Wednesday, February 16, 2022



संघर्ष के दिन भिलाई में गुजारे थे बप्पी दा ने, यहीं रहते

ख्वाब देखा फिर मुंबई गए और छा गए संगीत जगत में 

 

बप्पी दा के साथ भिलाई में इंटरव्यू 08-04-13
करीब महीने भर की तकलीफ के बाद अब संगीतकार बप्पी लाहिरी (मूल नाम-आलोकेश लाहिरी) भी नहीं रहे। मंगलवार 15 फरवरी 2022 मंगलवार की रात उन्होंने मुंबई के एक अस्पताल में 69 साल की उम्र में आखिरी सांस ली। 80-90 का दौर बप्पी दा के ऊर्जा से भरपूर संगीत का दौर था।

 तब बप्पी दा एक तरफ डिस्को की धूम मचा रहे थे तो दूसरी तरफ दक्षिण की फिल्मों की खास शैली का संगीत देकर पूरे देश का मनोरंजन कर रहे थे। लेकिन एक बप्पी लाहिरी वह भी थे, जो बेहद गंभीर किस्म का भी संगीत दे रहे थे। बप्पी दा के संगीत को इन तीन खांचें में महसूस किया जा सकता है। यही उनके संगीत की पहचान भी थी। 

यकीन कीजिए कि जिसने "आई एम ए डिस्को डांसर" रचा, उसी ने "सैंय्या बिना घर सूना" या फिर "चंदा देखे चंदा" भी रचा। खैर, बप्पी दा एनर्जी के पर्याय थे। उनके लिए हल्के-फुल्के संगीत के अलावा शास्त्रीयता का पुट लिए गंभीर संगीत का सृजन करना सहज था। 

17 साल की उम्र में गवा रहे थे लता-मन्ना डे और किशोर को

अपने माता-पिता के साथ बप्पी दा बालपन में

बप्पी दा जिस दौर में दक्षिण में व्यस्त थे और उनकी इंदीवर के साथ जोड़ी जो गीत-संगीत रच रही थी, तब उसकी खूब आलोचना हुई और उन पर फूहड़ता और नकल के आरोप लगे।

इसके बावजूद "जो चल गया वो चल गया" वाला मामला था। बप्पी दा चूंकि संगीत के समृद्ध परिवार से थे। इसलिए बचपन से ही उनके संस्कार में ही संगीत बसा था। 

महज 17 साल की उम्र में उन्होंंने बांग्ला फिल्म "दादू" में संगीत दिया। जिसमें लता मंगेशकर,मन्ना डे और किशोर कुमार जैसे दिग्गजों ने पार्श्वगायन किया। 

बाद में बप्पी दा ने मुंबई का रुख किया और फिर जो इतिहास बना वह दुनिया के सामने है। बप्पी दा के लिए स्वर्णकाल था। उस दौर में हर बड़े बैनर के साथ बप्पी दा ने काम किया और सुपरहिट संगीत दिया। 

बप्पी दा का संगीत आलोचना और लोकप्रियता के द्वंद के बीच बेहद लोकप्रिय होता रहा। इस तथ्य को उनके आलोचकों ने भी स्वीकार किया।

शिखर के दौर का संगीत ही लोकप्रिय रहा

तमाम इतिहास रचते हुए अपने करियर के शिखर के दौर में बप्पी लाहिरी ने फिल्म संगीत का जो माधुर्य रचा वह बाद के दौर में कायम नहीं रह पाया। इसलिए आज भी बप्पी दा का वही संगीत लोकप्रिय है, जो उन्हें अपने शिखर के दौर में रचा था। 

दशक भर पहले आई फिल्म "द डर्टी पिक्चर" में उसी लोकप्रियता को भुनाने के लिहाज से "उई अम्मा-उई अम्मा" के मीटर पर "ऊ ला ला ऊ ला ला" रच दिया गया। बप्पी दा के माधुर्य से सजी "हिम्मतवाला" की रिमेक बनी तो संगीत जस का तस रख दिया गया।  

राजनीति में भी किस्मत आजमाई, लता को पुकारा था मां

बप्पी दा ने शेयर की थी 'मां' की याद में अपनी यह फोटो
बप्पी दा  का अपना संसार था जिन दिनों बप्पी दा का करियर चरम पर था तब अपने संगीत के लिए उन्होंने खूब आलोचनाएं झेली लेकिन उनकी उपस्थिति हमेशा बनी रही। 

करियर के ढलान के बाद बप्पी दा ने राजनीति का रास्ता भी चुना। जिसमें उन्होंने 2014 में भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा और पश्चिम बंगाल की श्रीरामपुर सीट से किस्मत आजमाई लेकिन तृणमूल कांग्रेस के हाथों उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। 

इसके बाद उन्होंने राजनीति से तौबा कर ली। हाल के दिनों में बप्पी दा सोशल मीडिया पर सक्रिय थे। वह विभिन्न मुद्दों पर ट्विट किया करते थे।

सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर के निधन पर बप्पी दा ने अपनी बचपन की फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए मां के संबोधन के साथ श्रद्धांजलि दी थी। हालांकि तब खुद बप्पी दा भी बेहद बीमार थे। अब उनके जाने की खबर आई है।

बप्पी दा भिलाई पहुंचे, घिरे रहे रिश्तेदारों से

संगीतकार बप्पी लाहिरी 8 अप्रैल 2013 सोमवार को भिलाई क्लब में अपना शो करने भिलाई स्टील प्लांट के बुलावे पर आए थे। तब शो से ठीक पहले मुझे बप्पी दा से छोटी सी मुलाकात और बात करने का मौका मिला। 

