Thursday, December 31, 2020

तब 1930 में शुक्ल परिवार भिलाई में बनाने 
जा रहा था टाटा की तरह निजी स्टील प्लांट


भिलाई में स्टील प्लांट की दमदारी से पैरवी कर 
रविशंकर ने पूरा किया था अपने भांजे का सपना



बूढ़ापारा रायपुर स्थित निवास में रमेशचंद्र शुक्ल के साथ 
भिलाई में स्टील प्लांट लगाने के लिए तत्कालीन सेंट्रल प्राविंस एंड बरार प्रांत के मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल ने जो दृढ़ता दिखाई थी, उसके पीछे एक मजबूत आधार उनके दिवंगत भांजे की एक अध्ययन रिपोर्ट थी। 

दरअसल भिलाई में निजी स्टील प्लांट लगाने की योजना शुक्ल के भांजे बालाप्रसाद तिवारी की थी लेकिन इस भांजे की असमय मौत के चलते योजना पर 1920-30 के दौर में अमल नहीं हो पाया, फिर स्वतंत्र भारत में शुक्ल ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समक्ष दृढ़ता से भिलाई के दावे को रखा और तब कहीं भिलाई में स्टील प्लांट की स्थापना हो पाई।

31 दिसंबर को रविशंकर शुक्ल की पुण्यतिथि के मौके पर उनके पौत्र रमेशचंद्र शुक्ल ने यह रोचक जानकारी एक मुलाकात के दौरान दी। रविशंकर शुक्ल के बड़े बेटे अंबिकाचरण शुक्ल के सुपुत्र रमेशचंद्र शुक्ल अपने बूढ़ापारा रायपुर स्थित पैतृक निवास में रहते हैं। 

आज भी उनके निवास में स्व. रविशंकर शुक्ल के दौर की कई दुर्लभ निशानी मौजूद है। यहां 12 दिसंबर 2020 की दोपहर मेरी उनसे उनके निवास पर मुलाकात हुई। उनके कमरे में दीवार पर स्व. शुक्ल की बड़ी सी तस्वीर लगी है।

वहीं बीते दौर का रेडियो, रिकार्ड प्लेयर, बेल रिकार्डर से लेकर बाद के दौर के टेप रिकार्ड और वीसीआर भी मौजूद हैं। इन दुर्लभ निशानियों के बीच 85 वर्षीय रमेशचंद्र शुक्ल ने अपने दादा (जिन्हें वह 'बाबा' कहते हैं) पर विस्तार से बातचीत की। इस दौरान उन्होंने जो कुछ कहा, सब उन्हीं के शब्दों में- 


टाटा की रिपोर्ट के आधार पर योजना बनाई थी बालाप्रसाद ने 

एक जुलाई 1956 को भिलाई स्टील प्रोजेक्ट निर्माण स्थल सोंठ गांव में रविशंकर शुक्ल 

तब भिलाई में टाटा के स्तर का विशाल निजी स्टील प्लांट लगाने की तैयारी हमारे परिवार की थी। हमारे बाबा के भांजे बालाप्रसाद तिवारी तब टाटा स्टील में इंजीनियर थे और उनके पास 1888 से 1905 की अवधि में दल्ली राजहरा से रावघाट तक भारतीय भू-सर्वेक्षण विभाग (जीएसआई) व टाटा स्टील द्वारा कराए गए सर्वे की पूरी रिपोर्ट थी। 

तब 1905 तक टाटा स्टील ने यहां स्टील प्लांट इसलिए नहीं लगाया था क्योंकि यहां आसपास पानी का कोई बड़ा बांध जैसा स्त्रोत नहीं था। हालांकि इसके बाद 1920 आते-आते तांदुला बांध बना।

इस दौर में बालाप्रसाद तिवारी टाटा स्टील से छुट्टी लेकर अक्सर रायपुर आते थे। यहां से उन्होंने दल्ली राजहरा तक पूरा सर्वे किया था और भिलाई गांव के आस-पास निजी स्टील प्लांट स्थापित करने रिपोर्ट तैयार की थी।


हो चुकी थी वित्तीय व्यवस्था और दूसरी तैयारी भी 

शुक्ल निवास में पुराना रेडियो और बेल टेप रिकार्डर 

तब तक हमारे बाबा भी देश के राजनीतिक परिदृश्य में स्थापित हो चुके थे। ऐसे में हमारा परिवार इस स्टील प्लांट को लेकर बेहद उत्साहित था। 
सब कुछ टाटा के स्तर का होने जा रहा था। वित्तीय व्यवस्था और दूसरी तैयारी भी हो चुकी थी लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था।1930 में बेहद कम उम्र में नौजवान बाला प्रसाद तिवारी की आकस्मिक मृत्यु हो गई।
हमनें अपने पिता अंबिकाचरण शुक्ल से कई बार सुना था कि बाबा अपने सभी बच्चों से भी ज्यादा अपने भांजे बालाप्रसाद को चाहते थे। बालाप्रसाद की शख्सियत बिल्कुल अंग्रेजों जैसी थी। बाबा जहां 6 फीट 1 इंच ऊंचे थे तो उनके भांजे उनसे भी 2 इंच ऊंचे थे। 

भांजे की मौत ने कर दिया था दुखी, मेहता ने निभाई अहम भूमिका 

शुक्ल को भिलाई का ब्ल्यूप्रिंट दिखाते श्रीनाथ मेहता

जब बालाप्रसाद तिवारी की आकस्मिक मौत हुई तो हमारे बाबा इतने ज्यादा दुखी हुए कि उन्होंने अपना सिर दीवार पर दे मारा था। 

