Thursday, January 1, 2015

अपने जुनून को पहचानिए, सफलता आपके कदम चूमेगी

भिलाई को एजुकेशन हब का दर्जा दिलाने वाले इस्पात नगरी के पहले
आईआईटी टॉपर ने नए साल पर की अपने दिल की बातें

भिलाई के गौरव नवीन बुद्धिराजा अपने  साथ 
 आज से 31 साल पहले स्टील सिटी भिलाई की चर्चा अचानक देश भर में होने लगी थी। हमारे शहर के छात्र नवीन बुद्धिराजा ने आईआईटी-जेईई में जब 1984 में देश भर में टॉप किया था तो बड़े शहरों के शिक्षाविद भी हैरान रह गए थे कि भिलाई में आखिर ऐसा क्या है। डॉ. नवीन बुद्धिराजा ने तब इतिहास बनाया था और उनके बाद से आईआईटी में सर्वाधिक चयन का कीर्तिमान हमारे शहर का कायम है। स्टील सिटी भिलाई को एजुकेशन हब का दर्जा दिलाने वाले डॉ. बुद्धिराजा तीन दशक में अमेरिका सहित दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में कंप्यूटर साइंस के क्षेत्र में कीर्तिमान बना कर हिंदुस्तान लौट चुके हैं और अब प्रतिष्ठित कंपनी इन्फोसिस का हिस्सा हैं।
उल्लेखनीय है कि डॉ.नवीन बुद्धिराजा और इंफोसिस के वर्तमान सीईओ डॉ. विशाल सिक्का इसके पहले एसएपी (यूएसए) में एक साथ काम कर चुके हैं। इसलिए इन्फोसिस की जवाबदारी संभालते ही डॉ. सिक्का ने अपनी टीम बनाई और इसमें सबसे पहले डॉ. बुद्धिराजा को सीनियर वाइस प्रेसीडेंट और हेड आॅफ टेक्नालॉजी बना कर अमेरिका से हिंदुस्तान बुला लिया। नव वर्ष 2015 के आगमन पर भिलाईवासियों को संदेश देने डॉ. नवीन बुद्धिराजा ने की खास बातचीत।
डॉ. नवीन ने अपने दिल की बात कुछ इस अंदाज में की-मेरा तो जन्म ही भिलाई में हुआ है, इसलिए भिलाई को मैं बचपन से जानता हूं। पिता वायर रॉड मिल में मेकेनिकल इंजीनियर थे और मां बीएसपी सेक्टर-9 हास्पिटल में स्त्रीरोग विशेषज्ञ। मेरी बहन फिलहाल दिल्ली में रहती है। भिलाई के बारे में अगर कोई सबसे अच्छी बात बतानी हो तो मैं कहूंगा कि यह एक ऐसी शानदार जगह हैं, जहां आप अपने दोस्तों के साथ केजी से लेकर हायर सेकंडरी स्कूल तक साथ-साथ पढ़ते और बड़े होते हैं। मैं मानता हूं कि भिलाई मेरे परिवार का एक हिस्सा है और भिलाई में बने दोस्त आज भी मेरे सबसे करीबी दोस्त हैं। फिर बाद के दिनों में भिलाई का एक और महत्व मेरे लिए इसलिए भी है कि मेरी जीवन संगिनी सोनल भी मेरे ही शहर भिलाई की है। हमारे वैवाहिक जीवन को 23 साल हो चुके हैं और हमारी दोनों बेटियां आशली और सायली  भी अपना-अपना भविष्य गढ़ रही हैं।
जहां तक आईआईटी-जेईई टॉप करने की बात है तो तब आज की तरह आपाधापी वाली तैयारी तो नहीं होती थी। आज की तरह हम लोगों के पास कोचिंग-ट्यूशन के इतने विकल्प भी नहीं थे। हां, यह जरूर है कि हम लोग स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ घर पर भी खूब पढ़ाई करते थे। मैं खुशकिस्मत था कि मुझे ऐसे माता-पिता मिले, जिन्होंने मुझे अपने मन की करने की पूरी छूट दी और जहां कहीं भी मुश्किल आई उन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया।
जब परिणाम आया तो मैं तो बेहद खुश था। मुझे अपनी सफलता पर पूरा भरोसा था लेकिन सच कहूं तो मैं साल 1984 का टॉपर रहूंगा, ऐसा तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था। जब मुझे सबसे पहले साथियों से पता लगा तो मुझे खुद यकीन नहीं हुआ लेकिन अंतत: हमारे प्रिंसिपल एमएन बोरले जी ने मुझे बुलाया और कहा कि यह सच है तब मैं यकीन कर पाया। इसके बाद तो बधाईयों का तांता लग गया। स्कूल से लेकर हमारे घर तक हर कोई बधाई देने आता था। यहां तक कि इनमें ऐसे बहुत से होते थे, जिन्हें हम जानते भी नहीं थे। लेकिन यह सब मेरे भिलाईवासी थे, जिन्होंने मेरी सफलता में अपना भी गर्व महसूस किया। भिलाई के लोगों की शुभकामनाएं मुझे आज भी मिलती रहती हैं और मैं मानता हूं कि भिलाई की यही मेरी अनमोल पूंजी है।
आईआईटी टॉप करने के बाद मैनें आईआईटी कानपुर से कंप्यूटर साइंस में डिग्री ली। फिर मैनें कॉरनेल यूनिवर्सिटी न्यूयार्क (यूएसए) से पीएचडी की। इसके बाद मैनें आईबीएम, अमेजॉन और एसएपी जैसी बहुत सी कंपनियों में सेवाएं दी। वर्तमान में मैं इन्फोसिस का हिस्सा हूं। देश-दुनिया में जहां भी रहूं अपने भिलाई के लोगों से मुलाकात हो ही जाती है और तब सब कुछ भूल कर मैं अपने शहर भिलाई के बारे में बात करने में ज्यादा रोमांच महसूस करता हूं। सभी भिलाईवासियों को नए साल 2015 की दिली मुबारकबाद।
भिलाई के छात्रों के लिए कहा-
मैं स्टीव जॉब्स का प्रशंसक रहा हूं। जॉब्स का कथन है कि-‘जीवन आपको सिर्फ एक बार मिलता है, इसलिए इसे दूसरों के हिसाब से जी कर व्यर्थ मत करो।’ मेरे शहर भिलाई के छात्रों से मैं यही कहूंगा कि आज अपना फैसला लेने के लिए आप लोगों के पास विकल्प बहुत से हैं। आज जो भी जानकारी चाहिए, आप के पास इंटरनेट सहित ढेर सारी सुविधाएं मौजूद हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि आप अपने अंदर के जुनून को पहचानो, इसके बाद तय है सफलता आपके कदम चूमेगी।