हालांकि थोड़ा अफरा-तफरी का माहौल था और बप्पी दा की टीम भिलाई निवास से भिलाई क्लब रवाना होने के लिए खड़ी थी। वहीं बप्पी दा के परिजन भी उन्हें घेरे खड़े थे। ऐसे माहौल में बप्पी दा ने छोटे से इंटरव्यू के लिए मुझे वक्त दिया। इस दौरान खुद बप्पी दा ने भिलाई से अपने 40 साल पुराने रिश्तों पर रोशनी डाली।

बप्पी दा ने बताया उनके पिता और प्रख्यात संगीतकार अपरेश लाहिरी और शास्त्रीय गायिका मां बंसरी लाहिरी ने 1960-70 के दौर में भिलाई में बंगाली समाज के बीच कई कार्यक्रम दिए थे। उस दौर में मेरे माता-पिता अक्सर भिलाई आते रहते थे। तब मेरी बहन शुक्ला चौधरी (सगी बुआ की बेटी) यहां भिलाई में क्वार्टर नं. 2 डी, स्ट्रीट-46, सेक्टर-8 में रहती थी। 

मुंबई जाते वक्त अक्सर भिलाई पहुंच जाता था

बप्पी दा का आटोग्राफ
बप्पी दा ने बताया कि पहली बांग्ला फिल्म 17 साल की उम्र में तो मिल गई और उसका संगीत भी खूब चला। लेकिन आगे मेरा ख्वाब मुंबई में पैर जमाने का था।

 वह मेरे संघर्ष की शुरूआत थी। कोलकाता से मुंबई जाते वक्त अक्सर मैं तब भिलाई उतर जाता और बहन के घर 1-2 दिन रह कर जाता था। फिर कुछ 2-3 महीने का एक दौर ऐसा भी रहा जब मुझे 1971 में भिलाई में अपनी बहन के इसी सेक्टर-8 वाले घर में रहना पड़ा। 

तब यहां रह कर मैं अपना संगीत तैयार करता रहता था और खाली वक्त में भिलाई घूमता था। बप्पी दा कहते हैं-तब मेरा ख्वाब मुंबई फिल्मी दुनिया में पहचान बनाना था और इसी ख्वाब को पूरा करने मैं भिलाई में रहते हुए कोशिश कर रहा था। 

तब मैं अपने संपर्कों को चिटि्ठयां लिखता था और इंतजार करता था जवाब आने का। तब टेलीफोन तो मुश्किल से लगता था इसलिए घर में भी चिट्‌ठी लिख कर ही अपनी खैर, खैरियत देता रहता था। 

ऐसे भिलाई से पहुंचा मुंबई

बप्पी दा बोले-फिर एक दिन ऐसा आया कि मुंबई में कुछ उम्मीदें दिखाई दी। मैनें तुरंत भिलाई से मुंबई की टिकट कटाई और यहां से सीधे जा पहुंचा मुंबई। वहां मुझे एक छोटे बजट की फिल्म "नन्हा शिकारी" मिली। इसके बाद नासिर हुसैन प्रोडक्शन की फिल्म "मदहोश" में बैकग्राउंड म्यूजिक करने का मौका मिला, जिसमें संगीतकार आरडी बर्मन थे।

 इसके बाद पहली बड़ी सुपरहिट फिल्म नासिर हुसैन की ही "जख्मी" मिली । उसके बाद "चलते-चलते", "आप की खातिर", "टूटे खिलौने" और फिर सफल फिल्मों के धूम की कतार लग गई।

इस बातचीत के दौरान बप्पी दा के भिलाई में रहने वाले भांजे शांतनु चौधरी ने बताया कि परिवार अब सेक्टर-8 छोड़ सिंधिया नगर में रह रहा है। 

अपने संगीत की आलोचना पर बप्पी दा ने कहा था...

संगीत की आलोचना के सवाल पर बप्पी दा ने कहा था-उनके संगीत की कई बार आलोचना हुई लेकिन यही हिट भी रहा। बप्पी दा ने इस तथ्य को गलत बताया कि दक्षिण की फिल्मों के हिंदी संस्करण में संगीत जस का तस रख दिया गया। 

बप्पी दा बोले-नहीं ऐसा नहीं है जिन दिनों "हिम्मतवाला", "मवाली", "मकसद","तोहफा" और "पाताल भैरवी" से लेकर "सिंघासन" तक दक्षिण की फिल्मों की कतार लगी हुई थी तो मैनें उनके दक्षिण के संगीत को एक तरफ रख कर अपना संगीत रचा। 

कहीं भी कॉपी नहीं किया,इन फिल्मों में जितना भी संगीत रचा मेरा मौलिक रहा। उन्होंने बातचीत के दौरान अपने किशोर कुमार मामा को भी याद किया। बप्पी दा ने बताया कि किशोर कुमार उनके रिश्ते के मामा लगते थे और उन्होंने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया।

तब सिविक सेंटर खूब घूमता था, फिर आउंगा भिलाई

दैनिक भास्कर में तब प्रकाशित मेरा इंटरव्यू
बप्पी दा ने फिल्मी धुनों की नकल के सवाल पर कहा कि दुनिया भर का संगीत हम ही क्या सभी सुनते हैं और यह सब हमारे कानों में रचा-बसा रहता है। इसलिए स्वाभाविक है कि कहीं न कहीं किसी धुन से हम प्रभावित हों लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम नकल कर रहे हैं।

