Tuesday, April 16, 2019

देश का पहला आमचुनाव और दुर्ग संसदीय 

सीट को मिले सर्वाधिक 4 निर्वाचित सांसद



वासुदेव श्रीधर किरोलीकर,भगवतीचरण शुक्ल और गुरू अगम दास एक साथ 

निर्वाचित हुए और उपचुनाव में मिनीमाता ने भी किया दुर्ग का प्रतिनिधित्व



मुहम्मद जाकिर हुसैन 

वासुदेव किरोलीकर, भगवती चरण शुक्ल, गुरु अगम दास , मिनीमाता 
क्या आप जानते हैं कि देश के पहले आमचुनाव (1952) में दुर्ग लोकसभा को एक या दो नहीं बल्कि पूरे चार निर्वाचित सांसद मिले थे। इनमें तीन सांसद तो एक ही वक्त में निर्वाचित हुए थे और एक सांसद को उपचुनाव में निर्वाचि घोषित किया गया था। इन निर्वाचित सांसदों में भगवतीचरण शुक्ल, वासुदेव श्रीधर किरोलीकर और गुरू अगम दास के बाद मिनीमाता ने भी दुर्ग का प्रतिनिधित्व किया है।  
स्वतंत्र भारत की पहली लोक सभा ने 17 अप्रैल 1952 से 4 अप्रैल 1957 तक अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया था। उस समय लोकसभा की कुल 489 सीटें थीं लेकिन संसदीय क्षेत्र 401 ही थे। इनमें 314 संसदीय क्षेत्र ऐसे थे, जहां से सिर्फ  एक-एक प्रतिनिधि का निर्वाचन हुआ था। वहीं 86 संसदीय क्षेत्र ऐसे थे जहां एक साथ 2 जनप्रतिनिधि का निर्वाचन हुआ। इनमें से एक सामान्य वर्ग से और दूसरा सांसद एससी/अनुसूचित जाति समुदाय से चुना गया था। इसके अलावा पश्चिम बंगाल में एक सीट ऐसी भी थी, जहां एक साथ तीन प्रतिनिधियों के निर्वाचन की व्यवस्था थी। 
अब बात करते हैं छत्तीसगढ़ और दुर्ग की। इस आम चुनाव में छत्तीसगढ़ में दुर्ग, रायपुर (संयुक्त रूप से एक सीट), दुर्ग-बस्तर (संयुक्त रूप से एक सीट) के साथ-साथ सरगुजा और रायगढ़ में द्विसदस्यीय तथा महासमुंद, दुर्ग व बस्तर में एक सदस्यीय लोकसभा सीट थी। आज का दुर्ग लोकसभा तब सीपी एंड बरार प्रांत के अधीन आता था। यहां लोकसभा-विधानसभा चुनाव एक साथ करवाने के लिए अधिसूचना 6 मार्च 1952 को जारी हुई। नामांकन पत्र दाखिले की आखिरी तारीख 13 मार्च, नामांकन पत्रों की जांच 14 मार्च, नाम वापस लेने की तिथि 17 मार्च और मतदान की तिथि 27 मार्च 1952 थी।
पहले लोकसभा चुनाव के दौरान पृथक राजनांदगांव जिला और राजनांदगांव लोकसभा  सीट का गठन नहीं हुआ था, इस लिहाज से दुर्ग जिले की सीमा सुदूर बस्तर तक लगती थी। ऐसे में दुर्ग और बस्तर को मिलाते हुए घोषित की गई दुर्ग-बस्तर (सामान्य) सीट पर कुल मतदाता 3,94,803 थे, जिनमें 2,14,924 ने मत दिए और मतदान 54.4 प्रतिशत रहा। इस चुनाव में कांग्रेस के भगवती चरण शुक्ल को 1,02,666, राम राज्य परिषद के हनुमान प्रसाद ब्रह्मचारी को 48017, किसान मजदूर प्रजा पाटी के राधेश्याम को 44,498 और समाज पार्टी के सरजू प्रसाद को 19 हजार 743 मत मिले। इस तरह भगवती चरण शुक्ल इस चुनाव में विजेता रहे। 
इसी तरह दुर्ग के पूर्वी हिस्से को रायपुर व बिलासपुर के साथ मिलाते हुए एक अन्य सीट बिलासपुर-दुर्ग व रायपुर (संयुक्त) भी बनाई गई थी। जिसमें 7 लाख 59 लाख 650 मतदाता थे। इनमें 5,29,272 ने मत दिया और 34.8 प्रतिशत मत पड़े। इस चुनाव में कांग्रेस के गुरु अगमदास को 1,16,713, कांग्रेस के ही भूपेंद्र नाथ मिश्रा को 1,00,011,  किसान मजदूर प्रजा पाटी के केशव प्रसाद को 90,571 और राम राज्य परिषद के ठाकुर धरमराज सिंह 68,442 मत मिले। इस चुनाव में गुरु अगमदास विजेता रहे। 
दुर्ग लोकसभा सामान्य सीट में कुल मतदाता 3,98,341 थे। जिनमें 191,348 मतदाताओं ने हिस्सा लिया और 48.0 प्रतिशत मतदान हुआ। जिसमें कांग्रेस के वासुदेव श्रीधर किरोलीकर को 1,21,648, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के  गंगा प्रसाद को 29,422, किसान मजदूर प्रजा पाटी के उदय प्रसाद को 20,694 और समाज पार्टी के सुरजन सिंग को 19,584 मत मिले। 

