Saturday, March 5, 2022

रूस से ज्यादा यूक्रेन करीब रहा है भिलाई के 

 

भिलाई का निर्माण किया यूक्रेन के इंजीनियरों ने, 65 साल 

पहले बने बेहतर रिश्ते आज तनाव-अपमान के शिकार

 

यूक्रेन का अज्वस्ताल स्टील प्लांट, जहां भिलाई के ज्यादातर इंजीनियरों ने तकनीकी प्रशिक्षण लिया- तस्वीर 1960 की

मुहम्मद जाकिर हुसैन 

हम भिलाईवालों से कोई रूसी और यूक्रेनी नागरिकों के बीच फर्क करने कहे तो शायद ही कोई कर पाए। रंग-रूप वेशभूषा और बोली-भाषा भी एक सी होने की वजह से वैसे भी इनमें फर्क करना आसान नहीं। दरअसल, हम लोग भिलाई में जिन्हें 'रशियन' के नाम से जानते हैं उनमें से 90 फीसदी लोग यूक्रेन मूल के ही हैं। आज भी भिलाई में जो बचे हुए 'रशियन' परिवार हैं, उन सभी का रिश्ता यूक्रेन से जुड़ा है। 

यह अलग बात है कि इन सभी की भावनाएं आज भी रूस के साथ जुड़ी हुई है। इन दिनों जबकि रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव चल रहा है, ऐसे में भिलाई में रहने वाले ये सभी वयोवृद्ध भी चिंतित है यूक्रेन-रूस में रहने वाले अपने रिश्तेदारों को लेकर। सभी की वीडियो कॉल पर बातें हो रही हैं और एक दूसरे।

 तनाव के इस माहौल में दूसरा पहलू वर्तमान में यूक्रेन में मेडिकल शिक्षा लेने गए भारतीय स्टूडेंट की सुरक्षित 'घर वापसी' का है। वर्तमान में भारतीय स्टूडेंट के साथ जो सुलूक यूक्रेन में हो रहा है, उसके वीडियो विचलित कर देने वाले हैं। लेकिन हमेशा हालात ऐसे नहीं थे। 

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पहल पर तत्कालीन सोवियत संघ के साथ जो रिश्ता बना, उसके नतीजे में भिलाई स्टील प्लांट का जन्म हुआ। इसके साथ ही तत्कालीन रूसी इंजीनियर भिलाई पहुंचे कारखाना निर्माण के लिए और भिलाई के नौजवान इंजीनियरों को सोवियत संघ भेजा गया स्टील टेक्नालॉजी में महारत हासिल करने। 

आईए, पहले एक नजर डालते हैं तत्कालीन परिस्थितियों पर। हमारे देश की आजादी के साथ ही नेहरू काल में जब हमारे राजनयिक रिश्ते तत्कालीन सोवियत संघ के साथ स्थापित हुए तो सोवियत संघ भी द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से उबर रहा था। इस विश्व युद्ध में आज के रूस और यूक्रेन में स्थित तमाम बड़े स्टील प्लांट पर दुश्मन देशों जर्मन, जापान और इटली का हमला हुआ था। इनमें ज्यादातर स्टील प्लांट के ब्लास्ट फर्नेस को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था।

ऐसी परिस्थिति में सोवियत संघ वहां के सभी स्टील प्लांट में फिर से उत्पादन शुरू करने की जद्दोजहद में जुटा हुआ था। इसके बावजूद हमारे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कोशिश के चलते सोवियत संघ ने भारत में 10 लाख टन उत्पादन क्षमता का स्टील प्लांट लगाने सहमति दे दी। 

तब वैश्विवक महाशक्ति के तौर पर सोवियत संघ भले ही अपना झंडा बुलंद कर रहा था लेकिन वहां का स्टील सेक्टर बहुत अच्छी हालत में नहीं था। इसके बावजूद सोवियत रूस ने अपने स्टील प्लांटों में भारतीय इंजीनियरों को तकनीकी प्रशिक्षण देना स्वीकार किया और अपने तमाम एक्सपर्ट को भिलाई भी भेजा। सोवियत संघ की इस पहल से भिलाई स्टील प्लांट अपने स्वरूप में आ सका।


