Tuesday, January 5, 2016

मैनें इंदिरा गांधी नहीं गायत्री देवी से 
प्रभावित होकर लिखी थी 'आंधी' 

प्रख्यात कथाकार व पत्रकार कमलेश्वर से खास चर्चा 


साक्षात्कार के अगले दिन सुबह
भिलाई (12 जनवरी 2003)। प्रख्यात साहित्यकार व पत्रकार कमलेश्वर का मानना है कि साहित्य कोई क्रांति नहीं ला सकता बल्कि क्रांति लाने वालों का मार्गदर्शन भर कर सकता है। 
बहुचर्चित उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' के बेस्ट सेलर बनने से उन्हें अपने उद्देश्यों की पूर्ति का संतोष है। इंदिरा गांधी पर केंद्रित माने जाते रहे बहुचर्चित उपन्यास 'काली आंधी' के संबंध में कमलेश्वर का कहना है कि उन्होंने यह उपन्यास इंदिरा गांधी से प्रभावित होकर नहीं बल्कि जयपुर की महारानी गायत्री देवी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर लिखा था।
 इन दिनों इंदिरा गांधी पर ही महत्वाकांक्षी फिल्म का लेखन कर रहे कमलेश्वर मानते हैं कि सुभाषचंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू और सीमांत गांधी पर भी फिल्म बननी चाहिए। 
कमलेश्वर के मुताबिक छत्तीसगढ़ में श्रेष्ठ साहित्य लिखा जा रहा है क्योंकि यहां के लोग बाजारवाद से दूर हैं। छत्तीसगढ़ी बोली में भाषा बनने की उन्हें पूरी संभावनाएं नजर आती है। 
इन दिन गुजरात त्रासदी पर केंद्रित उपन्यास लिख रहे कमलेश्वर से उनके भिलाई प्रवास के दौरान विशेष बातचील हुई। 


सवाल-जवाब

0 दो वर्ष पूर्व लिखा गया आपका उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' आज भी बेस्ट सेलर है। 
जिन उद्देश्यों को लेकर आपने उपन्यास लिखा, क्या आप उसमें सफल रहे? 
00 इस उपन्यास को जितना विशाल व विराट पाठक समुदाय मिला, उससे निश्चित ही संतोष हुआ। हिंदी में इसके 9 संस्करण निकल चुके हैं और मराठी, उर्दू, बांग्ला व उडिय़ा में इसका अनुवाद हुआ।
कई जगह यह किताब 'ब्लैक' में साइक्लोस्टाइल स्वरूप में भी बिकी। मेरा संदेश ज्यादा लोगों तक पहुंचा। इससे लगता है कि मैं अपने उद्देश्य में सफल रहा। 

0 आपने (काली ) आंधी जैसी संवेदनशील फिल्म लिखी तो मिस्टर नटवरलाल और राम-बलराम जैसी मसाला फिल्म भी. क्या मसाला फिल्म लिखते हुए कहीं आपको अपने स्तर से समझौता करना पड़ा? 
00 कोई समझौता नहीं। अगर मैं व्यावसायिक तरीके से 'मिस्टर नटवरलाल' या 'राम-बलराम' लिख रहा हूं तो मेरा मकसद अपनी फिल्म को सफल बनाना है। अब इसका मतलब यह नहीं कि मैं गलत करूंगा।

जयपुर सांसद गायत्री देवी अपनी जनता की समस्याएं सुनते हुए।

0 आपकी 'काली आंधी' में इंदिरा गांधी की छवि दिखती है? 
00 ऐसा नहीं है, यह लोगों की गलतफहमी है कि 'आंधी' मैंनें इंदिरा गांधी को केंद्र में रख कर लिखी। दरअसल उन दिनों जयपुर में महारानी गायत्री देवी स्वतंत्र पार्टी से लोकसभा का चुनाव लड़ रही थी। 
मैं जयपुर गया था चुनाव की रिपोर्टिंग करने। वहां देखा तो गायत्री देवी एक हाथ मेें नंगी तलवार और सिर पर कलश लिए पूजा के लिए मंदिर जा रही हैं। उनके पीछे हजारों की भीड़ है। उस वक्त मेरे ध्यान में आया कि ऐसी महिलाएं ही राजनीति में आनी चाहिए और इसके बाद मैनें 'काली आंधी' लिखना शुरू किया। 