हरिभूमि 15 अप्रैल 2019 

इस तरह पहले आम चुनाव में दुर्ग जिले को तीन जनप्रतिनिधि मिले। इनमें  दुर्ग-बस्तर से निर्वाचित भगवतीचरण शुक्ल तत्कालीन सीपीएंड बरार के मुख्यमंत्री पं. रविशंकर शुक्ल के बेटे थे। वहीं दुर्ग सामान्य सीट से निर्वाचित कांग्रेसी वासुदेव श्रीधर किरोलीकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। इनके अलावा बिलासपुर-दुर्ग व रायपुर (संयुक्त) से निर्वाचित गुरू अगमदास की ख्याति सतनाम पंथ के गुरू के रूप मेें थी। 
इन तीनों जनप्रतिनिधियों में भगवतीचरण शुक्ल और वासुदेव श्रीधर किरोलीकर ने अपना संसदीय पांच साल का कार्यकाल पूरा किया लेकिन गुरू अगमदास अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए। सांसद रहते हुए 2 अक्टूबर 1954 को उनका निधन हुआ। इसके बाद भारतीय निर्वाचन आयोग ने 10 फरवरी 1955 को इस बिलासपुर-दुर्ग व रायपुर (संयुक्त)सीट पर उपचुनाव करवाया। जिसमें गुरू अगमदास की पत्नी मिनी माता निर्वाचित हुईं और छत्तीसगढ़ की पहली महिला निर्वाचित सांसद बनीं। 

Wednesday, March 13, 2019

भिलाई के अभय ने आईआईटी बॉम्बे 

को दान किए 10 करोड़ 



व्यक्तिगत दान में यह अब तक की सबसे बड़ी रकम, मुंबई में वित्तीय फर्म चलाते हैं अभय