'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव की टिप्पणी 

 

ज्यादातर स्टील प्लांट यूक्रेन और रूस गणराज्य में 

मेकेयेवका स्टील प्लांट के बाहर भिलाई के इंजीनियर-1960

तत्कालीन सोवियत संघ में ज्यादातर बड़े स्टील प्लांट रूस और यूक्रेन गणराज्य में थे। इनमें भी भिलाई के इंजीनियरों को ज्यादातर यूक्रेन के स्टील प्लांट में प्रशिक्षण के लिए 1956 से 1990 तक  भेजा जाता रहा। 

शुरूआती दौर में जब भिलाई से देश भर के नौजवान सोवियत संघ गए तो यूक्रेन के इन्ही स्टील प्लांट के शहरों में रुमानियत का रिश्ता भी जोड़ लिया। 

दरअसल, तब सोवियत संघ भी द्वितीय विश्व युद्ध से उबरा था और अपनी सख्त पाबंदियों के चलते 'आयरन कर्टेन' कहा जाता था। वहां की वही खबरें बाहर आती थी, जो वहां का कम्युनिस्ट सोवियत प्रशासन चाहता था। दूसरा वहां की महिलाओं को तब विदेश जाने की अनुमति दुर्लभ थी। 

ऐसे में जब भारत के नौजवान यूक्रेन के स्टील प्लांट में प्रशिक्षण लेने गए तो वहां की बहुत सी नवयुवतियां इन्हें अपना दिल दे बैठीं। यह सब उस दौर की बातें हैं, जब तब के सोवियत संघ में उद्योगों का बोलबाला था और इनमें सबसे ज्यादा बड़े स्टील प्लांट संचालित थे। 

 'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर डॉ. सोनाली चक्रवर्ती की टिप्पणी 

 

 सोवियत संघ टूटा और बदल गईं परिस्थितियां

यूक्रेन का एक मेडिकल कॉलेज

एक नाटकीय घटनाक्रम में दिसंबर 1991 में सोवियत संघ का विघटन हुआ और सभी गणराज्यों ने खुद को स्वतंत्र देश घोषित कर दिया। यही वह दौर था, जब यूक्रेन और रूस का इस्पात उद्योग चरमरा रहा था। 

 तब नवस्वाधीन यूक्रेन ने अपने यहां शिक्षा पर जोर दिया और देखते ही देखते मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में एक तूफान सा आ गया। इसका सीधा असर हमारे हिंदुस्तान पर भी हुआ। 

91 के पहले तक भिलाई सहित सोवियत प्रभाव वाले भारतीय शहरों में ज्यादातर परिवारों के बच्चे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए रूस-यूक्रेन जाया करते थे। तब इंजीनियरिंग में वहां भिलाई से गए स्टूडेंट को प्राथमिकता भी मिलती थी। लेकिन 91 के बाद वहां इंजीनियरिंग के बजाए फोकस मेडिकल में होने लगा और भारत के बनिस्बत वहां सस्ती मेडिकल शिक्षा की वजह से भारतीय स्टूडेंट का यूक्रेन का रुख करने लगे।

आज की परिस्थिति में बताया जा रहा है कि करीब 20 हजार स्टूडेंट यूक्रेन में मेडिकल कॉलेज में शिक्षा ले रहे हैं। फिलहाल सभी की चिंता यह है कि हमारे स्टूडेंट सुरक्षित अपने घर लौट जाएं। आईए जानते हैं कि तत्कालीन सोवियत संघ के साथ भारत ने कैसे रिश्ते जोड़े और इसके बाद उन दिनों भारतीयों को किस तरह वहां स्पेशल ट्रीटमेंट मिला। 

'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध की टिप्पणी  

 

