे। उनकी सफलता से सभी प्रभावित थे और यह तय कर लिया था कि हमें भी आईआईटी जाना है। तब भिलाई के स्टूडेंट मेडिकल और इंजीनियरिंग में ज्यादा जाते थे, इसलिए हम लोगों ने मैथ्स सेक्शन के होने की वजह से तय कर लिया था कि आईआईटी में जाएंगे अगर नहीं हुआ तो आरईसी में एडमिशन ले लेंगे। रामचंद्रन वसंत कुमार वर्तमान में ब्रिटेन में वैज्ञानिक हैं।

तब देश में सिर्फ 5 आईआईटी थे,  आज देश भर में भिलाई सहित 23 संचालित हो रहे

आईआईटी भिलाई

साल 1974 में जब पहली बार भिलाई से एक साथ 5 स्टूडेंट ने सफलता दर्ज की थी, तब देश में सिर्फ 5 आईआईटी थे। इनमें आईआईटी बॉम्बे (1958), आईआईटी मद्रास (1959), आईआईटी कानपुर (1959), और आईआईटी दिल्ली (1961) थे।

 तब इन आईआईटी में प्रत्येक में 300-300 सीट्स थी। फिर दशकों बाद देश में छठवां आईआईटी गुवाहाटी (1994) में शुरू हुआ। अब देश में भिलाई सहित कुल 23 आईआईटी संचालित हैं। भिलाई का आईआईटी यहां कुटेलाभाठा की जमीन पर बनाया गया है।
 

हमें कोचिंग-ट्यूशन की जरूरत ही नहीं पड़ी: सहगल

अमेरिका में अनिल सहगल एशियन-अमेरिकन कमिश्नर के तौर पर

डॉ.अनिल सहगल बताते हैं- तब हमारी मैथ्स टीचर ने अपना स्कूली पाठ्यक्रम दिसंबर अंत तक पूरा कर लिया था और इसके बाद बचे तीन महीनों में उन्होंने सिर्फ आईआईटी की तैयारी करवाई। हममें से किसी को भी स्कूल के बाहर कोचिंग की जरूरत नहीं पड़ी। 

तब सेक्टर-10 का अंग्रेजी मीडियम स्कूल शुरू ही हुआ था और  हम यहां तीसरे बैच थे। हमारे प्रिंसिपल रिजवी सर का हर बच्चे पर गंभीरता के साथ खास ध्यान होता था।

तब आईआईटी को लेकर आज जैसा माहौल भी नहीं था कि अगर पास नहीं हुए तो क्या होगा। हम लोगों के दिमाग में यही था कि आईआईटी नहीं तो रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज (आरईसी) चले जाएंगे। हमारी मैथ्स टीचर श्रीमती पोट्टी का साफ कहना था कि जो पूछना है क्लास में या फिर क्लास के बाद स्कूल में ही पूछो। वह ट्यूशन कोचिंग कभी नहीं लेती थी। 

मैंने आईआईटी बॉम्बे से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली। पिता श्याम लाल सहगल तब भिलाई स्टील प्लांट के स्टील मेल्टिंग शॉप में सुपरिंटेंडेंट थे। हमारा परिवार सेक्टर-9 में रहता था। अमेरिका में मैं 1983 से प्राध्यापक के पेशे में हूं। तब से लगातार यह 41 वां साल है। वहां मैसाचुसेट्स बोस्टन की टफ्ट्स यूनिवर्सिटी मेडफोर्ड में मैकेनिकल इंजीनियरिंग पढ़ा रहा हूं।

जो भी प्रेशर था हमारा खुद का बनाया हुआ था कि हमें जेईई क्रैक करना है: कामेश

बीके कामेश राव
बीके कामेश राव बताते हैं- मैं उन दिनों की बात करूं तो आईआईटी की पढ़ाई अपनी जगह है लेकिन मुझे यह भी मालूम था कि वहां यहां खाना अच्छा मिलता है और खेलकूद की ढेर सारी सुविधा है। तो मेरे लिए यह एक आकर्षण था ही। जहां तक तैयारी की बात है तो मेरे एक कजिन पहले आईआईटी में चयनित हुए थे। लिहाजा उन्होंने 10 साल के अनसाल्वड क्वेश्चन पेपर भेज दिए थे। उसे हम सबने हल किए थे। तब हमारे दिमाग में समाज या घरवालों का प्रेशर कुछ नहीं था। 