Monday, November 10, 2014

'हैदर’ जैसी फिल्में हमारी डेमोक्रेसी में ही संभव, दुर्ग हादसे ने मुझे नई जिंदगी दी

अभिनेता आशीष विद्यार्थी से लंबी बातचीत

- मोहम्मद जाकिर हुसैन

आशीष विद्यार्थी आला दर्जे के कलाकार होने के साथ-साथ सबसे घुल-मिल कर रहने वाले एक आम इंसान भी हैं। बीते 12 दिनों से आशीष इस्पात नगरी भिलाई में यहीं के पले-बढ़े युवा निर्देशक केडी सत्यम की फिल्म 'बॉलीवुड डायरी’ की शूटिंग में व्यस्त थे। शूटिंग कभी सुबह 10 बजे से रात 12 बजे तक चली तो कभी अगली सुबह 6 बजे तक। शूटिंग के बीच-बीच में जब भी वक्त मिला, आशीष ने टुकड़ो-टुकड़ों में बातचीत की। इस बीच वह सबसे खुल कर मिलते भी रहे। इसके बाद मुंबई रवाना होने से पहले उनके साथ बातचीत का फाइनल दौर चला। आशीष विद्यार्थी मानते हैं कि बीते तीन दशक के मुकाबले आज ज्यादा बेहतर फिल्में बन रही हैं। फिल्मों की व्यस्तता के बीच उन्हें थियेटर को कम वक्त देने का मलाल भी है। हाल की अपनी फिल्म 'हैदर’ को लेकर वह खुल कर प्रतिक्रिया देते हैं। उनका मानना है कि 'हैदर’ जैसी फिल्में भारतीय लोकतंत्र में ही संभव है। आशीष विद्यार्थी से हुई पूरी बातचीत सवाल-जवाब की शक्ल में-



0 शुरुआत भिलाई से ही करते हैं। इस शहर की आप कैसी छवि अपने मन में लेकर आए थे और इसे कैसा पाया...?
00 सच कहूं तो मुंबई में जब मुझे कहा गया कि भिलाई जाना है,तो मेरे जहन में भिलाई स्टील प्लांट जरूर था लेकिन पढ़ा-लिखा होने के बावजूद मैं खुद सोच में पड़ गया था कि ये शहर एमपी, झारखंड या छत्तीसगढ़ में कहां है। दरअसल आज भिलाई हम भारतीय लोगों के जहन से गुम सा होता जा रहा है। आज सबसे बड़ी जरुरत है कि हम अपने आजाद मुल्क के शुरूआती और सबसे बड़े सरकारी औद्योगिक उपक्रम भिलाई की पहचान को जिंदा रखें। खास कर सरकार और यहां के लोगों को देश भर के स्कूली बच्चों के स्टडी टूर करवाना चाहिए। पं. जवाहरलाल नेहरू ने कभी भिलाई और उस दौर में स्थापित हुए तमाम सार्वजनिक उपक्रमों को आधुनिक भारत के तीर्थ कहा था और यह भिलाई के लोगों के व्यवहार में आज भी दिखता है। यहां लघु भारत हर गली, चौराहे और बाजार में दिख जाता है। यह हम सब का दायित्व है कि भिलाई की इस पहचान को हम राष्ट्रीय पटल पर जागृत रखें।

0 लेकिन भिलाई जैसे तमाम आधुनिक तीर्थों पर विनिवेश यानि निजीकरण का खतरा मंडरा रहा है। तब भिलाई अपनी पहचान कैसे कायम रख पाएगा?
00 देखिए, हर चीज का एक दौर में महत्व होता है और उसकी ऐतिहासिक प्रासंगिकता होती है। लाल किला कल तक कुछ और महत्व का था लेकिन एक समय के बाद अब वह नए आयाम में है। तो आपके भिलाई का भी एक ऐतिहासिक महत्व है कि देश की आजादी के बाद इतना विशाल औद्योगिक ढांचा कैसे खड़ा हुआ और यह भारतीयता का प्रतीक कैसे बना। इसका ये महत्व तो रहेगा ही। अब अगर हम सोचें कि यहां भी निजीकरण का खतरा है तो इसकी क्या पहचान रह जाएगी? मेरा मानना है कि अगर भिलाई और देश की तरक्की के लिए जरूरी है तो यहां विनिवेश भी होगा। लेकिन यह किस हद तक होगा, इसे आप लोग तय करेंगे, जनता तय करेगी। फिर अगर ऐसी कोई आशंका दिखती भी है तो विनिवेश के बावजूद भिलाई का ध्येय खोना नही चाहिए।

0 12 दिन तक आपने भिलाई को करीब से देखा, शूटिंग में भी व्यस्त रहे। यहां से ऐसी कौन सी खास यादें हैं जो लेकर जा रहे हैं?
00 यहां आने के बाद जिन लोगों से भी मुलाकात हुई,सब ने मेरा दिल जीत लिया है। गजब की फीलिंग है यहां के लोगों में। मैं तो शूटिंग के अलावा भिलाई के लोगों से मिलने और यहां अलग-अलग जगह घूमने में बिजी रहा। यहां जलेबी चौक में जलेबी और समोसा, सिविक सेंटर में नन्हे की कॉफी, आकाशगंगा सुपेला व सेक्टर-4 की चाट और हाईवे रेस्टॉरेंट पावर हाउस डोसा नहीं भूल पाउंगा। मैने तो खूब लुत्फ उठाया। मुझे फोटोग्राफी जुनून की हद तक पसंद है। जलेबी चौक में जलेबी खाते-खाते अचानक मैनें सामने दीदार स्टूडियो देखा। स्टूडियो का नाम और चौक की जगह मिलकर एक अद्भुत प्रभावी दृश्य बना रहे थे। यहां का 32 बंगला, टाउनशिप और तमाम शहर ही अपने आप में अद्भुत दृश्य रचते हैं।