भिलाई की पृष्ठभूमि और नेहरू का दौरा 

नेहरू-इंदिरा का मग्नितागोर्स्क दौरा (जून-1955)

भारत की स्वतंत्रता के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किस तरह देश के औद्योगिकीकरण के लिए दुनिया के बड़े देशों से हाथ मिलाया, इसका ब्यौरा आपको मेरी किताब 'वोल्गा से शिवनाथ तक' में विस्तार से मिल जाएगा। 

यह प्रधानमंत्री नेहरू ही थे, जिनकी वजह से तब सोवियत संघ ने भारत में एक स्टील प्लांट लगाने न सिर्फ कर्ज बल्कि तमाम तकनीकी सहायता व मशीनरी उपलब्ध कराने हामी भरी थी। जवाहरलाल नेहरू का सोवियत संघ से रिश्ता हमारे देश की आजादी से पहले का था।

 जवाहरलाल नेहरू ने 1947 के पहले और बाद में तीन मरतबा सोवियत संघ का दौरा किया था। पहली बार वह सोवियत सरकार के विशेष आमंत्रण पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रतिनिधि के तौर पर 7 नवंबर 1927 को महान अक्टूबर क्रांति दिवस की 10 वीं सालगिरह के आयोजनों में भाग लेने पहुंचे थे। उनके साथ उनके पिता मोतीलाल नेहरू, छोटी बहन कृष्णा व पत्नी कमला नेहरू भी साथ थे। 

इसके बाद सोवियत संघ का उनका दूसरा दौरा 7 जून से 23 जून 1955 में हुआ। तब उनके साथ उनकी बेटी इंदिरा गांधी भी थी। उन्होंने अपनी यात्रा याकेतरिनबर्ग से शुरू की थी। वह रूस के औद्योगिक शहर मैगनीतोगोर्स्क भी पहुंचे थे और यहां का विशाल स्टील प्लांट देखा था। 'रशिया बियॉन्ड' नाम की एक वेबसाइट के अनुसार '1955 में जब नेहरू और इंदिरा गांधी नदी किनारे बसे औद्योगिक शहर मैगनीतोगोर्स्क पहुँचे थे तो स्टील प्लांट में काम करने वाले कामगार और शहर के स्थानीय लोग उन्हें देखने के लिए दौड़ पड़े थे। 

अपने इस दौरे में नेहरू मास्को से लेनिनग्राद की वृहद यात्रा पर निकले, इस दौरान उन्होंने स्टालिनग्राद, क्रीमिया, जॉर्जिया, अस्काबाद, ताशकंद, समरकंद, अल्टाई क्षेत्र, मग्निागोस्र्क और सवर्दलोव्स्क (याकेतरिनबर्ग)  शहरों का दौरा किया। 

जवाहरलाल नेहरू का तीसरा और अंतिम दौरा 8 सितंबर 1961 को हुआ था। जिसमें नेहरू ने तत्कालीन रूसी प्रधानमंत्री के साथ मॉस्को में इंडो-सोवियत फ्रैंडशिप रैली को संबोधित किया था। जवाहरलाल नेहरू अपने पहले दौरे में रूस की औद्योगिक प्रगति को करीब से देखा था। फिर जब हमारा देश आजाद हुआ तो उन्होंने 10 लाख टन सालाना क्षमता वाले एक स्टील प्लांट के लिए रूस को राजी कर लिया।

 'वोल्गा से शिवनाथ तक' पर 'हरिभूमि' के प्रधान संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी की टिप्पणी 

 

 ऐतिहासिक समझौते के बाद मंजूरी मिली भिलाई को 

2 फरवरी 1955 को भारत-सोवियत संघ के बीच नई दिल्ली में करार

2 फरवरी 1955 को नई दिल्ली में सोवियत संघ के साथ भारत का ऐतिहासिक समझौता हुआ था। इस समझौते के फलस्वरूप ही हफ्ते भर के भीतर नए स्टील प्लांट के लिए भिलाई के नाम पर भारत सरकार की मंजूरी मिली थी। 

