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Tuesday, November 16, 2021

इस समय मूर्खता को लाइसेंस मिला हुआ है,आपमें 

से कितनों ने ऐसी मूर्खताओं का प्रतिवाद किया है? 

 

चिंतक-आलोचक प्रो. अग्रवाल भिलाई में

प्रसिद्ध आलोचक-चिंतक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल मूलत: ग्वालियर के रहने वाले हैं और कभी अपना छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश संयुक्त हुआ करते थे,लिहाजा प्रो. अग्रवाल की छत्तीसगढ़ के प्रति आत्मीयता स्वाभाविक रही है। 

10 नवंबर 2021 बुधवार को कांग्रेस पार्टी की ओर से भिलाई में जवाहरलाल नेहरू पर केंद्रित कार्यक्रम में प्रो. अग्रवाल मुख्य वक्ता थे। आयोजक छत्तीसगढ़ सरकार ने आनन-फानन तैयारी में महात्मा गांधी कला मंदिर जैसे छोटे से सभागार को बुक कर लिया था, नतीजे में सभागार के अंदर जितने खड़े और बैठे थे, उतने ज्यादा बाहर भटक रहे थे। बेहतर होता नेहरू हाउस सेक्टर-1 जैसा बड़ा सभागार बुक किया जाता।

 इस अव्यवस्था के चलते अपनी पत्रकार बिरादरी को बहिष्कार जैसा कदम उठाना पड़ा। हालांकि कार्यक्रम समाप्ति के बाद 'कका' भूपेश बाहर आए और अव्यवस्था के लिए खेद जता दिया, इसके बाद बहिष्कार भी काफूर हो गया।

 आयोजन की जानकारी मिलने के बाद मेरी तैयारी प्रो. अग्रवाल से लंबी बातचीत करने की थी लेकिन वहां अव्यवस्था इतनी थी कि ऐसा हो नहीं पाया। हां, प्रो. अग्रवाल से छोटी सी आत्मीय मुलाकात जरूर हो गई। उन्हें मैनें अपने काम के बारे में बताया और मेरा कुछ तार्रुफ भिलाई विद्यालय में मेरे शिक्षक रहे रवि श्रीवास्तव सर और भिलाई की पहली महापौर नीता लोधी ने भी उनसे करवा दिया। 

प्रो. अग्रवाल से आत्मीय मुलाक़ात

अलग हट कर अकेले में मैनें प्रो. अग्रवाल से कुछ कहा और उन्होंने जवाब में भी कुछ कहा। बस इतनी सी मुलाकात संभव हो पाई, जिसकी गवाह ये फोटोग्राफ है। इंशा अल्लाह, उम्मीद है कभी प्रो. अग्रवाल से तसल्ली से बात हो पाएगी। भिलाई का यह आयोजन खास तौर पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की ओर से था, लिहाजा इसमें पार्टी के कार्यकर्ता ज्यादा था।
 वैसे बहुत कम लोगों को यह बात मालूम है कि प्रो. अग्रवाल कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा हुआ करते थे। उनके इस संदर्भ में वीडियो भी यूट्यूब पर मौजूद है। संघ का हिस्सा होने की वजह से अंदरखाने की बहुत सी बातें जानते हैं। इसलिए उन्होंने व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में तैर रहे कई झूठ की कलई यहां आयोजन में बाकायदा नाम लेकर खोली। 

प्रो. अग्रवाल ने जवाहरलाल नेहरू पर जो भी कहा, उसमें पूरा का पूरा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर का था। उम्मीद थी कि भिलाई में नेहरू पर बात करने प्रो. अग्रवाल आ रहे हैं तो वो यहां नेहरू और भिलाई पर भी कुछ बोलेंगे। हालांकि ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने यहां जो कुछ कहा उसे आप भिलाई की प्रथम महापौर नीता लोधी की फेसबुक वॉल पर जाकर वीडियो में सुन सकते हैं। यहां उनकी खास बातें इस तरह से रहीं-

 बड़े लोगों के मतभेद ओछे दिमाग के लोग नहीं समझ सकते 

प्रचारित तो ऐसे किया जाता है, जैसे सरदार पटेल का हक मारकर नेहरू छल से प्रधानमंत्री बन गए। अगर सरदार पटेल प्रधानमंत्री बनते तो बेहतर साबित होते। दरअसल, कुछ लोगों को लगता है कि वो गांधी और पटेल को उनसे भी ज्यादा जानते हैं। वास्तविकता यह है और कांग्रेस संगठन की परंपरा और ताकत है कि यहां वैचारिक मतभेदों को व्यक्तिगत विद्वेष में यथासंभव नहीं बदलने दिया जाता।

