Sunday, January 22, 2017

आम जनता को खुश करने के लिए नहीं है शास्त्रीय संगीत

खयाल गायक पं. सत्यशील देशपांडेय से  मुहम्मद जाकिर हुसैन की खास बातचीत 

जाने-माने खयाल गायक पं. सत्यशील देशपांडेय 6-7 जनवरी 2017 को भिलाई-दुर्ग आए थे। महान गायक पं. कुमार गंधर्व के शिष्य होने के नाते उनकी अलग पहचान है। शास्त्रीय संगीत पर आधारित पृष्ठभूमि वाली कुछेक हिंदी-मराठी फिल्मों में भी उन्होंने अपनी आवाज दी है। यहां दुर्ग के शासकीय डॉ. वामन वासुदेव पाटणकर कन्या स्नातकोत्तर कॉलेज में शास्त्रीय संगीत पर आधारित एक संगोष्ठी में हिस्सा लेने आए पं. देशपांडेय से मेरी लंबी बातचीत हुई। पं. देशपांडेय को प्रख्यात पेंटर सैयद हैदर रजा के नाम पर स्थापित रजा सम्मान सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। संयोग से बातचीत के दौरान इसी कॉलेज में प्रोफेसर और रजा अवार्ड प्राप्त प्रख्यात चित्रकार योगेंद्र त्रिपाठी भी मौजूद थे। बातचीत के दौरान पं. देशपांडेय ने शास्त्रीय संगीत के शिक्षण-प्रशिक्षण से लेकर रियालिटी शो और फिल्मों तक ढेर सारे सवालों के जवाब बड़े धीरज के साथ दिया। धाराप्रवाह बातचीत के दौरान उन्होंने शास्त्रीय संगीत और उसके व्याकरण पर भी बहुत कुछ कहा। इसलिए इंटरव्यू बनाने के  दौरान मैनें अपने शहर के वरिष्ठ संगीतज्ञ प्रख्यात वायलिन वादक पं. कीर्ति माधव व्यास से भी कुछ जरूरी सलाह ली। जिससे कि तथ्यात्मक गलती न जाए। इसके बाद तैयार हुआ यह पूरा इंटरव्यू-

0 शास्त्रीय संगीत की शिक्षण पद्धति कैसी होनी चाहिए,खास कर बच्चों के लिए ? 
00 आज बच्चों को शास्त्रीय संगीत के नाम पर व्याकरण ज्यादा बताया जाता है। ऐसे में हमारे बच्चे शास्त्रीय संगीत को सरलता से कैसे आत्मसात कर पाएंगे? मैं बच्चों को बताऊं कि भूप में मध्यम और निषाद वज्र्य है और तीन ताल की मात्राएं 16 हैं तो बच्चे बोर हो जाएंगे। अगर मैं राग भूप के तराने से ही शुरूआत करूं तो बेहतर होगा। दरअसल आज लोगों के पास आधे-पौन घंटे की बंदिश सुनने का भी धीरज नहीं है। इसलिए मैनें फाइव मिनिट्स क्लासिकल म्यूजिक (एफएमसीएम) का कंसेप्ट दिया हैै। 
0 तराना ही क्यों..? 
इंटरव्यू के दौरान पं. देशपांडेय और योगेंद्र त्रिपाठी के साथ 
00 मेरा मानना है कि आपकी मातृभाषा अलग-अलग हो तो भी आप तराना गा सकते हैं। मैनें पांच मिनट में शास्त्रीय संगीत (एफएमसीएम) की जो अवधारणा दी उसमें  एक-एक राग का एक-एक तराना स्कूली बच्चों को बताया जाता है। महाराष्ट्र के स्कूलों में यह प्रयोग चल रहा है। इसके लिए करीब 20 तराने मैनें गाए हैं और 30 अन्य कलाकारों से गवाए हैं। मैनें स्पिक मैके के प्रोग्राम में एक लोकप्रिय गीत 'कजरारे-कजरारे' लिया और उसे 8 मात्रा के एक चक्र के बजाए 8-8 मात्रा के दो चक्र (16 मात्रा) में गा कर बताया। इससे बच्चे भी खुश हो गए और उनकी हमारे संगीत की विविधता भी समझ में आ गई। बात सिर्फ 'कजरारे-कजरारे' की नहीं है,आप आज का कोई भी लोकप्रिय गाना लेकर आइए मैं उसे एक ताल या तीन ताल में बनाके बच्चों को बताउंगा तो उसमें बच्चे एन्ज्वाए करेंगे और संगीत को भी समझेंगे। 
0 बच्चों का शिक्षण तो ठीक है लेकिन आम जनमानस तक शास्त्रीय संगीत को पहुंचाने कलाकार का दायित्व कितना है? 