 मैं तो अक्सर कहता हूं अगर मैनें धुन चोरी की है तो फिर मुझसे पहले के भी संगीतकार भी धुन चोरी के दोषी हैं। बप्पी दा ने भिलाई की यादों को टटोलते हुए कहा-उन दिनों तो भिलाई में काफी कम हरियाली दिखती थी।

 मैं सिविक सेंटर खूब जाता था। बप्पी दा ने कहा कि एक बार फिर वह 2-3 दिन के लिए भिलाई आकर रहना चाहते हैं, आखिर मेरे स्ट्रगल के दिनों का गवाह भिलाई भी रहा है।

माता-पिता के बाद अब मामा के जाने से हम अकेले रह गए

बाम्बे और भिलाई में बप्पी दा-शुक्ला परिवार

बप्पी दा के गुजरने पर उनकी बहन स्व. शुक्ला चौधरी के निवास पर भी शोक का माहौल है। स्व. शुक्ला चौधरी के सुपुत्र शांतनु चौधरी ने अपने मामा को याद करते हुए कुछ फोटोग्राफ्स शेयर किए हैं। ब्लैक एंड वाइट फोटो बप्पी के बाम्बे स्थित निवास की है।

इस फोटो में शांतनु अपने माता-पिता व छोटी बहन के साथ हैं, वहीं बप्पी दा के साथ उनके माता-पिता हैं। वहीं कलर फोटो शांतनु के दुर्ग सिंधिया नगर स्थित निवास की है।

 1995 में दुर्ग में फिल्म स्टार नाइट में शामिल होने आए बप्पी दा अपनी बहन के घर भी पहुंचे थे। तब बप्पी दा के साथ इस फोटो में शांतनु व उनके माता-पिता भी नजर आ रहे हैं। 

शांतनु बताते हैं- शुरूआती दौर में जब मामा हमारे सेक्टर-8 वाले घर आते थे तो मैं बहुत छोटा था। कुछ हल्की सी यादें हैं। मामा हमारे साथ कई बार रहते थे। फिर बाम्बे या कलकत्ता जाते थे। जब भी भिलाई रुकते तो सिविक सेंटर और सेक्टर-6 कालीबाड़ी जरूर जाते थे।

 जब फिल्मों में मामा व्यस्त होते गए तो उनका यहां आना कम होता गया। इसके बाद तो वह कभी-कभार किसी स्टेज परफार्मेंस के नाम पर रायपुर या भिलाई-दुर्ग आने पर ही घर आते थे। 

परिवार के सभी सदस्यों के प्रति बप्पी दा हमेशा बेहद स्नेही रहे। वह सभी का हालचाल पूछते रहते थे। शांतनु कहते हैं-अब मेरे माता-पिता नहीं रहे और बप्पी मामा ने भी हमारा साथ छोड़ दिया। ऐसे में हम परिवार के लोग अपने-आप को बहुत ही अकेला महसूस कर रहे हैं। 

Saturday, January 15, 2022


एक कारखाने के बनने की कथा और अंतर्कथा 

-जाहिद खान, शिवपुरी (मध्यप्रदेश)

समीक्षक जाहिद खान अपने निवास पर

‘वोल्गा से शिवनाथ तक’ छत्तीसगढ़ के विश्व प्रसिद्ध ‘भिलाई स्टील प्लांट’ पर केन्द्रित दिलचस्प और तमाम दस्तावेजी जानकारियों से भरी एक मुकम्मल किताब है। लेखक-पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन की यह शानदार किताब एक अलग ही शिल्प में लिखी गई है। 

कहीं ये किताब ‘भिलाई स्टील प्लांट’ के गौरवशाली इतिहास के बारे में सूक्ष्म जानकारियां देती है, तो कहीं इस प्लांट से जुड़े रूसी और भारतीय इंजीनियर-अधिकारियों के संस्मरण, इस्पात नगरी के बनने और उनके संघर्षमय जीवन की झलकियां दिखलाते हैं। किताब के कुछ अध्याय सीधे-सीधे रिपोर्ताज की शक्ल में हैं, तो अनेक महत्वपूर्ण लोगों के साक्षात्कार से प्लांट की अंतर्कथा मालूम चलती है। 

हां, किताब में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के तीन ऐतिहासिक भाषण भी शामिल हैं, जो उन्होंने अलग-अलग वक्त में ‘भिलाई स्टील प्लांट’ के दौरे के दौरान दिए थे। अपने एक भाषण में नेहरू ने भिलाई को मुल्क की तरक्की और खुशहाली की बुनियाद बतलाया था। उनका यह दावा बाद में सच साबित हुआ।

फरवरी, 1960 को सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधानमंत्री निकिता सरगेयेविच खु्रश्चेव के दो दिवसीय दौरे का भी लेखक ने किताब में तफ्सील से जिक्र किया है। यह जानना भी बेहद जरूरी होगा कि भिलाई कारखाने के निर्माण के पीछे नेहरू के साथ-साथ ख्रुश्चेव की बड़ी भूमिका थी। अगर खु्रश्चेव दिलचस्पी नहीं लेते, तो यह कारखाना आकार नहीं लेता। किताब में शामिल अनेक तस्वीरें, हमें उस दौर में ले जाती हैं, जब इस कारखाने का विस्तार हो रहा था। 

प्रकाशित समीक्षा

कुल मिलाकर ‘भिलाई स्टील प्लांट’ की स्थापना और इसके विकास को अच्छी तरह से जानना-समझना है, तो ‘वोल्गा से शिवनाथ तक’ एक मददगार किताब है। जो अथक शोध, धैर्य और परिश्रम के साथ लिखी गई है। हिंदी में इस तरह का काम बहुत कम हुआ है। 