0 भिलाई में पले-बढ़े और आज बालीवुड के स्थापित निर्देशक अनुराग बासु के साथ आपने 'बरफी’ की थी और अब भिलाई के ही एक और युवा निर्देशक केडी सत्यम के साथ 'बॉलीवुड डायरी’ कर रहे हैं। इन दोनों भिलाइयन की शख्सियत और उनके काम को कैसे देखते हैं?
00 मेरी नजर में अनुराग बासु बहुत ही क्रिएटिव और सज्जन व्यक्ति है। वो अपने ख्वाबों को बेहद खुबसूरती से बुनते हैं, जिसे आप उनकी अलग-अलग फिल्मों में विभिन्न पात्रों के माध्यम से देखते हैं। 'बरफी’ में उनके निर्देशन में काम करने पर एक अलग तरह की तसल्ली हुई। मुझे निजी तौर पर अनुराग की जो बात बहुत पसंद आती है वह यह है कि उसमें एक अच्छी फिल्म बनाने का जज्बा और हौसला दोनों है। इसी तरह सत्यम भी भिलाई का है। मैं उसे कुछ साल पहले मिला। मैंनें पाया कि बहुत ही समझदार, ईमानदार और निडर लड़का है। मैं निडर इसलिए कह रहा हूं कि आज निडर होना बहुत बड़ी बात है। सत्यम भी अपने सपने देखने की हिम्मत रखता है। जो बात मुझे अनुराग बासु में दिखी थी, वही मैं सत्यम में भी देखता हूं कि वो अपनी बात कहना चाहता है अपनी फिल्म बनाना चाहता है।

0 सत्यम की फिल्म 'बॉलीवुड डायरी’ है किस तरह की फिल्म?
00 फिलहाल तो फिल्म की कहानी और दूसरे खुलासे मैं नहीं कर सकता। हां, इतना बता सकता हूं कि बहुत दिनों की मेहनत के बाद सत्यम ने अपनी ये फिल्म शुरू की है। इसमें हम सब साथ हैं। जाहिर बात है कि उनकी यह फिल्म एक बहुत ही अनूठी कहानी है। यह कुछ सपनों की कहानी है जो हम सब देखते हैं। सत्यम ने इसे कुछ कहानियों के साथ पिरोया है आप सबको बहुत पसंद आएगी यह फिल्म। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि हमारे हिंदुस्तान के 99 प्रतिशत लोगों को अपना कुछ न कुछ हिस्सा दिखेगा इस फिल्म में।

0 इसी फिल्म की शूटिंग के दौरान जो अनहोनी हुई, उसे किस तरह याद रखेंगे?
00 शूटिंग के दौरान 19 अक्टूबर को दुर्ग की शिवनाथ नदी में अचानक मैं डूबने लगा। मुझे तैरना आता है लेकिन पता नहीं उस वक्त अचानक क्या हुआ, कुछ समझ नहीं आया। शायद पैर में धोती फंस गई और बहाव तेज होने की वजह से घबराहट की महसूस हुई। उसी वक्त वहां मौजूद पुलिस जवान विकास सिंह और मेरे डायरेक्टर केडी सत्यम को लगा कि कुछ अनहोनी हो सकती है। सभी सचेत हो गए। मैं खास तौर पर आरक्षक विकास सिंह की तत्परता का कायल हूं। इस एक हादसे ने मेरे जीवन का नजरिया भी बदला। मुझे लगता है यह नया जीवन है और इसे पूरी तरह एन्जाय करूं।

0 भिलाई से लौटते वक्त कोई अफसोस..?
00 हां, भिलाई स्टील प्लांट ही भिलाई की खास पहचान है लेकिन मैं इस बार प्लांट नहीं देख पाया। मैं अपने परिवार और दोस्तों को साथ लेकर आउंगा और तसल्ली से प्लांट देखना चाहता हूं। मैं यहां फौलाद ढालते हाथों को करीब से देखना चाहता हूं। मेरा वादा है अगली बार प्लांट जरूर देखने जाउंगा।

0 आपकी अपनी पृष्ठभूमि भी बड़ी रोचक है। इसे कैसे बयां करेंगे?
00 अक्सर मुझसे लोग पूछते हैं कि मैं किस स्टेट को बिलांग करता हूं। मैं भी सवालिया अंदाज में बताता हूं कि मेरे पिता गोविंद विद्यार्थी मलयाली थियेटर पर्सनालिटी थे। मेरी मां और मशहूर शास्त्रीय नृत्यांगना रेबा विद्यार्थी जयपुर (राजस्थान) के बंगाली परिवार से थी। मेरी पैदाइश हैदराबाद में हुई और पढ़ाई लिखाई दिल्ली में हुई। अब रोटी मुंबई और साउथ की खा रहा हूं। ऐसे में आप खुद बताइए कि मैं किस स्टेट को बिलांग करता हूं?

0 आपके पिता प्रसिद्ध पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी से प्रभावित थे। ऐसे में कलम के बजाए कैमरा चुनना मुश्किल भरा फैसला था?
00 बाबा एक स्वतंत्रता सेनानी और थियेटर पसर्नालिटी होने के साथ-साथ प्रसिद्ध पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। इसलिए बाबा ने विद्यार्थी उपनाम अपनाया। बाबा खुद भी जर्नलिस्ट थे। बाबा से मैनें फोटोग्राफी सीखी। बाबा की तरह मैं आपने आस-पास जो भी घट रहा है, उसे फोटोग्राफी और दूसरे माध्यमों में रिकार्ड करता जाता हूं। जहां तक अभिनय का सवाल है तो नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) जाने का मेरा अपना फैसला था। बाबा इस दुनिया में नहीं है लेकिन मुझे उम्मीद है कि वो मेरे फैसले से खुश हैं।

0 थियेटर से फिल्मों का रुख कैसे हुआ..? अब तक का सफर कैसा रहा..?
00 नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) के बैकग्राउंड की वजह से फिल्मों तक पहुंच तो गया था लेकिन यह यहां कदम जमाना आसान नहीं था। मेरा फिल्मी सफर 1986 में कन्नड़ फिल्म 'आनंद’ से शुरू हुआ। इसके पहले तो खूब थियेटर करता था। हिंदी में 1992 में पहली बड़ी फिल्म '1942 अ लव स्टोरी’आई। लेकिन पहचान मिली1994 में गोविंद निहलानी की फिल्म 'द्रोहकाल’ से । इस फिल्म में कमांडर भद्रा के किरदार के लिए श्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल हुआ। तब से अब तक दक्षिण के अलावा हिंदी और बांग्ला सहित विभिन्न भाषाओं में 300 से ज्यादा फिल्में कर चुका हूं।