0 लेकिन इस पर बनीं फिल्म तो इंदिरा गांधी के जीवन के काफी करीब लगती है? 
00 दरअसल जब गुलजार ने 'आंधी' बनाने सुचित्रा सेन को चुना तो उसके सामने कोई मॉडल नहीं था।

 हमनें इंदिरा गांधी, तारकेश्वरी सिन्हा और नंदिनी सत्पथी के चेहरे सामने रखे। जिसमें कहानी के अनुसार सुचित्रा सेन को इंदिरा गांधी की भाव-भंगिमा पसंद आई।इसके बाद सुचित्रा का गेटअप ठीक इंदिरा गांधी की तरह रखा गया, इसलिए लोगों को यह गलतफहमी हो जाती है। 


0 इन दिनों आप इंदिरा गांधी पर केंद्रित महत्वाकांक्षी फिल्म का लेखन कर रहे हैं। क्या आप उसमेें इंदिरा के संपूर्ण व्यक्तित्व से न्याय कर पाएंगे? 
00 जिस तरह रिचर्ड एटनबरो की 'गांधी' थी उसी तरह यह फिल्म होगी। यकीन मानिए, इसमेें इमरजेंसी के हालात, आपरेशन ब्ल्यू स्टार सहित तमाम वह बातें भी होंगी जो इंदिरा के व्यक्तित्व के दूसरे पहलू से भी रूबरू कराती है। 

0 क्या मनीषा कोईराला को दर्शक इंदिरा गांधी के रूप में स्वीकार कर पाएगा, जबकि वह 'छोटी सी लव स्टोरी' से विवादित हो गई हैं?
00 जिस वक्त कलाकार का चयन करना था हम लोगों ने तब्बू, नंदिता दास सेल लेकर दक्षिण व बांग्ला की कई अभिनेत्रियों के चेहरे व भाव-भंगिमा का अध्यन किया। 
लेकिन, कंप्यूटर पर मनीषा का चेहरा इंदिरा के काफी करीब लगा। इसलिए उसे चुना गया। जहां तक 'लव स्टोरी' वाली बात है तो मैं उस विवाद मेें पडऩा नहीं चाहता। आखिरकार मनीषा एक कलाकार भी है और विभिन्न किरदारों को निभाना उसका पेशा है। 

0 इंदिरा गांधी के अलावा राजनीति मेें आपको कोई ऐसा व्यक्तित्व नहीं लगता जिस पर आप फिल्म लिखें और वह चले भी? 
00 क्यों नहीं सुभाषचंद्र बोस हैं, जवाहरलाल नेहरू हैं और फिर सीमांत गांधी भी हैं। इन सब पर फिल्म बननी चाहिए। 

0 इन दिनों सैटेलाइट चैनलों पर जो सीरियल आ रहे हैं उनका समाज में कैसा प्रभाव महसूस करते हैं? 
00 माफ कीजिएगा, इन सीरियलों से मेरे अपने घर की महिलाएं 'डि-वैल्यूड' होती  दिखती है। सीरियलों में और खूबसूरत होती सास या बहू को देख कर मुझे लगता है कि इतनी सुंदर तो मेरे घर की महिलाएं भी नहीं है। 

0 हिंदी की पहली कहानी माधवराव सप्रे ने छत्तीसगढ़ में ही लिखी थी। लेकिन, आज भी साहित्य के नक्शे में छत्तीसगढ़ का विशेष स्थान नहीं बन पाया? 
00 साहित्य में छत्तीसगढ़ का महत्व तो पहले से ही रेखांकित हो चुका है। फिर मैनें पहले ही कहा कि छत्तीसगढ़ के पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी और सप्रे जी के बिना हिंदी साहित्य का इतिहास ही लंगड़ा है। 

0 फिलहाल छत्तीसगढ़ में जो साहित्य लिखा जा रहा है उस पर आपकी टिप्पणी? 
00 यहां छत्तीसगढ़ में तो बहुत अच्छा लिखा जा रहा है। परदेशी राम की कहानियां बहुत अच्छी है। कनक तिवारी, सतीश जायसवाल भी लिख रहे हैं। कबीर पर जितना अच्छा अंक महावीर अग्रवाल ने 'सापेक्ष' का निकाला है, मेरी नजर में पूरे भारत मेें इसकी मिसाल नहीं है। दरअसल छत्तीसगढ़ में इतना अच्छा इसलिए लिखा जा रहा है क्योंकि यहां के लोग बाजारवाद से दूर हैं। 