इसके बाद भिलाई स्टील प्रोजेक्ट कंपनी, इस्पात मंत्रालय और हिंदुस्तान स्टील लिमिटेड (सेल की पूर्ववर्ती कंपनी) अस्तित्व में आए।

इन तमाम प्रक्रियाओं के बीच 6 जून 1955 को पायनियर टीम नागपुर होते हुए भिलाई पहुंची। जिसमें सोवियत संघ और भारत के इंजीनियर सहित 11 प्रतिनिधि थे। यह टीम दुर्ग के सर्किट हाउस पहुंची और भिलाई परियोजना पर जमीनी स्तर का काम शुरू हुआ। इसके अगले दिन नई दिल्ली से प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने मास्को के लिए उड़ान भरी थी। 

 ' वोल्ग से शिवनाथ तक' पर स्कूली छात्रा परी पुरोहित का एक वीडियो

 

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के काम में आई तेजी 

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट निर्माण प्रथम चरण

प्रधानमंत्री नेहरू के जून 1955 के दौरे के बाद सोवियत संघ से इंजीनियर बड़ी तादाद में भिलाई पहुंचे और देश के पहले आधुनिक सरकारी स्टील प्लांट के निर्माण का कार्य तेजी से आगे बढ़ा। 

बाद के दौर में सोवियत संघ ने न सिर्फ स्टील बल्कि दूसरे भारतीय उद्योगों को स्थापित करने में भी अपनी भागीदारी दी। भारत का यह औद्योगिकीकरण तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की दूरदृष्टि का परिणाम थी। वजह इसके पीछे की यह है कि भारत के साथ जिस सोवियत संघ का करार हुआ उसमें रूस और यूक्रेन एक विशाल देश सोवियत संघ का हिस्सा हुआ करते थे। 

जब भिलाई का निर्माण शुरू हुआ और 40 लाख टन की क्षमता तक कारखाना निर्माण चलता रहा, तब तक हमारे इन्हीं यूक्रेनियन इंजीनियरों ने हम भारतीयों के साथ कंधे से कंधा मिला कर काम किया।

बीएसपी स्कूल सेक्टर-1 भिलाई 1988 बैच का यादगार आयोजन 'गुरुदक्षिणा' 

 

 इंजीनियरिंग शिक्षा में भिलाई के बच्चों को प्राथमिकता मिली यूक्रेन में

वह सोवियत संघ (यूएसएसआर) का दौर था, जब इस विशाल संघ (देश) का हिस्सा रहते हुए रूस, यूक्रेन, जार्जिया, बेलारूस, कजाकिस्तान, अजरबैजान, उज्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, लिथुआनिया, मॉल्दोविया, लातविया, आर्मीनिया, तुर्कमेनिया व एस्टोनिया अलग-अलग गणराज्य के तौर पर अस्तित्व रखते थे। उस दौर में सोवियत संघ का 80 फीसदी इस्पात उद्योग यूक्रेन में था।

यही वजह है कि जब 2 फरवरी 1955 को भारत के साथ सोवियत संघ करार हुआ तो इसके बाद भिलाई में स्थापित होने वाले स्टील प्लांट के भारतीय इंजीनियरों को तकनीकी प्रशिक्षण के लिए ज्यादातर यूक्रेन के ही स्टील प्लांट में भेजा गया। हालत तो यह थी कि आज जिस तरह से यूक्रेन में सस्ती मेडिकल पढ़ाई का क्रेज है, उन दिनों भिलाई के संपन्न अफसरों के पास अपने बच्चों को यूक्रेन के विभिन्न संस्थानों में कम दर पर उच्च शिक्षा के लिए भेजने का विकल्प था और इसका लाभ भी भिलाई के बच्चों को खूब मिला। ऐसे बच्चे 1990 तक रूस और यूक्रेन के विभिन्न कॉलेजों/तकनीकी संस्थानों में पढऩे जाते रहे।

भिलाई स्टील प्लांट शिक्षा विभाग का सफरनामा 1955 से

 