बालाप्रसाद तिवारी की वह सर्वे रिपोर्ट यहीं बूढ़ापारा रायपुर के निवास में सुरक्षित थी लेकिन बाद के दौर में हमारे चाचा विद्याचरण शुक्ल के लोगों ने इस रिपोर्ट का महत्व नहीं समझा और उसे रद्दी में फिंकवा दिया।

वैसे इसी रिपोर्ट के आधार पर हमारे बाबा ने अपने विश्वस्त आईसीएस आफिसर श्रीनाथ मेहता से विस्तृत सर्वे करवा कर तीन वाल्यूम में रिपोर्ट तैयार करवाई थी।

जिसके आधार पर उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समक्ष भिलाई के दावे को मजबूती से रखा था। मेहता को उनके इसी उल्लेखनीय कार्य की वजह से भिलाई स्टील प्रोजेक्ट का पहला जनरल मैनेजर बनाया गया।


बाबा ने कहा था-'भिलाई' लेकर लौटूंगा नहीं तो मेरी लाश आएगी

हमारे बाबा मध्य भारत में लगने वाले स्टील प्लांट के लिए भिलाई के दावे को लेकर इस कदर आश्वस्त थे कि उन्होंने इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सामने भी जिद पकड़ ली। 

सीपी एंड बरार के मुख्यमंत्री बनते ही बाबा ने भिलाई के पक्ष में श्रीनाथ मेहता से नए सिरे से दावा रिपोर्ट तैयार करवाई। इस बीच प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मध्य भारत का स्टील प्लांट विभिन्न वजहों से कुछ माह टालने की मन:स्थिति में थे। वह दुर्गापुर का काम पहले शुरू करवाना चाहते थे।

तब मध्यभारत में अलग-अलग जगह से स्टील प्लांट लगाने की मांग भी उठ रही थी और कुछ लोग इसे विवादित करवा कर पूरी योजना ही ठंडे बस्ते में डलवाना चाह रहे थे। बाबा को यह सब पता लगा तो अपने सेक्रेट्री श्रीनाथ मेहता बुलाया और रातों-रात टेलीप्रिंटर पर अपने प्लान को फिर से तैयार करवा कर दिल्ली भिजवाया। इसके बाद मेहता को लेकर वह दिल्ली गए। 

जाने से पहले बाबा अपने परिवार और विधायकों के बीच बोलकर गए थे कि-''मैं भिलाई स्टील प्रोजेक्ट मंजूर करवा कर लौटूंगा नहीं तो दिल्ली से मेरी लाश आएगी।'' दिल्ली में वह प्रधानमंत्री से मिले और उन्हें बताया कि-मध्य भारत सबसे पिछड़ा इलाका है और यहां के विकास के लिए सबसे पहले भिलाई गांव के पास ही प्लांट लगना चाहिए। नेहरू उनकी दलीलों से सहमत हुए और इस तरह भिलाई स्टील प्रोजेक्ट को सबसे पहले मंजूरी मिली।

बाबा हमेशा पक्षधर थे माटीपुत्रों के 

भिलाई निर्माण स्थल में शुक्ल, साथ में हैं पुरतेज सिंह

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट मंजूर होने के बाद नए मध्यप्रदेश का गठन एक नवंबर 1956 को हुआ तो बाबा इसके पहले मुख्यमंत्री हुए और वे भिलाई के काम को लेकर बेहद उत्साहित थे।
उन्होंने श्रीनाथ मेहता और पुरतेज सिंह समेत अपने सर्वश्रेष्ठ अफसरों को यहां डेप्युटेशन पर पहले ही भेज दिया था। जिससे कि भिलाई का काम पूरी गति से हो।

सीपी एंड बरार के मुख्यमंत्री रहते हुए बाबा 1 जुलाई 1956 को निर्माण कार्य का जायजा लेने भिलाई आए थे। बाबा हमेशा कहते थे कि भिलाई कारखाने में रोजगार का पहला हक मध्यप्रदेश के माटीपुत्रों का है। इसके लिए उन्होंने नियम भी बनवाने की कोशिश की कि 80 प्रतिशत माटीपुत्र और 20 प्रतिशत अन्य राज्य के लोगों को नौकरी मिलेगी।

लेकिन तब के अफसरों की लॉबी ऐसा नियम बनने नहीं देना चाहती थी। वहीं भिलाई में बैठे कुछ अफसर जानबूझ कर स्थानीय लोगों को सरप्लस बताते हुए उनकी छंटनी भी कर देते थे।

इसी बीच 31 दिसंबर 1956 को बाबा का निधन भी हो गया। तब हम लोग सुनते थे कि इसी मुद्दे पर भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के पहले जनरल मैनेजर श्रीनाथ मेहता ने इस्तीफा दे दिया था।

श्रीनाथ मेहता एक बहुत ही सुलझे हुए काबिल अफसर थे। मुझे याद है उन्हें कुत्ते पालने का बड़ा शौक था। एक दफा भिलाई में 32 बंगले में उनसे मिलने विद्याचरण शुक्ल के साथ मैं भी गया था। तब उनके बंगले के बरामदे 6-7 कुत्ते घूम रहे थे। 

नौजवानों से भी ज्यादा फुर्तीले थे रविशंकर शुक्ल 

नए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए शुक्ल

एक बार ऐसा हुआ कि बाबा, हम, हमारे चाचा गिरिजा चरण नागपुर से रायपुर आ रहे थे।

 तब हम नागपुर में लॉ कॉलेज में पढ़ रहे थे। बाबा सुबह ४ बजे से उठ जाते थे और नहा धो कर पूजा व ध्यान के साथ चंदन टीका लगाकर अपनी छड़ी और दुपट्टा लेकर निकलते थे।