पैरेंट्स हमारे जागरुक जरूर थे लेकिन कभी किसी ने हमें दबाव में नहीं पढ़ाया कि हम उनके मुताबिक पढ़े। हां, जो भी प्रेशर था वह सब हमारा खुद का बनाया हुआ था। हम सब अंदरूनी तौर पर दबाव में थे कि हमें हर हाल में जेईई क्रैक करना करना होगा। इसलिए हम लोगों ने काफी मेहनत की। 

तब भिलाई में तो कोचिंग-ट्यूशन का नामो-निशान नहीं था। उन दिनों तो पूरे इंडिया में ही हम लोग 2-3 कोचिंग का नाम सुनते थे। एक ब्रिलियंट कोचिंग दक्षिण भारत में थी जो डिस्टेंस में देश भर में कोचिंग करवाते थे। बाद में एक अग्रवाल कोचिंग का भी हम लोगों ने नाम सुना लेकिन इसकी जरूरत नहीं पड़ी। 


होटल-एयरपोर्ट निर्माण में कामेश का विशिष्ट योगदान, तब चरोदा से सेक्टर-10 आते थे स्कूल

एक व्याख्यान के दौरान जीएमआर इंफ्रास्ट्रक्चर के डायरेक्टर बीके कामेश राव (ठीक बीच में )

कामेश बताते हैं-आईआईटी मद्रास से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद मैंने देश-विदेश में कई प्रतिष्ठित फर्म्स में सेवाएं दी। 1995 में दिल्ली लौट आया।

 तब तत्कालीन नरसिंह राव सरकार ने आर्थिक उदारीकरण की नीति लागू की थी तो हम लोगों ने एक सिविल इंजीनियरिंग की फर्म बनाई। इसके बाद अमर विलास और उदय विलास सहित ओबेरॉय ग्रुप के ढेर सारे होटल डिजाइन से लेकर कंस्ट्रक्शन तक बनाए। इसके बाद मैंने 2004 में जीएमआर कंपनी में ज्वाइन की। 

हमनें हैदराबाद एयरपोर्ट , कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए टर्मिनल-3 जैसे कई चुनौतीपूर्ण निर्माण किए। अभी हम दिल्ली, हैदराबाद, गोवा का एयरपोर्ट भी संचालित कर रहे हैं।  मेरे पिता बीबी शंकरम चरोदा में रेलवे में कार्यरत थे और तब हम चरोदा में रहा करते थे। वहां से मैं रोज लोकल ट्रेन से भिलाई नगर रेलवे स्टेशन उतरता था और वहां से साइकिल लेकर सेक्टर-10 स्कूल जाता था। 


सलेक्शन हो गया तो खुशी हुई लेकिन दबाव कुछ नहीं था:गौतम

गौतम सदाशिव

गौतम सदाशिव बताते हैं- आईआईटी एग्जाम पास करने हम लोगों पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था इसलिए हम लोगों ने सहज होकर तैयारी की। जब सलेक्शन हो गया तो हम सबके लिए अच्छी बात थी। 

एक तरह से  हम सबके लिए सरप्राइज ही था। हम लोग तो तय कर चुके थे कि अगर आईआईटी में नहीं हुआ तो आरईसी में सिलेक्शन हो ही जाएगा। 

हां, तब भिलाई से एक साथ 5 स्टूडेंट का सलेक्शन होना एक बड़ी बात तो थी ही। इसके लिए हम सारा क्रेडिट स्कूल की पढ़ाई और टीचर्स को देते हैं। मैनें आईआईटी बॉम्बे से सिविल इंजीनियरिंग में डिग्री लेने के बाद देश-विदेश की कई प्रमुख फर्म्स में सेवाएं दी। 

एलएंडटी में प्रोजेक्ट मैनेजर, एचसीसी में जनरल मैनेजर, ओरिएंटल स्ट्रक्चरल इंजीनियर्स में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर, जीएमआर वाइस प्रेसिडेंट और आईएलएफएस में प्रेसिडेंट रहा। अब पूरा समय परिवार को दे रहा हूं। अपने करियर में मैंने सड़क निर्माण के क्षेत्र में कई उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की। मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे सहित देश के कई प्रमुख निर्माण में अपना योगदान दिया। मेरे पिता जी. सदाशिव तब भिलाई स्टील प्लांट के डिप्टी चीफ इंजीनियर थे और हमारा परिवार सेक्टर-10 में रहता था। 