यूक्रेन-रूस के स्टील प्लांट, जिनके इंजीनियरों ने बनाया भिलाई

तत्कालीन सोवियत संघ में ज्यादातर स्टील प्लांट यूक्रेन और रूस गणराज्य में थे। भिलाई में 10 लाख टन वार्षिक उत्पादन क्षमता का स्टील प्लांट लगाने हुए समझौते के बाद तमाम इंजीनियर इन्हीं स्टील प्लांट से आए और भिलाई के नौजवान इंजीनियरों को भी इन्हीं स्टील प्लांट में प्रशिक्षण के लिए भेजा गया। इनमें यूक्रेन के मरियोपोल (पूर्व नाम ज्दानोव) में अज्वस्ताल स्टील प्लांट और इलिच  स्टील एंड आयरन वर्क्स है। यूक्रेन के मेकेयेवका (पूर्व नाम दमित्रविस्क या दमित्रविस्की) में दोनेत्स्क प्रांत से 15 किमी दूर स्थापित मेकेयेवका मेटलर्जिकल प्लांट है। 

दोनेत्स बेसिन (डोनबास) की मशहूर आयरन ओर खदानें भी यहीं है। निपर नदी के किनारे यूक्रेन में ज्पारोशिया दक्षिण-पूर्वी शहर है। यहां क्रिवयी रीह (रोग) आयरन ओर माइंस है। यहीं ज्पारोशिया स्टील प्लांट ज्पारोस्ताल में है, जो 1933 में शुरू हुआ था। क्रिवा रोग स्टील प्लांट पहले सरकारी था, जिसे अब आर्सेलर-मित्तल ले चुका है। 

इनके अलावा रूस में भी स्टील प्लांट हैं, जिनका भिलाई से सीधा रिश्ता रहा है। इनमें रूस के दक्षिण-पश्चिम साइबेरिया में केमेरोवो परिक्षेत्र (ओब्लास्ट) स्थित नोवोकुजनेत्स है। जहां नोवोकुजनेत्स आयरन एंड स्टील प्लांट है। रूस के चेलियाबिन्स्क परिक्षेत्र (ओब्लास्ट) में यूराल पर्वत श्रृंखला के साए तले मग्नितागोर्सके शहर है, जहां मग्नितागोर्सके आयरन एंड स्टील वर्क्स है। 

 'वोल्गा से शिवनाथ तक' प्रथम संस्करण का विमोचन 

 

ज्यादातर शीर्ष पदों तक पहुंचे शुरूआती बैच के इंजीनियर

मरियोवपोल में भिलाई के इंजीनियर-1957

भिलाई स्टील प्रोजेक्ट के लिए युवा इंजीनियरों का पहला बैच 10 सितंबर 1956 को भिलाई से रवाना हुआ था। तब से 90 के दौर तक भिलाई के इंजीनियरों के कई बैच उच्च तकनीकी प्रशिक्षण के लिए जाते रहे। इनमें से ज्यादातर इंजीनियर भारतीय स्टील सेक्टर के शीर्ष पदों पर रहे।

 इनमें बहुत से लोगों ने स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) को नेतृत्व दिया तो बहुत से इंजीनियर सेल के विभिन्न स्टील प्लांट में शीर्ष पदों पर पहुंचे। इन इंजीनियरों के पहले बैच से केसी खन्ना, एस. नारायण, एएस मूर्ति, एचसी धारवाड़, ईआरसी शेखर, एचएस अश्वत्थ, निमाई कुमार मित्र, केपी रामचंद्रन, बीएमजी रमन, एबी माथुर, ईएएस मूर्ति, एनसी रामासुब्बु, एस. नारायण, कैलाश बिहारी गोयल, केआर संगमेश्वरन, तेरे देसाई, आर. कृष्णामूर्ति, एस. समरपुंगवन में आधे ज्पारोशिया और आधे ज्दानोव में तकनीकी प्रशिक्षण हेतु भेजे गए थे। 