तब बाबा मुख्यमंत्री के  तौर पर अमरावती-अकोला का दौरा करके नागपुर आए और हम चाचा- भतीजा को साथ लेकर रायपुर के लिए सड़क से रवाना हुए। मुझे याद है तब  हम लोग रात २ बजे राजनांदगांव पहुंचे।

 वहां बाबा की प्रशासनिक बैठक थी और जनसामान्य से भी उन्हें मिलना था। रास्ते भर बाबा ड्राइवर को टोकते  जा रहे थे कि-तुम हमको देर कराओगे जरा जल्दी चलाओ। हम लोग जब रात को 2 बजे पहुंचे तो रेस्ट हाउस में आराम कुर्सी दिख गई।

हम और हमारे चाचा जवान होने के बावजूद थक के चूर हो चुके थे। इसलिए दोनों आराम कुर्सी में निढाल होकर गिर गए। जबकि दूसरी तरफ हमारे बाबा एकदम तरोताजा दिखाई दे रहे थे।

हम लोगों को झपकी आ रही थी तो उन्होंने ताड़ लिया और पुलिस वालों को बोले कि ये लड़के थोड़ा आराम कर लें। जब तक मैं मीटिंग में हूं, मुझे इतनी सिक्योरिटी की जरूरत नहीं है, तुम इन्हें लेकर आ जाना, मैं अपनी गाड़ी में चलता हूं। इसके बाद बाबा चले गए।

अपने आलोचक के लिए सह्रदयता थी उनके दिल में 

भिलाई में प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के हाथों प्रतिमा अनावरण 28 जनवरी 2002

बाबा जब मुख्यमंत्री थे तो उन दिनों राजनांदगांव में एक बड़े वामपंथी नेता रूइकर हुआ करते थे। रूइकर यहां बंगाल नागपुर कॉटन (बीएनसी) मिल में श्रमिक राजनीति करते थे लेकिन मध्यप्रदेश और पूर्ववर्ती सीपी-बरार की राजनीति में भी उनका अच्छा खासा दखल था।
उनकी राजनीतिक शैली ऐसी थी कि वह हमेशा बाबा को खूब बुरा कहते थे। हर बात पर वह बाबा को कटघरे में खड़ा करते थे। उस रात जब हम लोग राजनांदगांव सर्किट हाउस से बाबा की बैठक की जगह पहुंचे तो वहां मैनें देखा कि रूइकर की पत्नी आई हुई है। वह बाबा से मिली और बेहद दुखी होकर बताया कि उनके पति की राजनीति की वजह से घर में फाके पड़ रहे हैं।

सब कुछ सुन कर बाबा बेहद दुखी हो गए और अपने सेक्रेट्री से बोले लाओ मेरी चेक बुक। तुरंत उन्होंने 5 हजार रूपए का चेक काटकर रूईकर की पत्नी को दिया और बोले-बेटी, तुम घबराओ मत मैं अभी हूं और जरूरत पड़े तो मुझे संपर्क करना। तब हम लोग बड़े हैरान थे कि जो आदमी उनको हमेशा गाली बकता रहता है, उसके परिवार के साथ बाबा इतनी उदारता का व्यवहार कर रहे हैं।

बाबा के आदर्श अनुकरणीय थे। भिलाई की स्थापना में उनका योगदान हमेशा याद किया जाएगा। 28 जनवरी 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री  अटल बिहारी बाजपेयी ने भिलाई के सेक्टर-9 में बाबा की प्रतिमा का अनावरण किया था। यह बाबा के योगदान को नमन करने का एक स्तुत्य प्रयास था। 

विद्याचरण और मिनीमाता ने भी स्थानीयता की आवाज उठाई

विद्याचरण शुक्ल-मिनी माता

बाबा रविशंकर शुक्ल के निधन के बाद के दिनों में विद्याचरण शुक्ल और मिनीमाता संसद में छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, तब इन दोनों सांसदों ने भिलाई सहित तमाम उद्योगों में स्थानीय लोगों की नौकरी सुरक्षित रखने आवाज उठाई थी।

दोनों सांसद भी चाहते थे कि सार्वजनिक उपक्रमों में 80 प्रतिशत भर्ती स्थानीय हो। इसके विपरीत भिलाई मेें तो स्थानीय लोगों की उपेक्षा हो रही रही थी वहीं 1966 में कोरबा में शुरू हुई भारत एल्युमिनियम कंपनी (बाल्को) में तो अफसरों ने मिल कर इस नियम को ही उल्टा कर दिया। वहां 20 प्रतिशत स्थानीय और 80 प्रतिशत अन्य राज्यों से भर्ती होने लगी।

तब मिनीमाता ने इसका पुरजोर विरोध किया था। हालांकि बाल्को में उत्पादन शुरू होने के दौर में मिनीमाता स्थानीय लोगों को नौकरी दिलाने आवाज उठा रही थीं। 

 इसी बीच 1972 में मिनीमाता का एक प्लेन क्रैश में निधन हो गया। बाद के दिनों में मैनें भी रेलवे में स्थानीय भर्ती की मांग को लेकर आंदोलन किया था। हमारा आंदोलन डब्ल्यूआरएस कालोनी में चला था।

हरिभूमि में प्रकाशित मेरी स्टोरी 

 