00 देखिए,हमारे शास्त्रीय संगीत में असीमित संभावनाएं हैं और वो किसी भी सच्चे कलाकार को हमेशा प्रेरित करती है। इससे कलाकार तो आनंदित होता ही है लेकिन ज्यादा से ज्यादा श्रोताओं तक पहुंचने का काम प्रतिभाशाली कलाकार कर नहीं पाते हैं। क्योंकि वो तो अपने परफ ार्मेंस और रियाज में व्यस्त रहते हैं। इसलिए सबसे बड़ी जवाबदारी अकादमिक क्षेत्र के लोगों की है। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी में जो लोग संगीत के शिक्षण से जुड़े हैं और आज की पीढ़ी के सीधे संपर्क में हैं, यह उनका दायित्व है कि हमारे शास्त्रीय संगीत के प्रति युवा पीढ़ी में समझ पैदा करे और ज्यादा से ज्यादा लोगों को संगीत से जोड़ें। 
0 आजादी से पहले और बाद के दौर में शास्त्रीय संगीत और कलाकारों को लेकर क्या बदलाव देखते हैं? 
आजादी से पहले संपर्क माध्यम उतने नहीं थे। ऐसे में समाज से शास्त्रीय संगीतकारों की अपेक्षाएं सिर्फ यही थी कि उसकी साधना में कोई बाधा न आए। तब कलाकार को लोकप्रिय होने की जरुरत नहीं थी। तब कलाकारों-पहलवानों को राजा-महाराजा का संरक्षण मिलता था। इसलिए जनता को खुश करने की तब नौबत नहीं आई थी। लेकिन स्वातंंत्र्य के बाद जब राजा-महाराजा का दौर खत्म हुआ तो भरण-पोषण के लिए कलाकारों का पाला जनता जनार्दन से पड़ा। ऐसे में कलाकारों ने नई तरकीबें ढूंढ निकाली। जैसे अतिगद्रुत तराने गाना या झाला बजाना। 
0 ...तो क्या शास्त्रीय संगीत आम जनता के लिए नहीं है? 
00 मेरा मानना है कि हमारे शास्त्रीय संगीत का स्वभाव आपस की गुफ्तगू जैसा है। मसलन एक कमरे में 10-20 लोग बैठे हैं और कलाकार गा या बजा रहा है तो वहां राग की बारीकियां उभर कर आएगी। अब वही कलाकार हजारों लोगों के बीच परफार्म करे तो पता नहीं कितने लोग इन बारीकियों को पकड़ पाएंगे। हमारा संगीत जनता को खुश करने के लिए नहीं है बल्कि यह बहुत हद तक स्वांत: सुखाय जैसा है। मैनें अपने जीवन में अपने गुरु पं. कुमार गंधर्व के अलावा पं. रविशंकर और पं. भीमसेन जोशी जैसे कलाकारों को सुना है तो उनका सर्वोत्तम मुझे घरेलू महफिलों में ही मिला है। 
0 तो शास्त्रीय संगीत फिर जनता विमुख हुआ ना?
00 देखिए, आम जनता को तो द्रुत गति का संगीत ज्यादा आकर्षित करेगा। हमारा शास्त्रीय संगीत एक अलग तबीयत का है वो बहुत ही नाजुक है और मौन की तरफ ले जाता है। आबादी बढ़ी है तो जनता को आकर्षित करने की तरकीबें भी निकाली गई हैं। जरूरी नहीं कि उससे सच्चा कलाकार भी खुश हो। मान लो मेरी महफिल हो रही है तो उसमें मैं एक हजार लोगों को खुश करूं, उससे बेहतर होगा कि मैं समझ रखने वाले 5 लोगों के लिए अपना संगीत पेश करुं। मैं ग्रेट ब्रिटेन कई बार गया हूं। वहां शेक्सपियर को पढऩे वाले लोग वहां की आबादी के हिसाब से 1-2 प्रतिशत ही होंगे। हमारी शास्त्रीय कलाएं हमेशा सीमित लोगों तक रही हैं और इसमें वो लोग खुश थे। जनता अभिमुख कला का होना ये तो आजादी के बाद आया है और ये कोई उत्कृष्टता की कसौटी नहीं है। 
0 सुगम संगीत का अपना श्रोता वर्ग है और वो शास्त्रीय संगीत की अपेक्षा कहीं ज्यादा बड़ा है? 