हिंदी मीडियम से आया था लेकिन खूब मेहनत की: डॉ. वसंत जोशी

एनएसडब्ल्यूसी में वैज्ञनिक डॉ. वसंत जोशी (दाएं)

डॉ. वसंत जोशी बताते हैं- मैनें प्राइमरी स्कूल सेक्टर-2 हिंदी मीडियम में पढ़ाई की थी। बाद में अंग्रेजी मीडियम सेक्टर-10 आ गया। लेकिन मीडियम बदलने का पढ़ाई में कोई असर नहीं हुआ। 

जहां तक आईआईटी की तैयारी की बात है तो मैडम श्रीमती शांता शंकरन पोट्टी ने अपने रोजाना की क्लास से हट कर हमें न्यू मैथ्स अच्छी तरह पढ़ाया, जो केंद्रीय शिक्षा बोर्ड के तहत हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं था। 

इससे हमारी तैयारी बेहतर ढंग से हो पाई। तब मैंने कानपुर आईआईटी में दाखिला लिया था। वर्तमान में अमेरिकी नौसेना संगठन नौसेना सतह युद्ध केंद्र ( एनएसडब्ल्यूसी) के अनुसंधान विभाग में वरिष्ठ वैज्ञानिक और तकनीकी प्रमुख के तौर पर सेवा दे रहा हूं। मेरे पिता शिवराम दत्तात्रेय जोशी तब भिलाई स्टील प्लांट के कंट्रोलर स्टोर्स एंड परचेज थे। उन दिनों हम सेक्टर-2 में रहते थे।  

मैथ्स सेक्शन में थे सिर्फ 14 स्टूडेंट, बायो के 8 स्टूडेंट बनें डॉक्टर

बीएसपी सीनियर सेकंडरी स्कूल सेक्टर-10 भिलाई

बीएसपी के सीनियर सेकंडरी स्कूल सेक्टर-10 में वर्ष 1973-74 के शैक्षणिक सत्र की मैथ्स की क्लास में सिर्फ 14 स्टूडेंट थे। इनमें से 5 आईआईटी के लिए चुने गए। वहीं 7 ने क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेजों (आरईसी) में दाखिला लिया और 2 सेना में शामिल हुए।

वहीं इसी सत्र की बायोलॉजी में 30 स्टूडेंट थे। जिनमें से 8 चिकित्सा पेशे में गए। इन 8 स्टूडेंट में परवेज़ अख्तर,पूनम सारस्वत, रेखा गुप्ता, एन एस प्रसन्ना, निर्वेद जैन, शुभदा आप्टे, इंदिरा अरोड़ा और वीएस गीता शामिल हैं।

 इस सत्र की ह्यूमैनिटीज (कला समूह) में सिर्फ 6 स्टूडेंट थे, इसलिए उन्हें मैथ्स की क्लास में बैठना होता था। यहां 1975-76 का मैथ्स का बैच उल्लेखनीय उपलब्धि वाला रहा, जब यहां से 10 स्टूडेंट आईआईटी के लिए चयनित हुए।


एलुमनी मीट में जुटे 50 साल बाद, भिलाई से बालोद तक मचाया धमाल

एलुमनी मीट के दौरान स्कूल में 1974 बैच (24 दिसंबर 2024)

बीएसपी सीनियर सेकण्डरी स्कूल सेक्टर-10 के 1974 बैच के स्टूडेंट ने अपना 50 वां गोल्डन जुबली एलुमनी मीट 22 से 26 दिसंबर 2024 तक मनाया। जिसमें देश-विदेश से आए लगभग 55 सहपाठियों ने भिलाई और बालोद में कुछ दिन साथ-साथ बिताए और अपनी पुरानी यादों को ताजा किया। किसी ने सेना के अपने अनुभव सुनाए तो किसी ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपने अनुभव को साझा किया।
जाट रेजीमेंट से अवकाश प्राप्त ब्रिगेडियर जयेश सैनी ने पूर्वोत्तर में अपने दीर्घ कार्यकाल के अनुभव साझा किए। अस्थि रोग विशेषज्ञ डॉ राकेश शर्मा ने सभी से इस उम्र में अपनी अस्थियों और उपास्थियों की अच्छी देखभाल के लिए प्रेरित किया। कैल्शियम लेने के साथ उन्होंने कुछ सरल अभ्यास भी बताए जिससे स्वयं को फिट रखा जा सके। नेत्र रोग विशेषज्ञ में डॉ. पूनम सारस्वत शर्मा ने आखों की देखभाल के टिप्स दिये। डॉ संजीव जैन, डॉ रेखा, डॉ सुभाष सिंघल, डॉ विद्याधर, डॉ प्रसन्ना, डॉ शुभदा एवं डॉ निर्वेद जैन ने भी स्वास्थ्य के विभिन्न क्षेत्रों पर उपयोगी जानकारी दी। 