अलबत्ता, मुहम्मद जाकिर हुसैन जरूर इस तरह का काम पहले भी कर चुके हैं। इस किताब से पहले इस्पात नगरी भिलाई पर साल 2012 में उनकी एक और महत्वपूर्ण किताब ‘भिलाई-एक मिसाल’ आई थी, जो काफी चर्चा में रही।

 वोल्गा नदी, अविभाजित रूस की जीवनरेखा रही है, तो शिवनाथ नदी छत्तीसगढ़ की। विश्व की सारी आधुनिक सभ्यताएं, नदी किनारे विकसित हुईं। भिलाई, शिवनाथ नदी के किनारे तो नही है, लेकिन इस नदी से ‘भिलाई स्टील प्लांट’, के लिए पानी की आपूर्ति हुई और एक आधुनिक शहर अस्तित्व में आया। जिसकी संस्कृति मिली-जुली है

प्रकाशित समीक्षा

रशियन टेक्नालॉजी, वर्क कल्चर और छत्तीसगढ़ी संस्कृति से मिलकर भिलाई में एक ऐसी संस्कृति बनी जो बेजोड़, बेमिसाल है। किताब में जितने भी इंटरव्यू हैं, चाहे वे रूसियों के हों या फिर भारतीयों के इनमें एक दूसरे के प्रति गहरी दोस्ती, मुहब्बत, एहतराम और यकीन झलकता है। 

किताब का सबसे दिलचस्प हिस्सा, ऐसे दंपतियों के इंटरव्यू हैं, जिनमें पति भारतीय और पत्नी रशियन हैं। इन इंटरव्यू से मालूम चलता है कि मुहब्बत, किसी देश-दुनिया की दीवार और बंधनों को नहीं मानती। लेखक ने किताब में उस अनुबंध को भी शामिल किया है, जो भारत सरकार और सोवियत संघ के बीच हुआ था।

अनुबंध से मालूम चलता है कि परियोजना के लिए दोनों सरकारों के बीच उस वक्त क्या-क्या अहम करार हुए थे। छोटे-छोटे अध्यायों में बंटी ‘वोल्गा से शिवनाथ तक’ की कोई कमी की यदि बात करें, तो जितना संजीदा कंटेन्ट है, उसके बरक्स किताब की छपाई बेहद निम्न स्तर की है। 

किताब बिल्कुल टेक्स्ट बुक की तरह लगती है। प्रकाशक ने पेपरबैक किताब का दाम तो पांच सौ रुपए रखा है, लेकिन क्वालिटी थोड़ी सी भी देने की कोशिश नहीं की है। जबकि किताब की मांग को देखते हुए, एक साल के अंदर इसका दूसरा संस्करण आ गया है।

शीर्षक: वोल्गा से शिवनाथ तक

लेखक:मुहम्मद जाकिर हुसैन

समीक्षक-जाहिद खान, महल कॉलोनी, शिवपुरी मप्र 

मोबाईल 94254 89944 

मूल्य : 500 (पेपरबैक संस्करण), 

प्रकाशक : सर्वप्रिय प्रकाशन, नई दिल्ली

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 लोहे का बदन... लोहे का कारखाना 

गर छूने से नहीं सिहरता तो मेरे किस काम का

-पीयुष कुमार, रामानुजगंज छत्तीसगढ़ 

इंसानी सभ्यता की बड़ी पहचान उसकी बनाई तामीर है। मिस्र के पिरामिड्स से लेकर सिंधु सभ्यता और और आज शंघाई की गगनचुम्बी इमारतों को देखकर यह बेहतर समझा जा सकता है। सभ्यता के इस विकास क्रम में स्टील का सबसे बड़ा योगदान है। 

यह इस्पात कैसे बनता है और इसमें लोहे के साथ पसीना, दिमाग और जज्बात किस तरह घुले मिले हैं उसकी यह अलहदा सी कहानी है जिसे भिलाई के पत्रकार लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने 'वोल्गा से शिवनाथ तक' में बयान किया है। 

राहुल सांकृत्यायन आज होते तो उन्हें खुशी होती कि 'वोल्गा से गंगा' के अलावा एक धारा शिवनाथ (नदी) तक भी बह चली है, वह धारा जिसने देश की आज़ादी के बाद उसके भविष्य को थामकर रखने के लिए बुनियाद दी। 

जी हां, यह किताब रूस के सहयोग से 1955 में स्थापित भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना और प्रक्रिया पर आधारित है जिसमें लोहे को इस्पात में बदलने में लगे जज्बातों का पानी मिला हुआ है। भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना रूस के सहयोग से हुई थी। 

ऐसे में रूसी इंजीनियरों का भिलाई आना और उनके यहां रम जाने के किस्से पढऩा अद्भुत एहसास कराते हैं। इन किस्सों में एक ओर जहां भिलाई इस्पात संयंत्र के विकास क्रम में हुई हर बात जो भट्टी के अंदर के ताप से रूबरू कराती है, वहीं साथ मिलकर काम करने से उपजे इंसानी रिश्तों की तरलता भी साथ साथ बहती है। गौरतलब है कि कई रूसी महिलाओं ने यहीं भारतीय पुरुषों के साथ विवाह कर यहीं घर बसा लिया है जिनमे से कई जोड़ों का तस्वीर सहित इसमें जिक्र है। 

पहली-दूसरी पंचवर्षीय योजनाओं में बने औद्योगिक तीर्थों की खास बात यह है कि हर जगह वे एक लघु भारत का निर्माण करते हैं। छत्तीसगढ़ के भिलाई की भी यही कहानी है। यह बोकारो, राऊरकेला जैसे शहर के लोग और रेलवे में जिनके पिता या दादाजी कार्यरत रहे हैं, वे भी बेहतर महसूस कर सकते हैं। 