00 वह तो होगा ही। सुगम संगीत और शास्त्रीय संगीत में फ र्क ये है कि सुगम संगीत पूर्व निश्चित है। जैसे 'आधा है चंद्रमा रात आधी' गाना किसी सिचुएशन से बना है। अब ये गाना आपको 2017 में भी अच्छा लगता है तो मैं ईष्र्या करुंगा कि क्या खुश आदमी है ये कि इसको उसी गाने से तृप्ति मिल जाती है। लेकिन जिसकी सांगीतिक आत्मा तड़पती है तो उसको शास्त्रीय संगीत तक आना पड़ता है। हमारे शास्त्रीय संगीत में दो वैश्विक रिदम छह मात्रा का दादरा और 8 मात्रा का कहरवा है। इसके दुगुने मात्रा के ताल हमारे ख्याल संगीत में बनें। ताल का पहला आधा और दूसरा आधा ये कंसेप्ट दुनिया के किसी भी संगीत में नहीं है मैं इस संगीत को श्रेष्ठ बताने का दावा नहीं कर रहा हूं,इसकी खासियत बता रहा हूं। 
0 शास्त्रीय संगीत में खास कर गायन में किन तत्वों का समावेश होता है और श्रोता वर्ग इनसे किस हद तक प्रभावित होता है? 
00 शास्त्रीय संगीत में एक कलाकार का स्वभाव, उसके संस्कार, उसकी तालीम और उसकी तत्काल स्वस्फूर्तता जैसे तत्वों से प्रस्तुति का रूप बनता है। इसलिए हमारे संगीत की ये परंपरा रही है कि उसी गायक के उसी राग को ताल में गाए जाने वाले उसी बंदिश को सुनने के लिए वही श्रोता इस उम्मीद पर बार-बार जाते हैं कि अब कुछ नया होगा। यह बात आप दूसरे संगीत में नहीं पा सकते। हमारे संगीत का वैभव और इसकी ऊंचाई है कि हर स्तर पर किसी भी उम्र में लोग बंदिशों का आनंद ले सकते हैं। शास्त्रीय संगीत में नवनिर्माण की खासियत है और जिसको इसका चस्का पड़ जाए तो यही आनंद उसके लिए बहुत है। इसके बाद दस हजार लोगों को संगीत अच्छा लगता है कि नहीं इससे उसे क्या वास्ता...?
अपने गुरू पं. कुमार गंधर्व के साथ संगत करते हुए
0 आपके गुुरू पं. कुमार गंधर्व इस बारे में क्या सोचते थे? उनकी शिक्षण पद्धति कैसी थी? 
00 पं. कुमार गंधर्व को करोड़ों लोगों ने सुना पर उन्होंने कभी जनता के लिए समझौता नहीं किया। कोई उनकी कोई नकल करे या उनका कोई घराना बने ये उनकी इच्छा कभी नहीं थी। वो कहते थे कि मेरा सौंदर्य विचार, मेरा सांगीतिक विचार है। जब वो सिखाने बैठते थे तो हम लोगों को कोई विशिष्ट राग के साथ उससे जुड़ी परंपरा और अन्य पहलू भी समझाते थे। उसके बाद कहते थे-मैनें आपको बता दिया, अब आप अपना रास्ता ढंूढो और इसलिए ही मैं उनके श्रेष्ठ गुरू मानता हूं। उनकी जगह कोई और होता तो रटवा लेता। लेकिन उनका भी शिक्षण ऐसा ही हुआ था। हमारे पंडित जी के गुरूजी पं. बीआर देवधर जी ने भी ऐसे ही गायकी का हर रंग बताने के बाद कहा था कि-अब आप अपना गाना बनाओ। गुरूजी पं. कुमार गंधर्व का कहना था कि जब आप गाने बैठते हैं तो अष्टांग का प्रदर्शन नहीं लगना चाहिए। वे मानते थे कि गाना अष्टांग के लिए नहीं बना है कि हमें आलाप,बोल आलाप और बोलतान सब कुछ मालूम है और हम सभी का प्रदर्शन कर दें। ऐसा जरूरी नहीं बल्कि जो बंदिश आप गा रहे हैं उसमें जो अनुकूल व प्रभावशाली है, वही प्रदर्शित करें। उनका मानना था कि गायिकी किसी भी अंग की अति न करो। 
0 ऐसे में आप पश्चिमी संगीत को किस पैमाने पर रखते हैं? 