इस्पात नगरी भिलाई में पले-बढ़े अभय पांडेय ने एक अनूठी मिसाल पेश करते हुए आईआईटी बॉम्बे को 10 करोड़ रूपए दान में दिए हैं। किसी पूर्व छात्र द्वारा आईआईटी बॉम्बे को दिया गया यह सर्वाधिक राशि का व्यक्तिगत दान है। इन दिनों मुंबई में अपनी वित्तीय फर्म चला रहे अभय ने कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सेवाएं दी है। आईआईटी बॉम्बे ने इस दान के लिए सोशल मीडिया पर भी उनका शुक्रिया अदा किया है। अभय पांडेय ने चर्चा करते हुए बताया कि उन्होंने इसके लिए कोई प्लानिंग नहीं की थी, बस मन में आया तो अपने पूर्व संस्थान के लिए दान कर दिया। 
उल्लेखनीय है कि अभय पांडेय भिलाई में पले-बढ़े हैं। सेक्टर-8 में उनका निवास था। उनके पिता कमलेश्वर पांडेय यहां एचएससीएल में इलेक्ट्रिकल इंजीनियर थे। अभय की स्कूली शिक्षा ईएमएमएस सेक्टर-9 और उसके बाद बीएसपी सीनियर सेकंडरी स्कूल सेक्टर-10 से हुई है। यहां 1989 में 12 वीं के बाद उन्होंने आईआईटी बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस में बीटेक किया। इसके बाद उन्होंने आईआईएम कोलकाता से एमबीए की डिग्री ली और फिर कई प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सेवा देते हुए अब मुंबई में अपनी वित्तीय फर्म ए-91 पार्टनर चला रहे हैं।
अभय ने बताया कि आईआईटी के 1993 बैच की सिल्वर जुबली गत वर्ष थी। जिसमें सभी पूर्व छात्र जुटे थे। इस दौरान मानविकी और सामाजिक विज्ञान की एनेक्सी बिल्डिंग निर्माण की बात सामने आई तो सभी पूर्व छात्रों के मन में भावना थी कि अपनी तरफ से चैरिटी की जाए। इसके बाद सभी ने मिलाकर कुल 25 करोड़ रूपए जुटाए, जिनमें सर्वाधिक हिस्सा 10 करोड़ के रूप में उन्होंने दिया है। यह राशि तीन दिन पहले आईआईटी बॉम्बे में आयोजित एक कार्यक्रम में समर्पित कर दी गई। अभय ने कहा कि उन्हें बेहद खुशी है कि अपने पूर्व संस्थान के लिए कुछ कर पाए हैं। अभय के छोटे भाई आलोक पांडेय ने बताया कि उनकी इस भावना का पूरा सम्मान करते हुए परिवार बेहद गौरवान्वित महसूस कर रहा है। 
आईआईटी बॉम्बे को 10 करोड़ रूपए दान में देकर सुर्खियों में आए अभय पांडेय अपने बचपन के शहर भिलाई में भी शिक्षा की बेहतरी के लिए लगातार प्रयासरत हैं। उन्होंने अपने चार दोस्तों के साथ मिलकर भिलाई एजुकेशन चेरिटेबल ट्रस्ट बनाया है, जो 2014 से भिलाई के मेधावी बच्चों को छात्रवृत्ति दे रहा है, वहीं खस्ताहाल स्कूलों की दशा सुधारने भी पहल कर रहा है। इस ट्रस्ट में हांगकांग में बैंक आॅफ अमेरिका में मैनेजिंग डायरेक्टर राजकुमार सिंघल, वकालत में स्नातकोत्तर और वर्तमान में सिंगापुर में रह रहीं लेखिका जूही शुक्ला और भिलाई से मैत्री एजुकेशनल सोसाइटी के डायरेक्टर सजीव सुधाकरन शामिल हैं। ट्रस्ट ने मरोड़ा स्थित आजाद हिन्द स्कूल की दशा सुधारने कई पहल की है। जहां डिजीटल क्लास रूम से संबंधित गतिविधियों को समर्थन दे रहें हैं। 

Wednesday, January 16, 2019

हमने जाकर देख लिया है रहगुजर के आगे भी,

रहगुजर ही रहगुजर है रहगुजर के आगे भी....