Wednesday, December 16, 2020

 तनाव से भरे थे वह अढ़ाई घंटे, जब हमनेें 
बंगबंधु मुजीब को सुरक्षित ढाका पहुंचाया


 16 दिसंबर विजय दिवस पर विशेष 


बांग्लादेश निर्माण के बाद बंगबंधु शेख मुजीब को ढाका लेकर 
गई भारतीय टीम में शामिल थे एयरफोर्स जवान वीके मुहम्मद 


वायुसेना के जवान वीके मुहम्मद तब और अब
16 दिसंबर हर भारतीय के लिए गौरव का दिन रहता है, जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की दृढ़ इच्छाशक्ति की बदौलत देश की सेना ने अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए एक नए देश बांग्लादेश के निर्माण में सार्थक भूमिका निभाई। 

16 दिसंबर 1971 को भारत के साथ बुरी तरह हारने के बाद पाकिस्तान की सेना ने अपने 94 हजार पाकिस्तानी सैनिक, छह महिने के राशन और 8 महिने के युद्ध के हिसाब से असलाह व हथियार के साथ आत्मसमर्पण कर दिया था।

 भारत-पाक युद्ध की इस गौरव गाथा की एक कड़ी इस्पात नगरी भिलाई में भी है। कम ही लोग जानते हैं कि बांग्लादेश निर्माण के बाद बंगबंधु शेख मुजीब को सुरक्षित ढाका पहुंचाने में वैशाली नगर भिलाई में निवासरत वायुसेना के जवान वीके मुहम्मद ने एक अहम भूमिका निभाई थी। 

एयरफोर्स से सेवानिवृत्ति के बाद अब स्टील इंडस्ट्री को तरक्की देने में अपनी भूमिका का निर्वहन कर रहे वीके मुहम्मद ने बांग्लादेश युद्ध से जुड़े अपने अनुभव विजय दिवस के मौके पर कुछ इस तरह साझा किए-

1964 में भारतीय वायुसेना में मेरा चयन हुआ और ट्रेनिंग के बाद हेलीकॉप्टर स्क्वाड में ग्राउंड इंजीनियर के तौर पर सेवा की शुरूआत की। इसके बाद 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान देश सेवा का मौका मिला। फिर 1971 के भारत-पाक का युद्ध तो हम लोगों के लिए बिल्कुल नया अनुभव था। जब दो देशों के युद्ध के बाद तीसरे देश बांग्लादेश का निर्माण हुआ।


94 हजार सैनिकों के साथ दुनिया का सबसे बड़ा आत्मसमर्पण

पाकिस्तानी फौज का आत्मसमर्पण 16 दिसंबर 1971
भारत और पाकिस्तान के बीच 3 दिसंबर 1971 को शुरू हुआ युद्ध 16 दिसंबर 1971 को अपनी परिणति पर पहुंचा। जब फील्ड मार्शल मानेकशॉ ने पाकिस्तानी फौज को हमारी भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण को मजबूर कर दिया। 

पाकिस्तानी जनरल अमीर अब्दुल्लाह खां नियाजी ने 94 हजार पाकिस्तानी सैनिक, छह महिने के राशन और 8 महिने के युद्ध के हिसाब से असलाह व हथियार के साथ भारतीय पक्ष के मेजर जनरल जगजीत सिंह अरोरा के समक्ष आत्ममर्पण कर दिया। यह तब दुनिया का सबसे बड़ा आत्मसर्पण था। 

इस पूरे युद्ध में हम लोग एमआई-4 श्रेणी के 6 हैलीकॉप्टर के साथ आर्मी को सहायता देने संबद्ध किए गए थे। युद्ध के 7 वें दिन हम लोगों को जख्मी और लहूलुहान जवानों को युद्ध क्षेत्र से सुरक्षित क्षेत्र ले जाने का मौका मिला। 

युद्ध के बारे में एक फौजी होने के नाते मुझे यह बात दुखी करती है कि इस युद्ध के दौरान हमारे भारतीय सैनिकों के बलिदान का कोई आंकलन नहीं किया गया। यहां तक कि स्वतंत्र बांग्लादेश ने भी इस तथ्य को स्वीकार नहीं किया। हालांकि इसके बावजूद हम लोग कंधे से कंधा मिलाकर लड़े। ऐसा मौका दोबारा नहीं आया। यह हमारी नियति थी।


लंदन से दिल्ली होते हुए ढाका ले जाया गया बंगबंधु को

ढाका रवाना होने से पहले शेख मुजीब नई दिल्ली में

16 दिसंबर 1971 को हमारी सेना युद्ध जीत चुकी थी और पाकिस्तानी फौज के आत्मसमर्पण के बाद चारों तरफ जीत का माहौल था लेकिन इसके बाद बांग्लादेश निर्माण में भी भारतीय भूमिका का निर्वहन होना था। तब शेख मुजीब पाकिस्तान में लाहौर जेल में बंद थे। 
उनकी जान के संभावित खतरे को देखते हुए उन्हें पाकिस्तान-बांग्लादेश के बजाए किसी तीसरे देश में भेजने की नीति के तहत उन्हें लंदन भेज दिया गया। इधर बांग्लादेश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलते ही वहां पहली सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई।

 ऐसे में शेख मुजीब को लंदन से ढाका पहुंचाने की जवाबदारी भारतीय पक्ष थी। मुजीब लंदन से सीधे नई दिल्ली पहुंचे तो हम एयरफोर्स के लोग इस पूरे आपरेशन का एक हिस्सा थे। अब हमें दिल्ली से ढाका तक उन्हें सुरक्षित ले जाना था। 