0 यहां मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने छत्तीसगढ़ी बोली को भाषा का दर्जा दिलाने का संकल्प व्यक्त किया है। आपकी नजर में छत्तीसगढ़ी बोली के भाषा मेें तब्दील होने की क्या संभावनाएं हैं? 
00 बहुत संभावनाएं हैं। छत्तीसगढ़ी में कोई कमी नहीं है। दरअसल जब तक तमाम क्षेत्रीय सहयात्री भाषाएं पुष्ट होकर सामने नहीं आएंगी तब तक हिंदी समृद्ध नहीं होगी। 

0 यहां छत्तीसगढ़ में साहित्य के क्षेत्र में दो लाख रुपए का पुरस्कार विवादित हो गया है। आरोप है कि राज्य के सांस्कृतिक सलाहकार अशोक बाजपेयी के खेमे  से कथित रूप से जुड़े लोगों (विनोद कुमार शुक्ल और कृष्ण बलदेव वैद्य) को ही इस पुरस्कार से नवाजा गया। आपकी क्या राय है? 
00 अगर साहित्यकारों को सम्मान मिल रहा तो ये अच्छी बात है। बाकी बेवजह की बातों में कुछ रखा नहीं है। 

0 आज साहित्य में क्रांति जैसी बातें सुनाई नहीं देती? 
00 दरअसल साहित्य से क्रांति नहीं होती है बल्कि जो लोग क्रांति कर सकते हैं साहित्य उनके काम आता है। 

0 साहित्य में किसी वाद या एजेंडे का लेखन क्या मायने रखता है? 
00 एजेंडे का लेखन गलत है।स्त्री विमर्श,दलित विमर्श यह सब क्या है? यह ज्यादा दूर तक नहीं चल सकता। 

0 प्रारंभिक दिनों में आपने पेंटर का काम भी किया और आपका हस्तलेखन बहुत ही कलात्मक है। क्या आज भी पेंटिंग के शौक से रचनात्मक स्तर पर जुड़े हैं? 
00 नहीं पेंटिंग तो अब नहीं करता। क्योंकि एमएफ हुसैन पेंटिंग को जिस ऊंचाई तक ले गए हैं उसके बाद मुझे लगा कि यह मेरे काम की चीज नहीं है। वैसे मेरा मानना है कि क्रिएटिव ग्रेटनेस किसी भी काम को निरंतर करने से कायम रहती है। 

0 आपके समकालीन और पूर्ववर्ती में ऐसे कौन से व्यक्तित्व हैं, जिन्हे देख कर आपको लगता है कि ऐसा नहीं बन सका? 
00 ऐसा तो कोई भी नहीं। क्योंकि मुझे अपने आप पर भरोसा था। हां, प्रभावित जरूर रहा हूं। गणेश शंकर विद्यार्थी से, प्रेमचंद से और निराला के 3 उपन्यासों से। 

0 प्रधानमंत्री अटलबिहारी बाजपेयी ने गोवा चिंतन मेें जो हिंदूत्व की परिभाषा दी है उससे आप कितना इत्तेफाक रखते हैं? 
गुड़गांव के निवास में 2004
00 यह तो उनके लिए बड़ी सुविधाजनक चीज है। आप बताईए आखिर हिंदुत्व है क्या चीज? उनके अडवाणी, तोगडिय़ा,सिंघल, मोदी और ठाकरे सब का हिंदुत्व अलग-अलग है।
 पहले बाजपेयी ने अमरीका में खुद को संघ का सच्चा स्वयंसेवक कह दिया फिर भारत आकर संघ का मतलब भारत संघ बता दिया। 
अब गोवा चिंतन आया है तो यह सब उनकी सुविधा के हिसाब से है। कम शब्दों में कहूं तो एक मित्र ने कहा है-'बाजपेयी जी आपने घुटने तो बदलवा लिए लेकिन देश के घुटने तोड़ दिए।' 
गुजरात को लेकर अमरीका में बाजपेयी और इंग्लैंड में अडवाणी ने जब शर्मिंदगी का इजहार किया तो फिर गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की ताजपोशी में कैसे चले गए? अभी प्रवासी दिवस मनाया गया।
 इसमें उन्हीं लोगों को बुलाया गया जो थ्री पीस के नीचे भगवा पहनते हैं। पहले उनके लिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था। अब अप्रवासी भारतीयों के साथ इसे अंतरराष्ट्रीय राष्ट्रवाद का नाम दिया जा रहा है। यह बी हिंसक हिंदुत्व का दूसरा रूप है। 