00 पश्चिमी संगीत दरअसल पूर्व निश्चित होता है। महान संगीतकार जुबिन मेहता की सिंफ नी सुनिए,वहां आप हमेशा आउटसाइडर रहेंगे। वहां सवा सौ लोगों की टीम है। जिसमें 15 वायलिन, 10 फ्ल्यूट,16 ड्रम और 20 सैक्सोफोन सहित तमाम वाद्य हंै और इन सबके मिलने से बहुत ही सुंदर सिम्फ नी बनती है लेकिन यह सब तो पूर्व निश्चित है। वो लोग स्कोर बोर्ड में लिखा हुआ पढ़ कर स्कोर बजाते हैं। मैं उनके संगीत को छोटा नहीं बता रहा हूं लेकिन वहां तत्काल में अपना कुछ देने के लिए कलाकार के पास गुंजाइश नहीं होती। इसके विपरीत हमारे यहां तो सामने कुछ भी लिखा हुआ नहीं होता। यहां तो कलाकार का मूड, उसकी तालीम,उसके संस्कार और उसकी तात्कालिक समझ ये सब मिल कर हमेशा एक नई सर्जना रचते हैं। हमारे संगीत में जो क्षमताएं हैं,वो चिरंतन है। इसलिए इसको ज्यादा लोकप्रिय होने की तमन्ना कभी नहीं रही। 
0 आपने महज तीन चुनिंदा फिल्मों में पाश्र्वगायन किया। इसकी क्या वजह थी? 
00 क्योंकि इन तीनों फि ल्मों में शास्त्रीय संगीत की पृष्ठभूमि पर आधारित ही प्रसंग था। फि र वो लोग मुझे जानते भी थे। इसलिए उन्होंने मुझे चुना तो मुझे हट के कुछ नहीं करना पड़ा। शशि कपूर की 'विजेता' फि ल्म में रेखा ''भीनी-भीनी भोर आई'' गीत में अपने उस्ताद से संगीत सीख रही है। वहीं फिल्म 'लेकिन' में हेमा मालिनी के मुजरे के दौरान ''झूठे नैना बोले सांची बतिया'' गीत में उस्ताद जी भी साथ दे रहे हैं। ये 'झूठे नैना' वाली बंदिश मेरी ही तैयार की हुई थी। इन दोनों गीतों में मैनें आशा भोंसले के साथ पाश्र्वगायन किया। वहीं 1996-97 में आई मराठी फि ल्म 'हे गीत जीवनाची' भी शास्त्रीय संगीत की पृष्ठभूमि पर बनी थी। जिसमें मैनें लता मंगेशकर के साथ पाश्र्वगायन किया। इसके बावजूद फिल्मों में गाना मेरे लिए कोई बहुत ''ग्रेट'' चीज नहीं है। 
0 शास्त्रीय संगीत के बहुत से कलाकार फि ल्मों से दूर रहना पसंद करते हैं, इसकी क्या वजह है? 
00 पहली बात तो अब ऐसी फि ल्में नहीं बनती जिसमें हमारे शास्त्रीय संगीत के लिए ठीक-ठाक भी गुंजाइश हो। फि र जिसे एक मुक्त इंप्रोवाइजेशन का चस्का लग जाए यानि कि आप एक रटा हुआ फ ार्मूला पेश नहीं कर रहे हैं और अपने संगीत को हर बार अलग-अलग ढंग से पेश कर रहे हैं तो आपको फिल्मों के ऐसे पूर्व निश्चित 3-4 मिनट के गाने में रूचि नहीं रहेगी। किशोरी अमोणकर को भी तो ऐसे मौके आए थे पर उनका मन नहीं लगा। मुझे भी नहीं लगता कि मैं किसी प्रोड्यूसर के पास जाउं या उनको बुलाऊं या उनसे संबंध रखूं, जिससे वो मुझे भी प्लेबैक दें। प्लेबैक से मुझे कोई फ र्क नहीं पड़ता। मैं अपनी बात नहीं कहता। हर शास्त्रीय संगीत के कलाकार को फिल्मों का आकर्षण होता ही नहीं है। 
0 लेकिन फिल्मी गायन को लेकर आप जैसे कलाकारों में इतनी तल्खियां क्यों है ?
00 हमारे यहां फिल्मों में आज कल जो चेहरे दिखते हैं उन पर तो भले आदमियों की आवाज सूट नहीं होगी। मैं नाम नहीं लूंगा लेकिन फि ल्मी संगीत में जो आज के दौर में हैं, ऐसे लोगों की जीवन शैली में ही संगीत नहीं है। आज विडम्बनाएं बहुत सी हैं। मेरे मित्र सुरेश वाडेकर कितना सुरीले गाने वाले हैं लेकिन आज उनको कोई काम नहीं है। ये अलग बात है कि सुरेश वाडेकर अपना विद्यालय चलाते हैं और संगीत शिक्षण में व्यस्त हैं। उनका आनंद इसी में है। 
0 टेलीविजन चैनलों पर संगीत के रियालिटी शो को आप किस नजरिए से देखते हैं? 
