Saturday, December 24, 2016

क्विज मास्टर बनने कोई स्कूल नहीं, बनना होगा खुद से 

प्रख्यात क्विज मास्टर सिद्धार्थ बसु ने याद किया 37 साल पहले का भिलाई और केबीसी की सफलता बताई

मुहम्मद जाकिर हुसैन/भिलाई
प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान
प्रख्यात क्विज मास्टर सिद्धार्थ बसु का कहना है कि क्विज मास्टर बनने के लिए कोई स्कूल नहीं होता बल्कि इसके लिए आपमें खुद की मेहनत और लगन जरूरी है। करीब 37 साल बाद 16 दिसंबर को भिलाई आए बसु को इस बार हरियाली और बिल्डिंग ज्यादा दिखी। यहां एमजीएम स्कूल में क्विज प्रतियोगिता के होस्ट के तौर पर आए थियेटर-फि ल्म आर्टिस्ट, क्विज मास्टर और कई किताबों के लेखक सिद्धार्थ बसु ने इस संवाददाता से चर्चा करते हुए कौन बनेगा करोड़पति (केबीसी) की सफलता से लेकर कई सवालों के जवाब दिए। 
भिलाई से अब लाल मुरुम के मैदान गायब
सिद्धार्थ ने बताया कि करीब 37 साल पहले वह भिलाई स्टील प्लांट पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने अपनी टीम लेकर आए थे। तब रायपुर एयरपोर्ट से भिलाई पहुंचते वक्त दूर-दूर तक लाल मुरुम के मैदान नजर आ रहे थे और थोड़ी बहुत हरियाली भी थी। अब आया हूं तो बड़ी-बड़ी बिल्डिंग और काफी ग्रीनरी दिखाई दे रही है। कार्यक्रम के बाद मैं भिलाई घूम कर अपनी 37 साल पुरानी यादों को जरूर ताजा करना चाहूंगा। 
मैनें काम और शौक को कभी अलग नहीं किया
थियेटर,आकाशवाणी, फिल्म, क्विज, लेखन सहित अनेक विधाओं में लगातार सक्रियता के संबंध में सिद्धार्थ बसु ने कहा कि उन्होंने जीवन में अपने शौक और काम को कभी भी अलग नहीं किया। इस वजह से थियेटर भी खूब किया। डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाई और दूरदर्शन के दौर में क्विज टाइम की शुरूआत की। फिर सैटेलाइट चैनलों का दौर आया तो ढेर सारे दूसरे प्रोग्राम के साथ-साथ ‘कौन बनेगा करोड़पति’ लेकर हम लोग आ गए। काम अभी भी ढेर सारा कर रहे हैं लेकिन सब कुछ अपने मन का ही करते हैं। 
 ऑटोग्राफ की गुजारिश
 पूरी हो रही है
फिल्में मैं शाहरूख के लिए छोड़ चुका
सिद्धार्थ ने मजाकिया लहजे में कहा कि फिल्मों में वह हाल के कुछ सालों में आए हैं, वह भी तब जबकि वह 60 के हो चुके हैं। उन्होंने हंसते हुए कहा-मैं चाहता तो पहले भी फिल्में कर सकता था लेकिन मैनें फिल्में शाहरूख के लिए छोड़ दी। आखिरकार थियेटर में हम दोनों के गुरु एक ही शख्स बैरी जॉन थे। सिद्धार्थ ने बताया कि शुजीत सरकार की ‘मद्रास कैफे’ में रॉ अफसर से लेकर मलयाली में रोशन एंड्र्यू की सुपरहिट मूवी ‘हाऊ ओल्ड आर यू?’ में राष्ट्रपति तक की भूमिकाएं कर चुके हैं। अभी भी फिल्में वह बहुत कम करते हैं। 
खुद दुविधा में थे अमिताभ भी 
सिद्धार्थ बसु ने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ से जुड़े कई सवालों के जवाब दिए। उन्होंने बताया कि 16 साल पहले जब इस क्विज कार्यक्रम को डिजाइन किया गया तो अमिताभ बच्चन को लेने का फैसला किसी एक का नहीं बल्कि पूरी टीम का था लेकिन खुद अमिताभ बच्चन भी दुविधा में थे। उन्होंने करीब 3.5 महीने हां बोलने में लगा दिए। नतीजा सबके सामने था अमित जी बड़े परदे से छोटे परदे पर आए और छोटा परदा सचमुच में काफी बड़ा हो गया। 
