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Sunday, May 31, 2026


 रावघाट का लौह अयस्क भिलाई जाएगा ट्रेन 

 

से, दो दशक में पटरियां बिछाने का काम पूरा  


रावघाट रेलवे स्टेशन का प्रवेश द्वार मई 2026

अंतत: रावघाट लौह अयस्क खदान से भिलाई स्टील प्लांट के लिए कच्चा माल भेजने एक महत्वपूर्ण पड़ाव पूरा हो गया। दो दशक पहले दल्ली राजहरा से रावघाट होते हुए जगदलपुर तक रेल लाइन बिछाने एक महत्वपूर्ण एमओयू 2007 में हुआ था। तब लक्ष्य 5 वर्ष में रेल लाइन बिछाने का था लेकिन सुरक्षागत व अन्य वजहों से अब करीब दो दशक में रावघाट तक रेल लाइन बिछाने का काम पूरा हुआ है। 

फिलहाल रावघाट से अंतागढ़ तक लौह अयस्क सड़क मार्ग से भेजा जा रहा है और वहां से मालगाड़ी में दल्ली राजहरा होते हुए भिलाई भेजा जा रहा है। उम्मीद जताई जा रही है अक्टूबर 2026 से सीधे रावघाट से लौह अयस्क मालगाड़ी से भेजा जा सकेगा। रेलवे और सेल-बीएसपी मैनेजमेंट की तैयारियां पूरी है। फिलहाल रावघाट रेलखंड पर इंजन की सफल रोलिंग की जा चुकी है। अंतत: दल्ली राजहरा से रावघाट तक रेल लाइन का काम लगभग पूरा हो चुका है। 

95 किमी रेल लाइन बिछाना एक जटिल परियोजना 

फिलहाल अंतागढ़ से मालगाड़ी में भेजा जा रहा लौह अयस्क

देखा जाए तो दल्ली राजहरा से रावघाट तक करीब 95 किलोमीटर लंबी यह रेल परियोजना सामान्य निर्माण कार्य नहीं थी। नक्सल प्रभावित और अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र से गुजरने वाली इस लाइन के निर्माण में सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती रही। रेल लाइन और खनन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए वर्ष 2012 में गृह मंत्रालय के समन्वय से दो-दो बटालियन सुरक्षा बलों की तैनाती की गई, जिनमें रेलवे ट्रैक की सुरक्षा के लिए सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) तथा खनन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की बटालियनें शामिल थीं। 
गृह मंत्रालय के निर्देशानुसार दल्लीराजहरा से रावघाट तक के आंतरिक क्षेत्रों में सेल द्वारा 4 अर्ध-स्थायी तथा 21 स्थायी सुरक्षा शिविरों का निर्माण कराया गया, जिस पर स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा 180 करोड़ रुपये से अधिक की राशि व्यय की गई। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, सुरक्षा चुनौतियों और बीच-बीच में हुई घटनाओं के बावजूद परियोजना का कार्य लगातार आगे बढ़ता रहा।

कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) निरीक्षण 

सहित पूर्ण कमीशनिंग जून 2026 में प्रस्तावित  

अक्टूबर 2026 में रावघाट से सीधे मालगाड़ी में भेजा जा सकेगा लौह अयस्क 

रेलवे निर्माण कार्य भारतीय रेलवे द्वारा सेल के वित्तीय सहयोग से किया जा रहा है, जबकि निर्माण एजेंसी रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) है। रेल लाइन निर्माण की अनुमानित लागत लगभग 1854 करोड़ रुपये है, जिसमें से सेल-भिलाई इस्पात संयंत्र अब तक लगभग 1720 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुका है। इसके अतिरिक्त रेलवे लाइन के विद्युतीकरण कार्य के लिए भी संयंत्र द्वारा लगभग 180 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि व्यय की गई है। वर्ष 2010 में प्रारंभ हुए इस कार्य में अप्रैल 2026 तक रावघाट स्टेशन भवन, यात्री सुविधाओं तथा सिग्नलिंग एवं दूरसंचार कार्य को छोड़कर अधिकांश निर्माण पूरा किया जा चुका है। कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) निरीक्षण सहित पूर्ण कमीशनिंग जून 2026 में प्रस्तावित है।
20 मई 2026 को रावघाट रेलखंड पर इंजन की सफल रोलिंग इस परियोजना की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आई है। इसके साथ ही रावघाट माइंस से सीधे रेल रेक संचालन का मार्ग लगभग प्रशस्त हो गया है और आगामी कुछ सप्ताहों में रावघाट से रेक डिस्पैच प्रारंभ होने की संभावना है। यह उपलब्धि केवल तकनीकी प्रगति नहीं, बल्कि वर्षों के सतत प्रयास, समन्वय और कठिन परिस्थितियों में किए गए कार्य का परिणाम मानी जा रही है।

यात्री ट्रेन सेवा शुरू हो चुकी 

केवटी से शुरू हुई यात्री ट्रेन 16 जुलाई 2019 

इस परियोजना का प्रभाव अब केवल औद्योगिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है। वर्ष 2022 में दल्ली राजहरा से ताड़ोकी तक यात्री ट्रेन सेवा शुरू होने के बाद बस्तर अंचल के लोगों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और व्यापार के नए रास्ते खुले हैं। आदिवासी समाज के युवाओं के लिए अब दुर्ग, भिलाई और देश के अन्य बड़े शहरों तक पहुंच पहले की तुलना में अधिक सहज हो गई है। स्थानीय नागरिकों के लिए यह रेल लाइन केवल परिवहन का माध्यम नहीं, बल्कि नई संभावनाओं का द्वार बनती जा रही है।
आज भिलाई इस्पात संयंत्र रावघाट स्टेशन को भी भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित कर रहा है। स्टेशन में यात्रियों के लिए तीन प्लेटफॉर्म तथा लौह अयस्क एवं सामग्री परिवहन हेतु एक पृथक गुड्स प्लेटफॉर्म विकसित किया जा रहा है। वर्तमान में लौह अयस्क का परिवहन सड़क मार्ग से अंतागढ़ रेलवे साइडिंग तक तथा वहां से रेल मार्ग द्वारा संयंत्र तक किया जा रहा है। पहली रैक 9 सितंबर 2022 को लोड की गई थी और वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 6000 टन लौह अयस्क अंतागढ़ साइडिंग तक पहुंचाया जा रहा है।

अंतागढ़ तक यात्री ट्रेन पहुंची 15 अगस्त 2024

अक्टूबर  2026  से रावघाट से सीधे रैक संचालन प्रारंभ होने की संभावना है, जिससे प्रतिदिन लगभग चार रैक यानी 15 हजार टन लौह अयस्क परिवहन संभव हो सकेगा। वर्ष 2025-26 में अंतागढ़ साइडिंग से 1.74 मिलियन टन आयरन ओर प्राप्त हुआ है, जबकि वर्ष 2026-27 में अंतागढ़ और रावघाट साइडिंग के माध्यम से अतिरिक्त 4 से 5 मिलियन टन लौह अयस्क प्राप्त होने का अनुमान है। परियोजना पूर्ण होने के बाद प्रतिवर्ष 6 से 7 मिलियन टन लौह अयस्क की आपूर्ति संभव होगी।
यह परियोजना भिलाई इस्पात संयंत्र की भविष्य की उत्पादन योजनाओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्तमान में संयंत्र की लौह अयस्क आवश्यकता लगभग 32 हजार टन प्रतिदिन है। वहीं हॉट मेटल उत्पादन को 6.5 एमटीपीए से बढ़ाकर 7.5 एमटीपीए तथा वर्ष 2031 तक 10.5 एमटीपीए विस्तार लक्ष्य तक पहुंचाने की योजना पर कार्य किया जा रहा है।


रावघाट 1983 से एमओयू तक 

रावघाट रेलवे स्टेशन मई 2026

सेल-भिलाई स्टील प्लांट ने रावघाट खदानों के लिए 1983 में अपना पहला आवेदन किया और 13 साल बाद 1996 में पर्यावरण और वन मंत्रालय (एमओईएफ) ने सैद्धांतिक रूप से पर्यावरणीय मंज़ूरी दी थी।
रेलवे, मध्य प्रदेश राज्य सरकार (जिससे बाद में 1 नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य का गठन किया गया), राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनएमडीसी) और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) के बीच 02 अप्रैल 1998 को एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।
2004 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने सेल को वानिकी और पर्यावरण मंजूरी के लिए नए सिरे से आवेदन प्रस्तुत करने को कहा। सेल ने आईबीएम, केंद्रीय खान एवं अनुसंधान संस्थान, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान और अन्य द्वारा अध्ययन करने के बाद 2006 में आवेदन प्रस्तुत किया। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा मई 2007 में वन मंजूरी के लिए सेल के प्रस्ताव को पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भेजे जाने के बाद, मंत्रालय ने इसे जून 2007 के आसपास सर्वोच्च न्यायालय की अधिकार प्राप्त समिति को भेज दिया।
दल्ली राजहरा-रावघाट-जगदलपुर (235 किमी) ब्रॉड गेज रेल लिंक परियोजना के निर्माण को लागत-साझाकरण के आधार पर कार्यान्वित करने के लिए 11 दिसंबर 2007 को रेल मंत्रालय और छत्तीसगढ़ सरकार, सेल, एनएमडीसी के बीच एक संशोधित समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।
सुप्रीम कोर्ट कमेटी ने अक्टूबर 2008 में रावघाट माइंस के एफ ब्लॉक के लिए वन मंजूरी के लिए अपनी अंतिम सहमति दी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अंतिम मंजूरी के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय को भेजा गया ।
छत्तीसगढ़ सरकार के खनिज संसाधन विभाग ने अंततः अक्टूबर 2009 में पर्यावरण एवं वन मंत्रालय से उचित पर्यावरणीय मंजूरी और वानिकी मंजूरी मिलने के बाद सेल को 20 साल की अवधि के लिए रावघाट माइंस के एफ ब्लॉक के लिए खनन पट्टा प्रदान किया। 

नई रेल लाइन के लिए एमओयू 2007

ताड़ोकी रेलवे स्टेशन के समीप रेलवे ब्रिज 2026

'पब्लिक-पब्लिक पार्टनरशिप' (सार्वजनिक-सार्वजनिक भागीदारी) के एक बेहतरीन उदाहरण के रूप में, रेल मंत्रालय, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल), नेशनल मिनरल्स डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएमडीसी) और छत्तीसगढ़ की राज्य सरकार ने मिलकर छत्तीसगढ़ में दल्लीराजहरा से जगदलपुर तक (रावघाट होते हुए) 235 किलोमीटर लंबी एक नई ब्रॉड गेज रेल लाइन बनाने के लिए साझा सहमति पत्र पर 11 दिसंबर 2007 को हस्ताक्षर किए।
इस अवसर पर केंद्रीय रेल मंत्री लालू प्रसाद, केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक तथा इस्पात मंत्री राम विलास पासवान, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और रेल राज्य मंत्री आर. वेलू उपस्थित थे। समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों में रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के.सी. जेना, छत्तीसगढ़ सरकार के मुख्य सचिव शिवराज सिंह, सेल के अध्यक्ष एस.के. रूंगटा और एनएमडीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक राणा सोम शामिल थे। इस अवसर पर रेल मंत्रालय, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय, सेल और एनएमडीसी के वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।