 वैसे भी बड़े लोगों के बीच के मतभेद को ओछे दिमाग के लोग नहीं समझ सकते। यह बड़े लोगों की बड़ी बातें हैं, इस पर ओछापन नहीं थोपना चाहिए। यह भाव आज का नहीं और कोई दबी ढकी बात नहीं कि नेहरू-पटेल में मतभेद थे। मतभेद तो गांधी-नेहरू में भी थे। 

गांधी-नेहरू में मतभेद थे लेकिन... 

 प्रथम महापौर नीता लोधी और प्रख्यात व्यंगकार रवि श्रीवास्तव  साथ में

1927 में मद्रास कांग्रेस में नेहरू के दबाव में डोमिनियन स्टेट के बजाए पूर्ण स्वराज की बात हुई थी और गांधी जी इससे खुश नहीं थे। बाद में 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव पर गांधी जी ने बाकायदा आलोचना की कि यह प्रस्ताव हड़बड़ी में पारित किया गया। लेकिन 1930 में आते-आते गांधी जी का मन बदल गया और उन्होंने भी पूर्ण स्वराज की बात कही।
 इन दोनों के बीच में गांधी-इरविन पैक्ट को लेकर मतभेद थे। महात्मा गांधी के साथ हुए तमाम मतभेदों को नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है और इसे प्रकाशित करने से पहले 1937 में नेहरू ने पांडुलिपी महात्मा गांधी को दी थी कि कोई अंश पसंद न हो तो बताइए, हटा देंगे। लेकिन महात्मा गांधी ने कहा-एक शब्द भी नहीं हटेगा और इसे जस का तस प्रकाशित करवाओ। इस दौरान दोनों के बीच तीखा पत्र व्यवहार भी हुआ था। 

पटेल ने खुद माना, कि देश का प्रधानमंत्री कैसा होना चाहिए..?

 दरअसल, सरदार पटेल संगठन के व्यक्ति थे और संगठन के लोग चाहते थे कि सरदार पटेल को अहम जिम्मेदारी देते हुए प्रधानमंत्री बनाया जाए लेकिन गांधी केवल संगठन ही नहीं जनता का मिजाज भी जानते थे। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि इस बात को सरदार पटेल ने आगे चल कर माना भी कि इसके दस्तावेज भी उपलब्ध हैं कि एक नवस्वाधीन देश के प्रधानमंत्री को अंतरराष्ट्रीय मामले की गहरी समझ होनी चाहिए और उसकी अंतराष्ट्रीय स्थिति होनी चाहिए। 

महात्मा के निधन के बाद 1949 में सरदार पटेल ने लिखा कि, महात्मा गांधी ने अपना उत्तराधिकारी नेहरू को घोषित किया तो आज गांधी जी के जाने के बाद लगता है कि उनका फैसला बिल्कुल सही था। सरदार पटेल स्वीकार भी करते थे कि- हां, मतभेद है हम लोगों के बीच लेकिन एक दूसरे के विचारों को समायोजित कर सकते हैं।

 गांधी ने नेहरू का अपना वारिस इसलिए घोषित किया

 नेहरू-गांधी के रिश्तों को लेकर बात करें तो इसी पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव पर महात्मा गांधी से कहा गया कि नेहरू ने इस प्रस्ताव में अहिंसा के सिद्धांत को लेकर बहुत तीखी बातें कही हैं और आपकी आलोचना की है। गांधी जी लाहौर अधिवेशन में तो थे नहीं लेकिन इसके बाद 1942 की वर्धा एआईसीसी में उन्होंने भाषण दिया और कहा कि सरदार पटेल नहीं, राजेंद्र प्रसाद नहीं, राजाजी नहीं, मेरा वारिस जवाहर होगा। क्योंकि गांधी जी अपने आप को व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के इन प्रोफेसरों से ज्यादा जानते थे।