इमदादखानी घराने के प्रतिनिधि और प्रख्यात सितार नवाज

उस्ताद शाहिद परवेज से एक मुलाकात


मुहम्मद जाकिर हुसैन

गीनरूम  में उस्ताद से रूबरू 
जाने-माने सितारवादक उस्ताद शाहिद परवेज का मानना है कि कला की दुनिया में कोई मंजिल नहीं होती। इसलिए वे खुद भी इस राह पर किसी मंजिल की तलाश के बजाए सिर्फ अपनी राह चल रहे हैं। उस्ताद के मुताबिक अच्छा संगीत किसी भी स्वरूप में हो सकता है,बस लोगों को अच्छा लगना चाहिए। वे शास्त्रीय संगीत में किसी भी तरह के मेल (फ्यूजन) के खिलाफ भी है।
यहां केबीआर बिमलअर्पण संगीत समारोह के दूसरे दिन का आयोजन 12 जनवरी 2019 शुक्रवार की शाम भिलाई इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी (बीआईटी) सभागार में हुआ। समारोह मेें उस्ताद शाहिद परवेज का सितारवादन तय किया गया था, लिहाजा अपनी प्रस्तुति से करीब आधा घंटा पहले उस्ताद अपने हवाई सफर के बाद रायपुर होते हुए भिलाई पहुंचे। जाहिर है सफर की थोड़ी थकान भी थी और उस्ताद की तबीयत भी कुछ नासाज थी। इसके बावजूद साज और उस्ताद दोनों अपनी तैयारी में थे। उनके पहुंचते ही उनके चाहने वालों का मिलने के लिए तांता लग गया।

इस बीच मुख्य आयोजक डॉ. सुष्मिता बसु मजुमदार अपनी टीम के साथ उस्ताद का स्वागत करने पहुंची। डॉ. सुष्मिता ने उस्ताद को बताया कि उन्होंनें पहली बार 1982 में उन्हें भिलाई में सुना था और इसके बाद से दिल में कहीं एक बात थी कि भिलाई में ही कभी ना कभी उस्ताद का एक प्रोग्राम जरूर करवाना है और आज ये मुराद पूरी हो गई। यह सुन कर उस्ताद भी मुस्कुरा दिए।

खैर, उस्ताद से मिलने वालों के हुजूम के बीच मैनें अपना परिचय दिया और छोटी सी बातचीत की गुजारिश की। हालांकि उस्ताद अपनी तबीयत को लेकर थोड़ा परेशान थे। इसके बावजूद उन्होंने कहा कि ठीक है, मैं 10 मिनट दूंगा। ग्रीन रूम में ही मिलने वालों को बाहर करने के बाद उनके संगतकार और भिलाई से ही राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाले वरिष्ठ तबला नवाज पार्थसारथी मुखर्जी की मौजूदगी में थोड़ी हड़बड़ी में उनसे रिकार्डेड बातचीत शुरू हुई। जो यहां सवाल-जवाब की शक्ल में-


0 आज के दौर इटावा (इमदादखानी) घराना  किस  तरह अपनी अहमियत बरक़रार रखे हुए है ?


उस्ताद इनायत खां और प बिमलेन्दु मुखर्जी 
00 हमारा घराना सितार के हिसाब से सबसे पुराना घराना है। मैं सातवीं पीढ़ी का प्रतिनिधि हूं। दौर तो हमेशा बदलता रहता है, लेकिन हमारी कोशिश है कि अपने घराने की स्थापित परंपराओं को बरकरार रखते हुए हम नई पीढ़ी को तैयार करें। हमारे घराने में सभी बड़े सितारनवाज हुए हैं। हमारे बुजुर्ग इमदाद खां साहब के बेटे वाहिद खान और इनायत खान हुए। इनमें वाहिद खान के बेटे हफीज खान और अजीज खान थे। वहीं इनायत खान के बेटे विलायत खान हुए हैं। उस्ताद हफीज खान बाद के दौर में हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय पाश्र्वगायक एच. खान मस्ताना के नाम से जाने गए। वहीं मेरे वालिद उस्ताद अजीज खान ने हिंदी फिल्मों में बतौर संगीतकार अपना योगदान दिया।
 हमारी मौजूदा पीढ़ी में शुजाअत खान,हिदायत खान,निशात खान, इरशाद खान, वजाहत खान और मेरे बेटे शाकिर खान सहित तमाम लोग संगीत की सेवा कर रहे हैं। हमारे घराने के एक और बुजुर्ग पं. बिमलेंदु मुखर्जी थे। पं. मुखर्जी भिलाई स्टील प्लांट के माइंस में जनरल मैनेजर रहे और उन्होंने सितार और संगीत को परवान चढ़ाने में आखिरी सांस तक अपना योगदान दिया। पं. मुखर्जी के बेटे पं. बुधादित्य मुखर्जी आज इमदादखानी घराने के प्रतिनिधि के तौर पर पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। पं. बिमलेंदु मुखर्जी के बुलावे पर ही मुझे 1982 और 1986 में भिलाई के सुधि श्रोताओं के समक्ष सितार वादन पेश करने का मौका मिला था और आज उन्हीं के नाम पर आयोजित समारोह में मैं फिर एक बार यहां के सुधि श्रोताओं के समक्ष हूं। जहां तक हमारे घराने की अहमियत की बात है तो इस पर हम घराने वाले लोग क्या कहें? यह तो लोग बताएंगे तो बेहतर।