रेल मंत्री लालू बोले-विकास का मार्ग प्रशस्त करेगी नई रेल लाइन  

अक्टूबर 2009 में रावघाट खदान की माइनिंग लीज मिलने के बाद एमडी आर रामाराजू व अन्य 

इस अवसर पर बोलते हुए, रेल मंत्री लालू प्रसाद ने कहा कि यह नई रेल लाइन एक महत्वपूर्ण परियोजना है जो देश में आर्थिक विकास की गति को तेज करने में मदद करेगी। लालू प्रसाद ने कहा कि यह रेल लाइन बैलाडीला और रावघाट के लौह अयस्क से समृद्ध क्षेत्रों से होकर गुजरेगी, जिससे देश में इस्पात उत्पादन में वृद्धि होगी। मंत्री ने बताया कि यह नई लाइन अयस्कों और खनिजों के परिवहन के साथ-साथ वन उत्पादों के थोक परिवहन को भी सुगम बनाएगी। रेल मंत्री ने आगे कहा कि यह नई लाइन आदिवासी और पिछड़े वर्गों के लोगों को रोजगार के अनेक अवसर प्रदान करेगी और छत्तीसगढ़ के बस्तर तथा नारायणपुर जैसे पिछड़े क्षेत्रों के विकास का मार्ग प्रशस्त करेगी। 1998 में हस्ताक्षरित पिछले एमओयू का ज़िक्र करते हुए, लालू प्रसाद यादव ने कहा कि कुछ कारणों से पिछले दशक के दौरान यह परियोजना शुरू नहीं हो पाई थी। मंत्री ने बताया कि पिछले महीने उनके मंत्रालय द्वारा बुलाई गई एक विशेष बैठक में इस मुद्दे को सुलझा लिया गया, जिसमें सभी संबंधित एजेंसियां शामिल थीं; इसी से आज के संशोधित समझौता ज्ञापन (एमओयू) का मार्ग प्रशस्त हुआ।

रमन ने बताया उत्तर और दक्षिण के बीच  सेतु तो 

पासवान ने कहा पीपीपी का बेहतरीन उदाहरण

मुख्यमंत्री डॉ. रमन को रावघाट खनन की योजना बताते बीएसपी के एमडी  आर. रामाराजू, 
ईडी माइंस मानस कुमार बिंदु, जीएम माइंस पीके सिन्हा व  
प्रदेश के वनमंत्री विक्रम उसेंडी और अन्य अफसर। (2008) 

अपने संबोधन में, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने कहा कि इस नई रेल कनेक्टिविटी को पिछड़े बस्तर क्षेत्र की जीवन रेखा कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि यह उत्तर और दक्षिण के बीच एक सेतु (पुल) का काम भी करेगी। इस क्षेत्र के सुंदर, अत्यंत सघन और अद्वितीय वनों का ज़िक्र करते हुए, डॉ. रमन सिंह ने कहा कि यह नई रेल लाइन पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होगी। डॉ. सिंह ने कहा कि यह नई लाइन रेलवे की कमाई में भी काफी हद तक इज़ाफ़ा करेगी। 

अपने संबोधन में, केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक तथा इस्पात मंत्री राम विलास पासवान ने कहा कि यह नई रेल लाइन स्थानीय लोगों की लंबे समय से लंबित मांग को पूरा करेगी। उन्होंने यह भी बताया कि आज का एमओयू 'सार्वजनिक-सार्वजनिक भागीदारी' (पीपीपी) का एक बेहतरीन उदाहरण है। उन्होंने कहा कि यह सराहनीय है कि रेल मंत्रालय देश के पिछड़े क्षेत्रों के विकास की अवधारणा को आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने कहा कि देश का सार्वजनिक क्षेत्र पूरी दक्षता के साथ कार्य कर रहा है, और उन्होंने उनसे आह्वान किया कि वे अपने मुनाफ़े का एक निश्चित प्रतिशत उस मद पर खर्च करें जिसे 'कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व' (सीएसआर) के रूप में जाना जाता है।
अपने स्वागत संबोधन में, रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के.सी. जेना ने कहा कि रेल मंत्री द्वारा की गई विशेष पहलों के कारण भारतीय रेलवे में एक ज़बरदस्त बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान एमओयू इसी पहल का एक हिस्सा है। उन्होंने कहा कि इस एमओयू  पर हस्ताक्षर होने के साथ ही, देश में लौह अयस्क और इस्पात के सुगम परिवहन के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात होगा, और इससे आदिवासी बहुल बस्तर क्षेत्र का बहुप्रतीक्षित सामाजिक-आर्थिक विकास सुनिश्चित होगा।

दो चरणों में होगा निर्माण, 58 वैगन की होगी मालगाड़ी

रावघाट रेलवे स्टेशन का शानदार नजारा मई 2026


इस परियोजना का निर्माण दो चरणों में किया जाएगा। पहला चरण दल्लीराजहरा से रावघाट तक 95 किलोमीटर लंबा है, जबकि दूसरा चरण रावघाट से जगदलपुर तक 140 किलोमीटर लंबा है। वर्ष 2004-05 के मूल्य स्तरों के आधार पर, इस परियोजना की लागत 968.60 करोड़ रुपये है। पहला चरण पाँच साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है और इसका पूरा खर्च, जो कि 304 करोड़ रुपये है, सेल उठाएगी। दूसरे चरण पर 640 करोड़ रुपये का खर्च आएगा, जिसे भारतीय रेलवे (376 करोड़ रुपये – 57%), सेल (141 करोड़ रुपये – 21%), छत्तीसगढ़ राज्य सरकार (76 करोड़ रुपये – 12%) और एनएमडीसी (70 करोड़ रुपये – 10%) मिलकर साझा करेंगे। पहले चरण के लिए ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी है। इस नई रेलवे लाइन में 460 मीटर लंबी एक सुरंग, 46 रोड अंडर-ब्रिज, 16 रोड ओवर-ब्रिज, 42 बड़े पुल और 303 छोटे पुल शामिल होंगे। रेलवे ने शुरू में 10 स्टेशन बनाने की योजना बनाई है।
खनिजों और अयस्कों के परिवहन के अलावा, जो इस परियोजना का मुख्य कार्य होगा, इस रेल लाइन के माध्यम से स्थानीय क्षेत्र के वन उत्पादों, खाद्यान्नों आदि के परिवहन का भी प्रस्ताव है। इन वस्तुओं को संभालने के लिए पर्याप्त लोडिंग और अनलोडिंग की सुविधाएँ प्रदान की जाएँगी। लौह अयस्क, डोलोमाइट, बॉक्साइट आदि जैसे खनिज अयस्कों के परिवहन के लिए, रेलवे ने डीज़ल इंजन वाली मालगाड़ियाँ चलाने की योजना बनाई है, जिनमें 58 वैगन होंगे। उद्योग जगत की विशेष माँगों पर अतिरिक्त निजी साइडिंग्स की व्यवस्था करने पर भी विचार किया जा सकता है।

रावघाट रेल लाइन पर हुआ तकनीकी ट्रायल


17 जून 2026 को तकनीकी ट्रायल
दल्लीराजहरा- रावघाट रेल परियोजना ने 17 जून 2026 को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की, जब रावघाट रेलखंड पर नियंत्रित गति और सीमित भार के साथ तकनीकी ट्रायल प्रारंभ किया गया। इस ट्रायल में 58 BOXN रैक का उपयोग किया गया। 

यह ट्रायल आगामी दिनों में विभिन्न चरणों में जारी रहेगा और रेल लाइन की परिचालन क्षमता, संरचनात्मक सुरक्षा तथा तकनीकी मानकों का परीक्षण किया जाएगा। इस प्रगति के साथ रावघाट रेल परियोजना अब अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है।

इस परियोजना में सेल द्वारा अब तक करीब 1800 करोड़ रुपये रेल लाइन निर्माण पर तथा रावघाट परियोजना के समग्र विकास पर लगभग 2000 करोड़ रुपये का निवेश किया जा चुका है। जून 2026
तक रेल लाइन निर्माण का अधिकांश कार्य पूर्ण हो चुका है। 

इस समय रावघाट स्टेशन भवन, यात्री सुविधाओं तथा सिग्नलिंग एवं दूरसंचार (एस एंड टी) से जुड़े कार्यों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। जुलाई 2026 के अंत तक स्टेशन परिसर के शेष कार्य पूर्ण होने की संभावना जताई गई है। इसके बाद कमिश्नर ऑफ रेलवे सेफ्टी (सीआरएस) द्वारा निरीक्षण और सुरक्षा स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
रेलवे अधिकारियों के अनुसार तकनीकी ट्रायल का उद्देश्य रेल लाइन की परिचालन तैयारियों का आकलन करना है। विभिन्न गति और भार स्थितियों में परीक्षण किए जाने के बाद आवश्यक अनुमतियां प्राप्त होंगी। सीआरएस की स्वीकृति मिलने के उपरांत इस रेलखंड पर यात्री ट्रेन संचालन का मार्ग भी प्रशस्त हो जाएगा, जिसका लंबे समय से बस्तर क्षेत्र के लोग इंतजार कर रहे हैं।
इस परियोजना का प्रभाव पहले से ही दिखाई देने लगा है। वर्ष 2022 में दल्लीराजहरा से ताड़ोकी तक यात्री ट्रेन सेवा शुरू की गई थी। आगे अब रावघाट तक रेल संपर्क स्थापित होने के बाद यह लाभ और व्यापक होगा तथा बस्तर के दूरस्थ क्षेत्रों की पहुंच राज्य और देश के प्रमुख शहरों तक और अधिक सुगम हो जाएगी।

महाप्रबंधक ने किया  मड़ोदा–ताड़ोकी रेल सेक्शन का मुआयना

ताड़ोकी रेलवे स्टेशन में महाप्रबंधक तरूण प्रकाश-26 जून 2026
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे रायपुर रेल मंडल में 26 जून 2026 को महाप्रबंधक तरुण प्रकाश ने मड़ोदा से ताड़ोकी रेल सेक्शन का संरक्षा एवं रेल विकासात्मक कार्यों का निरीक्षण किया गया। 

निरीक्षण के दौरान महाप्रबंधक ने मरौदा रेलवे स्टेशन पर चल रहे अमृत भारत स्टेशन योजना के  विकासात्मक कार्य, अप्रोच रोड़, आर आर आई, रेलवे स्टेशन परिसर का गहनता से निरीक्षण कर संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। 

उन्होंने बालोद रेलवे स्टेशन, दल्लीराजहरा रेलवे स्टेशन में चल रहे अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत कार्यों को देखा। जिसमें यात्री सुविधाओं में वृद्धि, रेलवे स्टेशनों में सुगम्य प्रवेश आसानी से टिकट लेने, प्रतीक्षालय की व्यवस्था, रेल परिचालन संबंधित, यात्री सुविधा  व संरक्षा संबंधित कार्यों पर आवश्यक दिशा निर्देश दिए। 

वहीं रेल कर्मियों तथा रेलवे ट्रैक पर काम कर रहे ट्रैकमेनो से  पर संवाद किये। इस निरीक्षण में मंडल रेल प्रबंधक दयानंद सहित बिलासपुर मुख्यालय के प्रधान मुख्य विभागाध्यक्ष रायपुर रेल मंडल के अधिकारी उपस्थित रहे।


 

Tuesday, February 24, 2026

 "भिलाई जिंदाबाद" का विमोचन किया फिल्मकार अनुराग बसु ने



 इस्पात नगरी भिलाई के लेखक व पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन की नई किताब "भिलाई जिंदाबाद, कुछ किस्से-कहानियां" का विमोचन फिल्मकार अनुराग बसु ने रविवार 25 जनवरी 2026 को किया किया। राजधानी नवा रायपुर स्थित पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित साहित्य उत्सव के समापन समारोह में अनुराग ने यह विमोचन किया। उन्होंने इस्पात नगरी भिलाई पर आधारित रोचक सामग्री को सराहा और लेखक को अपनी शुभकामनाएं दी।
उल्लेखनीय है कि वैभव प्रकाशन नई दिल्ली-रायपुर से प्रकाशित इस किताब में इस्पात नगरी भिलाई के स्थापना काल सेे अब तक के प्रमुख व रोचक घटनाक्रम को लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने कलमबद्ध किया है। इसके पूर्व  लेखक की "भिलाई एक मिसाल" और "वोल्गा से शिवनाथ तक" किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो इस्पात नगरी भिलाई के इतिहास पर केंद्रित है।

"भिलाई जिंदाबाद.." में क्या खास है..? 