एलुमनी मीट की खबर हरिभूमि 09-01-25


पहले दिन सभी सहपाठी भिलाई के एक होटल में मिले तया गीत और नृत्यों को प्रस्तुतियां दी। इसके बाद सीनियर सेकंडरी स्कूल सेक्टर-10 में भी सभी सहपाठियों ने समय बिताया।
यहां पौधारोपण किया और यादगार के तौर पर अपने स्कूल को उपहार दिए। इस दौरान स्कूल की प्रिंसिपल सुमिता सरकार व स्टाफ ने सभी का स्वागत किया।  इसके बाद सभी ने मैत्रीबाग जाकर अपने बचपन की यादें ताजा की। फिर सभी बालोद रिसोर्ट के लिए निकल गए जहा अलग-अलग सत्रों में लोगों ने अपने अनुभव साझा किये। यहां वाटर स्पोटर्स का भी आनंद लिया। यहां उनकी अगवानी कांकेर से आए दल ने सामूहिक नृत्य और तिलक लगा कर किया। अंताक्षरी, नृत्य, तंबोला और विभिन्न खेलों का आनंद सभी लोगों ने लिया। 

 एलुमनी मीट में मुख्य रूप से यूएसए से अनिल सहगल, वसंत जोशी, ऑस्ट्रेलिया से सुजीत दत्त के साथ कुलदीप अरविन्द,रवि अखौरी,बितापी सेनगुप्ता, जयश्री प्रधान, अविनाश मेहता,विनय बहल,कुमार मुखर्जी,गौतम सिल,प्रदीप सत्पथी, राकेश अस्थाना, वीएस राधामणि, रायपुर से निर्वेद जैन, संजय भौमिक, शेष भारत से, पूनम सारस्वत शर्मा हेड गर्ल नोएडा,आर अशोक कुमार हेड बॉय नागपुर, मंजुला त्रिपाठी भोपाल, केका बनर्जी नवी मुंबई, शिरीष नांदेड़कर नवी मुंबई, गुरविंदर भसीन जबलपुर, रेखा सिंघल करनाल, ब्रिगेडियर जे सैनी एन दिल्ली, राजीव वर्मा एन दिल्ली, विप्लव वर्मा एन दिल्ली, अनिरुद्ध गुहा कोलकाता, मीता बनर्जी कोलकाता, सुसान रॉय केरल, बीके कामेश राव हैदराबाद, प्रसन्न प्रकाश बेंगलुरु, गौतम सदाशिव बेंगलुरु और शुभदा रानाडे पुणे से शामिल हुए। 

हरिभूमि 09-01-25



 


Wednesday, February 16, 2022



संघर्ष के दिन भिलाई में गुजारे थे बप्पी दा ने, यहीं रहते

ख्वाब देखा फिर मुंबई गए और छा गए संगीत जगत में 

 

बप्पी दा के साथ भिलाई में इंटरव्यू 08-04-13
करीब महीने भर की तकलीफ के बाद अब संगीतकार बप्पी लाहिरी (मूल नाम-आलोकेश लाहिरी) भी नहीं रहे। मंगलवार 15 फरवरी 2022 मंगलवार की रात उन्होंने मुंबई के एक अस्पताल में 69 साल की उम्र में आखिरी सांस ली। 80-90 का दौर बप्पी दा के ऊर्जा से भरपूर संगीत का दौर था।

 तब बप्पी दा एक तरफ डिस्को की धूम मचा रहे थे तो दूसरी तरफ दक्षिण की फिल्मों की खास शैली का संगीत देकर पूरे देश का मनोरंजन कर रहे थे। लेकिन एक बप्पी लाहिरी वह भी थे, जो बेहद गंभीर किस्म का भी संगीत दे रहे थे। बप्पी दा के संगीत को इन तीन खांचें में महसूस किया जा सकता है। यही उनके संगीत की पहचान भी थी। 