सैयद हैदर रजा के हाथों रजा सम्मान प्राप्त करते हुए
00 मेरी समझ में नहीं आता कि इन रियालिटी शो में बैठे ज्यादातर निर्णायकों को ऐसा क्यों लगता है कि गाना यानि किसी की हू ब हू नकल करना है। होना तो ये चाहिए कि अगर रफ ी साहब या लता जी का गाना है तो उसे आप प्रतियोगी के तौर पर कैसे गाते हैं। अब जो जज बैठे होते हैं वे भी कहते हैं कि लता जी की तरह उसने अच्छा गाया। ये तो नकल की बात हुई ना,आपकी अपनी बात कहां आई इसमें? ऐसा इसलिए है कि ये जो जज बनाए गए हैं, वे इन प्रतियोगियों से उम्र में ज्यादा और थोड़े बेहतर हैं। इसके अलावा क्या है इनके पास? जरूरी नहीं कि ये उन प्रतियोगी बच्चों से ज्यादा टैलेंटेड हों। 
0 लेकिन टेलीविजन चैनल भी तो श्रोताओं तक पहुंचने का माध्यम है? 
00 बिल्कुल है और मैं इन चैनलों की भूमिका से इनकार नहीं कर रहा हूं। मैं दरअसल रियालिटी शो की रियालिटी पर बात कर रहा था। वैसे मैं बताऊं अढ़ाई महीना पहले ठीक दीवाली के दिन जब लोग पटाखों और रोशनाई में वक्त बिताना चाहते हैं, तब 'जी मराठी' ने मेरे डेढ़ घंटे के दो सेशन टेलीकास्ट किए। इसके बाद मुझे हजारों लोगों की प्रतिक्रियाएं आई। सोशल मीडिया में बधाई मिली। तो मैं मानता हूं कि सैटेलाइट चैनल भी श्रोताओं तक पहुंचने का बड़ा माध्यम है। 
0 अपने अब तक के संगीत जीवन को किस तरह परिभाषित करना चाहेंगे? कुल जमा हासिल और आगे की चाहत? 
00 महान संगीतकार पं. विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी ने अपना गायन प्रदर्शन छोड़ कर शास्त्रीय संगीत के प्रचार कार्य के लिए खुद को समर्पित कर दिया था। लेकिन हमारी पीढ़ी के लोग ऐसा नहीं कर पाए। हम लोगों ने अपने तरीके से शास्त्रीय संगीत को पल्लवित करने में योगदान दिया। मैं संगीत पर कुछ लिख पाया हूं। खुद को अभिव्यक्त करने मैनें संगीत को माध्यम बनाया। मैं कुछ प्रमुख रागों की रचना कर पाया हूं, जिसे मेरे समकालीन और नई पीढ़ी के लोग गाते हैं। ये अच्छी बात है कि वे लोग मेरी नकल नहीं करते हंै। मेरा मानना है कि हमारी बंदिशों में वो गुण होना चाहिए कि आप उसे अपने तरीके से गा सकें। उम्र के इस पड़ाव में भी मैं वही राग फिर से गाऊं और उसमें मुझे कुछ नया दिखता है, तो मैं गाता रहूंगा और जिस दिन मुझे नई बात नहीं दिखेगी तो नहीं तो गाना बंद कर दूंगा। 

Tuesday, December 27, 2016

  21 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरता है हमारा अंकित

समूचे छत्तीसगढ़ से इकलौता फाइटर पायलट, दीक्षांत में मिला स्वार्ड आॅफ आॅनर और प्रेसीडेंट प्लॉक, प्रशिक्षण में तमाम प्रतिस्पर्धाओं में देश भर के जवानों को पछाड़ कर रहा अव्वल, परेड का नेतृत्व भी किया


  इंटरव्यू के दौरान 
भिलाई नेहरू नगर निवासी अंकित अग्रवाल भारतीय वायु सेना में फाइटर पायलट बन गए हैं। अंकित समूचे छत्तीसगढ़ से इकलौते युवा हैं, जिन्होंने डेढ़ साल के कठोर प्रशिक्षण के बाद अपनी मंजिल पा ली है।
 दिसंबर-16 बैच में शामिल देश भर के 110 फ्लाइंग आफिसर्स के बीच विभिन्न प्रतिस्पर्धा में प्रथम रहने की वजह से पिछले सप्ताह हैदराबाद में हुई कमीशनिंग (दीक्षांत) के दौरान परेड का नेतृत्व करने का अवसर भी अंकित को मिला। उनकी इस उपलब्धि पर माता-पिता खुद को बेहद गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं।