इस्पात नगरी भिलाई के निर्माण काल से अब तक कुछ रोचक और हैरतअंगेज घटनाक्रमों को लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने अपनी इस किताब में दर्ज किया है। विगत तीन दशकों के लगातार शोध के बाद लेखक ने अपनी इस किताब में भिलाई से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रम को दर्ज किया है। यह सब किस्से और कहानियों की शैली है। 

इनमें फिल्मी दुनिया, राजनीति से लेकर विभिन्न क्षेत्रों के अतिविशिष्ट लोगों के इस्पात नगरी आगमन से लेकर ऐसे बहुत से तनाव भरे दिन और हादसों का भी विस्तार से उल्लेख है जिन्होंने भिलाई को कई बार झकझोर दिया। इसके साथ ही विदेश में भिलाई का परचम फहराने वाली कुछ हस्तियों का भी जिक्र है।


इस्पात नगरी का रोचक इतिहास प्रमाणित तथ्यों 

के साथ रखती है किताब भिलाई जिंदाबाद: उमाकांत

हमारी अगली पीढ़ी जानना चाहेगी तो बेहतर माध्यम 

साबित होगी किताब भिलाई जिंदाबाद : मेश्राम

सेक्टर-4 में हुआ समीक्षा गोष्ठी का आयोजन, बदलते 

भिलाई की चुनौतियों पर भी हुई चर्चा

गोष्ठी में उपस्थित विशिष्ट समुदाय

मूलनिवासी कला साहित्य और फिल्म फेस्टिवल भिलाई, डॉ अंबेडकर एग्जीक्यूटिव फ्रेटरनिटी भिलाई. डॉ अंबेडकर वेलफेयर सोसायटी छत्तीसगढ़ और एनस्टेप के संयुक्त तत्वावधान में समीक्षा गोष्ठी का आयोजन रविवार 8 फरवरी 2026 की शाम सेल एससी एसटी ओबीसी फेडरेशन भवन, सड़क नंबर 8, सेक्टर 4 में किया गया। जिसमें लेखक एवं पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन की  हालिया प्रकाशित किताब "भिलाई जिंदाबाद, कुछ किस्से-कुछ कहानियां" पर प्रमुख वक्ताओं ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने भिलाई को जानने समझने के लिए इसे एक जरूरी किताब बताया।
अतिथियों के स्वागत के उपरांत आधार वक्तव्य रखते हुए प्रसिद्ध कहानीकार मिर्जा हफीज बेग ने कहा कि कई मायनों में उन्हें यह किताब अपनी आपबीती भी लगती है क्योंकि भिलाई में जन्म लेने और भिलाई स्टील प्लांट का सेवानिवृत्त कर्मी होने के नाते इनमें से बहुत से घटनाक्रम से वह खुद भी रूबरू हुए है। उन्होंने कहा कि यह किताब लेखक की पिछली कृति "वोल्गा से शिवनाथ तक" के आगे का सिलसिला है और उसमें रह गई कमियों को पूरा करती है।

आधार वक्तव्य रखते हुए कहानीकार मिर्जा हफीज बेग 

वरिष्ठ रंगकर्मी राकेश बम्बार्डे ने कहा कि जिन्हें अपने शहर भिलाई से प्यार है और जो भिलाई को जानना-समझना चाहता है,वह सभी इस किताब को जरूर पढ़ेंगे। शायर मुमताज ने भिलाई की संस्कृति को किताब के माध्यम से सामने लाने के लिए लेखक की सराहना की और चंद अशआर सुनाए। ऑल पीएसयू एससी-एसटी एम्पलाइज फेडरेशन के चेयरमैन सुनील हरिशचंद्र रामटेके ने कहा कि लेखक ने पिछली किताब "वोल्गा से शिवनाथ तक" में भिलाई के योगदान पर भारतीय और रूसी लोगों के योगदान पर बेहद रोचक ढंग से तथ्यों को रखा था। वही शैली इस किताब में बरकरार है और जिस तरह लेखक ने भिलाई के शुरूआती दौर से अब तक की  तमाम हस्तियों से मिलकर उनका साक्षात्कार लेकर सबके सामने प्रस्तुत किया है, यह सबके बस की बात नहीं। 

उन्होंने दोहराया कि आज जिस तरह भिलाई के सामने नए दौर की चुनौतियां है, उनका सामना करने हमको अपने इतिहास के बारे जानना बेहद जरूरी है। भिलाई स्टील प्लांट के ऊर्जा प्रबंधन विभाग में जनरल मैनेजर कमल टंडन ने कहा कि भिलाई सही मायनों में लघु भारत है और इसका रोचक इतिहास जानने यह किताब सहायक होगी। कवि लक्ष्मीनारायण कुम्भकार ने कहा कि इतिहास को रोचक ढंग से प्रस्तुत करना भी एक चुनौती है और इसे लेखक ने बखूबी पूरा किया है। आकाशवाणी रायपुर के कार्यक्रम प्रमुख पंकज मेश्राम ने कहा कि एक पत्रकार का न केवल स्वतंत्र होना जरूरी है बल्कि उसका निर्भिक  होना और निष्पक्ष होना उतना ही जरूरी है। वो सारे गुण लेखक में मौजूद है। भिलाई पर अगर प्रमाणिक जानकारी चाहिए तो आपको लेखक की इस किताब से जरूर रूबरू होना चाहिए।

संचालनकर्ता रिटायर अपर कलेक्टर विश्वास मेश्राम ने भी रखी अपनी बात 

संचालन कर रहे सेवानिवृत्त अपर कलेक्टर विश्वास मेश्राम ने कहा कि जिस भिलाई को हमने देखा और जीया है, आज वह बदल रहा है।  आज के भिलाई की जो तस्वीर हम देखते हैं, उसे देखकर बहुत खुशी नहीं होती बल्कि एक दर्द सा उठता है। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में जब  हमारी अगली पीढ़ी हमारे भिलाई को ढूंढना चाहेगी तो इस किताब में ही पाएगी।
बीएसपी पावर इंजीनियरिंग एंड मेंटेनेंस विभाग में जनरल मैनेजर पीएस खोब्रागड़े ने कहा कि आज सोशल मीडिया और एआई का दौर है और इंटरनेट पर हम तलाशेंगे तो   इतनी प्रमाणित जानकारी नहीं मिल सकती जितनी लेखक ने अपनी किताब "भिलाई जिंदाबाद" में तथ्यों को जुटा कर दी है। 

भिलाई स्टील प्लांट टेलीकम्युनिकेशन विभाग के पूर्व प्रमुख और रिटायर जनरल मैनेजर एल. उमाकांत ने कहा कि लेखक ने जिन घटनाक्रमों को इस किताब में उल्लेखित किया है, उनमें से ज्यादातर के वे गवाह रहे हैं। उन्होंने बताया कि 6 जनवरी 1986 को जिस वक्त हादसा हुआ तो तब भिलाई होटल में दूरसंचार विभाग का एक कार्यक्रम चल रहा था और एमडी के आर संगमेश्वरन भी हमारे साथ उस कार्यक्रम में ही थे। हम सबने उस धमाके की आवाज सुनी थी। उन्होंने कहा कि भिलाई को जानने-समझने इस किताब से बेहतर माध्यम और कोई नहीं है। 

संगोष्ठी में अपनी बात रखते हुए लेखक-पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन 

अंत में लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने इस किताब की सृजन यात्रा के बारे में विस्तार से जानकारी दी और कहा कि पाठकों का प्रोत्साहन ही उन्हे आगे भी भिलाई के रोचक इतिहास से रूबरू कराने की प्रेरणा देगा। 

इस अवसर पर  भिलाई नगर मस्जिद ट्रस्ट के सदर मिर्जा आसिम बेग,रंगकर्मी एल. रुद्र मूर्ति, मोहन कुमार नामदेव, मुक्तानंद साहू, बिनितोष बाला, गंगा भाऊ जांभुलकर, विजया जांभुलकर, संगीता मेश्राम, उषा मेश्राम, फैजान खान, शारिक खान, चित्रसेन कोसरे, जयश्री मोहन नागदेवे, राजेंद्र सुनगरिया और गजेंद्र सायतोड़े सहित अनेक लोग मौजूद थे। अंत में धन्यवाद ज्ञापन बीएसपी कर्मचारी और रंगकर्मी वासुदेव ने दिया।

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भिलाई की अस्मिता और गौरव का शंखनाद है 'भिलाई ज़िंदाबाद'

समीक्षा- डॉ. सुधीर शर्मा 



भारत के औद्योगिक इतिहास में कुछ शहर केवल नक्शे पर दर्ज नाम नहीं होते, वे अपने भीतर एक युग की स्मृतियाँ, संघर्ष और सपने सँजोए रहते हैं। छत्तीसगढ़ की धरती पर बसा भिलाई ऐसा ही शहर है, जिसकी पहचान केवल एक औद्योगिक नगर के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण की जीवंत प्रयोगशाला के रूप में रही है। यहाँ की मिट्टी में श्रम की गंध है, यहाँ की सड़कों पर इतिहास के पदचिह्न हैं और यहाँ की हवा में उस दौर की प्रतिध्वनि सुनाई देती है जब राष्ट्र निर्माण एक सामूहिक संकल्प हुआ करता था।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने जिस समाजवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाया, उसमें भारी उद्योगों को राष्ट्र की रीढ़ माना गया। इसी सोच के केंद्र में रहा भिलाई इस्पात संयंत्र, जिसकी स्थापना केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की आकांक्षा का प्रतीक थी। 

1950 के दशक में जब देश योजनाबद्ध विकास की राह पर अग्रसर हुआ, तब भिलाई का नाम राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उभरने लगा। यह वह समय था जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भारी उद्योगों को आधुनिक भारत के ‘नए मंदिर’ कहा करते थे। भिलाई उन्हीं मंदिरों में से एक बना, जहाँ मशीनों की गड़गड़ाहट के साथ भविष्य की रूपरेखा गढ़ी जा रही थी।
भिलाई की स्थापना की कहानी केवल सरकारी फाइलों या योजनाओं में सीमित नहीं है। यह उन गाँवों की कहानी भी है जिनकी जमीन अधिग्रहित हुई, उन परिवारों की कहानी है जिन्होंने अपनी पुरानी दुनिया छोड़कर नई बस्तियों में जीवन बसाया। कोटराभाठा, सोंठभाठा, बोरिया, हिंगना और मरौदा जैसे गाँवों की स्मृतियाँ आज भी बुज़ुर्गों की बातचीत में जीवित हैं। खेतों की हरियाली के स्थान पर जब सेक्टरों की व्यवस्थित रेखाएँ खिंचीं, तब एक ग्रामीण भूगोल शहरी परिदृश्य में बदल गया। 

यह परिवर्तन सहज नहीं था, परंतु समय की धारा में वह अपरिहार्य बन गया। भिलाई का एक विशेष पक्ष उसकी बहुसांस्कृतिक संरचना है। देश के कोने-कोने से आए इंजीनियर, तकनीशियन और श्रमिक यहाँ एक साथ बसे। बंगाल, पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और दक्षिण भारत से आए लोगों ने अपनी-अपनी भाषाएँ, खान-पान और त्योहार साथ लाए। 