यकीन कीजिए कि जिसने "आई एम ए डिस्को डांसर" रचा, उसी ने "सैंय्या बिना घर सूना" या फिर "चंदा देखे चंदा" भी रचा। खैर, बप्पी दा एनर्जी के पर्याय थे। उनके लिए हल्के-फुल्के संगीत के अलावा शास्त्रीयता का पुट लिए गंभीर संगीत का सृजन करना सहज था। 

17 साल की उम्र में गवा रहे थे लता-मन्ना डे और किशोर को

अपने माता-पिता के साथ बप्पी दा बालपन में

बप्पी दा जिस दौर में दक्षिण में व्यस्त थे और उनकी इंदीवर के साथ जोड़ी जो गीत-संगीत रच रही थी, तब उसकी खूब आलोचना हुई और उन पर फूहड़ता और नकल के आरोप लगे।

इसके बावजूद "जो चल गया वो चल गया" वाला मामला था। बप्पी दा चूंकि संगीत के समृद्ध परिवार से थे। इसलिए बचपन से ही उनके संस्कार में ही संगीत बसा था। 

महज 17 साल की उम्र में उन्होंंने बांग्ला फिल्म "दादू" में संगीत दिया। जिसमें लता मंगेशकर,मन्ना डे और किशोर कुमार जैसे दिग्गजों ने पार्श्वगायन किया। 

बाद में बप्पी दा ने मुंबई का रुख किया और फिर जो इतिहास बना वह दुनिया के सामने है। बप्पी दा के लिए स्वर्णकाल था। उस दौर में हर बड़े बैनर के साथ बप्पी दा ने काम किया और सुपरहिट संगीत दिया। 

बप्पी दा का संगीत आलोचना और लोकप्रियता के द्वंद के बीच बेहद लोकप्रिय होता रहा। इस तथ्य को उनके आलोचकों ने भी स्वीकार किया।

शिखर के दौर का संगीत ही लोकप्रिय रहा

तमाम इतिहास रचते हुए अपने करियर के शिखर के दौर में बप्पी लाहिरी ने फिल्म संगीत का जो माधुर्य रचा वह बाद के दौर में कायम नहीं रह पाया। इसलिए आज भी बप्पी दा का वही संगीत लोकप्रिय है, जो उन्हें अपने शिखर के दौर में रचा था। 

दशक भर पहले आई फिल्म "द डर्टी पिक्चर" में उसी लोकप्रियता को भुनाने के लिहाज से "उई अम्मा-उई अम्मा" के मीटर पर "ऊ ला ला ऊ ला ला" रच दिया गया। बप्पी दा के माधुर्य से सजी "हिम्मतवाला" की रिमेक बनी तो संगीत जस का तस रख दिया गया।  

राजनीति में भी किस्मत आजमाई, लता को पुकारा था मां

बप्पी दा ने शेयर की थी 'मां' की याद में अपनी यह फोटो
बप्पी दा  का अपना संसार था जिन दिनों बप्पी दा का करियर चरम पर था तब अपने संगीत के लिए उन्होंने खूब आलोचनाएं झेली लेकिन उनकी उपस्थिति हमेशा बनी रही। 

करियर के ढलान के बाद बप्पी दा ने राजनीति का रास्ता भी चुना। जिसमें उन्होंने 2014 में भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा और पश्चिम बंगाल की श्रीरामपुर सीट से किस्मत आजमाई लेकिन तृणमूल कांग्रेस के हाथों उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। 

इसके बाद उन्होंने राजनीति से तौबा कर ली। हाल के दिनों में बप्पी दा सोशल मीडिया पर सक्रिय थे। वह विभिन्न मुद्दों पर ट्विट किया करते थे।

सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर के निधन पर बप्पी दा ने अपनी बचपन की फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए मां के संबोधन के साथ श्रद्धांजलि दी थी। हालांकि तब खुद बप्पी दा भी बेहद बीमार थे। अब उनके जाने की खबर आई है।