विशेष ढंग से बनी कालोनियां, पार्क, अस्पताल, स्कूल, पेड़ पौधे और मार्केट इन्हें बाकी जगहों से अलग करते हैं। यह किताब देश के बुनियादी विकास का एक दस्तावेज है। औद्योगिक नगरीयकरण में श्रम, सहकार और विभिन्न सांस्कृतिक पहचानों में गुंथे समाज को साहित्यिक विधाओं और विमर्शों में जगह नहीं मिली है, इस लिहाज से यह किताब इस कमी को पूरा करती है और प्रेरित करती है कि हर ऐसी जगहों को उसके मिजाज बदलने से पहले ही दर्ज कर लिया जाए। लेखक को इस किताब के लिए बधाई।

 सुझाव है कि आप भी यह किताब जरूर पढ़ें ताकि पता लगे कि साहित्य में कविता कहानी से अलग भी कोई दुनिया है। 

संपर्क-+918839072306 

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एक खुशहाल मुल्क बनने का ब्यौरा इस किताब में 

 -पल्लव चटर्जी, भिलाई छत्तीसगढ़

'वोल्गा से शिवनाथ तक' के लेखक मुहम्मद ज़ाकिर हुसैन को मैं मुबारकबाद देता हूं। उन्होंने अपनी पुस्तक में तत्कालीन रुसी प्रधानमंत्री खुशचेव तथा भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी के मित्रतापूर्ण संबंध और भिलाई में आधुनिक भारत के लौह इस्पात संयंत्र निर्माण कार्य पूरा कर इस्पात उत्पादन सम्भव बनाने का ब्यौरा दिया है। 

केवल कृषि प्रधान देश नहीं हमें कुछ नये ख्वाब देखना होगा। देश में खनिज पदार्थ का इस्तेमाल करके नये तकनीकी शिक्षा को अपनाकर देश को स्वाबलंबी बनाने हेतु भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यह विचार व्यक्त किए। 

उनके इस विचार को किस प्रकार रुसी भाईयों ने वास्तव में परिणत किया उसका बिस्तारपूर्वक उल्लेख लेखक ने अपनी किताब में किया है। दोस्ती बढी, प्रेम बढ़ा दो बड़े देशों के बीच। विश्व में आधुनिक भारत का लोहा मनवाया रूसी मित्रता ने। धीरे धीरे एक खुशहाल मुल्क बनाने का विवरण इस पुस्तक में मिलता है। इस पुस्तक को पढ़कर मुझे बेहद संतुष्टि मिला।

 मैं मोहम्मद जाकिर हुसैन के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं। 

संपर्क -+918109303936

Friday, January 14, 2022

 

वोल्गा से शिवनाथ तक एक अभूतपूर्व दस्तावेज,पठनीय ग्रंथ 

 

समीक्षक-डॉ. परदेशी राम वर्मा 

 

मैं अतीत को जीत,जीत की पहली एक किरण हूँ,

 भारत के आते भविष्य का मैं मंगलाचरण हूँ। 

बदल रहा यह देश विश्व को मैंने दिखा दिया है,

 मैं भिलाई का नगर कि मैंने जीना सिखा दिया है। 


उपरोक्त पंक्तियां दिवंगत रमाशंकर तिवारी द्वारा रचित हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र के जनसम्पर्क विभाग में प्रमुख थे। भिलाई इस्पात संयंत्र के शुरूआती दौर में कुछ ऐसे कर्मचारी और अधिकारी यहाँ आये जिन्होंने साहित्य के क्षेत्र में भी यश प्राप्त किया। 

दानेश्वर शर्मा,रविशंकर शुक्ल, रमाशंकर तिवारी,मोहन भारती और केशव पाण्डे जैसे कवि चढ़ती जवानी के दिनोंं में यहाँ आये और आगे चलकर वे अपने अपने क्षेत्रों के दिग्गज कहलाये। केशव पाण्डे जनवादी लेखक संघ दुर्ग जिला के अध्यक्ष बने। दानेश्वर शर्मा लिटररी क्लब के अध्यक्ष बने और मोहन भारतीय ने प्रतिष्ठित जैनी पत्रिका का एक दशक तक संपादन किया। इनमें केशव पाण्डे, मोहन भारतीय और रमाशंकर तिवारी अब हमारे बीच नहीं हैं। 

समीक्षक और लेखक 

प्रसिद्ध पत्रकार और सेंट थॉमस कालेज भिलाई के पत्रकारिता विभाग में शिक्षाविद् मुहम्मद जाकिर हुसैन द्वारा लिखित पुस्तक 'वोल्गा से शिवनाथ तक' में भिलाई नगर की वंदना का रमाशंकर तिवारी लिखित यह गीत महत्व के साथ प्रकाशित है। 

जाकिर छत्तीसगढ़ के जिम्मेदार और प्रतिष्ठित युवा पत्रकार हैं। नई पीढ़ी के जिन पत्रकारों ने अपना विशिष्ट स्थान बनाया जाकिर उनमें से एक प्रमुख नाम है। वे अपने दायित्वों को निबाहते हुए पुस्तक लेखन भी करते हैं। अब तक उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। 'वोल्गा से शिवनाथ तक' उनकी तीसरी पुस्तक है।

वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव की टिप्पणी वीडियो पर

निश्चित रूप से शीर्षक राहुल सांकृत्यायन की किताब 'वोल्गा से गंगा' की तर्ज पर है लेकिन 'वोल्गा से शिवनाथ तक' इस शीर्षक में ही पूरी किताब की आंतरिक सामग्री के सम्बन्ध में लेखक ने अपना उद्देश्य स्पष्ट कर दिया है। पुस्तक लेखन में सदैव शीर्षक चयन का विशेष महत्व होता है।

विशेषकर किसी विशेष संदर्भ को केन्द्र में रखकर लिखी गई किताब में तो शीर्षक का चयन पाठक को जुडऩे का आमंत्रण ही देती है। वोल्गा रूस की नदी है शिवनाथ छत्तीसगढ़ के दुर्ग नगर के पास बहने वाली नदी है। शिवनाथ नदी से जुड़ा है दुर्ग शहर जिसके पास ही भिलाई नगर यह नया नगर आबाद हुआ। रूसी भाषा में दोस्ती को द्रुगे कहा जाता है। 

वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध की टिप्पणी वीडियो पर

आश्चर्य तथ्य यह है कि छत्तीसगढ़ी में भी इसे दु्रग या दुरूग ही कहते हैं। छत्तीसगढ़ी और रूसी की दोस्ती भी दु्रगे शब्द में निहित है। भारत और रूस ने मिलकर भिलाई इस्पात संयंत्र को खड़ा किया। यह द्रुग अर्थात दोस्ती की मिसाल भी है। जवाहर लाल नेहरू ने इस तरह के नए उद्योग नगरी को भारत का नया तीर्थ कहा। विनोबा भावे ने भिलाई कारखाने को भलाई कारखाना कहा।

 जाकिर इससे पहले 'भिलाई एक मिसाल' और इस्पात नगरी के प्रसिद्ध रंगकर्मी सुब्रत बसु पर 'फौलादी रंगकर्मी सुब्रत बसु' पुस्तक भी लिख चुके हैं। जाकिर हिन्दी और उर्दू के अच्छे जानकार हैं। उनके पास आमफहम सर चढ़कर बोलने वाली भाषा है। वे कल्याण महाविद्यालय के छात्र हैं। उन्होंने इतिहास में एमए किया है। वे बाकायदा पत्रकारिता में डिग्री के साथ सक्रिय हैं। 

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. हिमांशु द्विवेदी की टिप्पणी वीडियो

अपनी अब तक की दो दशक की पत्रकारिता में उन्हें दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ और हरिभूमि में कार्य का अनुभव है। 'हरिभूमि' में ही लगातार पन्द्रह दिनों तक उनका कॉलम 'वोल्गा से शिवनाथ तक' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। जिसमें प्रकाशित सभी साक्षात्कार रूसी दम्पत्तियों के थे जो भिलाई में ही बस गए हैं। 

पुस्तक में पहला लेख है 'ऐसे साकार हुआ भिलाई'। इस प्रथम लेख में जाकिर ने 1955 से लेकर 1961 तक के संघर्ष भरे दिनों का खाका खींचा है। इसमें 1932 में आये इस सिलसिले के महत्वपूर्ण प्रस्ताव का जिक्र भी है। किस तरह 1945 में आयरन एण्ड स्टील पैनल बना, कब से हुआ भिलाई कारखाने के लिए भूमि अधिग्रहण और पंचवर्षीय योजना में भारत सरकार ने किस तरह 1952 में देश में इस्पात की खपत की दिशा में ठोस चिंतन किया। फिर सोवियत संघ से संबंध बने, धीरे-धीरे भिलाई के सामने आ रही अड़चने हटीं। 1953 में पंडित रविशंकर शुक्ल ने ऐलान कर दिया था कि वे भिलाई के पक्ष में केंद्र सरकार के सामने दृढ़ता से बात रखेंगे।

प्रथम संस्करण के विमोचन अवसर का वीडियो

 10 सितम्बर 1954 की बैठक में सोवियत संघ से सहयोग लेने का प्रस्ताव पारित हुआ। 2 फरवरी 1955 को 10 लाख टन हाट मेटल सालाना उत्पादित करने हेतु संयंत्र लगाने हेतु सोवियत संघ और भारत के बीच समझौता हुआ। धीरे-धीरे लाल मिट्टी, डासा कन्हार वाली धरती जिसे धान का कटोरा कहा जाता है वहाँ भिलाई इस्पात संयंत्र आकार लेने लगा। रूस ठंडा मुल्क हैं और वहाँ से विशेषज्ञ भिलाई आये जो बरसात और गर्मी के मौसम में खूब अपना रंग दिखाता है।

द्वितीय संस्करण के विमोचन अवसर का वीडियो

यहाँ खूब बारिश भी होती है और गर्मी भी अधिक पड़ती है। रूसी विशेषज्ञ ठंडे माहौल में रहने के आदी थे। उन्हें मौसम, भाषा, भोजन और अन्य परिस्थितियों से समझौता करना पड़ा। लेकिन एक बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित इस्पात सेनानियों ने यहाँ धीरे-धीरे उत्साह का वातावरण बना दिया। 'द्रुगे' अर्थात दोस्ती ने विशाल कारखाने को बहुत कम समय में खड़ा कर दिया। 

मैत्री बाग भिलाई नगर में इसी दोस्ती को महत्व देते हुए बनाया गया। जहाँ संस्थापकों की प्रतिमा भी लगाई गई है। 1 जुलाई 1956 को मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल भिलाई आए। उसके बाद देश के मूर्धन्य नेतागण लगातार भिलाई आये। जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, विनोबा भावे से लेकर नेहरू जी के साथ छुटपन में भिलाई आये राजीव गांधी भी बाद में प्रधानमंत्री के रूप में भिलाई आये। देश के जाने माने कलाकार, साहित्यकार भिलाई आये। 