इस विविधता ने भिलाई को केवल औद्योगिक नगर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संगम बना दिया। दुर्गा पूजा से लेकर गणेशोत्सव और छत्तीसगढ़ी लोकपर्वों तक, यहाँ उत्सवों की एक साझा परंपरा विकसित हुई। इस मेलजोल ने एक ऐसी नागरिक संस्कृति को जन्म दिया, जिसमें स्थानीय और राष्ट्रीय दोनों रंग समाहित हैं।
समय के साथ भिलाई ने केवल विकास ही नहीं, संकट भी देखे। औद्योगिक दुर्घटनाएँ, श्रमिक आंदोलन, बिजली और कोयले के संकट, आर्थिक उदारीकरण के बाद की चुनौतियाँ—इन सबने इस नगर को झकझोरा। 1990 के दशक में जब देश ने उदारीकरण की नीति अपनाई, तब सार्वजनिक उपक्रमों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगने लगे। निजीकरण और आउटसोर्सिंग की प्रक्रियाओं ने पुराने ढाँचे को चुनौती दी। भिलाई भी इससे अछूता नहीं रहा। उत्पादन के नए मानदंड, तकनीकी आधुनिकीकरण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ने इस इस्पात नगरी को आत्ममंथन के लिए विवश किया।
फिर भी, यह उल्लेखनीय है कि भिलाई ने हर संकट के बाद स्वयं को पुनर्गठित किया। यहाँ की श्रमिक चेतना और प्रबंधन की सामूहिक समझ ने कई बार संभावित ठहराव को नई गति में बदला। इस्पात की तरह ही इस शहर की आत्मा भी तपकर मजबूत हुई। भिलाई की पहचान केवल उत्पादन के आँकड़ों से नहीं, बल्कि उस मानवीय रिश्ते से है जो यहाँ के लोगों को जोड़ता है। सेक्टरों की योजनाबद्ध बस्तियाँ, स्कूल, अस्पताल, पार्क और सांस्कृतिक भवन—ये सब उस कल्याणकारी सोच के प्रतीक हैं, जिसने इस नगर को आकार दिया।
आज जब डिजिटल युग में सूचना और संचार के साधन बदल रहे हैं, तब भी भिलाई का इतिहास हमें यह सिखाता है कि विकास केवल तकनीकी उन्नति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों की निरंतरता भी है। यहाँ की पीढ़ियाँ बदल रही हैं; पुराने श्रमिकों की जगह नई तकनीकी दक्षता वाले युवा ले रहे हैं। फिर भी, शहर की स्मृतियों में वह दौर जीवित है जब इस्पात संयंत्र के सायरन के साथ दिन की शुरुआत होती थी और शाम को श्रमिक कॉलोनियों में जीवन की चहल-पहल गूँजती थी।
भिलाई की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि औद्योगिक नगर केवल आर्थिक इकाइयाँ नहीं होते, वे सामाजिक और सांस्कृतिक प्रयोगशालाएँ भी होते हैं। यहाँ श्रम और सपनों का संगम हुआ, यहाँ संघर्ष और सहयोग का संतुलन बना। यह शहर आज भी अपने अतीत के गौरव और वर्तमान की चुनौतियों के बीच संतुलन साधते हुए आगे बढ़ रहा है।
समय के बदलते परिदृश्य में जब सार्वजनिक उपक्रमों की भूमिका पर बहस जारी है, तब भिलाई एक जीवंत उदाहरण की तरह सामने खड़ा है। यह शहर हमें बताता है कि यदि दूरदृष्टि, सामाजिक प्रतिबद्धता और तकनीकी नवाचार साथ हों, तो कोई भी औद्योगिक परियोजना केवल कारखाना नहीं रहती, वह समाज का धड़कता हुआ हृदय बन जाती है।
भिलाई की गाथा दरअसल उस भारत की गाथा है जिसने कठिनाइयों के बीच अपने लिए रास्ता बनाया। यह उस विश्वास की कहानी है कि विकास केवल मशीनों से नहीं, मनुष्यों से होता है। इस फौलादी नगर की आत्मा में आज भी वही उम्मीद धड़कती है—कि समय चाहे जैसा भी हो, श्रम, साहस और सामूहिकता की शक्ति से भविष्य गढ़ा जा सकता है।
प्रस्तुत पुस्तक ''भिलाई ज़िंदाबाद, कुछ किस्से-कुछ कहानियां'' के लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने भिलाई को जीया है, बचपन से लेकर अपनी जवानी की सांसें भिलाई को दी हैं। वे एक रचनात्मक और सकारात्मक पत्रकारिता तथा लेखन के सच्चे श्रमिक हैं। 

अपने अनुभव और भिलाई को ढालने वाले अनेक विभूतियों से सुनकर तथा समझकर उन्होंने यह पुस्तक लिखी है। बीते बीस-तीस बरस के देखे-सुने किस्सों का यह संग्रह है। 'भिलाई ज़िंदाबाद' सही मायनों में भिलाई की अस्मिता और गौरव का शंखनाद है। लेखक को इसके लिए साधुवाद है। ये किस्से आनेवाली पीढ़ी के लिए इतिहास से लेकर वर्तमान की गाथा है। भविष्य के सपनों को पूरा करने का मंत्र है। बधाई जाकिर और धन्यवाद उन किस्सागोई व्यक्तित्वों का जो इसके गवाह हैं।

 (डॉ सुधीर शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई छत्तीसगढ़) 

Saturday, March 5, 2022

रूस से ज्यादा यूक्रेन करीब रहा है भिलाई के 

 

भिलाई का निर्माण किया यूक्रेन के इंजीनियरों ने, 65 साल 

पहले बने बेहतर रिश्ते आज तनाव-अपमान के शिकार

 

यूक्रेन का अज्वस्ताल स्टील प्लांट, जहां भिलाई के ज्यादातर इंजीनियरों ने तकनीकी प्रशिक्षण लिया- तस्वीर 1960 की

मुहम्मद जाकिर हुसैन 

हम भिलाईवालों से कोई रूसी और यूक्रेनी नागरिकों के बीच फर्क करने कहे तो शायद ही कोई कर पाए। रंग-रूप वेशभूषा और बोली-भाषा भी एक सी होने की वजह से वैसे भी इनमें फर्क करना आसान नहीं। दरअसल, हम लोग भिलाई में जिन्हें 'रशियन' के नाम से जानते हैं उनमें से 90 फीसदी लोग यूक्रेन मूल के ही हैं। आज भी भिलाई में जो बचे हुए 'रशियन' परिवार हैं, उन सभी का रिश्ता यूक्रेन से जुड़ा है। 

यह अलग बात है कि इन सभी की भावनाएं आज भी रूस के साथ जुड़ी हुई है। इन दिनों जबकि रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव चल रहा है, ऐसे में भिलाई में रहने वाले ये सभी वयोवृद्ध भी चिंतित है यूक्रेन-रूस में रहने वाले अपने रिश्तेदारों को लेकर। सभी की वीडियो कॉल पर बातें हो रही हैं और एक दूसरे।

 तनाव के इस माहौल में दूसरा पहलू वर्तमान में यूक्रेन में मेडिकल शिक्षा लेने गए भारतीय स्टूडेंट की सुरक्षित 'घर वापसी' का है। वर्तमान में भारतीय स्टूडेंट के साथ जो सुलूक यूक्रेन में हो रहा है, उसके वीडियो विचलित कर देने वाले हैं। लेकिन हमेशा हालात ऐसे नहीं थे। 

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पहल पर तत्कालीन सोवियत संघ के साथ जो रिश्ता बना, उसके नतीजे में भिलाई स्टील प्लांट का जन्म हुआ। इसके साथ ही तत्कालीन रूसी इंजीनियर भिलाई पहुंचे कारखाना निर्माण के लिए और भिलाई के नौजवान इंजीनियरों को सोवियत संघ भेजा गया स्टील टेक्नालॉजी में महारत हासिल करने। 

आईए, पहले एक नजर डालते हैं तत्कालीन परिस्थितियों पर। हमारे देश की आजादी के साथ ही नेहरू काल में जब हमारे राजनयिक रिश्ते तत्कालीन सोवियत संघ के साथ स्थापित हुए तो सोवियत संघ भी द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से उबर रहा था। इस विश्व युद्ध में आज के रूस और यूक्रेन में स्थित तमाम बड़े स्टील प्लांट पर दुश्मन देशों जर्मन, जापान और इटली का हमला हुआ था। इनमें ज्यादातर स्टील प्लांट के ब्लास्ट फर्नेस को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था।

ऐसी परिस्थिति में सोवियत संघ वहां के सभी स्टील प्लांट में फिर से उत्पादन शुरू करने की जद्दोजहद में जुटा हुआ था। इसके बावजूद हमारे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कोशिश के चलते सोवियत संघ ने भारत में 10 लाख टन उत्पादन क्षमता का स्टील प्लांट लगाने सहमति दे दी। 

तब वैश्विवक महाशक्ति के तौर पर सोवियत संघ भले ही अपना झंडा बुलंद कर रहा था लेकिन वहां का स्टील सेक्टर बहुत अच्छी हालत में नहीं था। इसके बावजूद सोवियत रूस ने अपने स्टील प्लांटों में भारतीय इंजीनियरों को तकनीकी प्रशिक्षण देना स्वीकार किया और अपने तमाम एक्सपर्ट को भिलाई भी भेजा। सोवियत संघ की इस पहल से भिलाई स्टील प्लांट अपने स्वरूप में आ सका।


'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव की टिप्पणी 

 

ज्यादातर स्टील प्लांट यूक्रेन और रूस गणराज्य में 

मेकेयेवका स्टील प्लांट के बाहर भिलाई के इंजीनियर-1960

तत्कालीन सोवियत संघ में ज्यादातर बड़े स्टील प्लांट रूस और यूक्रेन गणराज्य में थे। इनमें भी भिलाई के इंजीनियरों को ज्यादातर यूक्रेन के स्टील प्लांट में प्रशिक्षण के लिए 1956 से 1990 तक  भेजा जाता रहा। 

शुरूआती दौर में जब भिलाई से देश भर के नौजवान सोवियत संघ गए तो यूक्रेन के इन्ही स्टील प्लांट के शहरों में रुमानियत का रिश्ता भी जोड़ लिया। 

दरअसल, तब सोवियत संघ भी द्वितीय विश्व युद्ध से उबरा था और अपनी सख्त पाबंदियों के चलते 'आयरन कर्टेन' कहा जाता था। वहां की वही खबरें बाहर आती थी, जो वहां का कम्युनिस्ट सोवियत प्रशासन चाहता था। दूसरा वहां की महिलाओं को तब विदेश जाने की अनुमति दुर्लभ थी। 

ऐसे में जब भारत के नौजवान यूक्रेन के स्टील प्लांट में प्रशिक्षण लेने गए तो वहां की बहुत सी नवयुवतियां इन्हें अपना दिल दे बैठीं। यह सब उस दौर की बातें हैं, जब तब के सोवियत संघ में उद्योगों का बोलबाला था और इनमें सबसे ज्यादा बड़े स्टील प्लांट संचालित थे। 

 'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर डॉ. सोनाली चक्रवर्ती की टिप्पणी 

 

 सोवियत संघ टूटा और बदल गईं परिस्थितियां

यूक्रेन का एक मेडिकल कॉलेज

एक नाटकीय घटनाक्रम में दिसंबर 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ और सभी गणराज्यों ने खुद को स्वतंत्र देश घोषित कर दिया। यही वह दौर था, जब यूक्रेन और रूस का इस्पात उद्योग चरमरा रहा था। 

 तब नवस्वाधीन यूक्रेन ने अपने यहां शिक्षा पर जोर दिया और देखते ही देखते मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में एक तूफान सा आ गया। इसका सीधा असर हमारे हिंदुस्तान पर भी हुआ। 

91 के पहले तक भिलाई सहित सोवियत प्रभाव वाले भारतीय शहरों में ज्यादातर परिवारों के बच्चे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए रूस-यूक्रेन जाया करते थे। तब इंजीनियरिंग में वहां भिलाई से गए स्टूडेंट को प्राथमिकता भी मिलती थी। लेकिन 91 के बाद वहां इंजीनियरिंग के बजाए फोकस मेडिकल में होने लगा और भारत के बनिस्बत वहां सस्ती मेडिकल शिक्षा की वजह से भारतीय स्टूडेंट का यूक्रेन का रुख करने लगे।

आज की परिस्थिति में बताया जा रहा है कि करीब 20 हजार स्टूडेंट यूक्रेन में मेडिकल कॉलेज में शिक्षा ले रहे हैं। फिलहाल सभी की चिंता यह है कि हमारे स्टूडेंट सुरक्षित अपने घर लौट जाएं। आईए जानते हैं कि तत्कालीन सोवियत संघ के साथ भारत ने कैसे रिश्ते जोड़े और इसके बाद उन दिनों भारतीयों को किस तरह वहां स्पेशल ट्रीटमेंट मिला। 

'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध की टिप्पणी  

 

भिलाई की पृष्ठभूमि और नेहरू का दौरा 

नेहरू-इंदिरा का मग्नितागोर्स्क दौरा (जून-1955)

भारत की स्वतंत्रता के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किस तरह देश के औद्योगिकीकरण के लिए दुनिया के बड़े देशों से हाथ मिलाया, इसका ब्यौरा आपको मेरी किताब 'वोल्गा से शिवनाथ तक' में विस्तार से मिल जाएगा। 

यह प्रधानमंत्री नेहरू ही थे, जिनकी वजह से तब सोवियत संघ ने भारत में एक स्टील प्लांट लगाने न सिर्फ कर्ज बल्कि तमाम तकनीकी सहायता व मशीनरी उपलब्ध कराने हामी भरी थी। जवाहरलाल नेहरू का सोवियत संघ से रिश्ता हमारे देश की आजादी से पहले का था।