0 तो आखिर हिंदुत्व है क्या? 
00 दरअसल हिंदुत्व तो सावरकर की किताब से पैदा होता है। जिसमें उन्होंने साफ कहा है कि इसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। तो फिर इसे वही लोग 'डिफाइन' करें। 

0 प्रिंट मीडिया में विदेशी पूंजी निवेश से क्या खतरा देखते हैं? 
00 खतरा तो अंग्रेजी पत्रकारिता को होगा, हिंदी पत्रकारिता को नहीं। हां, इससे भाषाई भगवाकरण का खतरा जरूर बढ़ रहा है। 

0 इन दिनों आप क्या लिख रहे हैं? 
00 एक उपन्यास लिख रहा हूं। गुजरात में जो मानवीय त्रासदी हुई, यह उसी पर आधारित है। 
(रविवार 12 जनवरी 2003 को भिलाई निवास में लिया गया इंटरव्यू 13 जनवरी 2003 के हरिभूमि भिलाई-दुर्ग संस्करण में प्रमुखता से प्रकाशित)
 
परिचय
इंटरव्यू के मिनिएचर पर आटोग्राफ
कमलेश्वर (पूरा नाम-कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना) का जन्म 6 जनवरी 1932 को मैनपुरी उत्तरप्रदेश में हुआ। लेकिन, वे अपनी उम्र के साथ भारत की पिछले पांच हजार वर्षों की सांस्कृतिक उम्र को जोडऩा कभी नहीं भूलते। 
अपनी स्कूली पढ़ाई के बाद कमलेश्वर ने इलाहाबाद से इंटर-बीए और फिर हिंदी में एमए की पढ़ाई पूरी की। उनका पहला उपन्यास 'एक सडक़ सत्तावन गलियां' पहले 'हंस' में और फिर 'बदनाम गली' शीर्षक से भी छपा। 
उन्होंने शिक्षा पूरी करने के बाद जीविका के लिए कुछ ऐसे कार्य भी किए जो अब बेहद अविश्वसनीय लग सकते हैं। मसलन किताबों एवं लघु पत्र-पत्रिकाओं के लिए प्रूफ रीडिंग, कागज के डिब्बों पर डिजाइन और ड्राइंग बनाने का काम,ट्यूशन पढ़ाना, पुस्तकों की सप्लाई से लेकर चाय के गोदाम में रात की पाली में चौकीदारी तक शामिल है। 
सन 1948 में पहली कहानी 'कॉमरेड' से लेकर अब तक इनकी साहित्यिक यात्रा में ढेरों कहानियां, उपन्यास, यात्रा संस्मरण, नाटक व आलोचनाएं प्रकाशित हो चुके हैं। पत्रिका 'सारिका' के संपादक (1967-78)के रूप में उन्होंने हिंदी कहानी के समानांतर आंदोलन का नेतृत्व किया। 
उनके कई उपन्यास छपने से पहले पत्रिकाओं में छप कर चर्चित हुए हैं साथ ही फिल्मों के लिए भी उन्होंने खूब लिखा। उनके उपन्यास 'काली आंधी' पर गुलकाार ने 'आंधी' नाम से बेहद सशक्त फिल्म बनाई। 
इसके अलावा उन्होंने मौसम, अमानुष, फिर भी, सारा आकाश जैसी कलात्मक फिल्मों से लेकर 'मि. नटवरलाल','सौतन', 'द बर्निंग ट्रेन' और 'राम-बलराम' जैसी मसाला फिल्मों सहित उन्होंने कुल 99 फिल्मों के लिए लेखन किया। इन दिनों वे इंदिरा गांधी पर बनने वाली महत्वाकांक्षी फिल्म के लिए लेखन कार्य में जुटे हुए हैं।
 दूरदर्शन के अतिरिक्त महानिदेशक (1980-82) रहने के अलावा उन्होंने मीडिया के समस्त क्षेत्रों में काम किया है। दूरदर्शन के लिए अछूते विषयों और सवालों से पूरे देश को झकझोर देने वाले 'परिक्रमा' कार्यक्रम (जिसे यूनेस्को ने दुनिया के 10 सर्वश्रेष्ठ टेलीविजन कार्यक्रम माना था) में कमलेश्वर ने ज्वलंत मुद्दों पर खुली और गंभीर बहस करने की दिशा में साहसिक पहल की थी। 
बीसवीं सदी अवसान की बेला में प्रकाशित उनका उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' आज भी बेस्ट सेलर है। इन दिनों राष्ट्रीय दैनिक में संपादन के अलावा स्वतंत्र लेखन के साथ निजी टीवी चैनल को वे अपनी सेवाएं दे रहे हैं।  27 जनवरी 2007 को फरीदाबाद में उन्होंने आखिरी सांस ली। 