0 अब फिल्मों की व्यस्तता के बीच थियेटर को कितना वक्त दे पाते हैं?
00 ये सच है कि जितना वक्त मैं थियेटर को देना चाहता हूं, उतना नहीं दे पाता हूं। फिर भी कोशिश करता हूं कि थियेटर जितना भी करूं अच्छे से करूं। अभी बहुत दिन से थियेटर नहीं कर पा रहा हूं, इसलिए थोड़ा विचलित भी हूं।

0 आपका एक पात्रीय नाटक 'दयाशंकर की डायरी’ काफी चर्चित रहा और सराहा भी गया। इतनी उम्मीदें थी इस नाटक को लेकर..?
00 कोई भी क्रिएशन टीम वर्क का नतीजा होता है, उसके बाद वह अपना खुद का रूप ले लेता है। 'दयाशंकर की डायरी’ के बारे में भी यही कहना ठीक होगा। राइटर-डायरेक्टर नादिरा जहीर बब्बर सहित पूरी टीम ने कुछ इंटरेस्टिंग बनाने की सोची और वो एक हद तक लोगों को पसंद आया है। इसमें एक अनूठी बात यह है कि यह एक ऐसी कहानी है जिसमें आम लोग अपने आप को और अपने आस-पास को इसमें देख पाए हैं।

0 आपकी हालिया रिलीज फिल्म 'हैदर’ आलोचना और सराहना दोनों पा रही है। आप इसे किस नजरिए से देखते हैं?
00 मेरी नजर में 'हैदर’ इंडियन सिनेमा और इंडियन पॉलिटी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण फिल्म है। सिनेमा के लिए महत्वपूर्ण इसलिए क्योंकि जिस तरीके से कहानी कही गई है, वह वर्ल्ड क्लास है। अभी थोड़ी देर पहले ही विशाल भारद्वाज का मैसेज आया कि रोम में 'हैदर’ को पीपल्स च्वाइस अवार्ड मिला है। मैं पॉलिटी की बात इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि हमारे देश में लोकतंत्र है और यहां एक फिल्ममेकर अपनी बात कहने की छूट रखता है। वी शुड बी प्राउड ऑफ इट। दुनिया में बहुत से मुल्क ऐसे हैं जहां अपनी बात कहने पर प्रतिबंध झेलना पड़ता है और जेल से लेकर फांसी तक हो जाती है। लेकिन हम लोग गौरवान्वित हैं कि हमारे देश में अलग-अलग मत के लिए जगह है।

0 ...लेकिन 'हैदर’ पर हदें लांघने जैसे आरोप भी लगे हैं?
00 देखिए, कईयों को लगता है कि ये इधर वाली बात है या उधर वाली बात। लेकिन हमें समझना चाहिए कि हमारी डेमोक्रेसी की सबसे बड़ी ताकत बोलने की आजादी है। इसी वजह से हम लोग ग्रो कर पाए हैं। हमारा डेमोक्रेटिक सिस्टम इतना मजबूत है कि हमारे यहां तानाशाही पांव नहीं जमा पाई है। यह हमने हाल के इलेक्शन में भी देखा कि जो पार्टी कभी बहुमत में नहीं आई थी वह आ गई और एक पार्टी जिसने अच्छा परफार्म नहीं किया उनको जनता ने एक दम से पटक कर अलग कर दिया गया।'हैदर’ जैसी फिल्में हमारी डेमोक्रेसी में ही संभव है। 

0 कश्मीर जैसे संदेनशील मुद्दे को उठाने शेक्सपियर के 'हैमलेट’ का ही सहारा क्यों लिया जाए..?
00 सवाल तो किसी पर भी उठाया जा सकता है। अगर आप पेंटर हैं और आइल पेंट इस्तेमाल करते हैं तो आप पूछ सकते हैं कि आइल की क्या जरूरत है, चारकोल से हो सकता है। चारकोल उठाएंगे तो आप कहेंगे वाटर कलर से हो सकता है। तो ये एक आध्यात्मिक या यूं कहिए इंटेलक्चुअल किस्म का सवाल है। जिसके बारे में मैं ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहूंगा। मैं सिर्फ यह मानता हूं कि हम लोग अपने-अपने तरह से अपनी बात कहना जानते हैं। जरिया कुछ भी हो सकता है। विशाल ने इससे पहले 'ओमकारा’ एकदम अलग पृष्ठभूमि में बनाई। तो, वो वहां पर वैलिड है। अब ये एक फिल्मकार की क्रेडिबिलिटी है कि वो किस तरह का माध्यम चुनता है। वैसे 'हैदर’ एक चुनौतीपूर्ण कदम था, जिसे विशाल ने बहुत ही गजब तरीके से उठाया है।

0 दक्षिण की फिल्में अलग किस्म की थोड़े लाउड मिजाज लिए हुए होती है। वहीं बालीवुड का टेस्ट अलग होता है। ऐसे में दोनों माहौल में काम करते हुए क्या फर्क देखते हैं?
00 यह फिल्मकार पर निर्भर करता है कि वो अपनी बात किस तरह कहना चाहता है। मुझे लगता है कि हमको किसी और पक्ष के बारे में उतना सोचना नहीं चाहिए क्योंकि हमें मालूम नहीं होता है कि वहां और यहां आखिर चलता क्या है। हकीकत ये है कि दक्षिण में वो वैसी ही लाउड किस्म की फिल्में इसलिए बनाते हैं, क्योंकि वहां वैसी ही फिल्में चलती है। मैं फिल्म को फिल्म की तरह ही करता हूं, इसमें फर्क नहीं देखता।

0 80-90 के दशक की तरह क्या आज समानांतर सिनेमा जैसा कुछ बचा है? आज की फिल्में कितनी तसल्ली दे पाती है आपको?
00 मुझे लगता है पिछले तीन दशक के मुकाबले आज तो गजब की फिल्में बन रही हैं। पहले जरा माफी के साथ फिल्में बनानी पड़ती थी। तब डायरेक्टर लोगों से कहना पड़ता था कि मैं जरा अच्छी फिल्म बनाना चाहता हूं इसलिए समानांतर सिनेमा बना रहा हूं, प्लीज आना यार देखने के लिए। लेकिन आज तो लोग डंके की चोट पर अच्छी फिल्में बना रहे हैं। मुझे लगता है फिल्मों को लेकर आज बहुत ही जबरदस्त माहौल है। आज आप जिस तरह की फिल्म देखना चाहते हैं उस तरह की फिल्में भी बन रही है। यह अमेजिंग दौर है इंडियन सिनेमा का। न सिर्फ हिंदी के लिए बल्कि बांग्ला, तमिल, असमिया और सभी भाषाओं की फिल्मों के लिए भी।