 जवाहरलाल नेहरू ने 1947 के पहले और बाद में तीन मरतबा सोवियत संघ का दौरा किया था। पहली बार वह सोवियत सरकार के विशेष आमंत्रण पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि के तौर पर 7 नवंबर 1927 को महान अक्टूबर क्रांति दिवस की 10 वीं सालगिरह के आयोजनों में भाग लेने पहुंचे थे। उनके साथ उनके पिता मोतीलाल नेहरू, छोटी बहन कृष्णा व पत्नी कमला नेहरू भी साथ थे। 

इसके बाद सोवियत संघ का उनका दूसरा दौरा 7 जून से 23 जून 1955 में हुआ। तब उनके साथ उनकी बेटी इंदिरा गांधी भी थी। उन्होंने अपनी यात्रा याकेतरिनबर्ग से शुरू की थी। वह रूस के औद्योगिक शहर मैगनीतोगोर्स्क भी पहुंचे थे और यहां का विशाल स्टील प्लांट देखा था। 'रशिया बियॉन्ड' नाम की एक वेबसाइट के अनुसार '1955 में जब नेहरू और इंदिरा गांधी नदी किनारे बसे औद्योगिक शहर मैगनीतोगोर्स्क पहुँचे थे तो स्टील प्लांट में काम करने वाले कामगार और शहर के स्थानीय लोग उन्हें देखने के लिए दौड़ पड़े थे। 

अपने इस दौरे में नेहरू मास्को से लेनिनग्राद की वृहद यात्रा पर निकले, इस दौरान उन्होंने स्टालिनग्राद, क्रीमिया, जॉर्जिया, अस्काबाद, ताशकंद, समरकंद, अल्टाई क्षेत्र, मग्निागोस्र्क और सवर्दलोव्स्क (याकेतरिनबर्ग)  शहरों का दौरा किया। 

जवाहरलाल नेहरू का तीसरा और अंतिम दौरा 8 सितंबर 1961 को हुआ था। जिसमें नेहरू ने तत्कालीन रूसी प्रधानमंत्री के साथ मॉस्को में इंडो-सोवियत फ्रैंडशिप रैली को संबोधित किया था। जवाहरलाल नेहरू अपने पहले दौरे में रूस की औद्योगिक प्रगति को करीब से देखा था। फिर जब हमारा देश आजाद हुआ तो उन्होंने 10 लाख टन सालाना क्षमता वाले एक स्टील प्लांट के लिए रूस को राजी कर लिया।

 'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर 'हरिभूमि' के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी की टिप्पणी 

 

 ऐतिहासिक समझौते के बाद मंजूरी मिली भिलाई को 

2 फरवरी 1955 को भारत-सोवियत संघ के बीच नई दिल्ली में करार

2 फरवरी 1955 को नई दिल्ली में सोवियत संघ के साथ भारत का ऐतिहासिक समझौता हुआ था। इस समझौते के फलस्वरूप ही हफ्ते भर के भीतर नए स्टील प्लांट के लिए भिलाई के नाम पर भारत सरकार की मंजूरी मिली थी। 

इसके बाद भिलाई स्टील प्रोजेक्ट कंपनी, इस्पात मंत्रालय और हिंदुस्तान स्टील लिमिटेड (सेल की पूर्ववर्ती कंपनी) अस्तित्व में आए।

इन तमाम प्रक्रियाओं के बीच 6 जून 1955 को पायनियर टीम नागपुर होते हुए भिलाई पहुंची। जिसमें सोवियत संघ और भारत के इंजीनियर सहित 11 प्रतिनिधि थे। यह टीम दुर्ग के सर्किट हाउस पहुंची और भिलाई परियोजना पर जमीनी स्तर का काम शुरू हुआ। इसके अगले दिन नई दिल्ली से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मास्को के लिए उड़ान भरी थी। 

 ' वोल्ग से शिवनाथ तक' पर स्कूली छात्रा परी पुरोहित का एक वीडियो

 

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के काम में आई तेजी 

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट निर्माण प्रथम चरण

प्रधानमंत्री नेहरू के जून 1955 के दौरे के बाद सोवियत संघ से इंजीनियर बड़ी तादाद में भिलाई पहुंचे और देश के पहले आधुनिक सरकारी स्टील प्लांट के निर्माण का कार्य तेजी से आगे बढ़ा। 

बाद के दौर में सोवियत संघ ने न सिर्फ स्टील बल्कि दूसरे भारतीय उद्योगों को स्थापित करने में भी अपनी भागीदारी दी। भारत का यह औद्योगिकीकरण तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की दूरदृष्टि का परिणाम थी। वजह इसके पीछे की यह है कि भारत के साथ जिस सोवियत संघ का करार हुआ उसमें रूस और यूक्रेन एक विशाल देश सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करते थे। 

जब भिलाई का निर्माण शुरू हुआ और 40 लाख टन की क्षमता तक कारखाना निर्माण चलता रहा, तब तक हमारे इन्हीं यूक्रेनियन इंजीनियरों ने हम भारतीयों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम किया।

बीएसपी स्कूल सेक्टर-1 भिलाई 1988 बैच का यादगार आयोजन 'गुरुदक्षिणा' 

 

 इंजीनियरिंग शिक्षा में भिलाई के बच्चों को प्राथमिकता मिली यूक्रेन में

वह सोवियत संघ (यूएसएसआर) का दौर था, जब इस विशाल संघ (देश) का हिस्सा रहते हुए रूस, यूक्रेन, जार्जिया, बेलारूस, कजाकिस्तान, अजरबैजान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, लिथुआनिया, मॉल्दोविया, लातविया, आर्मीनिया, तुर्कमेनिया व एस्टोनिया अलग-अलग गणराज्य के तौर पर अस्तित्व रखते थे। उस दौर में सोवियत संघ का 80 फीसदी इस्पात उद्योग यूक्रेन में था।

यही वजह है कि जब 2 फरवरी 1955 को भारत के साथ सोवियत संघ करार हुआ तो इसके बाद भिलाई में स्थापित होने वाले स्टील प्लांट के भारतीय इंजीनियरों को तकनीकी प्रशिक्षण के लिए ज्यादातर यूक्रेन के ही स्टील प्लांट में भेजा गया। हालत तो यह थी कि आज जिस तरह से यूक्रेन में सस्ती मेडिकल पढ़ाई का क्रेज है, उन दिनों भिलाई के संपन्न अफसरों के पास अपने बच्चों को यूक्रेन के विभिन्न संस्थानों में कम दर पर उच्च शिक्षा के लिए भेजने का विकल्प था और इसका लाभ भी भिलाई के बच्चों को खूब मिला। ऐसे बच्चे 1990 तक रूस और यूक्रेन के विभिन्न कॉलेजों/तकनीकी संस्थानों में पढऩे जाते रहे।

भिलाई स्टील प्लांट शिक्षा विभाग का सफरनामा 1955 से

 

यूक्रेन-रूस के स्टील प्लांट, जिनके इंजीनियरों ने बनाया भिलाई

तत्कालीन सोवियत संघ में ज्यादातर स्टील प्लांट यूक्रेन और रूस गणराज्य में थे। भिलाई में 10 लाख टन वार्षिक उत्पादन क्षमता का स्टील प्लांट लगाने हुए समझौते के बाद तमाम इंजीनियर इन्हीं स्टील प्लांट से आए और भिलाई के नौजवान इंजीनियरों को भी इन्हीं स्टील प्लांट में प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। इनमें यूक्रेन के मरियोपोल (पूर्व नाम ज्दानोव) में अज्वस्ताल स्टील प्लांट और इलिच  स्टील एंड आयरन वर्क्स है। यूक्रेन के मेकेयेवका (पूर्व नाम दमित्रविस्क या दमित्रविस्की) में दोनेत्स्क प्रांत से 15 किमी दूर स्थापित मेकेयेवका मेटलर्जिकल प्लांट है। 

दोनेत्स बेसिन (डोनबास) की मशहूर आयरन ओर खदानें भी यहीं है। निपर नदी के किनारे यूक्रेन में ज्पारोशिया दक्षिण-पूर्वी शहर है। यहां क्रिवयी रीह (रोग) आयरन ओर माइंस है। यहीं ज्पारोशिया स्टील प्लांट ज्पारोस्ताल में है, जो 1933 में शुरू हुआ था। क्रिवा रोग स्टील प्लांट पहले सरकारी था, जिसे अब आर्सेलर-मित्तल ले चुका है। 

इनके अलावा रूस में भी स्टील प्लांट हैं, जिनका भिलाई से सीधा रिश्ता रहा है। इनमें रूस के दक्षिण-पश्चिम साइबेरिया में केमेरोवो परिक्षेत्र (ओब्लास्ट) स्थित नोवोकुजनेत्स है। जहां नोवोकुजनेत्स आयरन एंड स्टील प्लांट है। रूस के चेलियाबिन्स्क परिक्षेत्र (ओब्लास्ट) में यूराल पर्वत श्रृंखला के साए तले मग्नितागोर्सके शहर है, जहां मग्नितागोर्सके आयरन एंड स्टील वर्क्स है। 

 'वोल्गा से शिवनाथ तक' प्रथम संस्करण का विमोचन 

 

ज्यादातर शीर्ष पदों तक पहुंचे शुरूआती बैच के इंजीनियर

मरियोवपोल में भिलाई के इंजीनियर-1957

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के लिए युवा इंजीनियरों का पहला बैच 10 सितंबर 1956 को भिलाई से रवाना हुआ था। तब से 90 के दौर तक भिलाई के इंजीनियरों के कई बैच उच्च तकनीकी प्रशिक्षण के लिए जाते रहे। इनमें से ज्यादातर इंजीनियर भारतीय स्टील सेक्टर के शीर्ष पदों पर रहे।

 इनमें बहुत से लोगों ने स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) को नेतृत्व दिया तो बहुत से इंजीनियर सेल के विभिन्न स्टील प्लांट में शीर्ष पदों पर पहुंचे। इन इंजीनियरों के पहले बैच से केसी खन्ना, एस. नारायण, एएस मूर्ति, एचसी धारवाड़, ईआरसी शेखर, एचएस अश्वत्थ, निमाई कुमार मित्र, केपी रामचंद्रन, बीएमजी रमन, एबी माथुर, ईएएस मूर्ति, एनसी रामासुब्बु, एस. नारायण, कैलाश बिहारी गोयल, केआर संगमेश्वरन, तेरे देसाई, आर. कृष्णामूर्ति, एस. समरपुंगवन में आधे ज्पारोशिया और आधे ज्दानोव में तकनीकी प्रशिक्षण हेतु भेजे गए थे। 

ज्पारोशे में एस. समरपुंगवन, ईआरसी शेखर, केआर संगमेश्वरन और एके फोतेदार ने प्रशिक्षण लिया, वहीं दिलबाग राय आहूजा, गोपीनाथ पुरी, रघुवीर व पीएच सचदेवा सहित अन्य ने मेकेयवका स्टील प्लांट भेजा गया। तब भिलाई स्टील प्लांट में नियुक्त होने वाले सोवियत चीफ इंजीनियर मेें भी ज्यादातर यूक्रेन के स्टील प्लांट से ही आते थे। 

शुरूआती दौर के चीफ इंजीनियर वीई दिमशित्स ने यूक्रेन की प्रसिद्ध डोनबास की खदानों में भी काम किया था और मरियोवपुल व अज्वस्ताल स्टील प्लांट में सेवाएं दी थी। वहीं शुरूआती दौर के युवा इंजीनियरों में केआर संगमेश्वरन, एस. रामासुब्बुु, ईआरसी शेखर और केबी गोयल को रूस के मग्नितागर्सके में भी प्रशिक्षण का अवसर मिला। बाद के दौर में देखें तो ईडी प्रभारी रहे विनोद अरोरा को रूस मेें साइबेरिया के नोवे कुजनेत्स स्टील प्लांट मेें प्रशिक्षण का अवसर मिला था। 

'वोल्गा से शिवनाथ तक' के दूसरे संस्करण का विमोचन 

 