कमीशनिंग परेड के बाद विधिवत फाइटर पायलट बन चुके अंकित हफ्ते भर की छुट्टी पर घर आए हुए हैं। वायुसेना में जाने की अपनी यात्रा का जिक्र करते हुए अंकित ने बताया कि एमजीएम सेक्टर-6 से स्कूलिंग के बाद उन्होंने नागपुर यूनिवर्सिटी से मेकेनिकल में डिग्री की पढ़ाई की और इसके बाद  इंस्टीट्यूट आॅफ मैनेजमेंट टेक्नालॉजी (आईएमटी) गाजियाबाद में एमबीए में दाखिला ले लिया था। इसी दौरान वायुसेना में सेवारत कजिन सुमीत अग्रवाल ने सर्विस सलेक्शन बोर्ड (एसएसबी) की जानकारी दी और तत्काल आवेदन करवाया।फिर एयरफोर्स कॉमन एप्टीट्यूट टेस्ट हुआ। जिसमें सफलता के बाद हफ्ते भर का इंटरव्यू मैसूर में हुआ। इसके बाद जुलाई 15 से अगले डेढ़ साल कठोर प्रशिक्षण में बीते और पिछले सप्ताह 17 दिसंबर को हैदराबाद के डुंडीगल स्थित एयरफोर्स अकादमी में कमिशनिंग परेड हुई। जिसमें फायटर पायलट का ओहदा मिला।
  अंकित अपने माता-पिता के साथ एयरफोर्स अकादमी में 
अंकित ने बताया कि स्कूल अथवा कॉलेज की पढ़ाई करते हुए उन्होंने कभी भी नहीं सोचा था कि एक दिन वो फाइटर पायलट बनेंगे, इसलिए सबकुछ अचानक हुआ और इसमें सबसे ज्यादा परिवार का सपोर्ट रहा। अंकित के मुताबिक वायुसेना में शामिल होने से पहले उन्होंने कभी हवाई सफर तक नहीं किया था लेकिन अब वह स्विटजरलैंड में बना पिलेटस पीसी-7 और अपने ही देश में बना किरण एमके 1/1ए लड़ाकू विमान सफलतापूर्वक उड़ा चुके हैं।
अंकित की इस सफलता से माता-पिता बेहद अभिभूत हैं। पेशे से व्यवसायी उनके पिता योगराज अग्रवाल कहते हैं-हमारे पूरे खानदान को गौरवान्वित किया है बेटे ने। अब ईश्वर से और क्या मांगे ? वहीं उनकी मम्मी सरोज अग्रवाल कहती हैं-बेटे की सफलता हमारे जीवन का सबसे अनमोल उपहार है। बेटा देश की सेवा करेगा और हमें क्या चाहिए।अंकित के छोटे भाई नितिन अग्रवाल इन दिनों नई दिल्ली में रहकर यूपीएससी की तैयारी कर रहे हैं।
श्रीलंका के वायुसेना प्रमुख के हाथों में मिले प्रतिष्ठित सम्मान
''हरिभूमि'' 27 दिसंबर 2016
अंकित अग्रवाल भिलाई और छत्तीसगढ़ से पहले फाइटर पायलट है। छह माह पूर्व भिलाई से फ्लाइंग आॅफिसर अमितेश हरमुख हुए हैं। लेकिन वह फाइटर पायलट नहीं है। अंकित की उपलब्धि इसलिए भी उल्लेखनीय है कि उन्होंने उन्होंने प्रशिक्षण के दौरान विभिन्न प्रतिस्पर्धाओं में भी प्रथम स्थान पाया है। जिससे कमीशनिंग परेड के दौरान सम्मान स्वरूप  राष्ट्रपति की पट्टिका (प्रेसीडेंट्स प्लॉक),भारतीय वायुसेना की विंग्स (प्रतीक) और भारतीय वायुसेना प्रमुख की तलवार (स्वार्ड आॅफ आॅनर) मुख्य अतिथि श्रीलंका एयरफोर्स के कमांडर एयरमार्शल केवीबी जयमपति के हाथों अंकित को प्रदान की गई। इसके साथ ही अपने लड़ाकू विमान से हवा में करतब दिखाने में भी अव्वल रहे अंकित को कमीशनिंग परेड के दौरान प्रतिष्ठित राजाराम ट्रॉफी प्रदान की गई। यह सारे सम्मान पाने वाले अंकित अपने बैच के इकलौते फाइटर पायलट हैं।
21 हजार फुट की ऊंचाई पर फाइटर विमान अकेले उड़ाने का रोमांच
फाइटर प्लेन के पास माता-पिता के साथ