ज्पारोशे में एस. समरपुंगवन, ईआरसी शेखर, केआर संगमेश्वरन और एके फोतेदार ने प्रशिक्षण लिया, वहीं दिलबाग राय आहूजा, गोपीनाथ पुरी, रघुवीर व पीएच सचदेवा सहित अन्य ने मेकेयवका स्टील प्लांट भेजा गया। तब भिलाई स्टील प्लांट में नियुक्त होने वाले सोवियत चीफ इंजीनियर मेें भी ज्यादातर यूक्रेन के स्टील प्लांट से ही आते थे। 

शुरूआती दौर के चीफ इंजीनियर वीई दिमशित्स ने यूक्रेन की प्रसिद्ध डोनबास की खदानों में भी काम किया था और मरियोवपुल व अज्वस्ताल स्टील प्लांट में सेवाएं दी थी। वहीं शुरूआती दौर के युवा इंजीनियरों में केआर संगमेश्वरन, एस. रामासुब्बुु, ईआरसी शेखर और केबी गोयल को रूस के मग्नितागर्सके में भी प्रशिक्षण का अवसर मिला। बाद के दौर में देखें तो ईडी प्रभारी रहे विनोद अरोरा को रूस मेें साइबेरिया के नोवे कुजनेत्स स्टील प्लांट मेें प्रशिक्षण का अवसर मिला था। 

'वोल्गा से शिवनाथ तक' के दूसरे संस्करण का विमोचन 

 

 तब भिलाई के इंजीनियरों को मिलता था स्पेशल ट्रीटमेंट 

ज्पारोशे में नए साल की पार्टी में भिलाई के इंजीनियर-1958

भिलाई से यूक्रेन और रूस के स्टील प्लांट में उच्च तकनीकी प्रशिक्षण लेने वाले कई वरिष्ठ इंजीनियर आज भी यह बताते नहीं थकते कि उन्हें उस दौर में सोवियत रूस में कैसा वीवीआईपी ट्रीटमेंट मिलता था।

 भिलाई स्टील प्लांट की रेल एंड स्ट्रक्चरल मिल के सुप्रिंटेंडेंट रहे नरेंद्र सिंह छत्री बताते हैं-जब सितंबर 1956 को भिलाई के इंजीनियरों का समूह सोवियत रूस के लिए रवाना हो रहा था तो सांसद व महात्मा गांधी के सचिव रहे सुधीर घोष को खास तौर पर इस्पात मंत्रालय में विशेष कर्त्तव्यस्थ अधिकारी (ओएसडी) नियुक्त किया गया था और पत्राचार व पासपोर्ट सहित हमारी यात्रा का तमाम औपचारिकताएं सुधीर घोष के मार्गदर्शन में हुई। घोष हम लोगोें को खास तौर पर विदा करने एयरपोर्ट भी आए थे। 

छत्री बताते हैं-मास्को उतरने के बाद से अज्वस्ताल, ज्दानोव, ज्पारोशे, मरियोपोल और मग्नितागोर्सके जैसे स्टील प्लांट में समूह को बांट दिया गया। यहां हर शहर में भारतीय को स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता था। शहर में भारतीय युवा यदि सर्कस या मूवी देखने तो वहां के स्थानीय लोग हमें पहले टिकट लेने का मौका देते।

 इसी तरह शहर में होने वाली क्रिसमस व न्यू ईयर सहित तमाम पार्टियों में भी भारतीय युवा खास तौर पर आमंत्रित किए जाते थे। वह ऐसा दौर था जब द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से सोवियत रूस उबर रहा था और जनजीवन सामान्य हो रहा था। ऐसे में भारतीय इंजीनियर भी वहां की जीवनशैली में घुलमिल गए। 

जब भिलाई स्टील प्लांट से निकला पहला 'हीरा'

 