 अंतरराष्ट्रीय धाक जम चुकी थी नेहरू की

 अंतरराष्ट्रीय धाक 1927 से जमना शुरू हो गई थी, जब दुनिया के तमाम औपनिवेशिक देशों की ब्रुसेल्स में हुई कान्फ्रेंस में उन्होंने शिरकत की थी। इसके बाद से नेहरू का अंतरारष्ट्रीय पटल पर सम्मान बढऩे लगा था। अंतरराष्ट्रीय पटल पर लोग उनको अच्छी तरह जानते थे और नेहरू इस बात को बार-बार रेखांकित करते थे जो आज तक रेखांकित करने की जरूरत है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम केवल भारत की अपनी स्वाधीनता का आंदोलन नहीं था बल्कि उपनिवेशवाद के अंत का आरंभ भी था। 

आप देखिए, 1947 में हिंदुस्तान आजाद हुआ और सन 1955 तक लगभग सारा ब्रिटिश फ्रेंच और पुर्तगाली उपनिवेश आजाद होता गया। इंडोनेशिया से लेकर ब्राजील तक सारे उपनिवेश ताश के महल की तरह ढहते गए। 

 

 उपनिवेशवाद के अंत की शुरूआत 

याद कीजिए कि जब तक भारत औपचारिक रूप से आजाद नहीं हुआ था और नेहरू अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष थे। उस समय नेहरू ने दिल्ली में 15 दिन की एशियन पीपुल्स कांग्रेस आयोजित की थी। जिसे गांधी जी ने आशीर्वाद दिया था और इस कान्फ्रेंस के बारे ब्रिटिश जर्नलिस्ट फिलिप्स टालबोट ने लिखा था कि ये कान्फ्रेंस कुछ लोगों को केवल एक तमाशा लग सकती है लेकिन जानने वाले जानते हैं कि यह उपनिवेशवाद के अंत की शुरूआत है।

 सिंगापुर के संस्थापक प्रधानमंत्री ली कुआन यू जो हमारे दक्षिणपंथी मित्रों के बड़े अजीज है और इनके आदर्श पुरुष कहलाते हैं। उन्होंने कहा था एशिया और अफ्रीका के सिरमौर तो नेहरू थे।

 ..तो सुभाष बाबू ने एक ब्रिगेड उनके नाम पर भी क्यों नहीं रखी?

 व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के मुताबिक सुभाष बोस के साथ गांधी-नेहरू ने ज्यादती की और मौलाना आजाद तो फिर मुसलमान भी थे। अब फैलाया जा रहा है कि सावरकर ने सुभाष चंद्र बोस को प्रेरणा दी थी अपनी सेना बनाने। 

मुझे हैरानी होती है कि अगर ऐसा था तो सुभाष बाबू ने आजाद हिंद फौज के बजाए अपने संगठन का नाम स्वाधीन भारत सेना क्यों नहीं रखा, फिर उनका तराना कदम-कदम बढ़ाए जा भी पूरी तरह उर्दू में है। फिर सुभाष बोस ने अपनी फौज में गांधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड, आजाद ब्रिगेड और रानी झांसी ब्रिगेड बनाई। क्या उनमें इतनी कृतज्ञता भी नहीं थी कि कथित प्रेरणा देने वाले सावरकर के नाम पर भी एक ब्रिगेड बना देते? 

नेहरू पर यह झूठ चिपकाया गया

 एक और झूठ फैलाया जाता है कि जवाहरलाल नेहरू ने एक्सीडेंटल हिंदू और कल्चर से मुस्लिम बताया है। दरअसल ये शब्दावली नेहरू पर हिंदू महासभाई नेता खरे ने चिपका दिया था और साफ कहूं तो यह कांग्रेस पार्टी की कमजोरी है कि इसका प्रतिवाद नहीं कर पाए। ऐसे कई झूठ आज व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के जरिए बच्चे-बच्चे तक पहुंचाए जा रहे हैं। 

नेहरू, जिन्ना और एडविना पर ऐसा झूठ 

एक सज्जन राजीव दीक्षित, जो आज के एक बाबाजी के बड़े प्रिय थे। उनके हर वीडियो में मूर्खतापूर्ण बातें हैं। सही बात है कि मूर्खों का आत्मविश्वास भी गजब का होता है। अपने एक वीडियो में राजीव दीक्षित कहते हैं जिन्ना, एडविना और नेहरू लंदन के हॉरिस कॉलेज में सहपाठी थे।