अंकित अग्रवाल को विभिन्न फाइटर प्लेन उड़ाने का मौका मिला है और आगे भी मिलेगा। आसमान में उड़ने का रोमांच बताते हुए उनकी आंखें चमक उठती हैं। अंकित बताते हैं-पहली बार जब फाइटर प्लेन में बैठा तो साथ में संधू सर थे। दिल की धड़कन भी बढ़ी हुई थी। संधू सर ने कहा- खुद को एक पंछी की तरह समझो और बादलों को महसूस करो। इसके बाद तो 16 हजार से लेकर 21 हजार फुट की ऊंचाईं तक विमान बेखौफ उड़ा चुका हूं। खास कर रात के वक्त जब आसमान में आप अकेले होते हैं और चांद-तारों के अलावा कुछ नजर नहीं आता है, ऐसे में फाइटर प्लेन उड़ाने का रोमांच कई गुना बढ़ जाता है।

Saturday, December 24, 2016

क्विज मास्टर बनने कोई स्कूल नहीं, बनना होगा खुद से 

प्रख्यात क्विज मास्टर सिद्धार्थ बसु ने याद किया 37 साल पहले का भिलाई और केबीसी की सफलता बताई

मुहम्मद जाकिर हुसैन/भिलाई
प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान
प्रख्यात क्विज मास्टर सिद्धार्थ बसु का कहना है कि क्विज मास्टर बनने के लिए कोई स्कूल नहीं होता बल्कि इसके लिए आपमें खुद की मेहनत और लगन जरूरी है। करीब 37 साल बाद 16 दिसंबर को भिलाई आए बसु को इस बार हरियाली और बिल्डिंग ज्यादा दिखी। यहां एमजीएम स्कूल में क्विज प्रतियोगिता के होस्ट के तौर पर आए थियेटर-फि ल्म आर्टिस्ट, क्विज मास्टर और कई किताबों के लेखक सिद्धार्थ बसु ने इस संवाददाता से चर्चा करते हुए कौन बनेगा करोड़पति (केबीसी) की सफलता से लेकर कई सवालों के जवाब दिए। 
भिलाई से अब लाल मुरुम के मैदान गायब
सिद्धार्थ ने बताया कि करीब 37 साल पहले वह भिलाई स्टील प्लांट पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने अपनी टीम लेकर आए थे। तब रायपुर एयरपोर्ट से भिलाई पहुंचते वक्त दूर-दूर तक लाल मुरुम के मैदान नजर आ रहे थे और थोड़ी बहुत हरियाली भी थी। अब आया हूं तो बड़ी-बड़ी बिल्डिंग और काफी ग्रीनरी दिखाई दे रही है। कार्यक्रम के बाद मैं भिलाई घूम कर अपनी 37 साल पुरानी यादों को जरूर ताजा करना चाहूंगा। 
मैनें काम और शौक को कभी अलग नहीं किया
थियेटर,आकाशवाणी, फिल्म, क्विज, लेखन सहित अनेक विधाओं में लगातार सक्रियता के संबंध में सिद्धार्थ बसु ने कहा कि उन्होंने जीवन में अपने शौक और काम को कभी भी अलग नहीं किया। इस वजह से थियेटर भी खूब किया। डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाई और दूरदर्शन के दौर में क्विज टाइम की शुरूआत की। फिर सैटेलाइट चैनलों का दौर आया तो ढेर सारे दूसरे प्रोग्राम के साथ-साथ ‘कौन बनेगा करोड़पति’ लेकर हम लोग आ गए। काम अभी भी ढेर सारा कर रहे हैं लेकिन सब कुछ अपने मन का ही करते हैं। 
 ऑटोग्राफ की गुजारिश
 पूरी हो रही है
फिल्में मैं शाहरूख के लिए छोड़ चुका
सिद्धार्थ ने मजाकिया लहजे में कहा कि फिल्मों में वह हाल के कुछ सालों में आए हैं, वह भी तब जबकि वह 60 के हो चुके हैं। उन्होंने हंसते हुए कहा-मैं चाहता तो पहले भी फिल्में कर सकता था लेकिन मैनें फिल्में शाहरूख के लिए छोड़ दी। आखिरकार थियेटर में हम दोनों के गुरु एक ही शख्स बैरी जॉन थे। सिद्धार्थ ने बताया कि शुजीत सरकार की ‘मद्रास कैफे’ में रॉ अफसर से लेकर मलयाली में रोशन एंड्र्यू की सुपरहिट मूवी ‘हाऊ ओल्ड आर यू?’ में राष्ट्रपति तक की भूमिकाएं कर चुके हैं। अभी भी फिल्में वह बहुत कम करते हैं। 
खुद दुविधा में थे अमिताभ भी 