वह 10 जनवरी 1972 का दिन था, जब ढाका जाने के लिए मुजीब भारतीय विमान में सवार हुए। उनके साथ उनके कुछ साथी थे। सभी आपस में बांग्ला में ही बात कर रहे थे।

 इनके साथ भारतीय पक्ष से भी सेना, गुप्तचर ब्यूरो सहित सुरक्षा में लगे लोग भी शामिल हुए। हमारी जवाबदारी मुजीब के इस विशेष विमान को आसमान में सुरक्षा प्रदान करना था। हम लोग अपने हेलीकॉप्टर में सवार हुए और इसके बाद हमारा सफर शुरू हुआ। करीब 2:30 घंटे लगे हमें ढाका पहुंचने में लेकिन यह पूरा समय बेहद तनाव भरा था। हर पल अनहोनी की आशंका थी।

 हालांकि हम सब सुरक्षित ढाका पहुंचे और वहां के एयरपोर्ट पर तो अद्भुत नजारा था। चारों तरफ हजारों की तादाद में लोग अपने बंगबंधु शेख मुजीब का स्वागत करने खड़े थे।

 हम लोगों ने अपनी ड्यूटी पूरी कर वहां से विदा ली और मुजीब अपने बांग्लादेशी लोगों के बीच बड़ी तेजी से बढ़ते चले जा रहे थे। वह नजारा आज भी मैं नहीं भूल पाया।


शिमला समझौता और बेनजीर 

इस युद्ध के बाद 2 जुलाई 1972 को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो और भारतीय प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी शिमला समझौते के लिए इकट्ठा हुए। 

उस घटनाक्रम का भी मैं गवाह रहा हूं। तब मेरी पोस्टिंग शिमला में ही थी। मुझे याद है तब 17 वर्षीय बेनजीर भुट्टो शिमला में बड़े आराम से शॉपिंग करते हुए घूम रही थी। ऐसा लग रहा था कि वो किसी पिकनिक पर आई हैं।

शेख मुजीब और उनके परिवार का दुखद अंत

शेख मुजीब अपने परिवार के साथ 
वीके मुहम्मद बताते हैं कि युद्ध के बाद के घटनाक्रम में भी बांग्लादेश के मामलों में भारतीय सेना की भूमिका महत्वपूर्ण रही। बांग्लादेश के राष्ट्रपति शेख मुजीब के खिलाफ उनका विरोधी गुट वहां की सेना के साथ मिल कर साजिशें रच रहा था। 

इसकी सूचना भारत सरकार को थी और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने निजी तौर पर शेख मुजीब को फोन कर चेताया था कि उन्हें उनकी ही सुरक्षा में लगे लोगों से जान का खतरा है।

 लेकिन शेख मुजीब ने हमेशा इस चेतावनी को हल्के में लेते हुए कहा कि ये सब हमारे बच्चे हैं, ऐसा कुछ नहीं करेंगे। इधर भारत सरकार शेख मुजीब की सुरक्षा को लेकर चिंतित थी।

 ऐसे में हम लोगों को हाई अलर्ट पर रखा गया था। हमें भारत सरकार का निर्देश था कि आपात स्थिति में तत्काल ढाका जा कर शेख मुजीब और उनके परिवार को हिंदोस्तान लाना पड़ सकता है। हमारी एयरफोर्स इसके लिए तैयार थी, हम लोगों की छुट्टिया रद्द कर दी गई थीं।

हम अपने तैयारी में थे लेकिन बदकिस्मती से 15 अगस्त 1975 को सुबह 5:30 से 6 बजे के बीच ढाका के राष्ट्रपति भवन में सेना के लोगों ने ही विद्रोहियों के साथ मिल कर राष्ट्रपति शेख मुजीब,उनकी पत्नी औप तीनों बेटों सहित परिवार के कुल 20 लोगों की हत्या कर दी। 

शेख मुजीब की दो बेटियां लंदन में रह रही थीं, इसलिए दोनों बच गईं। इनमें से बड़ी बेटी शेख हसीना आज बांग्लादेश की प्रधानमंत्री है। इस पूरे घटनाक्रम का एक ददर्नाक संयोग यह है कि 1975 में इंदिरा गांधी की चेतावनी को मुजीब हल्के से ले रहे थे और जब ऐसी ही स्थिति 1984 में भारत में बनीं तो इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के बावजूद खुद इंदिरा गांधी ने अपने अंगरक्षकों को हटाने से इनकार कर दिया था, जिसके चलते वह भी अपनों की गोली का शिकार हुईं।


इंदिरा गांधी के एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर से जाने पर हुआ था हंगामा

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी हेलीकॉप्टर में
वीके मुहम्मद को वायुसेना की सेवा के दौरान देश-विदेश के कई वीवीआईपी के साथ सफर का अनुभव है। लेकिन इनमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ के घटनाक्रम आज  भी   नहीं भूल पाए हैं। वह बताते हैं- 1967 में राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के चुनाव था और इंदिरा जी एयरफोर्स के हेलीकॉप्टर से जयपुर पहुंची। संयोग से इस हेलीकॉप्टर पर मैं तैनात था। इस घटना के बाद संसद से लेकर देश भर में खूब हंगामा हुआ। सवाल उठाए गए कि किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री एयरफोर्स की सेवा कैसे ले सकती हैं ? 