Wednesday, December 16, 2015

..इसलिए 'तमाशा' में नहीं बज पाया तीजन का तंबूरा
पिछले साल रणबीर भिलाई पहुंचे थे तीजन बाई से मिलने
पद्मभूषण तीजन बाई,निज सचिव मनहरण सार्वा और रणबीर कपूर
पिछले साल 27 अगस्त को पूरी तैयारी के साथ भिलाई पहुंचे निर्देशक इम्तियाज अली और अभिनेता रणबीर कपूर की तैयारियां धरी की धरी रह गई। दोनों की तैयारी पद्मभूषण तीजन बाई और उनकी पंडवानी को अपनी फिल्म 'तमाशा' में शामिल करने की थी लेकिन अब जबकि फिल्म स्क्रीन पर आ चुकी है तो परदे पर न तो तीजन बाई हैं और ना ही उनकी पंडवानी। इसके पीछे की वजह भी बेहद दिलचस्प है।  तीजन बाई का कहना है कि-अब तो फिल्म बन चुकी है, इसलिए कुछ कहने का कोई मतलब नहीं है।
अपनी पिछली सुपरहिट फिल्म 'रॉक स्टार' के बाद रणबीर कपूर और इम्तियाज अली की जोड़ी ने 'तमाशा' की तैयारी शुरू कर दी थी। तब अपनी फिल्म के कथानक के लिहाज से दोनों ने सबसे पहले छत्तीसगढ़ की प्रख्यात पंडवानी गायिका पद्मभूषण तीजन बाई से संपर्क किया था। सारी तैयारियों के बाद रणबीर और इम्तियाज सीधे सेक्टर-1 स्थित तीजन बाई के घर पहुंचे थे। जहां से ये लोग तीजन बाई के शिवनाथ नदी तट पर स्थित गांव बेलौदी गए थे। जहां पंडवानी सुनाने के लिए इन्होंने तीजन बाई को परंपरागत ढंग से तैयार करवाया था और पंडवानी की कुछ प्रमुख मुद्राओं की दोनों ने वीडियो रिकार्डिंग भी की थी। इसके बाद सब कुछ गोपनीय रखते हुए दोनों तुरंत रायपुर से मुंबई रवाना हो गए थे।
इसके बाद मीडिया में आई खबरों के बाद माना जा रहा था कि 'तमाशा' में तीजन बाई किसी न किसी रूप में नजर आएंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। 'तमाशा' रिलीज हो चुकी है और छत्तीसगढ़ में ज्यादातर दर्शक तीजन बाई को देखने के लिहाज से सिनेमा हॉल जा रहे है और निराश हो कर लौट रहे हंै। दरअसल इन सबके पीछे जो जानकारी निकल कर आ रही है, वह बेहद दिलचस्प है। तीजन बाई के निज सचिव मनहरण सार्वा बताते हैं कि 'तमाशा' फिल्म में पंडवानी रखने का फैसला हो चुका था लेकिन डायरेक्टर इम्तियाज अली चाहते थे कि आवाज तो तीजन बाई की रहे लेकिन परदे पर अभिनय ईला अरूण करेंगी। इसके लिए एआर रहमान के संगीत निर्देशन में मुंबई पंडवानी रिकार्ड करने की तैयारी भी हो गई थी। प्रस्ताव थोड़ा अटपटा तो था,इस बीच रिकार्डिंग की तारीख तय हुई और तीजन बाई के मोतियाबिंद के आपरेशन की तारीख भी आ गई। ऐसे मेें आपरेशन छोड़ कर रिकार्डिंग पर जाना संभव नहीं था। इसलिए फिल्म में पंडवानी वाला अध्याय रखा ही नहीं गया। इसलिए फिल्म में पंडवानी वाला अध्याय रखा ही नहीं गया।
उल्लेखनीय है कि 'तमाशा'' फिल्म में पौराणिक काल से लेकर आधुनिक काल तक की कई कथाएं एक कहानीकार के माध्यम से दिखाने की कोशिश की गई है। संभव हैं इसी में महाभारत का अध्याय तीजन बाई की पंडवानी के माध्यम से दिखाने की तैयारी इम्तियाज अली और रणबीर कपूर की रही हो। लेकिन विभिन्न कारणों से ऐसा नहीं हो सका। इसलिए फिल्म के क्रेडिट में भी कहीं भी पद्मभूषण तीजन बाई का नाम नहीं है। यह गौरतलब है कि तीजन बाई मंच पर पंडवानी प्रस्तुत करने के अलावा बड़े परदे पर बहुत कम नजर आई हैं। सबसे पहले वह 1986 में श्याम बेनेगल के सीरियल 'भारत एक खोज' में महाभारत वाले अध्याय में पंडवानी प्रस्तुत कर चुकी हैं और 2001 में एक छत्तीसगढ़ी फिल्म 'मयारू भौजी' एक दृश्य में तीजन बाई के रूप में ही गांव में पंडवानी प्रस्तुत करते हुए नजर आई हैं। तीजन बाई के सचिव श्री सार्वा कहते हैं-वैसे भी उन्हें फिल्मों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है। इसलिए 'तमाशा' को लेकर इम्तियाज और रणवीर से आगे बहुत ज्यादा बात नहीं हो पाई।