सिद्धार्थ बसु ने ‘कौन बनेगा करोड़पति’ से जुड़े कई सवालों के जवाब दिए। उन्होंने बताया कि 16 साल पहले जब इस क्विज कार्यक्रम को डिजाइन किया गया तो अमिताभ बच्चन को लेने का फैसला किसी एक का नहीं बल्कि पूरी टीम का था लेकिन खुद अमिताभ बच्चन भी दुविधा में थे। उन्होंने करीब 3.5 महीने हां बोलने में लगा दिए। नतीजा सबके सामने था अमित जी बड़े परदे से छोटे परदे पर आए और छोटा परदा सचमुच में काफी बड़ा हो गया। 
..और मिल गया आटोग्राफ
ध्यान रखते हैं फिर भी गलतियां संभव
सिद्धार्थ ने बताया कि केबीसी में पूछे जाने वाले सवाल और जवाब में पूरी सावधानी बरती जाती है और कोशिश ‘जीरो एरर’ की होती है। इसके बावजूद कुछ एक सवाल-जवाब पर सवाल उठे थे। हमनें वहां अपनी गलती स्वीकार की। हमारे पास हर सवाल और उसके जवाब को क्रास चेक करने पूरी टीम है। उन्होंने बताया कि केबीसी का अगला सीजन फिलहाल सोनी चैनल पर निर्भर है। 
भारत भाग्य विधाता कौन यह रवींद्रनाथ बता चुके 
सिद्धार्थ बसु ने क्विज से जुड़े सवालों पर एक संदर्भ देते हुए कहा कि ज्यादातर लोग राष्ट्रगान जनगणमन को संस्कृत का समझते हैं लेकिन यह है बांग्ला में। वह भी साधु कम्युनिटी में बोली जाने वाली बांग्ला में। जब रवींद्रनाथ ठाकुर ने यह गान रचा तो तब से अब तक कई बार लोग यह स्थापित करने की कोशिश करते हैं कि इसमें भारत भाग्य विधाता के रूप में अंग्रेजी राजा जार्ज पंचम को संबोधित किया गया है। जबकि वास्तविकता यह है कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपनी जीवन काल में ही स्पष्ट कर दिया था कि उनका भारत भाग्य विधाता Al Mighty GOD (सर्वशक्तिमान परमेश्वर) है। 
बोकारो प्रथम, राउरकेला द्वितीय और इटारसी की टीम तृतीय रही
हम साथ-साथ हैं 
कलकत्ता डायोसियन मिशन एजुकेशन बोर्ड द्वारा एमजीएम स्कूल सेक्टर-6 में राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त मास्टर सिद्धार्थ बसु के तत्वाधान में प्रथम अंतर एम.जी.एम. स्कूल क्विज प्रतियोगिता का आयोजन शुक्रवार को किया गया। जिसमें एमजीएम ग्रुप के स्कूलों से 9 स्कूलों की टीम शामिल हुई। इस अवसर के मुख्य अतिथि अमरेष कुमार मिश्रा, पुलिस अधीक्षक दुर्ग थे। विशिष्ट अतिथि वेरी रेव्ह.फादर जार्ज मैथ्यू रम्बान, रेव्ह फादर पीटी थामस, रेव्ह फादर जोशी वर्गीस, रेव्ह.फादर जोस के वर्गीस, रेव्ह.फादर कूरियन जॉन, कॉरस्पोडेंट राजन मैथ्यू, गिलसन थॉमस, सुरेश जेकब, टी.जी. मनोज.रॉय थॉमस, सी.व्ही. जॉन   चर्च एवं शाला प्रबंधन कमेटी के सदस्यगण ,एमजीएम ग्रुप स्कूल के प्राचार्यगण, शाला के शिक्षकगण एवं अन्य सदस्यगण व छात्र-छात्राएँ उपस्थित थे। विद्यालय की प्रभारी सुजया कुमारी ने स्वागत में भाषण दिया तथा मुख्य अतिथि अमरेश कुमार मिश्रा ने सभा को उद्बोधित किया। शाला के छात्र-छात्राओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। इस प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त एमजीएम बोकारो को नगद पुरस्कार के रूप में 10001 रूपए व प्रशस्ति पत्र, द्वितीय स्थान प्राप्त एमजीएम राउरकेला को नगद पुरस्कार 7001 रूपए व प्रशस्ति पत्र तथा तृतीय स्थान प्राप्त एमजीएम इटारसी को नगद पुरस्कार 5001 रूपए व प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया। कार्यक्रम के अंत में मुख्य अतिथि को स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया। वेरी रेव्ह.फादर जार्ज मैथ्यू रम्बान द्वारा धन्यवाद ज्ञापित किया गया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।