विपक्ष की मांग पर जांच भी शुरू हुई लेकिन बाद में प्रधानमंत्री के तौर पर वायुसेना के हेलीकॉप्टर के इस्तेमाल का नियम बन गया। दूसरी बार कुछ ऐसा हुआ कि वड़ोदरा में पोस्टिंग के दौरान मैं परिवार सहित रह रहा था। 

पत्नी के साथ मुहम्मद बड़ोदरा के दिनों में
पारिवारिक कार्यवश केरल जाने के लिए मैनें छुट्टी का आवेदन दिया तो मेरी छुट्टी सीधे बड़ोदरा के कलेक्टर ने कैंसिल कर दी। 

किसी को कुछ समझ नहीं आया कि एयरफोर्स के जवान की छुट्टी कलेक्टर ने कैसे कैंसिल कर दी।

 फिर बाद में मुझे बताया गया कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बड़ोदरा आ रही हैं और श्रीमती गांधी और मेरी पत्नी का ब्लड ग्रुप एक ही है। पूरे बड़ोदरा में इस ब्लड ग्रुप वाले गिनती के 7 लोग थे और एहतियात के तौर पर हम लोगों को रोका गया था। 

खैर, प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी की ड्यूटी में जब भी मैं रहा, उनके सद्व्यवहार को कभी भूल नहीं पाया। वह हमेशा हेलीकॉप्टर से उतरते वक्त न सिर्फ हाल-चाल पूछती थीं बल्कि भोजन करते वक्त हम लोगों का भी पूरा ख्याल रखती थीं।


दुश्मनों के दो साइबर जेट ध्वस्त कर शहादत पाई थी निर्मलजीत ने

परमवीर चक्र विजेता के सम्मान में जारी डाक टिकट
परमवीर चक्र विजेता शहीद फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह की शहादत को देश आज भी नमन करता है।

 हम एयरफोर्स वाले भी उनकी कुरबानी को भूल नहीं पाए हैं। निर्मलजीत से हम लोगों का बहुत ज्यादा लगाव होने की खास वजह यह थी कि उनके पिता फ्लाइट लेफ्टिनेंट तरलोक सिंघ सेखों हमारे बॉस हुआ करते थे। चंडीगढ़ में पोस्टिंग के दौरान बालक निर्मलजीत अक्सर हम लोगों के साथ बैडमिंटन खेलने आया करते थे।

 फिर 1967 में वह एयरफोर्स से जुड़ गए और 1971 के युद्ध में उन्होंने अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए दुश्मन फौज के दो साइबर जेट विमानों को ध्वस्त कर शहादत पाई थी।

 14 दिसंबर 1971 को उनकी शहादत हुई और भारत सरकार उनके इस अदम्य साहस के लिए उन्हें मरोणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया।


वीके मुहम्मद ने अपने बारे में बताया

केरल में त्रिशूर जिले के कुडंगलूर गांव में मेरा जन्म हुआ। पिता कादर कुंजी मुसलियार (इमाम) थे। खानदान में ज्यादातर लोग इमाम हुए हैं।  पिता ने मुझे बचपन में तालीम देने घर में बिठाया तो अरबी और मलयालम साथ-साथ लिखना पढ़ऩा भी सिखाया। कम उम्र में ही मैनें कुरआन शरीफ हिफ्ज (कंठस्थ) कर लिया था और रमजान के महिने में रात की विशेष नमाज (तरावीह) भी पढ़ाया करता था। 

1965 में मैं वायुसेना से जुड़ा। 17 साल तक वायुसेना में रहने के दौरान मुझे 1965 और 1971 के युद्ध के अलावा राष्ट्रपति-प्रधानमंत्री और देश-विदेश की कई विशिष्ट हस्तियों को लाने ले जाने और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत कार्य में भागीदारी का अवसर मिला। 

1979 में सेना से सेवानिवृत्ति के बाद एक इंजीनियरिंग फर्म से जुड़ गया। उनका भिलाई स्टील प्लांट में एक कंस्ट्रक्शन का काम चलता था। तब भिलाई आना-जाना लगा रहता था। 

ऐसे में 1986 में मुझे भिलाई स्टील प्लांट ने सीधे जुडऩे का प्रस्ताव दिया और तब से भिलाई के विकास में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भूमिका निभा रहा हूं।

 भिलाई मलयाला ग्रंथशाला, श्रीनारायण गुरु समाजम, नृत्यति कला क्षेत्रम व केरला समाजम जैसी शैक्षणिक व सांस्कृतिक संस्थाओं से भी जुड़ा हूं। वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित संस्था यूनिवर्सल कन्फेडरेशन ऑफ श्री नारायण गुरू का वाइस चेयरमैन हूं।


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Friday, November 20, 2020

 अनुराग की 'लुडो' में भिलाई, सुपेला, 

धमतरी और सेंट थामस का मैजिक




इस्पात नगरी भिलाई में पले-बढ़े फिल्मकार अनुराग बसु की इस दीपावली रिलीज हुई फिल्म 'लुडो' में कलाकार भले ही मुंबई के हैं लेकिन अलग-अलग किरदार में ढले इन कलाकारों से अनुराग ने भिलाई, सुपेला, धमतरी और सेंट थामस का जिक्र बखूबी करवाया है। 

अनुराग बसु ने पंकज त्रिपाठी, अभिषेक बच्चन, राजकुमार राव और आदित्य राय कपूर सहित ढेर सारे कलाकारों के लेकर बनाई इस फिल्म में अपने शहर और अपने बचपन के परिवेश को शामिल करना नहीं भूले हैं।
अनुराग अपनी पहले की भी तमाम फिल्मों में अपने शहर भिलाई का जिक्र करते रहे हैं। इसे और विस्तारित करते हुए अनुराग ने 'लुडो' में अलग-अलग दृश्यों में भिलाई और छत्तीसगढ़ को याद किया है। 