0आज शास्त्रीय संगीत के समक्ष कैसी चुनौतियां देखते हैं?

00 आज आप चुनौती की बात करें तो अब हमारे संगीत को मूल स्वरूप में जिंदा रखना मुश्किल होता जा रहा है। इसमें इसमें मिलावट आ रही है और ज्यादा फ्यूजन हो रहे हैं। मेरा मानना है कि चाहे फिल्मी हो या गैर फिल्मी, पहले का म्यूजिक इतना अच्छा था कि उसमें लगता ही नहीं था कि क्लासिकल नहीं हो रहा है। मेरा मानना है कि अच्छा म्यूजिक वही है जो दिल को छुए वो चाहे मुंबई का हो चाहे क्लासिकल। मैं समझता हूं कि हर घराने की जो रिवायत है वो बिल्कुल सीधा रास्ता है, उसमें चलना चैलेंज नहीं होता। बल्कि चैलेंज होता है टेढ़े रास्ते पर चलना। जो हमारा ट्रेडिशन है उसे कायम रखना चैलेंज सीधा रास्ता है। उसमें गलत करना चैलेंज है मेरे हिसाब से।


0आम तौर पर कुछ संगीतज्ञ नई-नई राग-बंदिशों की रचना करते हैं या फिर पुराने साज को मॉडिफाई कर नया साज बनाते हैं, इस पर आपका क्या नजरिया है?

00 हमारे घराने में जो कुछ भी प्रयोग या बदलाव किए गए हैं, वो सब परंपरा के दायरे में रहकर और उसके मूल स्वरूप को बदले बिना किए गए हैं। हम कभी नहीं चाहेंगे कि हमारे घराने की जो खासियत है, उसकी जड़ें ही खत्म हो जाएं। इसलिए कुछ नया देने के नाम पर तोड़-फोड़ में हमारा यकीन नहीं है। म्यूजिक या कोई भी आर्ट है वो परिवर्तनशील है, उसका मिजाज ही बदलाव का है इसलिए वो बदलेगा ही। लेकिन बदलाव एक दायरे में हो तो बेहतर है। जहां तक साज में बदलाव या नया कोई साज बनाने की बात है तो हम लोगों ने प्रयोग तो किए लेकिन कभी ऐसा प्रयोग नहीं किया कि हमारे साज का मूल स्वरूप ही खत्म हो जाए।


0अपने उस्ताद वालिद मरहूम को कैसे याद करते हैं?