 तब भिलाई के इंजीनियरों को मिलता था स्पेशल ट्रीटमेंट 

ज्पारोशे में नए साल की पार्टी में भिलाई के इंजीनियर-1958

भिलाई से यूक्रेन और रूस के स्टील प्लांट में उच्च तकनीकी प्रशिक्षण लेने वाले कई वरिष्ठ इंजीनियर आज भी यह बताते नहीं थकते कि उन्हें उस दौर में सोवियत रूस में कैसा वीवीआईपी ट्रीटमेंट मिलता था।

 भिलाई स्टील प्लांट की रेल एंड स्ट्रक्चरल मिल के सुप्रिंटेंडेंट रहे नरेंद्र सिंह छत्री बताते हैं-जब सितंबर 1956 को भिलाई के इंजीनियरों का समूह सोवियत रूस के लिए रवाना हो रहा था तो सांसद व महात्मा गांधी के सचिव रहे सुधीर घोष को खास तौर पर इस्पात मंत्रालय में विशेष कर्त्तव्यस्थ अधिकारी (ओएसडी) नियुक्त किया गया था और पत्राचार व पासपोर्ट सहित हमारी यात्रा का तमाम औपचारिकताएं सुधीर घोष के मार्गदर्शन में हुई। घोष हम लोगोें को खास तौर पर विदा करने एयरपोर्ट भी आए थे। 

छत्री बताते हैं-मास्को उतरने के बाद से अज्वस्ताल, ज्दानोव, ज्पारोशे, मरियोपोल और मग्नितागोर्सके जैसे स्टील प्लांट में समूह को बांट दिया गया। यहां हर शहर में भारतीय को स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता था। शहर में भारतीय युवा यदि सर्कस या मूवी देखने तो वहां के स्थानीय लोग हमें पहले टिकट लेने का मौका देते।

 इसी तरह शहर में होने वाली क्रिसमस व न्यू ईयर सहित तमाम पार्टियों में भी भारतीय युवा खास तौर पर आमंत्रित किए जाते थे। वह ऐसा दौर था जब द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से सोवियत रूस उबर रहा था और जनजीवन सामान्य हो रहा था। ऐसे में भारतीय इंजीनियर भी वहां की जीवनशैली में घुलमिल गए। 

जब भिलाई स्टील प्लांट से निकला पहला 'हीरा'

 

दिल का रिश्ता भी जुड़ता गया यूक्रेन से 

मल्होत्रा-मजुमदार और बलराम सिंह दंपति

जिन दिनों भिलाई स्टील प्रोजेक्ट अपना रूप ले रहा था, उन्हीं दिनों सुदूर यूक्रेन में तकनीकी प्रशिक्षण हासिल करने गए भिलाई के ज्यादातर नौजवानों ने वहां दिल का रिश्ता भी जोड़ लिया। 

1956 से 1985 तक भिलाई में लगभग हर साल ऐसे कई जोड़े आते गए, जिनकी नई जिंदगी की शुरूआत यूक्रेन से हुई। भिलाई के एक युवा इंजीनियर काशीनाथ 1957 में यूक्रेन के ज्पारोशिया में प्रशिक्षण ले रहे थे। वहीं उनकी मुलाकात आना मलाया से हुई। बातें-मुलाकातें हुई और लुदमिला को काशीनाथ इतना भा गए कि उन्होंने साथ जिंदगी बिताने का फैसला कर लिया। 

1959 में भिलाई के इंजीनियर एलआर भटनागर यूक्रेन के मकेयेवका स्टील प्लांट में प्रशिक्षण ले रहे थे। वहीं उनकी मुलाकात एक युवा टेलीफोन ऑपरेटर गलीना से  हुई और दोनों ने एक दूसरे का हाथ थाम लिया।

1960 में मेकेयेवका के स्टील प्लांट में प्रशिक्षण ले रहे भिलाई के युवा इंजीनियर मोती सागर मल्होत्रा का वहीं के अस्पताल में पदस्थ 21 साल की नर्स जीना पर आ गया और जब मल्होत्रा हिंदुस्तान लौटे तो उनके साथ उनकी हमसफर जीना भी थी। 

1962 में यूक्रेन के ज्पारोशे में स्कूली पढ़ाई कर रही क्लेरा और भिलाई से गए युवा इंजीनियर बलराम सिंह की कहानी में भी ऐसी ही रूमानियत थी। क्लेरा और बलराम ने बाद में शादी कर ली और भिलाई में नई जिंदगी की शुरूआत की। सेल के निदेशक प्रोजेक्ट पद से रिटायर हुए बलराम सिंह तो अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन क्लेरा उम्र के 8 वें दशक में भी बेहद सक्रिय हैं और सोशल मीडिया पर रोजाना अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहती हैं। 

 यूक्रेन के ज्दानोव (अब मरियोपोल) के एक आर्थोडोक्स क्रिश्चियन परिवार की बेटी लुद्मिला और भिलाई से वहां स्टील प्लांट में प्रशिक्षण लेने गए युवा इंजीनियर विश्वनाथ नागेश मजुमदार की भी नजरें मिली और प्यार हो गया। हालांकि उनकी शादी में कुछ दिक्कतें आईं लेकिन दोनों ने एक दूसरे का हाथ थाम कर 1963 में शादी के बाद भिलाई में नहीं जिंदगी की शुरूआत की। 

बाद के दौर में 1985 में यूक्रेन के ज्पारोशिया में फैशन डिजाइनर लुद्मिला अरेफयेवा और भिलाई से वहां प्रशिक्षण लेने गए सुब्रत मुखर्जी ने 1985 में एक दूसरे को दिल दे दिया और शादी के बाद भिलाई में नई जिंदगी शुरू की। पेशे से मेकेनिकल इंजीनियर विवेक चतुर्वेदी 1986 में यूक्रेन के मशीन बिल्डिंग इंस्टीटॅयूट ज्पारोशिया में पढ़ रहे थे। वहीं इना लुब्रोनेंको भी इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की तालीम ले रही थीं। दोनों के दिल मिले और रूमानियत का एक नया रिश्ता शुरू हुआ जो आज भी हंसी-खुशी चल रहा है। 


नए दौर में भिलाई को जरूरत नहीं रही रूसी इंजीनियरों की 

भिलाई स्टील प्लांट का 40 लाख टन सालाना हॉट मेटल उत्पादन क्षमता तक का विस्तारीकरण अकेले सोवियत रूस के दम पर हुआ था। जाहिर है, इसमें रूसी तकनीक और मशीनरी इस्तेमाल हुई। इस वजह से एक दौर ऐसा भी रहा जब रशियन टेक्नीकल एक्सपर्ट बड़ी तादाद में भिलाई में हुआ करते थे। 

इनमें से 90 फीसदी एक्सपर्ट यूक्रेन के स्टील प्लांट से ही आया करते थे। इन सभी एक्सपर्ट को उपलब्ध कराने की जवाबदारी रूसी फर्म त्याशप्रोम एक्सपोर्ट (टीपीई) की हुआ करती थी। लेकिन देखते ही देखते दौर बदलने लगा। 


टीपीई का दफ्तर बंद, इस्माइल स्वदेश लौटे और यनोद का निधन 

टीपीई के दफ्तर में मेरी दाईं ओर इस्माइल और बाईं ओर यनोद

सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत सरकार के फैसले के अनुरूप भिलाई सहित तमाम सरकारी स्टील प्लांट के विस्तारीकरण में ग्लोबल टेंडर के जरिए अलग-अलग देशों की तकनीक अपनाने  की शुरूआत हुई। 

तब जर्मन, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, चीन और इटली सहित विभिन्न देशों की तकनीक का भिलाई में प्रवेश हुआ। ऐसे में रशियन एक्सपर्ट की संख्या लगातार घटने लगी। 

2018 में स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) ने एक अहम फैसला लेते हुए 2020 तक रशियन एक्सपर्ट की तादाद को घटाते हुए शून्य करने का फैसला लिया। इसके अनुरूप ही अब भिलाई सहित सेल के किसी भी स्टील प्लांट में रशियन एक्सपर्ट की जरूरत नहीं रही। 

भिलाई में एक्सपांशन बिल्डंग स्थित टीपीई का दफ्तर अब बंद हो चुका है। टीपीई के भारत प्रमुख इस्माइल मजयानेव ने बीएसपी मैनेजमेंट की ओर से सेक्टर-7 रशियन काम्पलेक्स में आवंटित सभी बंगले लौटा कर पिछले ही साल अपने देश रवाना हो चुके हैं। वहीं टीपीई दफ्तर की पहचान रहे यहां के केयर टेकर यनोद कुमार का भी कैंसर से देहांत हो चुका है। 


अब भारतीय स्टूडेंट से हो रहा व्यवहार चिंताजनक 

पोलैंड सीमा पर परेशान हाल भारतीय स्टूडेंट-28 फरवरी 2022

एक तरफ जिस यूक्रेन में शांतिकाल के दौरान भिलाई से गए इंजीनियरों को उन दिनों वीवीआईपी ट्रीटमेंट मिलता था तो दूसरी तरफ अब युद्धकाल में उसी यूक्रेन में भारतीय नौजवान स्टूडेंट के साथ दुव्र्यवहार की चिंताजनक खबरें आ रही हैं। 

आज भारतीय स्टूडेंट अपनी जान बचाने बंकरों में किसी तरह रह रहे हैं। युद्धग्रस्त क्षेत्र से निकलना सबसे बड़ी चुनौती है। 

ऐसे में यूक्रेनी लोग भारतीय स्टूडेंट को ट्रेन में चढऩे नहीं दे रहे हैं। वहीं पोलैंड सीमा पर भारतीय स्टूडेंट से वहां की सेना द्वारा मारपीट करने के वीडियो भी वायरल हो रहे हैं। भारत सरकार के सारे इंतजाम शांति वाले देशों में हैं। स्टूडेंट से कहा जा रहा है कि किसी तरह युद्धग्रस्त क्षेत्र से निकल जाएं। हालांकि संकटग्रस्त इलाके से बाहर निकालने के लिए किसी तरह का कोई इंतजाम भारत सरकार की तरफ से नहीं हो रहा है। ऐसे में भारतीय स्टूडेंट बेहद चुनौतीपूर्ण हालात का सामना कर रहे हैं। 

अब तो भारतीय स्टूडेंट की मौत की खबरें भी आ रही हैं। कर्नाटक के नवीन शेखरप्पा ज्ञानगौदर की यूक्रेन के खारकीव में मंगलवार 1 मार्च को हमले में मौत हो गई। पंजाब के बरनाला का रहने वाले चंदन कुमार की बुधवार 2 मार्च को को मौत हो गई। चंदन की मौत की वजह बीमारी बताई गई है और वह लंबे समय से अस्पताल में भर्ती थे। वहीं 4 मार्च को पंजाब के रहने वाले हरजोत सिंह को क्रास फायर में गोली लगी है और अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है।

Thursday, January 6, 2022

 भिलाई हादसे पर इंसानी रिश्तों को बयां करती

 36 साल पुरानी डायरी मिली कोलकाता में

 

-একটি দুর্যোগ-ঝটিকার করুন কাহিনী-

-एक दुर्योग-आहत कर देने वाली कहानी-


भिलाई में 1986 में हुए कोक ओवन ब्लास्ट हादसे के दौरान एक परिवार 

की वेदना दर्ज की पड़ोसी ने, बसु परिवार खोज रहा अपने पुराने पड़ोसी को 

 

(मुहम्मद जाकिर हुसैन) 

डायरी का अंश और स्व.बीना रानी बोस मजमुदार
भिलाई स्टील प्लांट के लिए 6 जनवरी 1986 का दिन ऐसा पहला बड़ा हादसा लेकर आया था जिसमें 9 कर्मवीरों की जान चली गई थी, वहीं 48 कर्मचारी घायल हुए थे। 

इस हादसे के जख्म आज 36 साल बाद भी प्रभावित परिवारों के लिए हरे ही हैं। इस बीच कोलकाता में इस हादसे पर 36 साल पुरानी एक दुर्लभ डायरी मिली है।

वर्ष 1985-86 में सेक्टर-6 एमजीएम स्कूल के पास स्ट्रीट-74 क्वार्टर नंबर 6 ए में निवासरत तपन कुमार बोस मजुमदार भिलाई स्टील प्लांट के एनर्जी मैनेजमेंट विभाग (ईएमडी) में पदस्थ थे। 