..और मिल गया आटोग्राफ
ध्यान रखते हैं फिर भी गलतियां संभव
सिद्धार्थ ने बताया कि केबीसी में पूछे जाने वाले सवाल और जवाब में पूरी सावधानी बरती जाती है और कोशिश ‘जीरो एरर’ की होती है। इसके बावजूद कुछ एक सवाल-जवाब पर सवाल उठे थे। हमनें वहां अपनी गलती स्वीकार की। हमारे पास हर सवाल और उसके जवाब को क्रास चेक करने पूरी टीम है। उन्होंने बताया कि केबीसी का अगला सीजन फिलहाल सोनी चैनल पर निर्भर है। 
भारत भाग्य विधाता कौन यह रवींद्रनाथ बता चुके 
सिद्धार्थ बसु ने क्विज से जुड़े सवालों पर एक संदर्भ देते हुए कहा कि ज्यादातर लोग राष्ट्रगान जनगणमन को संस्कृत का समझते हैं लेकिन यह है बांग्ला में। वह भी साधु कम्युनिटी में बोली जाने वाली बांग्ला में। जब रवींद्रनाथ ठाकुर ने यह गान रचा तो तब से अब तक कई बार लोग यह स्थापित करने की कोशिश करते हैं कि इसमें भारत भाग्य विधाता के रूप में अंग्रेजी राजा जार्ज पंचम को संबोधित किया गया है। जबकि वास्तविकता यह है कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपनी जीवन काल में ही स्पष्ट कर दिया था कि उनका भारत भाग्य विधाता Al Mighty GOD (सर्वशक्तिमान परमेश्वर) है। 
बोकारो प्रथम, राउरकेला द्वितीय और इटारसी की टीम तृतीय रही
हम साथ-साथ हैं 
कलकत्ता डायोसियन मिशन एजुकेशन बोर्ड द्वारा एमजीएम स्कूल सेक्टर-6 में राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त मास्टर सिद्धार्थ बसु के तत्वाधान में प्रथम अंतर एम.जी.एम. स्कूल क्विज प्रतियोगिता का आयोजन शुक्रवार को किया गया। जिसमें एमजीएम ग्रुप के स्कूलों से 9 स्कूलों की टीम शामिल हुई। इस अवसर के मुख्य अतिथि अमरेष कुमार मिश्रा, पुलिस अधीक्षक दुर्ग थे। विशिष्ट अतिथि वेरी रेव्ह.फादर जार्ज मैथ्यू रम्बान, रेव्ह फादर पीटी थामस, रेव्ह फादर जोशी वर्गीस, रेव्ह.फादर जोस के वर्गीस, रेव्ह.फादर कूरियन जॉन, कॉरस्पोडेंट राजन मैथ्यू, गिलसन थॉमस, सुरेश जेकब, टी.जी. मनोज.रॉय थॉमस, सी.व्ही. जॉन   चर्च एवं शाला प्रबंधन कमेटी के सदस्यगण ,एमजीएम ग्रुप स्कूल के प्राचार्यगण, शाला के शिक्षकगण एवं अन्य सदस्यगण व छात्र-छात्राएँ उपस्थित थे। विद्यालय की प्रभारी सुजया कुमारी ने स्वागत में भाषण दिया तथा मुख्य अतिथि अमरेश कुमार मिश्रा ने सभा को उद्बोधित किया। शाला के छात्र-छात्राओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। इस प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त एमजीएम बोकारो को नगद पुरस्कार के रूप में 10001 रूपए व प्रशस्ति पत्र, द्वितीय स्थान प्राप्त एमजीएम राउरकेला को नगद पुरस्कार 7001 रूपए व प्रशस्ति पत्र तथा तृतीय स्थान प्राप्त एमजीएम इटारसी को नगद पुरस्कार 5001 रूपए व प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया। वेरी रेव्ह.फादर जार्ज मैथ्यू रम्बान द्वारा धन्यवाद ज्ञापित किया गया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
 