उस्ताद अज़ीज़ खां 
00 मेरे वालिद उस्ताद अजीज खान एक बड़े सितार नवाज तो थे ही लेकिन उन्हें धुनें बनाने का शौक था। लिहाजा उन्होंने बंबई फिल्मी दुनिया का रुख किया और उन्होंने हीर-रांझा (1948), इंतजार के बाद (1949), परिवर्तन (1949), बीवी (1950),पुतली (1950),एक्टर (1952), धूपछांव (1954), डंका (1954) और चलता पुर्जा (1958) सहित उस जमाने की कई महत्वपूर्ण फिल्मों में संगीत दिया था। इनमें कुछ फिल्मों में अकेले अजीज हिंदी या अजीज खान के नाम से संगीत दिया तो कुछ में उन्होंने जोड़ी में संगीत दिया। मसलन संगीतकार खय्याम के साथ उन्होंने रामू एंड श्यामू के नाम से संगीत दिया।


0 लेकिन संगीतकार खय्याम के जोड़ीदार तो रहमान वर्मा (अब्दुल रहमान) थे और इन दोनों ने शर्मा जी-वर्मा जी के नाम से कई फिल्मों में संगीत दिया था?

00 देखिए,जो मुझे जानकारी है वही बता रहा हूं। मानना नही मानना आपकी बात है,लेकिन मेरा भी सुन लीजिए। मुझे जो जानकारी है,उसके मुताबिक उन्होंने खैय्याम साहब के साथ रामू एंड श्यामू और वर्मा जी-शर्मा जी के नाम से म्यूजिक दिया। जिसमे श्यामू और शर्माजी खैय्याम साहेब के नाम थे ।वहीं आज के मशहूर तबला नवाज उस्ताद जाकिर हुसैन के पिता उस्ताद अल्लारखा खां के साथ उन्होंने एआर कुरैशी-अजीज हिंदी के नाम से संगीत दिया। बंबई में उनका फिल्मी करियर परवान चढ़ ही रहा था कि हमारे दादा हुजूर वाहिद खान साहब ने उन्हें वापस बुला लिया। क्योंकि तब मेरी तालीम का दौर शुरू होना था। हमारे दादा का मानना था कि फिल्मों के बजाए उन्हें अपने घराने पर ध्यान देना चाहिए। उस जमाने में अपने स्थापित करियर को छोड़कर घर लौटना एक बड़ी कुरबानी थी, जो मेरे वालिद ने दी। आज मैं जो कुछ भी हूं उनकी उस कुरबानी की वजह से ही हूं।


0...क्या आपको भी अपने वालिद की तरह कोई कुरबानी अपनी अगली पीढ़ी के लिए देनी पड़ी?

00 मेरे वालिद फिल्मों में गए तो वो उनका शौक था। वहां उन्होंने खूब काम भी किया लेकिन हम लोग घराने तक ही सीमित रहे। जो बेहतर बन सका पहले भी किए और आज भी कर रहे हैं। हां, हमने कोशिश की कि इधर-उधर करने बजाए अपने ही घराने की रिवायतों को मजबूती से पकड़ कर रखें। इसे आप कुरबानी भी कह सकते हैं कि हम बाहर कहीं नहीं गए और जो अपने उस्तादों से सीखा, उसे ही हमनें अपने बच्चो (शागिर्दों) को सिखाया। अब नई पीढ़ी की जिम्मेदारी र्है कि अब वो इसे कैसे सहेज कर रखेंगी।


0आज आपके परिवार से कोई फिल्मों में जाए तो क्या आप इससे सहमत होंगे?

00 संगीत में रहकर 50 तरह के काम हो सकते हैं। एक ही तरह का काम तो कभी होता नहीं। कोई तय करता है कि गुरू बन जाएं, किसी ने सिखाना शुरू कर दिया। कोई प्रचार करता तो कोई म्यूजिकोलाजिस्ट बन जाता है। म्यूजिक में रहकर दूसरे विभाग में चले जाता है इसमें कोई हर्ज नहीं है। संगीत की खिदमत तो हजार तरीके से की जा सकती है। इसलिए इसमें सहमत-असहमत होने का सवाल नहीं है।


0आपके परिवार से फिल्मों में बड़े गायक खान मस्ताना हुए हैं। उनका आखिरी वक्त हाजी अली दरगाह में भीख मांगते हुए गुजरा। ऐसे हालात पर आपका क्या नजरिया है?