0 लेकिन इस दौर में यह भी हो रहा है कि समानांतर सिनेमा का प्रतीक रही 'बाजार’ जैसी फिल्म के निर्देशक सागर सरहदी अपनी फिल्म 'चौसर’ को लेकर 10 साल से खरीदार तलाशते भटक रहे हैं। क्या सरहदी जैसे निर्देशक अब चूक गए?
00 'कौन चूक गया और कौन नहीं चूका’ ये सब उन लोगों की बातें है जो ड्राइंग रुम में बैठ कर डिस्कशन करते हैं। हम लोग काम करने वाले लोग है। हम फिल्म बनाते हैं और हमारी कोशिश रहती है कि लोगों को पसंद आए। कोई भी फिल्मकार अपने पूरे पैशन के साथ एक पीस ऑफ आर्ट के तौर पर फिल्म बनाता है। अगर हम उसकी कद्र नहीं कर पाए तो मुझे लगता है कि यह हमारा नुकसान है।

0 एक कलाकार के लिए सामाजिक जवाबदारी कितना मायने रखती है?
00 हम लोग कलाकार होने के साथ-साथ इंसान भी हैं। हम लोग पूरा ध्यान रखते हैं कि हमारे किसी भी एक्ट से समाज में कोई गलत संदेश ना जाए। मेरी कोशिश रहती है कि जहां जो चीजें मुझे प्रेरित कर पाती है, मैं वही करूं। मैं ऐसा भी नहीं कहता कि मेरे कुछ करने ना करने से कुछ बदलने वाला नहीं।

0 लेकिन हाल ही में आपने बोतल बंद पानी का विज्ञापन भी किया है..?
00 कुछ साल पहले तक मैं स्मोक किया करता था। फिर मैनें छोड़ दिया। अब मेरी ये कोशिश रहती है कि मैं फिल्मों-एड में स्मोकिंग और उसके आस-पास की चीजों का प्रचार करने से बचूं। ऐसा ही दूसरे विषयों को लेकर मेरी सोच रहती है। कोशिश करता हूं कि समाज में मेरा योगदान अच्छी चीजों को लेकर रहे। बोतलबंद पानी का विज्ञापन अपवाद हो सकता है।

0 तमिल, तेलुगू, हिंदी, मराठी, बंगाली, उड़िया और कन्नड़ सहित ढेर सारी भाषाओं में सहज होकर कैसे काम कर पाते हैं?
00 सच कहूं तो दक्षिण भारतीय भाषाओं में मेरी पकड़ कमजोर है। इसके बावजूद सबसे बड़ी चुनौती यह रहती है कि अभिनय के दौरान हम दर्शकों को उन्हीं की भाषा में बोलते नजर आएं। भाषाई फिल्में करते वक्त मुझे बेहद सतर्क रहना पड़ता है कि डायलॉग में क्या बोला जा रहा है और आस-पास के लोग क्या कह रहे हैं। तालमेल से सब हो जाता है।

0 आने वाली फिल्में कौन-कौन सी हैं?
00 'हैदर’ तो फिलहाल धूम मचा रही है। हिंदी में जल्द ही 'रहस्य’ और उसके बाद केडी सत्यम की यह फिल्म 'बालीवुड डायरी’ रिलीज होगी। अभी तमिल में 4 और तेलुगू में दो फिल्में पूरी हो चुकी है जो इसी माह रिलीज होगी। कन्नड़ में एक फिल्म फ्लोर पर है।

(लेखक पत्रकार मोहम्मद जाकिर हुसैन इस्पात नगरी भिलाई में पत्रकारिता कर रहे हैं। उनसे मोबाइल नंबर 09425558442 और ई-मेल mzhbhilai@yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है।)

Thursday, October 9, 2014

मॉल तो गरीब आदमी को चिढ़ाते हैं कि देख बे...! 

(अभिनेता ओमपुरी से खास बातचीत)

- मुहम्मद जाकिर हुसैन


व्यवस्था के खिलाफ अपनी फिल्मों में उन्होंने शुरूआती दौर में जो आक्रोश दिखाया था, आज भी वैसा ही तेवर उनमें मौजूद है। फिल्म अभिनेता और सामाजिक कार्यकर्ता ओम पुरी आज भी मानते हैं कि व्यवस्था बदलने के लिए जन आंदोलन बेहद जरुरी है। 
पर्यावरण जैसे मुद्दे पर वह ‘निर्भया’ जैसे बड़े आंदोलन के हिमायती हैं। 4-5 अक्टूबर को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर हुए वाइल्ड लाइफ फिल्म फेस्टिवल शिरकत करने ओम पुरी खास तौर पर  आए थे।
 दो दिन के व्यस्त कार्यक्रम के बाद फुरसत पाते ही ओमपुरी ने बातचीत  के लिए वक्त निकाला। इस दौरान उन्होंने साफगोई के साथ बहुत कुछ अपनी कही और कुछ आज के मुद्दों पर बात की। उनसे हुई बातचीत सवाल-जवाब की शक्ल में।



रायपुर में एक मुलाक़ात ओम पुरी के साथ
0 तीन अलग-अलग दशक में हुआ तीन दौरा...अब तक छत्तीसगढ़  को किस तरह बदलता  हुआ पाते हैं आप? 

00 मैं तीन दशक में तीन बार यहां आया। 1981 में तो ‘सद्गति’ शूटिंग के लिए हम लोग ट्रेन से आए थे। तब छत्तीसगढ़ के गांव में जाने का मौका मिला था। उसके बाद 2007 में आया तो एयरपोर्ट पर उतरा। 
इस बार भी एयरपोर्ट से होटल और शहर तक चौड़ी-चौड़ी सड़कें बन चुकी हैं और चारों तरफ  शहर फैल चुका है। कई बड़े होटल बन गए हैं। शहर ने काफी ग्रो किया है। बिल्डिंगें बन गईं और मॉल भी तन गए। 

0 मतलब बिल्डिंग और शॉपिंग मॉल अब तरक्की का पैमाना है..? 

00 नहीं ऐसा नहीं है....मुझे बहुत गर्व नहीं होता इस मॉल कल्चर पर। मॉल तो गरीब आदमी को  चिढ़ाते हैं कि देख..बे...! 
 