बप्पी दा भिलाई पहुंचे, घिरे रहे रिश्तेदारों से

संगीतकार बप्पी लाहिरी 8 अप्रैल 2013 सोमवार को भिलाई क्लब में अपना शो करने भिलाई स्टील प्लांट के बुलावे पर आए थे। तब शो से ठीक पहले मुझे बप्पी दा से छोटी सी मुलाकात और बात करने का मौका मिला। 

हालांकि थोड़ा अफरा-तफरी का माहौल था और बप्पी दा की टीम भिलाई निवास से भिलाई क्लब रवाना होने के लिए खड़ी थी। वहीं बप्पी दा के परिजन भी उन्हें घेरे खड़े थे। ऐसे माहौल में बप्पी दा ने छोटे से इंटरव्यू के लिए मुझे वक्त दिया। इस दौरान खुद बप्पी दा ने भिलाई से अपने 40 साल पुराने रिश्तों पर रोशनी डाली।

बप्पी दा ने बताया उनके पिता और प्रख्यात संगीतकार अपरेश लाहिरी और शास्त्रीय गायिका मां बंसरी लाहिरी ने 1960-70 के दौर में भिलाई में बंगाली समाज के बीच कई कार्यक्रम दिए थे। उस दौर में मेरे माता-पिता अक्सर भिलाई आते रहते थे। तब मेरी बहन शुक्ला चौधरी (सगी बुआ की बेटी) यहां भिलाई में क्वार्टर नं. 2 डी, स्ट्रीट-46, सेक्टर-8 में रहती थी। 

मुंबई जाते वक्त अक्सर भिलाई पहुंच जाता था

बप्पी दा का आटोग्राफ
बप्पी दा ने बताया कि पहली बांग्ला फिल्म 17 साल की उम्र में तो मिल गई और उसका संगीत भी खूब चला। लेकिन आगे मेरा ख्वाब मुंबई में पैर जमाने का था।

 वह मेरे संघर्ष की शुरूआत थी। कोलकाता से मुंबई जाते वक्त अक्सर मैं तब भिलाई उतर जाता और बहन के घर 1-2 दिन रह कर जाता था। फिर कुछ 2-3 महीने का एक दौर ऐसा भी रहा जब मुझे 1971 में भिलाई में अपनी बहन के इसी सेक्टर-8 वाले घर में रहना पड़ा। 

तब यहां रह कर मैं अपना संगीत तैयार करता रहता था और खाली वक्त में भिलाई घूमता था। बप्पी दा कहते हैं-तब मेरा ख्वाब मुंबई फिल्मी दुनिया में पहचान बनाना था और इसी ख्वाब को पूरा करने मैं भिलाई में रहते हुए कोशिश कर रहा था। 

तब मैं अपने संपर्कों को चिटि्ठयां लिखता था और इंतजार करता था जवाब आने का। तब टेलीफोन तो मुश्किल से लगता था इसलिए घर में भी चिट्‌ठी लिख कर ही अपनी खैर, खैरियत देता रहता था। 

ऐसे भिलाई से पहुंचा मुंबई

बप्पी दा बोले-फिर एक दिन ऐसा आया कि मुंबई में कुछ उम्मीदें दिखाई दी। मैनें तुरंत भिलाई से मुंबई की टिकट कटाई और यहां से सीधे जा पहुंचा मुंबई। वहां मुझे एक छोटे बजट की फिल्म "नन्हा शिकारी" मिली। इसके बाद नासिर हुसैन प्रोडक्शन की फिल्म "मदहोश" में बैकग्राउंड म्यूजिक करने का मौका मिला, जिसमें संगीतकार आरडी बर्मन थे।

 इसके बाद पहली बड़ी सुपरहिट फिल्म नासिर हुसैन की ही "जख्मी" मिली । उसके बाद "चलते-चलते", "आप की खातिर", "टूटे खिलौने" और फिर सफल फिल्मों के धूम की कतार लग गई।

इस बातचीत के दौरान बप्पी दा के भिलाई में रहने वाले भांजे शांतनु चौधरी ने बताया कि परिवार अब सेक्टर-8 छोड़ सिंधिया नगर में रह रहा है। 

अपने संगीत की आलोचना पर बप्पी दा ने कहा था...