श्रमिक संघर्ष ने यहाँ अपनी पहचान बनाई। भिलाई नगर में इण्टक, सीटू के बीच लगातार प्रतिद्वंद्विता रही मगर सभी श्रम संघों ने भिलाई मेें दोस्ताना माहौल बनाने का यत्न किया। इण्टक यूनियन के महासचिव रहे रवि आर्य कालान्तर में भिलाई के विधायक भी बने। शुरूआती दौर की हर परिस्थिति पर जाकिर ने इस पुस्तक में लेखन करने का प्रशंसनीय प्रयास किया है।

परी पुरोहित का स्वप्रेरणा से बनाया वीडियो मेरी किताब पर

 शुरू में भोजन और निवास के लिए यहाँ सुविधा नहीं थी। ऐसे दौर में पुरोहित होटल ने यहाँ सबसे पहले इस दिशा में काम किया। सेक्टर-1 में और कैम्प-1 में पुरोहित होटल स्थापित कर सेवा का कीर्तिमान रचा गया। तब बड़े-बड़े ठेकेदार पुरोहित होटल (लॉज) में ही ठहरते थे। मित्तल जैसे स्टील किंग भी यहीं ठहरे। 

बी के, बी.ई.सी, सिम्पलेक्स के रूप में बाद में फैक्ट्री लगाने वाले लोग तब ठेका लेने के लिए आते थे और पुरोहित लॉज में ही आसरा पाते थे। धीरे-धीरे सेक्टर-1 बना फिर अन्य सेक्टर बने। भिलाई नगर का पहली सिनेमा चित्रमंदिर सिविक सेंटर में तैयार किया गया। नेहरू सांस्कृतिक सदन बना। मड़ोदा टैंक ने भी आकार लेना शुरू किया। शिक्षा के केंद्र बने। 

1961 में छत्तीसगढ़ कल्याण समिति बनी। इस समिति ने भिलाई में आये युवा कमर्चारियों के लिए आगे की पढ़ाई के लिए महाविद्यालय प्रारंभ किया। स्व. रामेश्वर प्रसाद मिश्रा एवं तोरन सिंह ठाकुर के साथ कल्याण समिति के सदस्योंं ने सेक्टर 2 में पहले यहां रात्रिकालीन महाविद्यालय प्रारंभ किया। बाद में यह नियमित कल्याण महाविद्यालय 14 एकड़ जमीन पर सेक्टर-7 में आकार ग्रहण करता चला गया ।

 नेहरू चिकित्सालय ने यहाँ अपार यश अर्जित किया। इसी कारखानें से जुड़ी हैं पद्मभूषण तीजन बाई। विदेशी 64 मंचों पर पंथी के प्रदर्शन से देश का नाम रोशन कर चुके स्व. देवदास बंजारे भिलाई स्टील प्लांट के कर्मचारी थे। वे गुरू बाबा घासीदास के समतावादी संदेश को लेकर रूस, जापान, इंग्लैण्ड अमेरिका गए। उन्होंने हबीब तनवीर के प्रसिद्ध नाटक चरण दास चोर में काम कर अपार यश प्राप्त किया। 

जाकिर ने इन सबको अपनी किताब में यथोचित महत्व दिया है। अलेक्सेई निकोलाई कोसिजिन सोवियत संघ के मंत्री परिषद के उपाध्यक्ष के हाथों 1961 में भारत रूस मैत्री के प्रतीक स्तम्भ (ओबेलिस्क) की आधार शिला रखी गई। इसी प्रतीक स्तम्भ में एक तरफ जवाहरलाल नेहरू की पंक्ति अंकित हैं कि-'भिलाई भारत के भविष्य का शुभ शगुन एवं प्रतीक हैं।' दूसरी तरफ तत्कालीन रूसी प्रधानमंत्री खुश्चेव की पंक्ति है कि-'भारत-रूस की मैत्री भिलाई इस्पात संयंत्र की तरह मजबूत हो'।

 भिलाई इस्पात संयत्र की गतिविधियों एवं उपलब्धियों की ज्यादातर शानदार फोटोग्राफी हरीश जाधव जी द्वारा की गई है। इनकी फोटोग्राफी की कई प्रदशर्नी भी लगी है। देश की चर्चित पत्रिकाओं ने उनके द्वारा खीची गई फोटो को आदर के साथ प्रकाशित किया है। 

जाकिर ने अपनी किताब में 'टाइम कैप्स्यूल' का भी जिक्र किया है, जो 25 दिसम्बर 1965 को ब्लास्ट फर्नेस-4 की नींव में डाला गया। इस पुस्तक से गुजरते हुए मुझे एक शख्स के द्वारा रचित कीतिर्मानों को पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ। विजय सिंह पाराशर तत्कालीन सुपरिन्टेण्डेण्ट ब्लास्ट फर्नेस भिलाई इस्पात संयंत्र ने भी अपना अनुभव साझा किया है। वे नेहरू नगर में रहते हैं। पाराशर मेरी बहू के दादा जी हैं। मैं उन्हें विभिन्न पारिवारिक समारोहों में उनकी अग्रगामी भूमिका के कारण ही जानता और सम्मान देता था। इस पुस्तक से यह जानकारी मिली कि भिलाई इस्पात संयंत्र में काबिल इंजीनियर के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण सेवायें दी हैं। पुस्तक में 121वें पृष्ठ में उनके योगदान का विशेष जिक्र जाकिर ने किया है। 