 इसलिए जानबूझ कर माउंटबेटन को वायसराय बनवाया गया जिससे उनकी पत्नी एडविना के माध्यम से नेहरू को प्रभावित करवाया जा सके। हकीकत यह है कि लंदन में हॉरिस नाम का कोई कॉलेज ही नहीं है। वहीं जिन्ना तो नेहरू से 15 साल पहले ही लंदन से पढ़ कर लौट चुके थे और एडविना तो हाई स्कूल से उपर पढ़ी भी नहीं है। फिर कहां से तीनों के एक साथ पढऩे की बात आती है।

 कश्मीर पर तो नेहरू को कोसते हैं पाकिस्तानी इतिहासकार

 कश्मीर का सवाल उठाया गया तो मेरा आग्रह है कि तमाम राजनीतिक डिबेट के बीच अपने कामन सेंस को जागृत रखिए। कश्मीर की अंतरराष्ट्रीय स्थिति जो उस वक्त की थी, उसमें उसकी सीमा सोवियत संघ, अफगानिस्तान और चीन से मिलती है। नेहरू यह अच्छी तरह जानते थे कि ऐसी रणनीतिक जगह को पाकिस्तान जैसे होस्टाइल देश के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता था। 

यह बात गांधी जी को भी समझ में आई और पटेल को भी मालूम हुई। उसके बाद भारत सरकार की यह आमराय बनीं कि कश्मीर को पाकिस्तान को दिए जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। पाकिस्तान के प्रख्यात इतिहासकार बर्क एंड कुरैशी (एसएम बर्क-सलीमुद्दीन कुरैशी) इस बात के लिए नेहरू की निंदा करते हुए पटेल का समर्थन करते हैं कि कश्मीर पर नेहरू ने तो गड़बड़ कर दी पटेल तो ठीक चल रहे थे।

 कश्मीर पर नेहरू गलत थे तो इस्तीफे क्यों नहीं हुए?

 मैं यह जानना चाहता हूं कि अगर कश्मीर के सवाल पर नेहरू की सोच इतनी गड़बड़ थी और कश्मीर के सवाल पर नेहरू मनमानी कर रहे थे। किसी की नहीं सुन रहे थे और सारी जिम्मेदारी उनकी ही थी तो कैबिनेट से सरदार पटेल ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया? अंबेडकर ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया? स्वयं हिंदू महासभा के हिंदू राष्ट्रवादी नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया? 

इन लोगों ने इस्तीफा इसलिए नहीं दिया क्योंकि जो भी फैसले थे वो सर्वसम्मत थे किसी मतभेद की गुंजाइश नहीं थी। इन पर सरकार की पूरी सहमति थी। मुखर्जी ने इस्तीफा इसलिए दिया था.. वैसे, श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर के सवाल पर कैबिनेट से इस्तीफा नहीं दिया बल्कि उस नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में दिया जिसमें यह संकल्प लिया गया कि दोनों देश अपने अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा करेंगे।

 मुखर्जी चाहते थे कि दोनों कौम का शत-प्रतिशत अदला-बदली हो। ऐसे बहुत से उदाहरण है, जब मंत्रियों ने कैबिनेट से इस्तीफा दिया। 2002 में गुजरात में हिंसा के बाद कैबिनेट मंत्री रामविलास पासवान ने अटलबिहारी बाजपेयी की सरकार से इस्तीफा दिया था, यह कहते हुए कि बाजपेयी ने नरेंद्र मोदी सरकार के विरुद्ध कड़े कदम नहीं उठाए। इसी तरह हिंदू कोड बिल को कैसे पास किया जाए, इस बात पर नेहरू कैबिनेट से अंबेडकर ने इस्तीफा दे दिया था।

 लियाकत दिल्ली आए तो दोनों देश के राष्ट्रध्वज के साथ...

 क्योंकि तब पाकिस्तान जानता था कि सर्जिकल स्ट्राइक कह कर नहीं की जाती। समझौते के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान तुरंत राजी हो गए और जब लियाकत पाकिस्तान के जहाज पर दिल्ली आए तो इस जहाज पर हिंदुस्तान-पाकिस्तान दोनों देशों के झंडे लगे थे। दिल्ली में नेहरू-लियाकत पैक्ट हुआ।

 जिसमें दोनों देशों ने अपने यहां अपने-अपने अल्पसंख्यक आबादी की पूरी सुरक्षा करने का संकल्प दिलाया। इधर श्यामाप्रसाद मुखर्जी अड़े हुए थे कि दोनों देशों की अल्पसंख्यक आबादी का पूरी तरह तबादला होना चाहिए। जबकि यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध होता क्योंकि भारत ने हिंदू राष्ट्र बनाने का इरादा नही किया था।