संगीत की आलोचना के सवाल पर बप्पी दा ने कहा था-उनके संगीत की कई बार आलोचना हुई लेकिन यही हिट भी रहा। बप्पी दा ने इस तथ्य को गलत बताया कि दक्षिण की फिल्मों के हिंदी संस्करण में संगीत जस का तस रख दिया गया। 

बप्पी दा बोले-नहीं ऐसा नहीं है जिन दिनों "हिम्मतवाला", "मवाली", "मकसद","तोहफा" और "पाताल भैरवी" से लेकर "सिंघासन" तक दक्षिण की फिल्मों की कतार लगी हुई थी तो मैनें उनके दक्षिण के संगीत को एक तरफ रख कर अपना संगीत रचा। 

कहीं भी कॉपी नहीं किया,इन फिल्मों में जितना भी संगीत रचा मेरा मौलिक रहा। उन्होंने बातचीत के दौरान अपने किशोर कुमार मामा को भी याद किया। बप्पी दा ने बताया कि किशोर कुमार उनके रिश्ते के मामा लगते थे और उन्होंने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया।

तब सिविक सेंटर खूब घूमता था, फिर आउंगा भिलाई

दैनिक भास्कर में तब प्रकाशित मेरा इंटरव्यू
बप्पी दा ने फिल्मी धुनों की नकल के सवाल पर कहा कि दुनिया भर का संगीत हम ही क्या सभी सुनते हैं और यह सब हमारे कानों में रचा-बसा रहता है। इसलिए स्वाभाविक है कि कहीं न कहीं किसी धुन से हम प्रभावित हों लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम नकल कर रहे हैं।

 मैं तो अक्सर कहता हूं अगर मैनें धुन चोरी की है तो फिर मुझसे पहले के भी संगीतकार भी धुन चोरी के दोषी हैं। बप्पी दा ने भिलाई की यादों को टटोलते हुए कहा-उन दिनों तो भिलाई में काफी कम हरियाली दिखती थी।

 मैं सिविक सेंटर खूब जाता था। बप्पी दा ने कहा कि एक बार फिर वह 2-3 दिन के लिए भिलाई आकर रहना चाहते हैं, आखिर मेरे स्ट्रगल के दिनों का गवाह भिलाई भी रहा है।

माता-पिता के बाद अब मामा के जाने से हम अकेले रह गए

बाम्बे और भिलाई में बप्पी दा-शुक्ला परिवार

बप्पी दा के गुजरने पर उनकी बहन स्व. शुक्ला चौधरी के निवास पर भी शोक का माहौल है। स्व. शुक्ला चौधरी के सुपुत्र शांतनु चौधरी ने अपने मामा को याद करते हुए कुछ फोटोग्राफ्स शेयर किए हैं। ब्लैक एंड वाइट फोटो बप्पी के बाम्बे स्थित निवास की है।

इस फोटो में शांतनु अपने माता-पिता व छोटी बहन के साथ हैं, वहीं बप्पी दा के साथ उनके माता-पिता हैं। वहीं कलर फोटो शांतनु के दुर्ग सिंधिया नगर स्थित निवास की है।

 1995 में दुर्ग में फिल्म स्टार नाइट में शामिल होने आए बप्पी दा अपनी बहन के घर भी पहुंचे थे। तब बप्पी दा के साथ इस फोटो में शांतनु व उनके माता-पिता भी नजर आ रहे हैं। 

शांतनु बताते हैं- शुरूआती दौर में जब मामा हमारे सेक्टर-8 वाले घर आते थे तो मैं बहुत छोटा था। कुछ हल्की सी यादें हैं। मामा हमारे साथ कई बार रहते थे। फिर बाम्बे या कलकत्ता जाते थे। जब भी भिलाई रुकते तो सिविक सेंटर और सेक्टर-6 कालीबाड़ी जरूर जाते थे।

 जब फिल्मों में मामा व्यस्त होते गए तो उनका यहां आना कम होता गया। इसके बाद तो वह कभी-कभार किसी स्टेज परफार्मेंस के नाम पर रायपुर या भिलाई-दुर्ग आने पर ही घर आते थे। 

परिवार के सभी सदस्यों के प्रति बप्पी दा हमेशा बेहद स्नेही रहे। वह सभी का हालचाल पूछते रहते थे। शांतनु कहते हैं-अब मेरे माता-पिता नहीं रहे और बप्पी मामा ने भी हमारा साथ छोड़ दिया। ऐसे में हम परिवार के लोग अपने-आप को बहुत ही अकेला महसूस कर रहे हैं।