उनकी वयोवृद्ध मां बीना रानी बोस मजमुदार की लिखी इस डायरी में একটি দুর্যোগ ঝটিকার করুন কাহিনী (एक्टि दुर्जोग झोटिकार कोरुण कहिनी) यानि ''एक दुर्योग, आहत कर देने वाली कहानी'' शीर्षक से अपने आवास के ठीक सामने रहने वाले ईएमडी के कर्मी एम. शंकर राव परिवार के साथ संबंधों और 6 जनवरी 1986 के हादसे व उसके बाद के घटनाक्रम को बेहद संवेदनशीलता के साथ उकेरा है।

डॉ. सुस्मिता
लेखिका बीना रानी तो अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनकी पौत्री और कोलकाता विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर डा. सुस्मिता बसु मजुमदार को जब घर के पुराने सामान में यह डायरी हाथ लगी तो उन्हें लगा कि किसी हादसे का ऐसा मर्मांतक ब्यौरा दुनिया,खासकर भिलाई और छत्तीसगढ़ के वासियों के सामने जरूर आना चाहिए।

 डॉ. सुस्मिता ने अपनी दादी की इस डायरी में लिखी मूल बांग्ला इबारत को पढ़ते हुए हिंदी अनुवाद का आडियो मुझे भेजा था। जिसे मैनें अक्षरों में ढाल कर आप लोगों के समक्ष रखने की कोशिश की है। इस डायरी का हिंदी अनुवाद आंशिक संशोधन के साथ यहां है। इस पूरी स्टोरी के लिए कैरिकेचर प्रख्यात कार्टूनिस्ट बीवी पांडुरंगा राव का बनाया हुआ है।  


सन्नाटे से भरी सुबह, जब एक ट्रक रुका हमारे घर के सामने 

वह सन्नाटे से भरी एक सुबह थी, जब एक ट्रक आकर हमारे घर के सामने रुका। देखते ही देखते घर के सामने ढेर सारी भीड़ इकट्‌ठा हो गई। 

ट्रक से चंदू के पिता एम. शंकर राव का शव उतारा गया। उनके घर में बगीचे के सामने स्लैब जैसा बना था उस पर शव रखा गया। एम. शंकर राव का निधन हम सब के लिए यह बहुत ही ह्रदयविदारक घटना थी। 

उनके दो बेटे थे 3-4 साल का चंदू यानि एम. चंद्रशेखर और उसका बड़ा भाई 10 साल का राजा यानि एम. राजशेखर। तेलुगू भाषी राव परिवार बहुत ही खुशहाल और सुखी दंपति थे। चंदू नर्सरी जाने लगा है वहीं राजा 5 वीं पढ़ता है। 

हमारे घर के ठीक सामने का उनका घर है। एक सुदर्शन व्यक्तित्व और हंसता-खेलता परिवार चंदू के पापा एम. शंकर राव की उम्र 29 साल थी वो बहुत ही सुदर्शन व्यक्तित्व वाले पुरुष और बहुत ख्यातिलब्ध थे। 

 

सलीकेदार रहन-सहन और बेहद विनम्र व्यवहार

हमारी पूरी स्ट्रीट में शंकर राव बेहद जानदार शख्सियत थे, हमेशा लोगों की मदद को तत्पर रहते थे। वह बहुत ही अच्छे इंसान थे। उनकी पत्नी का नाम एम. उमा राव था।

 शंकर राव को देखते हुए कोई भी यह कह सकता था कि वो बेहद संस्कारी व्यक्ति थे। उनके घर की सादगी से भरी साज-सज्जा और फर्नीचर को देखकर कोई भी कह सकता है कि कितना सलीकेदार रहन-सहन था उनका। वैसे उनका व्यवहार भी बेहद विनम्र था।

 उनकी पत्नी उमा भी बेहद शांत, शिष्टाचारी और गौरवर्णी थी। वह बहुत ही मीठा बोलती थी। उस वक्त हम स्ट्रीट-74 के 6 ए में नए आए हुए थे और हमारी सबसे ज्यादा करीबी ठीक सामने रहने वाले एम. शंकर राव परिवार के साथ हो गई थी। बेहद संस्कारी परिवार था उनका  और उमा से तो हम सास-बहू का बहुत अच्छा संबंध हो गया था। वो कुछ भी पकाती तो हमारे घर में जरूर देती। हम सब को बहुत ही प्यार करती थी। खास कर मेरी पौत्री मामोन (सुस्मिता) को बहुत पसंद करती थी। 

जब भी किसी चीज की जरूरत होती तो मुझे बुला कर ले जाती। उमा मुझे अम्मा कहती थी। हम लोग बहुत ही करीबी थे। उनका बड़ा बेटा राजा तो बेहद सलीकेदार था जब भी नजर पड़ती तो हमेशा नमस्ते करता था। अपने बच्चों को बहुत ही अच्छे संस्कार मां-बाप ने दिए थे। कहते हैं ना अगर पिता-माता अच्छे हो तो बच्चे भी उतने ही अच्छे और संस्कारी होते हैं। इतना सुखी परिवार कई बार देखने को नहीं मिलता है।

 

 हम टीवी देखने गए तो उमा ने सर्कस जाना त्याग दिया 

एक दिन ऐसा हुआ कि हमारे यहां का टेलीविजन खराब हो गया और उस दिन रविवार शाम को फिल्म का प्रसारण होता था। मेरी बहू का नाम भी उमा है। चंदू की मां का नाम भी उमा है। मेरी बहू उमा ने कहा कि मूवी देखने चंदू के घर चलते हैं।

 हम सकुचाते हुए उनके घर गए। उनके ड्राइंग रूम में कलर टीवी था। चंदू की मां ने देखा तो खुश हो गई और खूब आव-भगत की। हम बैठकर मूवी देखने लगे तो थोड़ी ही देर में चंदू के पापा आए और चंदू और राजा को लेकर सर्कस देखने गए। 

लगा कि शायद हमारे बैठने की वजह से बाहर तो नहीं जा रहे हैं। मैनें अपनी बहू उमा से पूछा कि हमारी वजह से चंदू की मां जा नहीं पाई? पर चंदू की मां उमा ने हमें इसका एहसास नहीं होने दिया बिल्कुल भी। लेकिन हम लोग स्थिति को भांप गए थे कि हमारी वजह से चंदू की मां सर्कस देखने नहीं जा पाई। हमेशा की तरह वह बहुत ही अच्छे से पेश आई। वह बेहद गुणी थी। वह अक्सर सिलाई-कढ़ाई करते भी दिखती थी। वह सलमा सितारा लगाकर बहुत अच्छा एम्ब्रायडरी कर सकती थी।

 टीवी पर मूवी देखने के बाद मैनें आग्रह किया कि सलाई-कढ़ाई देखना चाहती हूं तो उन्होंने अपना पूरा काम दिखाया। वो खाना बहुत अच्छा बनाती थी। आज वो सर्कस जाने वाला और एम्ब्राइडरी दिखाने वाला दिन बहुत याद आ रहा है। 

 

वीणा वादिका थी उमा, हमारे साथ जाती थी बाजार 

राव परिवार दक्षिण भारतीय संगीत परंपरा में ढला हुआ था। उमा बहुत अच्छा वीणा वादन करती थीं। उनके घर में एक खुबसूरत सी विचित्र वीणा थी। एक दिन मुझे लगा कि चंदू की मां का वीणा वादन सुनूंगी।

 अक्सर चंदू की मां हमारे घर आती थी। तेलुगूभाषी होने के बावजूद उनकी हिंदी बहुत अच्छी थी। उनकी डायनिंग टेबल पर एक बहुत ही खुबसूरत एक्वेरियम था। एक दिन चंदू की मां उमा ने आकर बताया कि उनके ससुर आ रहे हैं। उनके चेहरे पर बेहद खुशी झलक रही थी। 

सेक्टर-4 का बोरिया बाजार (1986)
उमा ने बताया कि उनके ससुर की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है, इसलिए चंदू के पापा हैदराबाद जाकर ला रहे हैं। उनका टेलीग्राम आया है कि कल ही आ रहे हैं। 

इसके बाद हम सास-बहू सेक्टर-4 के बोरिया बाजार जा रहे थे तो चंदू की मां उमा भी सामान खरीदने एक बैग लेकर हमारे साथ हो ली। उसने बहुत सी सब्जियां और फल खरीदे। परिवार में खुशियां ही खुशियां आ गई थी दादाजी के आने से। अगले ही दिन उनके ससुर आए, वह काफी वृद्ध लंबे से गोरे सुपुरुष  थे। 

उनको देखकर लग रहा है कि बेहद संस्कारी परिवार का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह शायद अक्टूबर-1985 की बात है। चंदू के दादाजी के आने से यह परिवार और भी सुखी दिखने लगा। उनके घर का माहौल जैसे और खुशनुमा हो गया है। 

दादाजी बोले आज खाना मत बनाओ तो वो सब मिल कर बाहर होटल में डिनर के लिए गए। जब वो जा रहे थे तो उनके परिवार को देखकर बहुत अच्छा लग रहा था। चंदू के दादाजी यहां की ठंड की वजह से भिलाई में ज्यादा दिन रह नहीं पाए। 

 

 भिलाई की ठंड सहन नहीं हुई तो हैदराबाद चले गए थे दादाजी 

शायद उनके दो बेटे थे और शंकर राव छोटे बेटे थे। वो यहां 15-20 दिन रुक कर बड़े बेटे के पास चले गए कि भिलाई की ठंड उन्हें सूट नहीं कर रही थी। तब कौन बता सकता था कि इतना सुखी परिवार जिसमें दादा-पिताजी-बच्चे इतना हंस बोल रहे हैं, यह पल उनकी दुनिया में लौट कर फिर कभी नहीं आएगा? 

कौन जानता था कि नियति का ऐसा परिहास होगा। चंदू के दादाजी के दो बेटे थे। बड़ा बेटा हैदराबाद में रहता था। हैदराबाद में उनका परिवार आर्थिक तौर पर बहुत ही सुदृढ़ था। एम. शंकर राव को भिलाई स्टील प्लांट ज्वाइन किए हुए महज 5-6 साल ही हुए थे। 

 

भाई-भाभी के आने की तैयारी में बनाया था केक 

ये छोटा सा परिवार इतना सुखी परिवार था कि इसे बयां नहीं कर सकते कि अचानक से काले बादलों की तरह विपदा इस परिवार पर आ पड़ेगी। दिसंबर-1985 की बात है, जब चंदू की मां अपने हाथ से बनाया हुआ केक लेकर आई और मुझसे बोली-देखिए मेरा केक कितना अच्छा बना है। बहुत दिनों के बाद भैया-भाभी आ रहे हैं। उनके लिए तैयारी कर रही हूं।

 उमा के चेहरे का भाव देख कर हम सब को बेहद खुशी हो रही थी। वो लोग भी बहुत खुश थे। फिर उमा के भाई-भाभी आए तो वो लोग साथ में अक्सर आते-जाते थे। 

 

...और आ गई वो मनहूस घड़ी, घनघना उठा फोन

ये संसार बिल्कुल अनिश्चित है रेत की तरह है कभी भी यह संसार ढह सकता है। इतना प्यारा घरौंदा नियति ने कैसे तोड़ डाला।

 फिर आई वो मनहूस घड़ी 6 जनवरी भिलाई सुबह 9-10 बजे के बीच हमारे तमिल पड़ोसी के घर फोन आया। उनके घर बेटा-बहू और मां रहते थे। 

खबर थी कि कोक ओवन में बड़ा एक्सीडेंट हो गया है और चंदू के पापा गंभीर रूप से आहत है। हम लोगों को बहुत ज्यादा पता नहीं था कि क्या हो रहा है। हमारे यहां और चंदू के यहां काम करने वाली बाई एक ही थी। उसने बताया तो हम लोग देखे।

 तब पड़ोसी के घर चंदू की मम्मी फोन पर बात कर रही थी और भी बहुत से लोग आ रहे हैं। उसी वक्त प्लांट से दो लोग आकर खबर दिए कि चंदू के पापा को हास्पिटल लेकर गए हैं। 

 