12 नवंबर 2020 को ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज के बाद से दर्शकों की प्रशंसा बटोर रही 'लुडो' में स्थानीयता वाले संवाद की वजह से भिलाई और छत्तीसगढ़ के दर्शक भावनात्मक रूप से जुड़ रहे हैं।

 ज्यादातर युवा दर्शक ऐसे दृश्यों के स्क्रीन शॉट सोशल मीडिया पर वायरल कर रहे हैं, जिन दृश्यों में भिलाई-छत्तीसगढ़ का उल्लेख है। फेसबुक, इंस्टाग्राम से लेकर ट्विटर तक में ऐसे दृश्य घूम रहे हैं जिसमें किरदार स्थानीय क्षेत्रों का उल्लेख करते हैं।

अनुराग बसु ने इस फिल्म में 4 अलग-अलग कहानियों को एक कड़ी में पिरोते हुए पेश किया है। इनके अलग-अलग दृश्यों में अनुराग ने भिलाई से जुड़े संवाद बुलवाए हैं। एक दृश्य में सत्तु भाई का किरदार निभा रहे पंकज त्रिपाठी पूछते हैं कि धमतरी से भिलाई वाले रोड में गए थे क्या मैडम के साथ?

एक दृश्य में पति अपनी पत्नी के सामने स्वीकारोक्ति करते हुए सुपेला चौक में रहने वाली महिला शांभवी का जिक्र कर रहा है तो एक अन्य दृश्य में नायक पूछ रहा है कि भिलाई की रहने वाले हो? वहीं एक अन्य दृश्य में जेल से लौट चुके अभिषेक बच्चन को पत्नी बता रही है कि बेटी बड़ी हो गई है और सेंट थामस में एडमिशन करवा दिया है। 

अनुराग बसु ने 'लुडो' में एक किरदार से संवाद बुलवाया है कि-कुछ रिश्तों में लॉजिक नहीं होता सिर्फ मैजिक होता है। भिलाई से अपने रिश्ते का कुछ ऐसा ही मैजिक अनुराग ने 'लुडो' में दिखाया है। 

फिल्म को जहां डार्क कॉमेडी के रूप में लोग पसंद कर रहे हैं वहीं इसमें तीखा राजनीतिक व्यंग्य भी शामिल है। जिसके स्क्रीन शॉट सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। खास तौर पर 'नेशन वांट्स टू नो' वाला दृश्य।
अनुराग ने 'लुडो' की कहानी चार रंगों की गोटी को प्रतीक बना कर पेश की है। जिसमें प्यार और गुस्से की प्रतीक लाल रंग की गोटी अभिषेक बच्चन की, शांति,खुशी और धूप की प्रतीक पीली गोटी आदित्य रॉय कपूर की, आशावाद और पवित्रता की प्रतीक नीले रंग की गोटी रोहित सराफ और पियरले माने की और अप्रत्याशित घटना की प्रतीक हरे रंग की गोटी राजकुमार राव की कहानी है। 

वहीं पंकज त्रिपाठी पूरी कहानी को आगे बढ़ाने वाला पासा हैं। वहीं अनुराग ने 60 के दशक की भगवान दादा की फ़िल्म 'अलबेला' के 'किस्मत की हवा कभी गरम कभी नरम' गाने का भी फिल्म में बेहतरीन इस्तेमाल किया है।

लुडो में शामिल संवाद ...


अनुराग बसु ने अपनी फिल्म 'लुडो' के जिन दृश्यों में स्थानीयता का समावेश किया है, उन्हें खूब पसंद किया जा रहा है। फिल्म में कुछ प्रमुख संवाद इस तरह से हैं-

1. ''एक बात बताओ भिलाई धमतरी की तरफ गए थे क्या मैडम को लेकर? हां सर, गया था... बस-बस उधर का ही होटल है।''
2. ''उससे जाकर मिल लेना, वहां रहती है सुपेला चौक पर, महिला एवं समाज कल्याण चलाती है।''

3. ''आप यहां.? आप तो भिलाई से हैं..? वो मैं यहां पर 6 महीने के लिए एक इंटर्नशिप के लिए आई हूं।''
4. 'यह पुराना सर्टिफिकेट है उसका, लास्ट ईयर सेंट थॉमस में डाल दिया है, जाओ मिल लो जाकर उससे।''


अपने पिता की रंगकर्म शैली को देते रहे हैं आदरांजलि

'लुडो' में यमराज के किरदार में अनुराग बसु


अनुराग बसु की अपनी अलग शैली है। जो उनकी हर फिल्म में नजर आती है। यह शैली उन्हें विरासत में मिली है। जिसे उन्होंने बचपन में अपने पिता स्व. सुब्रत बोस और मां दीपशिखा बोस को नेहरू हाउस सेक्टर-1 में थियेटर करते हुए देखा था।

 इसका सिनेमा में विस्तार करते हुए अनुराग ने फिर एक बार सूत्रधार शैली में 'लुडो' का निर्माण किया है। इस फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने सूत्रधार के रूप में अनुराग बसु खुद आधुनिक यमराज के रूप में नजर आए हैं। 

इस यमराज के माध्यम से ही कहानी का फ्रेम दर फ्रेम विस्तार होते जाता है। इसके पहले अनुराग ने अपनी फिल्म 'लाइफ इन ए मेट्रो' में भी रंगमंच की इसी सूत्रधार शैली का इस्तेमाल किया था।