0 छत्तीसगढ़ के श्रमिक नेता स्व.शंकर गुहा नियोगी से आप प्रभावित रहे हैं। उन्हें कैसे याद करते हैं? 
00 हां, उनसे वाकिफ था मैं। सोते वक्त उन्हें खिड़की से फायर कर मारा गया। मुझे खबर लगी तो बहुत तकलीफ हुई थी। मजदूरों के लिए बहुत काम किया था उन्होंने। आज उनके संगठन का क्या हाल है, मुझे नहीं पता। 
 
0 छत्तीसगढ़ में ‘सद्गति’ की शूटिंग का दौर कैसे याद करते हैं आप? 
00 बहुत सी यादें हैं। हमारे डायरेक्टर सत्यजीत रे साहब के साथ मैं, स्मिता पाटिल, मोहन अगाशे , गीता सिद्धार्थ सहित पूरी यूनिट रायपुर में जयस्तंभ चौक के एक होटल में रुके थे। होटल से लगा एक सिनेमा हॉल था, जहां उस वक्त ‘एक दूजे के लिए’ फिल्म लगी हुई थी। 
रोज सुबह 7 बजे हम लोग महासमुंद के लिए रवाना हो जाते थे। महासमुंद बड़ी शांत जगह है। मुझे याद है एक गांव था जहां हमनें लगातार 20 दिन तक शूटिंग की, बड़े अच्छे से काम हुआ। रोज शूटिंग पूरी कर शाम 7 बजे तक हम लोग होटल लौटते थे। थकान इतनी होती थी कि खाना खाते ही नींद आ जाती थी लेकिन सिनेमा हॉल में चल रही पिक्चर की आवाज मेरे कमरे की दीवारों और खिड़कियों से टकराती रहती थी। 
एक दिन रे साहब ने छुट्टी दी तो मैनें राज टॉकीज में जाकर वह फिल्म देखी। (इस बातचीत के दौरान मौजूद रहे वरिष्ठ पत्रकार सुदीप ठाकुर ने जब इस दौरान बताया कि बात राज टॉकीज और होटल मयूरा की हो रही है तो ओमपुरी को भी तुरंत याद आ गया और बोल पड़े-हां मयूरा होटल थी वो)
 
0 छत्तीसगढ़ की लोकेशन पर ‘सद्गति’ फिल्म का आधार क्या था? 
00 देखिए, मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘सद्गति’ गांव को केंद्र में रख कर लिखी थी। उसमें छत्तीसगढ़ की जगह यूपी-बिहार का भी गांव होता तो भी दिक्कत नहीं होती। 
वो फिल्म तो किसी भी गांव की लोकेशन पर बनाई जा सकती थी। मुझे जहां तक याद आ रहा है, सत्यजीत रे साहब कलकत्ते से अपने किसी परिचित के बुलावे पर यहां लोकेशन देखने आए थे और मुंबई-हावड़ा ट्रेन रूट पर सीधा रास्ता होने की वजह से लोकेशन उन्हे जंच गई थी। बस इतनी सी बात है। मुझे सत्यजीत रे साहब ने ‘आक्रोश’ में देखने के बाद  ‘सद्गति’ के लिए साइन किया था।
  फिर इसमें छत्तीसगढ़ के बहुत से कलाकारों ने भी काम किया। मेरी बेटी धनिया का किरदार निभाने वाली ऋचा मिश्रा की आज भी मुझे याद है। छोटी सी बच्ची थी वो..अब तो बड़ी हो गई है।
 
0 जंगल और गांव की लोकेशन पर आपने बहुत सी फिल्में की है। यह संयोग था या फिर आपकी पसंद..? 
00 संयोग ही कह सकते हैं क्योंकि उस दौर में तो जैसी फिल्में मिली, हमें करनी ही थी। वैसे निजी तौर पर कुदरत के करीब रहना मुझे ज्यादा पसंद है। कुछ चेहरा-मोहरा भी वैसा ही है कि शुरूआती दौर में फिल्म बनाने वाले भी मुझे लेकर जंगल, गांव या दलित से जुड़े मुद्दे पर ही फिल्म बनाना चाहते थे। इसमें कई बार धोखे भी हुए। 
1978 की बात है, एक सज्जन रस्किन बांड की कहानी ‘द लास्ट टाइगर’ पर फिल्म बनाना चाहते थे। मुझे, टॉम आल्टर और एक नए चेहरे नरेश सूरी को उन्होंने लिया। स्क्रिप्ट शायद प्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी लिख रहे थे। हमारी 10 लोगों की टीम को वो सज्जन संथाल परगना (आज के झारखंड) में जंगल के अंदर 25 किमी दूर एक गांव में ले गए।
 वहां दो कमरे के एक कच्चे मकान में उन्होंने मुझे ठहरा दिया। अंदर जाकर देखता हूं तो उपर छत ही नहीं है। नीचे खटिया बिछाने जा रहा हूं तो पास से एक सांप रेंगते हुए आगे बढ़ रहा है। 
खैर, रात किसी तरह कटी लेकिन, सुबह वो जनाब खुद ही गायब हो गए। दोपहर तक हम लोगों ने इंतजार किया लेकिन जब वो नहीं आए तो हम लोगों ने 25 किमी पैदल सफर तय कर सर्किट हाउस तक पहुंचे और उस पूरी फिल्म के प्रोजेक्ट से ही तौबा कर ली। 
 
0 फिल्मों की शूटिंग के जरिए जंगलों और गांवों को कितना देख या समझ   पाए? 
00 फिल्में ही क्यों। जब भी मौका मिलता है मैं जंगल और गांव ही जाना पसंद करता हूं। अपने देश के ज्यादातर रिजर्व फारेस्ट में जा चुका हूं। अपने करियर के शुरूआती दौर में 1977 में किसी डाक्यूमेंट्री फिल्म के लिए बस्तर के किसी गांव में भी आया था। 
एक आदिवासी के झोपड़े के बाहर...चांदनी रात में खुला आसमान..क्या अद्भुत दृश्य था मैं बता नहीं सकता। मुझे लगा यही तो जन्नत है। पत्ते के बने दोने में छक कर महुआ पिया। मुझे तो महुआ चढ़ गया था। 
 
0 पर्यावरण को बचाने भारतीय फिल्म जगत अपना योगदान कैसे दे सकता है? 
00 हमारा फिल्म जगत तो फिल्में ही बना सकता है। प्रकाश झा ने ‘चक्रव्यूह’ बनाई थी नक्सल मूवमेंट के बारे में। ऐसे ही पर्यावरण पर भी बड़े पैमाने पर फिल्म बनाई जा सकती है।
 जिसमें शिकारी, फारेस्ट गार्ड, भ्रष्ट नेता, उद्योग जगत और समाज के दूसरे किरदार शामिल किए जा सकते हैं। क्योंकि हमारे जंगल इन्हीं तत्वों के गठजोड़ से बरबाद हो रहे हैं। ऐसी फिल्में जरुर बनाई जानी चाहिए, जिससे समाज में और ज्यादा जागरुकता आए। 
 