''इम्तियाज अली और रणबीर कपूर ने महाभारत की गाथा पंडवानी के माध्यम से अपनी फिल्म 'तमाशा' में दिखाने की इच्छा जाहिर की थी और इसलिए ही वो लोग मेरे पास भिलाई आए थे। बाद में कुछ बात भी हुई थी लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी। अब तो फिल्म रिलीज हो चुका है। वैसे इस बारे में इम्तियाज अली और रणबीर कपूर ही बता सकते हैं।''

पद्मभूषण तीजन बाई, प्रख्यात पंडवानी गायिका

Thursday, January 1, 2015

अपने जुनून को पहचानिए, सफलता आपके कदम चूमेगी

भिलाई को एजुकेशन हब का दर्जा दिलाने वाले इस्पात नगरी के पहले
आईआईटी टॉपर ने नए साल पर की अपने दिल की बातें

भिलाई के गौरव नवीन बुद्धिराजा अपने  साथ 
 आज से 31 साल पहले स्टील सिटी भिलाई की चर्चा अचानक देश भर में होने लगी थी। हमारे शहर के छात्र नवीन बुद्धिराजा ने आईआईटी-जेईई में जब 1984 में देश भर में टॉप किया था तो बड़े शहरों के शिक्षाविद भी हैरान रह गए थे कि भिलाई में आखिर ऐसा क्या है। डॉ. नवीन बुद्धिराजा ने तब इतिहास बनाया था और उनके बाद से आईआईटी में सर्वाधिक चयन का कीर्तिमान हमारे शहर का कायम है। स्टील सिटी भिलाई को एजुकेशन हब का दर्जा दिलाने वाले डॉ. बुद्धिराजा तीन दशक में अमेरिका सहित दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में कंप्यूटर साइंस के क्षेत्र में कीर्तिमान बना कर हिंदुस्तान लौट चुके हैं और अब प्रतिष्ठित कंपनी इन्फोसिस का हिस्सा हैं।
उल्लेखनीय है कि डॉ.नवीन बुद्धिराजा और इंफोसिस के वर्तमान सीईओ डॉ. विशाल सिक्का इसके पहले एसएपी (यूएसए) में एक साथ काम कर चुके हैं। इसलिए इन्फोसिस की जवाबदारी संभालते ही डॉ. सिक्का ने अपनी टीम बनाई और इसमें सबसे पहले डॉ. बुद्धिराजा को सीनियर वाइस प्रेसीडेंट और हेड आॅफ टेक्नालॉजी बना कर अमेरिका से हिंदुस्तान बुला लिया। नव वर्ष 2015 के आगमन पर भिलाईवासियों को संदेश देने डॉ. नवीन बुद्धिराजा ने की खास बातचीत।
डॉ. नवीन ने अपने दिल की बात कुछ इस अंदाज में की-मेरा तो जन्म ही भिलाई में हुआ है, इसलिए भिलाई को मैं बचपन से जानता हूं। पिता वायर रॉड मिल में मेकेनिकल इंजीनियर थे और मां बीएसपी सेक्टर-9 हास्पिटल में स्त्रीरोग विशेषज्ञ। मेरी बहन फिलहाल दिल्ली में रहती है। भिलाई के बारे में अगर कोई सबसे अच्छी बात बतानी हो तो मैं कहूंगा कि यह एक ऐसी शानदार जगह हैं, जहां आप अपने दोस्तों के साथ केजी से लेकर हायर सेकंडरी स्कूल तक साथ-साथ पढ़ते और बड़े होते हैं। मैं मानता हूं कि भिलाई मेरे परिवार का एक हिस्सा है और भिलाई में बने दोस्त आज भी मेरे सबसे करीबी दोस्त हैं। फिर बाद के दिनों में भिलाई का एक और महत्व मेरे लिए इसलिए भी है कि मेरी जीवन संगिनी सोनल भी मेरे ही शहर भिलाई की है। हमारे वैवाहिक जीवन को 23 साल हो चुके हैं और हमारी दोनों बेटियां आशली और सायली  भी अपना-अपना भविष्य गढ़ रही हैं।