Friday, September 16, 2016

''रिटायरमेंट'' का फैसला मेरा खुद का था, चुनाव लड़ने से न किसी ने रोका ना कहा


पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा ने अनौपचारिक चर्चा में की अपने दिल की बातें 

मुहम्मद जाकिर हुसैन
  नोएडा स्थित निवास में यशवंत सिन्हा
देश के वित्त व विदेश मंत्री रह चुके वरिष्ठ राजनेता यशवंत सिन्हा अब सार्वजनिक बात करने से थोड़ा परहेज करते हैं। उनकी शिकायत है कि जो वो कहते हैं, उससे लोगों में गलतफहमी ज्यादा हो जाती है। श्री सिन्हा का कहना है कि यह ''रिटायरमेंट'' उन्होंने खुद चुना है। इन दिनों वह अपनी आत्मकथा लिख रहे हैं, जो साल भर में पाठकों के समक्ष होगी। इसलिए उनका कहना है कि- हमेशा मेरा कहना जरूरी नहीं, अब जो कहेगी मेरी किताब कहेगी। 2 सितंबर 2016 की सुबह नोएडा स्थित निवास पर यशवंत सिन्हा व श्रीमती नीलिमा सिन्हा से अनौपचारिक मुलाकात हुई। इस दौरान भिलाई से लेकर देश तक की बातें हुई। इनमें से कुछ बातें यशवंत सिन्हा जी के साथ सवाल-जवाब की शक्ल में-
0 आप मुख्यधारा की राजनीति से बिल्कुल दूर हो गए हैं, क्या यह आपका राजनीतिक वनवास है? 
00 इसे वनवास कहना ठीक नहीं। दरअसल यह एक तरह का रिटायरमेंट है, जिसे मैनें खुद चुना है। क्योंकि मेरा मानना है कि दो तरह की राजनीति में सक्रिय रह कर देशहित में कार्य किया जा सकता है। पहला तो आप सक्रिय राजनीति में रह कर चुनाव लड़ें और मंत्री या जनप्रतिनिधि रहते हुए योगदान दें और दूसरा किसी राजनीतिक दल अथवा संगठन में रहते हुए देश की चिंता करें। जैसा कि गांधी जी और जयप्रकाश जी ने करते हुए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई थी. हालांकि अभी मैं गांधी जी और जयप्रकाश जी वाली भूमिका से कुछ दूर हूं।
0..तो क्या 2014 का लोकसभा चुनाव नहीं लडऩे का फैसला आपका खुद का था? 
00मुझे चुनाव लडऩे से न किसी ने रोका न ही किसी ने कोई प्रस्ताव दिया। जब उन्होंने (इशारा पार्टी के नीति निर्धारकों की तरफ) 75 साल से उपर वालों का नियम बनाया था तो मैनें उसके पहले ही तय कर लिया था कि अब संसदीय चुनाव नहीं लड़ूंगा और इस तरह 2014 में मैं अपनी परंपरागत सीट हजारीबाग (झारखंड)से उम्मीदवार नहीं था।
0 मोदी सरकार में मंत्री आपके सुपुत्र जयंत सिन्हा के कामकाज में आपका कितना मार्गदर्शन या दखल रहता है? 
00 बतौर मंत्री जयंत का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है और मैं नहीं समझता कि मुझे उन्हें इसमें किसी तरह का मार्गदर्शन देना चाहिए। हां, एक परिवार में जैसे पिता-पुत्र की बात होती है हमारे रिश्ते भी वैसे ही हैं। मंत्री के तौर पर जयंत क्या करते हैं, उससे मुझे सरोकार नहीं लेकिन हजारीबाग के विकास को लेकर हमारी चर्चा जरूर होती है।
सिन्हा दंपत्ति के साथ 
0 आज केंद्र में भाजपा सरकार है और आप पूर्व में बाजपेयी सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय संभाल चुके हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दोनों सरकारों में भूमिका को लेकर क्या फर्क देखते हैं? 
00 आज की सरकार पर टिप्पणी करना मेरा मकसद नहीं है क्योंकि इससे गलतफहमी ज्यादा बढ़ जाती है। वैसे भी हम तो संघ के बाहर के हैं। इतना जरूर है कि तब (बाजपेयी सरकार के दौरान) हमारे वक्त में संघ तो हावी नहीं हो पाया था और ज्यादातर फैसलों में  संघ के लोग हमारे विरोध में ही थे।
0 सार्वजनिक जीवन में अब कैसी सक्रियता या व्यस्तता रहती हैं? 