0...लेकिन बड़े बजट की फिल्में तो दूर की बात है। फिलहाल तो पर्यावरण को लेकर जो डाक्यूमेंट्री बनती है, उन्हें दर्शक नसीब ही नहीं होते? 
00 हमारे डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर तो अच्छे मन और बड़े पैशन के साथ डाक्यूमेंट्री बनाते हैं। सच है कि दर्शक इन्हें मिलते नहीं। इसलिए सबसे पहले तो हमारे नेताओं को ऐसी डाक्यूमेंट्री फिल्में दिखानी चाहिए। तब ही ये नेता समझेंगे कि हमारी नीतियों में कहां खराबी है। 
पर अफसोस कि उनके पास समय ही नहीं होता और वो दूसरी समस्याओं में उलझे रहते हैं। साफ कहूं तो यह पर्यावरण मंत्री की जवाबदारी है कि वो ऐसी फिल्मों को न सिर्फ देखे बल्कि दूरदर्शन के माध्यम से इसे प्रसारित भी करवाए। जिससे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पर्यावरण की वास्तविकता पहुंचे। 
 
0 जंगलों में शिकार पर कानूनन रोक के बावजूद क्या अब तक हालात नहीं बदले हैं? 
00 अगर हालात सुधरे होते तो आज संसार चंद जैसा शिकारी इतने सालों तक जंगल में जानवरों को अंधाधुंध तरीके से मारता न रहता। संसार चंद कोई टारजन नहीं था। मुमकिन है कि इन जैसे शिकारियों की कारगुजारी में फॉरेस्ट विभाग, कुछ एनजीओ और कुछ नेता भी इन्वाल्व होंगे। 
मुझे तो बचपन से उन तस्वीरों को देखकर बड़ा गुस्सा आता है, जिसमें ये बड़े-बड़े राजा-महाराजा शेर और दूसरे शिकार पर पैर रख कर बंदूक हाथ में लेकर नजर आते हैं। मैं तो कहता हूं अरे, नामर्दों अगर इतने ही बड़े शिकारी हो तो जाओ ना जंगल में निहत्थे। उसके बाद करो आमने-सामने की लड़ाई। 
 
0 शहरीकरण तो बढ़ता ही जाएगा। ऐसे में एक आम शहरी अपना पर्यावरण बचाने क्या योगदान दे सकता है? 
00 शहर में रहने वाले सभी लोगों से मुझे कहना है कि लकड़ी का कम से कम इस्तेमाल करो। क्योंकि आखिर लकड़ियां भी तो जंगल से ही आती है। मैं शहरों में देखता हूं आलीशान कोठियों से लेकर आम घरों तक में छत से लेकर टाइल्स तक ढेर सारी लकड़ियां इस्तेमाल होती है।
 इसे बंद करना होगा। अपने फिल्म वालों को भी मैं कहता हूं कि शूटिंग के दौरान अगर पेड़ की कोई टहनी बाधा बन रही है तो उसे बिना सोचे-समझे काट देते हैं। जबकि इसे बांधा जा सकता है।
 अभी हमारे मुंबई में एक बड़ा गलत काम हो रहा है। सड़क बनाने के दौरान बड़े-बड़े पेड़  के नीचे की जमीन पूरी की पूरी कांक्रीट से पक्की कर दी जा रही है। आखिर पेड़ की जड़ों तक पानी कैसे पहुंचेगा। 
कोई इन सरकारों को समझाए। तल्ख़ियां तो बहुत सी है लेकिन एक छोटी सी अपील मैं करना चाहता हूं कि कम से कम आप अपने बच्चों के जन्मदिन पर एक पौधा हर साल लगाकर अच्छी शुरूआत तो कर सकते हैं। 
 
0 आप खुद भी जन आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं, ऐसे में आज के दौर में पर्यावरण जैसे मुद्दे पर जन आंदोलनों का क्या भविष्य देखते हैं आप? 
00 देखिए, जन आंदोलन तो जनता का सबसे बड़ा हथियार है।  दिल्ली में जब निभर्या वाला मामला हुआ।
 नौजवानों में इतना जोश आया कि वो अन्याय के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। सर्दी के मौसम में उन पर ठंडा पानी फेका जा रहा है लेकिन वो हिले नहीं बल्कि सरकार को हिला दिया। नतीजा देखिए, नया कानून बन गया।
 तो पर्यावरण बचाने के लिए भी ऐसे ही जन आंदोलन की जरुरत है। जैसे गांधी जी और जयप्रकाश नारायण जी ने लोगों को एकजुट कर आंदोलन खड़ा किया, ठीक वैसा ही दबाव हो तो पर्यावरण और प्रदूषण जैसे मुद्दे पर सरकार जरूर जागेगी। 
 
0 लेकिन जिस अन्ना आंदोलन में आपने मंच साझा किया, आपको नहीं लगता कि वह पूरा का पूरा आंदोलन भटक कर खत्म हो गया? 
00 अन्ना आंदोलन कहां भटका? आखिर केजरीवाल तो अन्ना आंदोलन की ही उपज है। उसे तो जनता ने चीफ मिनिस्टर बनाया। पूरा हिंदुस्तान हिल गया था कि ये ‘आप’ पार्टी है कौन।
 सबके होश उड़ गए थे कि ‘आप’  तो अब नेशनल पार्टी बन जाएगी। लेकिन उसको (केजरीवाल को)अकल नहीं थी...भाग गया कुर्सी छोड़ कर। उसे बैठना चाहिए था, लड़ता वो जनता के हक के लिए...लेकिन। 
 
0...तो क्या केजरीवाल को एक मौका और नहीं मिलना चाहिए..? 
00 मुझे नहीं लगता उसका भविष्य उज्ज्वल है। 
 
0 आपको लगता है कि चर्चित हस्तियों के जीवन पर लिखी गई किताबें बिना विवाद के हाथों-हाथ नहीं बिक सकती? 
00 इस सवाल से मेरा क्या लेना-देना और आप मुझसे यह क्यों पूछ रहे हैं, मैं नहीं समझ पा रहा। 
 