 बसु परिवार के रंगकर्म को करीब से जानने वाले इस्पात नगरी के लोग बताते हैं कि स्व. सुब्रत बोस अपने नाटक में कहानी को आगे बढ़ाने सूत्रधार जरूर रखते थे। तब ऐसा किरदार नवलदास मानिकपुरी निभाया करते थे। अब अनुराग बसु उसी शैली को सिनेमाई रंग देते हुए नए ढंग से प्रस्तुत कर रहे हैं।

पत्रकारिता के स्टूडेंट की अनुराग बसु से

यादगार मुलाकात और 'लुडो' में सेंट थॉमस


आमदी नगर हुडको में अनुराग बसु के साथ पत्रकारिता के स्टूडेंट (18 सितंबर-2017)


अनुराग बसु की फिल्म 'लुडो' में भिलाई, सुपेला व धमतरी के डायलॉग तो हैं ही साथ में एक डॉयलाॅग में सेंट थॉमस काॅलेज का भी जिक्र है। यह डॉयलाॅग थोड़ा चौंकाता भी है।
हालांकि खुद मेरे लिए और हमारे सेंट थॉमस कॉलेज रुआबांधा पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के स्टूडेंट के लिए यह वाकई में सरप्राइज जैसा ही है। इसके पहले भिलाई सेक्टर-2 के मानसिक नि:शक्त विद्यालय 'मुस्कान' के नाम को लेते हुए दादा (अनुराग बसु) ने 2013 में अपनी फिल्म 'बरफी' में 'मुस्कान' स्कूल दिखाया था। वैसे सेक्टर-2 के 'मुस्कान' स्कूल से बसु परिवार का आत्मीय नाता भी है। 
ऐसे में दादा ने 'बरफी' का स्टोरी आइडिया भले ही मुंबई के किसी मूक-बधिर स्कूल की किसी बच्ची को देखकर लिया लेकिन जहन में उनका अपना शहर भिलाई तो था ही। लिहाजा वहां 'मुस्कान' था तो अब साल 2020 में उनकी 'लुडो' के एक संवाद  में सेंट थॉमस है।
हालांकि सेंट थामस नाम शामिल करने के पीछे की वास्तविकता हो सकता है कुछ और भी जो जो दादा जानते हों। लेकिन हमारे सेंट थामस कॉलेज परिवार लोगों के लिए खुश होने की वजह तो है ही। यहां पिछले 4 साल से पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में मैं अतिथि प्राध्यापक के तौर पर संलग्न हूं। 
किस्सा मुख्तसर यह है कि बसु साल 2017 में भिलाई आए थे रूंगटा इंजीनियरिंग कॉलेज में टेडेक्स टॉक में हिस्सा लेने। तब मैनें उनसे अपने सेंट थॉमस कॉलेज चल कर पत्रकारिता के स्टूडेंट को मार्गदर्शन देने का आग्रह किया था।
हालांकि इसमें कुछ दिक्कतें भी आईं। तब दादा के पास रविवार 17 सितंबर का दिन था, जिसमें उन्हें अपने दोस्त की फैक्ट्री में विश्वकर्मा पूजा में शामिल होना था। 
वहीं रविवार होने की वजह से कॉलेज में भी छुट्टी थी। अंतत: सोमवार 18 सितंबर सुबह-सुबह तय यह हुआ कि कुछ चुनिंदा स्टूडेंट को लेकर मैं हुडको स्थित उनके बड़े पिताजी के घर 11:30 बजे तक पहुंच जाऊं। वहीं मुलाकात और बात कर लेंगे।
इसके बाद मैनें तीनों साल के स्टूडेंट में से कुछ को बुलाया और हम सब जा पहुंचे हुडको। यहां करीब घंटे भर तक दादा ने अनौपचारिक बातचीत की। इसी के साथ एक बात और जहन में आ रही है, दादा ने 'लुडो' में कुछ संवाद के माध्यम से आज के मीडिया पर जबरदस्त कटाक्ष किया है। सोशल मीडिया पर एक वर्ग मीडिया से जुड़े डॉयलॉग को अनुराग कश्यप का लिखा हुआ बताकर मजे ले रहा है। जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है। 

ऐसा इसलिए क्योंकि 18 सितंबर 2017 को जब हम लोग दादा के साथ बैठे तो तब भी उन्होंने मीडिया को लेकर कुछ ऐसी ही टिप्पणी की थी, जो अब संवाद के तौर पर 'लुडो' में शामिल हैं। खासकर एक बहुचर्चित संवाद- ''जब सरकार नहीं कहना चाहती तो हम मीडिया से कहलवा लेती है...नेशन वांट्स टू नो..''
खैर, तब पत्रकारिता के स्टूडेंट से दादा ने मीडिया के स्वरूप को लेकर दादा ने काफी कुछ कहा था। मैं दावा तो नहीं करता लेकिन मुमकिन है, तब बातचीत करते दादा के मन में कहीं सेंट थॉमस कॉलेज का नाम घर कर गया होगा और उन्होंने इसे अपनी फिल्म 'लुडो' में इस्तेमाल कर हम लोगों को खुशी मनाने का मौका दे दिया।
 इस यादगार मुलाकात के दौरान मेरे साथ पत्रकारिता के स्टूडेंट में अमिताभ शर्मा, रोमन तिवारी, सबा खान, साक्षी सैनिक, विनायक सिंह, अभिषेक यादव, कृष्णा दुबे, चंद्रकिशोर और अमित खरे थे। 
हम सबके लिए तब दादा के साथ घंटे भर बैठना यादगार पल रहा और अब 'लुडो' में सेंट थॉमस का जिक्र तो हम सब के लिए एक सरप्राइज है ही। इसलिए शुक्रिया दादा, इस सरप्राइज के लिए...

हरिभूमि में प्रकाशित स्टोरी