 ...तो बाबा की जगह पितामह बोलिए 

भारत ने हर आने वाली सभ्यता से कुछ सीखा और सिखाया है। समोसा भारत में तुर्को के साथ आया है। वैदिक व्यंजन नहीं है। आप इसे कैसे अलग कर सकते हैं? बाबा तो मूलरूप से तुर्की का शब्द है। जिन्हें अरबी-उर्दू करण से परहेज है, उन्हें बाबा की जगह पितामह शब्द इस्तेमाल कहने की आदत डाल लेना चाहिए।

 इसलिए होता है दुष्प्रचार 

सांप्रदायिक राजनीति के लोगों द्वारा नेहरू का बहिष्कार और नेहरू के प्रति दुष्प्रचार इसलिए किया जा रहा है क्योंकि नेहरू भारतीय परंपरा, भारतीय चिंतन की जो गतिशीलता है जो डायनामिज्म है, नेहरू उसके सबसे शानदार प्रतिनिधि हैं। लोकतांत्रिक और सामाजिक न्याय संरचना के सबसे प्रबल प्रवक्ता हैं। विविधता में एकता कोई खोखला नारा नहीं है। वहीं सांप्रदायिकता  तो फासिज्म का भारतीय रूप है जो भारतीयता के विरुद्ध है।

देश को आधुनिक राष्ट्र में तब्दील कर रहे थे  नेहरू

 नेहरू पर हमला इसलिए भी होता है क्योंकि नेहरू अपने देश को बहुत अच्छी तरह समझते थे। वह जानते थे कि भारत एक प्राचीन सभ्यता है और इसे एक आधुनिक नेशन में तब्दील करना है। अब दुनिया में मुगल, आटोमन साम्राज्य नहीं बचे हैं अब आधुनिक राज्य बचे हैं। तो साम्राज्यवाद के बाद दुनिया आधुनिक राज्य की दुनिया होगी। नेशन स्टेट की दुनिया होगी। प्राचीन सभ्यता को हमे एक नेशन स्टेट में तब्दील करना है। नेहरू इस प्रयास में आजीवन लगे रहे।

 आलोचनाओं के बावजूद मुझे नहीं कहा देशद्रोही 

मैं कांग्रेसी नहीं हूं और कांग्रेस के कार्यक्रमों में जाता हूं। कांग्रेस के मंचों से सार्वजनिक या व्यक्तिगत रूप से बड़े नेताओं से बातचीत में और लोगों से कड़वी बातें करता रहा हूं। इस तरह की आलोचनाओं के बावजूद कांग्रेसियों ने मुझे कभी एंटीनेशनल नहीं कहा और मुझ पर देशद्रोह का आरोप कभी नहीं लगाया।

 खुद को पैदाइशी विश्वगुरू बताने वाले वस्तुत: मूर्ख 

जो लोग पैदाइशी विश्वगुरू होने का दावा करते हैं वो वस्तुत: मूर्ख होते हैं। आज इनके पास अपना कोई प्रतीक या नेता नहीं है। इसलिए इनके प्रचार तंत्र को देखने पर लगता है कि लाल बहादुर ने अपनी राजनीति जनसंघ से शुरू की थी और सरदार पटेल ने संघ पर प्रतिबंध नहीं लगाया बल्कि संघ के स्वयंसेवक थे। इनके फर्जी दावों से तो ऐसा लगता है कि खुद महात्मा गांधी या सरदार पटेल अपने आप को नहीं जानते होंगे, जितना ये लोग जानते हैं। इस समय मूर्खता को लाइसेंस मिला हुआ है। 

आपके कॉमन सेंस को ध्वस्त कर रही व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी 

तमाम राजनीतिक डिबेट के बीच अपने कामन सेंस (सहजबोध) को जागृत रखिए। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी जो सबसे खतरनाक काम करती है, वह यह है कि वह आपके कामन सेंस को ध्वस्त करती है टेलीविजन भी ही करता है। सब चीजे आपको मूर्ख बनाने का हिस्सा है। सहजबोध का मतलब आपका ज्ञान व अनुभव है। आज तमाम फर्जी दावे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के माध्यम में समाज में फैलाए जा रहे हैं। आपमें से कितनों ने ऐसी मूर्खता का प्रतिवाद किया है?