0 आपकी पत्नी नंदिता पुरी ने आपकी बायोग्राफी लिखी,उस पर खूब बवेला मचा तो किताब चर्चा में आ गई, इसलिए..
00 (टोकते हुए) मैं उस पर कोई बात नहीं करना चाहता। उस मुद्दे को मैं पीछे छोड़ आया हूं। यहां छत्तीसगढ़ में पर्यावरण पर कार्यक्रम में आया हूं। उससे जुड़ा कोई सवाल हो तो जरुर पूछिए या कुछ और भी..। 
 
0 छत्तीसगढ़ में फिल्म सिटी की गुंजाइश देखते हैं क्या..? 
00 फिल्म सिटी तो बाद की बात है। पहले आप फिल्में तो बेहतरीन बनाइए। फिल्म सिटी तो और भी कई स्टेट में बनाई गई। उनका क्या हश्र हो रहा है, सबको मालूम है। इसलिए फिल्म सिटी की तो बात ही ना करें। 
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 भावभीनीं श्रद्धांजलि

मैनें आटोग्राफ मांगा तो बोले-तेरा 'बाबू ' तो 

पढ़ा लिखा नहीं है और अंगूठा लगा दिया

ओमपुरी हमेशा के लिए बन गए ऋचा के बाबू...अब यादें ही रह गईं


 'सद्गति' में ऋचा-ओमपुरी
महासमुंद के एक गांव में ये रिश्ता करीब 37 साल पहले बना और उसके बाद दिग्गज अभिनेता ओमपुरी जिंदगी भर उनके लिए बाबू ही रहे। अब अपने 'बाबू'  के गुजरने की खबर सुनने के बाद डॉ.ऋचा ठाकुर के जहन में सारी यादें ताजा हो गई हैं। 
डॉ.ऋचा यहां शासकीय डॉ. वामन वासुदेव पाटणकर कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय दुर्ग के नृत्य विभाग की अध्यक्ष है। शुक्रवार 6 जनवरी 2017 की सुबह जब ओमपुरी के गुजरने की खबर आई तो डॉ.ऋचा अपने कॉलेज में भारतीय शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक राष्ट्रीय संगोष्ठी की तैयारियों में लगी हुई थी। इस दौरान उनका फोन लगातार बज रहा था और लोग संवेदनाएं भेज रहे थे।
ओमपुरी के साथ अपने इस भावनात्मक रिश्ते को बताते हुए डॉ ऋचा भी भावुक हो गईं। उन्होंने बताया कि 1981 में महान फिल्मकार सत्यजीत रे छत्तीसगढ़ की पृष्ठभूमि पर मुंशी प्रेमचंद की कृति 'सद्गति' फिल्म बनाने की तैयारी के लिए रायपुर आए थे। चूंकि मेरे पिता डॉ. देवदत्त मिश्र और माता डॉ. सुमन मिश्र रंगकर्मी थे और शंकर नगर स्थित अपने घर में बाल नाट्य केंद्र चलाते थे,लिहाजा एक दिन रे साहब का हमारे घर भी आना हुआ। तब उनके सामने हम बच्चों ने मुंशी प्रेमचंद का नाटक 'ईदगाह' प्रस्तुत किया था। यह नाटक देखते हुए रे साहब ने दो बच्चों (मुझे और हमारे पारिवारिक सदस्य सलील दीवान) को  अपनी फिल्म के लिए चुन लिया।

बाबू का यादगार आटोग्राफ 
तब मेरी उम्र 10-11 साल थी। मुझे मुख्य पात्र दुखी (ओमपुरी) और झुरिया (स्मिता पाटिल) की बेटी धनिया की भूमिका दी गई। रायपुर के छतौना, मंदिर हसौद, पलारी और महासमुंद के पास कुछ गांवों में पूरी फिल्म की शूटिंग हुई। जिसमें मुंबई से मोहन आगाशे और गीता सिद्धार्थ के अलावा छत्तीसगढ़ से वरिष्ठ अभिनेता भैयालाल हेड़ऊ सहित अन्य लोग भी थे। पूरी शूटिंग में हम लोगों खूब एन्ज्वाए किया। कई बार तो लगता था कि मेरे असली माता-पिता यही दोनों हैं। ओमपुरी के साथ आत्मीयता को याद करते हुए डॉ. ऋचा बताती हैं-फिल्म में मुझे उन्हें बाबू कहना था और मैं शूटिंग के बाद भी उन्हें बाबू ही कहती रही। 'बाबू' भी मुझे पितातुल्य स्नेह देते थे। यहां तक कि जब शूटिंग खत्म हो गई और पूरी यूनिट लौटने लगी तो मैनें आटोग्राफ के लिए 'बाबू' के आगे अपनी कॉपी बढ़ा दी। उन्होंने कॉपी ली और 'सद्गति' फिल्म के किरदार को याद करते हुए बोले-धनिया तेरा बाबू तो पढ़ा-लिखा नहीं है, इसलिए ला अंगूठा लगा देता हूं। इसके बाद उन्होंने अंगूठा लगाया और फिर हंसते हुए उसके नीचे अपने आटोग्राफ दे दिए। यह आटोग्राफ मेरे पास 'बाबू' की एकमात्र अनमोल पूंजी है।
डॉ. ऋचा से उनके कॉलेज में हुई मुलाकात 
डॉ ऋचा बताती हैं-फिल्म के बाद बाबू से रिश्ता हमेशा कायम रहा। मैं उन्हें चिट्ठियां लिखती थी तो हर जवाब में वह यह जरूर लिखते थे कि पहले अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान दो, अच्छे से पढ़-लिख लो फिर एक्टिंग के बारे में सोचना।
 बाद के दिनों में रंगमंच और कुछ छत्तीसगढ़ी फिल्मों में सक्रिय रही डॉ. ऋचा ने बताया कि 2014 में जब 'बाबू' रायपुर आए थे तो फोन पर बात हुई थी उसके बाद 2015 में आए तो उनसे मिलने गई थी।
इसके अलावा मोबाइल फोन का दौर आने के बाद उनसे हमेशा बात होती रहती थी। जीवन में कभी भी मार्गदर्शन लेना होता था उनको फोन जरूर लगाती थी।
 आखिरी बार तीन महीना पहले 18 अक्टूबर को उनके जन्मदिन पर विश करने फोन किया था। तब  शायद वह मेहमानों से घिरे हुए थे, फिर भी उन्होंने काफी देर बात की। हालचाल पूछा और मिलने का वादा किया। मुझे नहीं मालूम था कि यह उनसे आखिरी बातचीत होगी।