00 देखिए, अपने परंपरागत निर्वाचन क्षेत्र रहे हजारीबाग के लिए तो लगातार काम कर रहा हूं। पिछले साल वहां रेल नेटवर्क आ गया। यहां दिल्ली में टेलीविजन चैनलों के शाम के डिबेट में मैं जाता नहीं। क्योंकि आधे घंटे की चिल्लपो में आपको 2 मिनट बोलने का मौका मिलता है और उसमें भी एंकर हावी होने लगता है। इसलिए मैनें सभी चैनलों को साफ मना कर दिया है। पिछले साल हिंदी के एक बड़े अखबार  ने मुझे साप्ताहिक कॉलम लिखने प्रस्ताव दिया था। तीन हफ्ते मैनें कॉलम लिखा भी। फिर मुझे लगा कि वह अखबार पत्रकारिता के मानदंडों पर खरा नहीं उतर रहा है तो मैनें वहां लिखना बंद कर दिया। अब सिर्फ एनडीटीवी इंडिया के लिए हर हफ्ते ब्लॉग लिख देता हू्ं।
0 कलराज मिश्र जैसे कुछेक अपवादों को छोड़ कर पार्टी के 75 पार वरिष्ठ नेताओं को मंत्री न सही राज्यपाल तो बनाया जा रहा है। क्या ऐसा कोई प्रस्ताव मौजूदा सरकार की ओर से आपको मिला?
00 यह सवाल ही नहीं उठता। मुझे अपने फैसले खुद लेने की आदत है। राज्यपाल बनना होता तो 1990 में ही बन जाता। तब के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने एक रोज बुलाया और बोले -आपको पंजाब का राज्यपाल बना कर भेजना चाहते हैं। तब मैनें साफ मना कर दिया था। आज ऐसा कोई प्रस्ताव केंद्र सरकार की तरफ से नहीं आया और न ऐसा प्रस्ताव स्वीकार कर सकता हूं।
  भिलाई में ब्याह
0अगले साल राष्ट्रपति चुनाव को लेकर क्या उम्मीदें दिखाई देती हैं? 
00प्रत्याशी तय करना उनका (केंद्र सरकार) का फैसला है। मैंनें अपनी लाइफ तय कर ली है। तो,ऐसी उम्मीदें मैं क्यों पालूं। हां, पार्टी के अंदर कुछ नाम जरूर सुन रहा हूं। जिनका मैं खुलासा नहीं कर सकता। हालांकि धारणा यह बन रही है कि जो चर्चा में नहीं है, ऐसा कोई नया नाम सामने आएगा।
0पाकिस्तान को लेकर हमारे देश की नीति कैसी होनी चाहिए?
00(मोदी सरकार पर टिप्पणी नहीं करने की शर्त पर उन्होंने कहा) मैं जनरल मुशर्रफ की जीवनी पढ़ रहा था, उसमें एक जगह वह लिखते हैं-इंडिया से वालीबॉल का मैच जीतने पर पाकिस्तान में जबरदस्त खुशी का माहौल था। तो दोनों देशों में खेल में हार-जीत पर खुश होने वाली स्थिति है। बहुत सी बातें ऐसी हैं कि जिनसे यह बार-बार जाहिर करने की कोशिश होती है कि पाकिस्तान हमारे बराबर का देश है। कश्मीर को लेकर अब तक हमारे देश मेें एक नीति नहीं रही है। अब तक जो भी प्रधानमंत्री आए, उन्होंने अपने अनुसार नीति बना ली।
0 देश की आर्थिक नीति और विदेश नीति से कितने संतुष्ट हैं? 
00 इन पर मेरा कुछ भी सार्वजनिक कहना ठीक नहीं।
0 राजनीतिक जीवन में इतने अनुभव के बाद अचानक चुप्पी को जनता क्या समझे? 
00इसे चुप्पी न समझें। अपनी बायोग्राफी (आत्मकथा) लिख रहा हूं। अगले साल तक पूरी हो जाएगी। उसमें सारी बातें लिखूंगा। पब्लिशर से बात हो गई है। जरा इंतजार कीजिए।
0छत्तीसगढ़, खास कर भिलाई से आपका रिश्ता रहा है, उसे कैसे बयां करेंगे? 
00अब इस बात को पूरे 56 साल हो चुके हैं। (पत्नी नीलिमा सिन्हा की तरफ इशारा करते हुए) इनके पिता निर्मलचंद्र श्रीवास्तव जी भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के जनरल मैनेजर थे और वहीं भिलाई के डायरेक्टर बंगला में हमारी शादी हुई। अरसा बीत गया है लेकिन भिलाई की तरक्की की खबर मिलते रहती है। भिलाई ने अच्छी तरक्की की है और छत्तीसगढ़ तो पिछले 16 साल में काफी बदल गया है। सुन कर और जानकर अच्छा लगता है। 