उस्ताद हफ़ीज़ खां उर्फ़
एच खान मस्ताना 
00 मेरे वालिद के सगे बड़े भाई उस्ताद हफीज खान थे। वे 40-50 के दौर में एच खान मस्ताना के नाम से फिल्मों के बड़े गायकों में से एक थे। एक दौर ऐसा भी था, जब वो मुख्य गायक थे और कोरस में मुहम्मद रफी गा रहे थे। फिर एक दौर ऐसा भी आया कि उन्होंने रफी साहब के साथ कई गीत भी गाए जिनमें वतन की राह में वतन के नौजवां शहीद हो (शहीद) गीत आज भी सुनाई देता है। उनके कुछ लोकप्रिय गीतों में दूर हटो ऐ दुनिया वालों (किस्मत), जिंदगी है प्यार से (सिकंदर), हम अपने दर्द का किस्सा (मुकाबला) और बुलबुल मेें हैं नग्मे तेरे (लैला मजनूं) शामिल हैं। उन्होंने कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया था। वो अपने जमाने में बहुत बड़े गायक थे। कई बार आपने देखा होगा बहुतों के साथ ऐसा होता है कि उनका आखिरी वक्त बड़ी मुश्किल में कटता है, तो ऐसा उनके साथ भी हुआ ये कोई बड़ी बात नहीं है। जिंदगी में ऐसा होते रहता है।


0आपने तीन साल की उम्र से संगीत में शुरूआत की और आज 60 बसंत देख चुके हैं। अब तक का कुल जमा हासिल क्या रहा? क्या मंजिल मिल गई?
00 देखिए, किसी भी फन या कला को किसी दायरे में नहीं बांधा जा सकता बल्कि अनलिमिटेड है। तीन साल की उम्र में जब मुझे मेरे वालिद उस्ताद अजीज खान ने छोटा सा सितार हाथ में थमाया तो वो एक शुरूआत थी, तब से आज तक बस सफर जारी है। मेरा यह मानना है कि यहां आपकी कोई मंजिल तो होती ही नहीं होती सिर्फ रास्ता होता है, जिसमें चलते जाना है। आप जितना चलते जाओगे उतना ही आगे जाओगे। अगर मुझे रुकना होता तो मैं माप लेता कि मुझे कहा रुकना है और कहां तक पहुंच गया हूं। इसलिए मेरी जिंदगी का कुल जमा अमल इस शेर की तरह है कि ''हमने जाकर देख लिया है रहगुजर (रास्ते) के आगे भी, रहगुजर ही रहगुजर है रहगुजर के आगे भी।''

टिप्पणी-इस बातचीत के दौरान उस्ताद अजीज खान के फिल्मी सफर पर उस्ताद शाहिद परवेज के बताए तथ्यों से असहमति थी। खास कर उन्होंने हीर-रांझा फिल्म में उन्होंने खय्याम साहब के साथ उनके पिता के संगीत की बात कही थी। हालांकि तथ्य कुछ और हैं। 
वेबसाइट में मौजूद जानकारियों के मुताबिक 1948 की फिल्म हीर-रांझा के तीन संगीतकार थे। अजीज हिंदी (उस्ताद अजीज खान) इस फिल्म के पहले संगीतकार थे और उनके बाद कुछ गीतों को शर्माजी-वर्माजी (खय्याम-रहमान वर्मा) ने संगीतबद्ध किया था। इसी तरह बहुत खोजने के बाद भी मुझे ऐसा कोई संदर्भ नहीं मिला, जिसमें अजीज खान -खय्याम की जोड़ी का मिलकर रामू एंड श्यामू के नाम से संगीत देने का जिक्र हो। इसी तरह एक वेबसाइट पर ही जानकारी मिली कि उस्ताद शाहिद परवेज के बड़े अब्बा और अपने जमाने के लोकप्रिय गायक खान मस्ताना की मौत 1972 में हाजी अली दरगाह के रास्ते में भिखारियों की टोली के बीच हुई थी। सुधि पाठक अगर इस पर कुछ और रौशनी डालना चाहें तो स्वागत है।
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