जहां तक आईआईटी-जेईई टॉप करने की बात है तो तब आज की तरह आपाधापी वाली तैयारी तो नहीं होती थी। आज की तरह हम लोगों के पास कोचिंग-ट्यूशन के इतने विकल्प भी नहीं थे। हां, यह जरूर है कि हम लोग स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ घर पर भी खूब पढ़ाई करते थे। मैं खुशकिस्मत था कि मुझे ऐसे माता-पिता मिले, जिन्होंने मुझे अपने मन की करने की पूरी छूट दी और जहां कहीं भी मुश्किल आई उन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया।
जब परिणाम आया तो मैं तो बेहद खुश था। मुझे अपनी सफलता पर पूरा भरोसा था लेकिन सच कहूं तो मैं साल 1984 का टॉपर रहूंगा, ऐसा तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था। जब मुझे सबसे पहले साथियों से पता लगा तो मुझे खुद यकीन नहीं हुआ लेकिन अंतत: हमारे प्रिंसिपल एमएन बोरले जी ने मुझे बुलाया और कहा कि यह सच है तब मैं यकीन कर पाया। इसके बाद तो बधाईयों का तांता लग गया। स्कूल से लेकर हमारे घर तक हर कोई बधाई देने आता था। यहां तक कि इनमें ऐसे बहुत से होते थे, जिन्हें हम जानते भी नहीं थे। लेकिन यह सब मेरे भिलाईवासी थे, जिन्होंने मेरी सफलता में अपना भी गर्व महसूस किया। भिलाई के लोगों की शुभकामनाएं मुझे आज भी मिलती रहती हैं और मैं मानता हूं कि भिलाई की यही मेरी अनमोल पूंजी है।
आईआईटी टॉप करने के बाद मैनें आईआईटी कानपुर से कंप्यूटर साइंस में डिग्री ली। फिर मैनें कॉरनेल यूनिवर्सिटी न्यूयार्क (यूएसए) से पीएचडी की। इसके बाद मैनें आईबीएम, अमेजॉन और एसएपी जैसी बहुत सी कंपनियों में सेवाएं दी। वर्तमान में मैं इन्फोसिस का हिस्सा हूं। देश-दुनिया में जहां भी रहूं अपने भिलाई के लोगों से मुलाकात हो ही जाती है और तब सब कुछ भूल कर मैं अपने शहर भिलाई के बारे में बात करने में ज्यादा रोमांच महसूस करता हूं। सभी भिलाईवासियों को नए साल 2015 की दिली मुबारकबाद।
भिलाई के छात्रों के लिए कहा-
मैं स्टीव जॉब्स का प्रशंसक रहा हूं। जॉब्स का कथन है कि-‘जीवन आपको सिर्फ एक बार मिलता है, इसलिए इसे दूसरों के हिसाब से जी कर व्यर्थ मत करो।’ मेरे शहर भिलाई के छात्रों से मैं यही कहूंगा कि आज अपना फैसला लेने के लिए आप लोगों के पास विकल्प बहुत से हैं। आज जो भी जानकारी चाहिए, आप के पास इंटरनेट सहित ढेर सारी सुविधाएं मौजूद हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि आप अपने अंदर के जुनून को पहचानो, इसके बाद तय है सफलता आपके कदम चूमेगी।