Saturday, July 30, 2016

भिलाई के आकाश ने ‘मोहेंजो-दारो’
पर आशुतोष-ऋत्विक को घसीटा कोर्ट में 

दावा-1995 में लिखी थी पटकथा, आज भी इसी नाम से मशहूर है उनका नाटक, बाम्बे हाईकोर्ट करेगा फैसला, 12 अगस्त 2016 को  रिलीज होनी है ऋत्विक की फिल्म

मुहम्मद जाकिर हुसैन/भिलाई

आशुतोष गोवारीकर-ऋत्विक रोशन की बहुचर्चित फिल्म ‘मोहेंजो-दारो’ की  पटकथा को लेकर बाम्बे हाईकोर्ट में दाखिल केस के याचिकाकर्ता इस्पात नगरी भिलाई में पले-बढ़े युवा फिल्मकार आकाशादित्य लामा हैं। आकाश का कोर्ट में दावा है कि उन्होंने 1995 में ‘मोहेंजो-दारो’ की पटकथा लिखी थी  2003 में आशुतोष गोवारीकर को यह पटकथा पढ़ने दी थी। आकाश ने अपनी याचिका में साफ कहा है कि उनकी स्क्रिप्ट चोरी कर आशुतोष ने ‘मोहेंजो-दारो’ बना ली है। अब 12 अगस्त को फिल्म रिलीज होने वाली है। उसके पहले कोर्ट में सुनवाई भी चल रही रही है।
इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर फिल्म जगत तक में ‘मोहेंजो-दारो’ पर उठा विवाद सुर्खियों में है। अपनी स्क्रिप्ट चोरी होने का आरोप लगा रहे आकाश ने ‘हरिभूमि’ से चर्चा करते हुए कहा कि उन्हें सस्ती लोकप्रियता का कोई शौक नहीं है, इसलिए 2010 में जैसे ही उन्हें गोवारीकर द्वारा ‘मोहेंजो-दारो’ फिल्म शुरू करने की जानकारी मिली, उन्होंने तुरंत ई-मेल भेजा। जिसमें साफ तौर पर मैनें कह दिया था कि अभी फिल्म शुरू नहीं हुई है और वह किसी सस्ती लोकप्रियता के लिए ऐसा कुछ नहीं करना चाहते। लेकिन स्क्रिप्ट का क्रेडिट उन्हें दिया जाना चाहिए। लेकिन बकौल आकाश, उन्हें कोई जवाब नहीं मिला। आकाश ने बताया कि भिलाई से ग्वालियर जाने के बाद उन्होंने 1995 में ‘मोहेंजो-दारो’ की पटकथा लिखना शुरू की थी। इसके बाद 1997 में जब वह मुंबई पहुंचे तो फिल्म बनाने का सपना लिए काम की तलाश करते रहे। इस बीच 2000 में बन रही ‘गदर-एक प्रेम कथा’ में डायरेक्टर अनिल शर्मा के असिस्टेंट डायरेक्टर बन गए। यहां से इंडस्ट्री में कई लोगों से संपर्क बढ़ा और इस बीच आशुतोष गोवारीकर की ‘लगान’ के एडिटर जसविंदर बल्लू सलूजा से उन्होंने ‘मोहेंजो-दारो’ की अपने हाथ से लिखी स्क्रिप्ट सौंपते हुए गोवारीकर से मीटिंग करवाने का अनुरोध किया था। लेकिन मीटिंग के बजाए 4 दिन रखने के बाद गोवारीकर ने यह कह कर स्क्रिप्ट लौटा दी कि ‘लगान’ के बाद उनका इरादा एतिहासिक कथानक पर फिल्म बनाने का नहीं है।