पुस्तक में जाकिर ने सभी प्रबंध निदेशक, रूसी प्रमुखों के साथ विशेषज्ञों को याद किया है। इस पुस्तक में जनरल मैनेजर जी. जगतपति के नाम प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के पत्र को भी प्रकाशित किया गया है, जो एक विशेष पत्र है। यह पत्र बताता है कि देश के विकास के लिए चिंतित रहने वाले बड़े लोग किस तरह चौकन्ने होकर हर उपलब्धि का ध्यान रखकर उससे सम्बन्धित लोगों की हौसला अफजाई करते थे। 

शिवराज जैन राजनांदगांव में जन्मे,पढ़े-लिखे पहले छत्तीसगढिय़ा इन्जीनियर थे जो बाद में प्रबंध निदेशक और फिर सेल के अध्यक्ष भी बने। चर्चित जनरल सुपरिन्टेण्डेंट कुलवंत सिंह नागी का भी इस पुस्तक में जिक्र है जिन्होंने एक विशेष अवसर पर शिवराज जैन तथा रशियन विशेषज्ञ मिखाइलोविच को पंजाब की परंपरागत पगड़ी पहनाकर सम्मान दिया था। भारत और रूस के बीच राजनायिक सम्बन्धों के 70 वर्षीय इतिहास को महत्व देते हुए भिलाई से इंडिया-रशिया फ्रैंडशिप मोटर रैली 20 फरवरी 18 को निकाली गई। भिलाई में रूसी महिलाओं ने अपने लिए जीवन साथी चुना। उनके सुखद दाम्पत्य जीवन के ब्यौरे को भी बहुत आत्मीयता के साथ इस ग्रंथ में संग्रहित किया गया है।

 रूस में नेहरू, लता और राजकपूर खूब प्रसिद्ध रहे हैं। जाकिर ने रूसी लोगोंं के साक्षात्कारों के माध्यम से इस सन्दर्भ में रोचक जानकारियाँ दी हैं। इस ग्रंथ में एक मार्मिक कहानी प्रदीप पुरतेज सिंह की है। वे भिलाई इस्पात संयंत्र में जन सम्पर्क विभाग में उपप्रमुख थे। उनका प्रेम रूसी महिला से था। उन्होंने रूसी महिला के माता-पिता को राजी करने का प्रयत्न भी किया लेकिन विकलांग पुरतेज सिंह को देखकर वे लोग राजी नहीं हुए। इस तरह तान्या त्सालगावा एवं प्रदीप सिंह की प्रेमकथा का दुखद अंत हुआ।

 रूसी भाषा के जानकार दुभाषिए विष्णु प्रभाकर तोपखानेवाले का किस्सा भी कम रोचक नहीं है। वे रूसी भाषा में प्रवीण थे। रूसियों ने उन्हें खूब सम्मान एवं अपनत्व दिया। 'वोल्गा से शिवनाथ तक' एक ऐसी किताब है जिसमें एक कारखाने के जन्म की कहानी है। उसका बचपन और उसकी जवानी के किस्से भी इस कृति में है। छत्तीसगढ़ प्रान्त की आंतरिक विशेषता, यहाँ के लोगों की सहजता, देश भर से आये श्रमिकों से जुड़े उनके प्रान्तोंं की तस्वीरें किताब के हर्फ-हर्फ में है। 

भिलाई नगर में विभिन्न प्रान्तों से आये समुदायों ने अपना भवन बनाया। पूरा देश यहाँ अपनी विशेषताओं केसाथ मिल जाता है। भिलाई इस्पात संयंत्र के हर अगुवा ने कुछ नया करने का प्रयास किया। यहाँ पर्यावरण के क्षेत्र में मैनेजिंग डायरेक्टर विक्रांत गुजराल ने विशेष काम किया। उनके समय में लगाये गए पेड़ों के कारण भिलाई नगर अन्य मैदानी नगरों की तुलना में ठंडा रहता है। छत्तीसगढ़ के उदार मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उत्तर प्रदेश, बिहार के छठ पर्व पर छुट्टी देकर छत्तीसगढ़ की उदारता का प्रमाण प्रस्तुत कर दिया है । 

विभिन्न प्रान्तों से भिलाई आये कमर्चारियों, व्यवसायियों तथा उनके बच्चों ने विभिन्न क्षेत्रों में कीर्तिमान रचकर सबको प्रेरित किया है। यह पुस्तक संतुलित विचार और समग्र जानकारी, प्रमाणित आंकड़ों एवं ऐतिहासिक महत्व की घटनाओं के आलेखन के कारण बेहद महत्वपूर्ण बन पड़ी है। कल्पना के बदले यथार्थ और सुनी सुनाई बातों के बदले प्रामाणिक इतिहास को आधार बनाकर लेखक जाकिर ने ऐसी किताब को आकार दिया है जो उसे भिलाई और देश से प्रेम करने वाले पाठक के लिए इसे बेहद उपयोगी किताब बनाती है। वोल्गा से शिवनाथ पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक हैं। 

विमोचन अवसर पर मुख्यमंत्री त्रयी अजीत जोगी, भूपेश बघेल और डॉ. रमन सिंह के साथ अतिथिगण (7 फरवरी 2019)

शीर्षक - वोल्गा से शिवनाथ तक

मूल्य - 500.00 रू. 

प्रकाशक- सर्वप्रिय प्रकाशन कश्मीरी गेट चर्च रोड, नई दिल्ली 

 लेखक - मुहम्मद जाकिर हुसैन

 समीक्षक- डॉ. परदेशी राम वर्मा 

संपर्क- लेखक-9425558442 समीक्षक-9827993494

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