 बुरी तरह डरे हुए थे हम भी


बसु परिवार मैत्रीबाग भिलाई में
इस हादसे से हम सब भी बुरी तरह डरे हुए थे क्योंकि मेरा बेटा तपन कुमार बसु मजुमदार भी ईएमडी में होने की वजह से अक्सर कोक ओवन आते-जाते रहता था। ऐसे में हम भी चिंतित थे कि उस एक्सीडेंट में वह भी तो नहीं हैं। हमने भी फोन करने और पता लगाने की कोशिश की। 

इस बीच चंदू के मामा तुरंत ही हास्पिटल निकल गए। बाद में फोन पर उमा के भाई ने पूरा ब्यौरा बताया कि शंकर राव काफी जल चुके थे। हम सब फोन पर संपर्क कर रहे थे।

 हमें भी कुछ सूझ नहीं रहा था औऱ् बदहवास होकर हम लोग भी तपन की खबर ले रहे थे। हम भी पागलों की तरह बीएसपी के फोन पर संपर्क करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन हमारा फोन नहीं लग रहा था।

 उम्मीद पर जी रहे थे हम सब

लगातार फोन करते हुए हमनें बहुत कोशिश की लेकिन कोई खबर नहीं आई। मैनें उस दिन देखा कि अनिश्चतता में जीना कितना कठिन होता है। जब तक तपन नहीं आए, हम लोग भी बेहद परेशान थे। इस बीच हम सभी चंदू की मां को दिलासा दे रहे थे। 

कुछ देर बाद चंदू की मां अस्पताल चली गई। फिर हमें पता चला कि चंदू के पापा ठीक हो जाएंगे। हालांकि चंदू के पिता शंकर राव करीब 10 दिनों तक जूझते रहे। चंदू के पापा को पता नहीं था कि मौत उन्हें यूं ही इस तरह से खींच कर ले जाएगी।

 इस वजह से उन्होंने चंदू की मां को बोला था कि मेरे या तुम्हारे पिता को मत बताना क्योंकि उन्हें पूरा यकीन था कि वो पूरी तरह ठीक हो जाएंगे।

 

 मकर संक्रांति के दिन उमा का चेहरा बयां कर रहा था हालात

आज 14 जनवरी है जिसे बंगालियों में दधि संक्रांति भी कहा जाता है। इस दिन हम उत्सब मनाया करते हैं। तेलुगू संस्कृति में भी इसे खूब अच्छी तरह धूम-धाम से मनाते हैं। 

उधर अस्पताल में भर्ती चंदू के पिता ने मना किया हुआ था कि मेरे व अपने पिता को हादसे के बारे में मत बताना और उनको आने भी मत कहना। बंगालियों की तरह तेलगुओं में मकर संक्रांति वाला दिन बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है। बंगालियों की दुर्गा पूजा की तरह तेलुगू परिवार इसे धूमधाम से मनाते हैं। 

तो संक्रांति वाले उस दिन उमा एक थाली में हल्दी कुमकुम पान सुपारी मिठाई डालकर लेकर आई। उस दिन उमा का चेहरा देखकर समझ मेें आ रहा था कि किस तरह से उनका चेहरा करूणा और विषाद से भरा हुआ था। उनका दुख हम सब समझ रहे थे। 

लेकिन फिर भी त्यौहार का दिन था तो जो करना चाहिए वो कर रही थी। बहुत ही अजीब सा माहौल था कि उनके भैया-भाभी आए थे कि उनके साथ यहीं संक्रांति मनाएंगे। कितने सारे सपने देखे होंगे उन्होंने इस त्यौहार के दिन को लेकर। लेकिन भाग्य का कितना बड़ा परिहास है कि बिना बादल के बिजली कड़की और इस परिवार पर गिर गई।

 

 हंसते-खेलते परिवार पर गिर पड़ी बिजली

 15 जनवरी 1986 सुबह सचमुच बिजली गिर पड़ी। हालांकि इसके दो दिन पहले से ही चंदू के पापा की तबीयत काफी बिगड़ गई थी। शंकर राव की बिगड़ती हालत को देखते हुए डाक्टरों ने घर वालों को बता दिया था।

ऐसे में एक दिन पहले ही उमा के पिता और ससुर भिलाई आ गए थे। फिर भी वो शंकर राव को अस्पताल में नहीं देख पाए क्योंकि शंकर राव तब आईसीयू में थे। उन्हें देखने मिला तो शंकर राव का मृत शरीर।

 शंकर राव उन दिनों मौत से लड़ते रहे और लड़ते-लड़ते आखिर चले ही गए। 15 जनवरी की रात को उन्होंने आखिरी सांस ली उसके बाद सुबह उनका शव लाया गया।

 

 गमगीन माहौल में, जब शंकर राव का शव आया

 

सेक्टर-6 में स्ट्रीट-74 का 6ए और सामने का आवास

16 जनवरी की सुबह माहौल बेहद गमगीन था, जब शंकर राव का शव घर लाया गया। चंदू के दादाजी, नानाजी, नानीजी, कई रिश्तेदार और भिलाई स्टील प्लांट के आफिसर-कर्मचारी बहुत से लोग वहां इकट्‌ठा हो गए थे। सुबह 10 बजे एक ट्रक आकर रुका। 

सभी आंसू भरी आंखों से इस घड़ी का इंतजार कर रहे थे। तब तक ढेर सारे लोग वहां जमा हो गए थे। हम लोगों की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वहां पास में जाएं। उनका शव एक सफेद कपड़े में लिपटा हुआ था। 

शव को अंदर घर में नहीं ले जाया गया बल्कि वहीं चबूतरे पर रखा गया जो बगीचे में बना था। उनका बड़ा बेटा राजा जो कि सिर्फ 10 साल का था उसे देखने हीं दिया गया। मामून (मेरी पौत्री सुस्मिता) और राजा दोनों अंदर बैठे हुए थे। हम लोगों ने उन्हें ड्राइंग करने दिया था। जिससे उनका ध्यान उस तरफ न जाए और वह बाहर न निकले। 

अबोध बच्चों को क्या मालूम उनका संसार लुट गया उसे क्या पता था कि उसका इतना बड़ा सर्वनाश हो चुका है। छोटे से निष्पाप शिशु को पता नहीं था कि क्या हो गया है। 

 

फूलों की वो शैय्या और हमारी आंखों से ओझल हो गया ट्रक

कुछ ही देर में चंदू को लेकर उसके मामा हमारे घर आए और आकर भीतर से राजा को लेकर बाहर आए। दोनों बच्चों को पिता का पांव छूने बोला गया। उन्हे क्या पता था कि उनका रखवाला नहीं रहेगा। इस तरह से विधि का विधान है। धीरे-धीरे ट्रक हम सब की आंखों से ओझल होता गया। 

शंकर राव को सफेद फूलों के बिछौने पर ले जाया गया। यह बेहद दर्दनाक नजारा था। उनकी यह शैया भी फूल की ही है जिस पर आखिरी बार यात्रा हो रही है। एक वो फूल से सजी सेज थी जिसमें उन दोनों का मधुर मिलाप हुआ था। कितना वेदना दायक है इस शैय्या को देखना। कितना निष्ठुर है यह समय। 

 

राव परिवार की शिद्दत से तलाश है डॉ. सुस्मिता को 

 डॉ. सुस्मिता ने बताया कि भिलाई से कोलकाता आने के बाद राव परिवार से संपर्क नहीं हो पाया। स्व. शंकर राव की जगह उनकी पत्नी एम. उमा राव को सेल के हैदराबाद आफिस में अनुकंपा नियुक्ति मिली थी। इसके बाद हमें ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाईं। 

डॉ. सुस्मिता के मुताबिक वह उमा आंटी और उनके दोनों बेटों चंद्रशेखर और राजशेखर का पता लगाने की कोशिश कर रही हैं। अगर राव परिवार फिर से मिल जाता है तो वह अपनी दादी की इस डायरी में लिखे भाव उस परिवार के साथ साझा करना चाहती हैं। 

वहीं भिलाई स्टील प्लांट प्रबंधन से मिली जानकारी के अनुसार एम. उमा राव ने 31 मार्च 2004 को भिलाई स्टील प्लांट के परचेस विभाग से जूनियर असिस्टेंट के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी। तब उनका पूरा पता 7-1-644/32, सुंदर नगर हैदराबाद 500038 दर्ज था। फिलहाल राव परिवार से कोई संपर्क नहीं हो पाया है। 

 

बांग्लादेश से सुकमा और फिर भिलाई, बस्तर जाने

तीन दिन तक बैलगाड़ी का सफर भी तय किया 

डा. रमणीमोहन-बीना रानी

दादी बीना रानी बोस मजमुदार ने सिर्फ एक हादसा या पड़ोसी की संवेदना को ही अपनी डायरी में दर्ज नहीं किया है बल्कि उनकी डायरी में उनके अपनी निजी जीवन से जुड़ी भी कई बातें हैं।

उनकी पौत्री डॉ. सुस्मिता बसु मजुमदार उस डायरी के पन्ने खोलते हुए बताती हैं-इसमें दादी ने बांग्लादेश से बस्तर के सुकमा में आकर बसने की कहानी का रोचक ब्यौरा दिया है, साथ ही यह भी बताया है कि किस तरह वह तीन दिन तक लगातार बैलगाड़ी का सफर तय कर जगदलपुर से सुकमा पहुंची थी। 

डायरी में उन्होंने लिखा है कि किस तरह से एक ''अंजान'' व्यक्ति (विवाहोपरांत) के साथ बांग्लादेश से कोलकाता, कोलकाता से रायपुर, फिर रायपुर से बस से जगदलपुर और जगदलपुर से बैलगाड़ी में तीन दिन में सुकमा का सफर तय किया था। 

डॉ. सुस्मिता बताती हैं-उनके दादा डॉ. रमणीमोहन बोस मजुमदार पेशे से चिकित्सक (सर्जन) थे। अपने विद्यार्थी जीवन में उन्होंने केमेस्ट्री में टॉप किया था, तब उन्हें जर्मनी जाकर अध्यन का मौका मिला था। लेकिन घर की आर्थिक परिस्थिति के चलते वह जर्मनी नहीं पाए। इसके बाद दादाजी ने डाक्टरी की पढ़ाई की और कोलकाता में प्रेक्टिस की। 

दादाजी सोनारपुर शासकीय हास्पिटल में पदस्थ थे। इसी दौरान उनके पास सुकमा (बस्तर) के जमींदार के मुंशी अपना उपचार कराने आया करते थे। मुंशी जी जब ठीक हो गए तो उन्होंने ही सुकमा में आने का प्रस्ताव दिया। इसके बाद दादाजी और दादाजी सुकमा पहुंचे और यहां कई साल तक रहे। इसके बाद पापा जब भिलाई स्टील प्लांट की सेवा से संबद्ध हुए तो परिवार 1961 में भिलाई आ गया। दादी बीना रानी बोस मजुमदार का निधन जनवरी 1992 में भिलाई में हुआ था।

क्या हुआ था 6 जनवरी 1986 को 

 यहां हुआ था भीषण विस्फोट

भिलाई स्टील प्लांट की कोक ओवन बैटरी-6 में 6 जनवरी 1986 की सुबह जोर का विस्फोट हुआ था। 

इस हादसे में कोक ओवन, मेंटनेंस एंड रिपेयर ग्रुप, कंस्ट्रक्शन एंड हैवी मेंटनेंस, सेफ्टी और फायर ब्रिगेड के 48 कर्मी घायल हुए थे। 

वहीं 9 कर्मियों-अफसर की मौत हो गई थी। इन मृतकों में त्रिलोकनाथ गैस सेफ्टी आपरेटर, जवाहर लाल टंडन हवलदारी एनएमआर, आरके दास प्रबंधक कोक ओवंस, तेजू राजभर फिटर, ऊर्जा प्रबंधन विभाग, एम शंकर राव उपप्रबंधक कोक ओवंस, ओपी ठाकुर फिटर एमिल मिंज फिटर और एसके बनर्जी चार्जमैन सभी ऊर्जा प्रबंधन विभाग से और ओपी जांगिड़ उपप्रबंधक कोक ओवंस शामिल हैं।


हरिभूमि भिलाई-दुर्ग संस्करण-6 जनवरी 2022