इसके बाद जब 2010 में उन्हें गोवारीकर द्वारा ‘मोहेंजो-दारो’ फिल्म शुरू किए जाने की खबर मिली तो उन्होंने तत्काल ई-मेल भेजा। 2 साल बाद आकाश ने फिर से गोवारीकर को ई-मेल भेजा लेकिन दोनों ई-मेल का कोई जवाब नहीं मिला। आकाश ने बताया कि उन्होंने अपनी यह स्क्रिप्ट बकायदा राइटर एसोसिएशन मुंबई और कॉपीराइट आॅफिस दिल्ली में रजिस्टर्ड करवा रखी है। इसके बाद उन्होंने गोवारीकर को लीगल नोटिस भी भेजा। अब मामला बाम्बे हाईकोर्ट में है। आकाश ने बताया कि कोर्ट में सुनवाई के दौरान गोवारीकर फिल्मस के वकीलों ने यह तो स्वीकार कर लिया है कि स्क्रिप्ट दी गई थी। इसकेअलावा कोर्ट के आदेश पर हमने स्क्रिप्ट से जुड़े अपने सारे दस्तावेजों का परीक्षण भी करवा लिया है। आकाश ने स्क्रिप्ट चोरी के इस मामले मे आशुतोष गोवारीकर के साथ ऋत्विक रोशन, यूटीवी मूवीज और वाल्ट डिजनी इंडिया को कटघरे में खड़ा किया है।
भिलाई में जन्में, अब छोटे-बड़े परदे पर सक्रिय
आकाशादित्य लामा भिलाई में जन्में और पले-बढ़े हैं। उनके पिता हरीशचंद्र लामा यहां सीआईएसएफ में पदस्थ थे और आकाश ने विवेकानंद स्कूल व ईएमएमएस सेक्टर-2 के बाद 1994 में सीनियर सेकंडर स्कूल सेक्टर-4 से 12 वीं पास की है। यहां पाटन और कोहका में आज भी पैतृक जमीन व मकान है और परिचितों व रिश्तेदारों से मिलने वह अक्सर भिलाई आते रहते हैं। आकाश ने 2012 में फिल्म ‘सिगरेट की तरह’ बनाई थी। इसके अलावा वह छोटे परदे पर कुमकुम, कुसुम और हमारी बेटियों का विवाह जैसे सीरियल लिख चुके हैं। डेढ़ घंटे की अवधि का उनका लिखा नाटक ‘मोहेंजो-दारो’ वर्ष 2005 से लगातार मंचित हो रहा है। अब तक उज्जैन, इंदौर, कोलकाता, गोवा और चंडीगढ़ में इसके सफल शो हो चुके हैं। संयोग से आकाश के इस बहुचर्चित नाटक का पोस्टर भिलाई से अंतरराष्ट्रीय स्तर की फैशन फोटोग्राफी में अपना अलग मकाम बनाने वाले शिराज हेनरी ने डिजाइन किया है।