दिल का रिश्ता भी जुड़ता गया यूक्रेन से 

मल्होत्रा-मजुमदार और बलराम सिंह दंपति

जिन दिनों भिलाई स्टील प्रोजेक्ट अपना रूप ले रहा था, उन्हीं दिनों सुदूर यूक्रेन में तकनीकी प्रशिक्षण हासिल करने गए भिलाई के ज्यादातर नौजवानों ने वहां दिल का रिश्ता भी जोड़ लिया। 

1956 से 1985 तक भिलाई में लगभग हर साल ऐसे कई जोड़े आते गए, जिनकी नई जिंदगी की शुरूआत यूक्रेन से हुई। भिलाई के एक युवा इंजीनियर काशीनाथ 1957 में यूक्रेन के ज्पारोशिया में प्रशिक्षण ले रहे थे। वहीं उनकी मुलाकात आना मलाया से हुई। बातें-मुलाकातें हुई और लुदमिला को काशीनाथ इतना भा गए कि उन्होंने साथ जिंदगी बिताने का फैसला कर लिया। 

1959 में भिलाई के इंजीनियर एलआर भटनागर यूक्रेन के मकेयेवका स्टील प्लांट में प्रशिक्षण ले रहे थे। वहीं उनकी मुलाकात एक युवा टेलीफोन ऑपरेटर गलीना से  हुई और दोनों ने एक दूसरे का हाथ थाम लिया।

1960 में मेकेयेवका के स्टील प्लांट में प्रशिक्षण ले रहे भिलाई के युवा इंजीनियर मोती सागर मल्होत्रा का वहीं के अस्पताल में पदस्थ 21 साल की नर्स जीना पर आ गया और जब मल्होत्रा हिंदुस्तान लौटे तो उनके साथ उनकी हमसफर जीना भी थी। 

1962 में यूक्रेन के ज्पारोशे में स्कूली पढ़ाई कर रही क्लेरा और भिलाई से गए युवा इंजीनियर बलराम सिंह की कहानी में भी ऐसी ही रूमानियत थी। क्लेरा और बलराम ने बाद में शादी कर ली और भिलाई में नई जिंदगी की शुरूआत की। सेल के निदेशक प्रोजेक्ट पद से रिटायर हुए बलराम सिंह तो अब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन क्लेरा उम्र के 8 वें दशक में भी बेहद सक्रिय हैं और सोशल मीडिया पर रोजाना अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहती हैं। 

 यूक्रेन के ज्दानोव (अब मरियोपोल) के एक आर्थोडोक्स क्रिश्चियन परिवार की बेटी लुद्मिला और भिलाई से वहां स्टील प्लांट में प्रशिक्षण लेने गए युवा इंजीनियर विश्वनाथ नागेश मजुमदार की भी नजरें मिली और प्यार हो गया। हालांकि उनकी शादी में कुछ दिक्कतें आईं लेकिन दोनों ने एक दूसरे का हाथ थाम कर 1963 में शादी के बाद भिलाई में नहीं जिंदगी की शुरूआत की। 

बाद के दौर में 1985 में यूक्रेन के ज्पारोशिया में फैशन डिजाइनर लुद्मिला अरेफयेवा और भिलाई से वहां प्रशिक्षण लेने गए सुब्रत मुखर्जी ने 1985 में एक दूसरे को दिल दे दिया और शादी के बाद भिलाई में नई जिंदगी शुरू की। पेशे से मेकेनिकल इंजीनियर विवेक चतुर्वेदी 1986 में यूक्रेन के मशीन बिल्डिंग इंस्टीटॅयूट ज्पारोशिया में पढ़ रहे थे। वहीं इना लुब्रोनेंको भी इलेक्ट्रिकल इंजीनियर की तालीम ले रही थीं। दोनों के दिल मिले और रूमानियत का एक नया रिश्ता शुरू हुआ जो आज भी हंसी-खुशी चल रहा है। 


नए दौर में भिलाई को जरूरत नहीं रही रूसी इंजीनियरों की 

भिलाई स्टील प्लांट का 40 लाख टन सालाना हॉट मेटल उत्पादन क्षमता तक का विस्तारीकरण अकेले सोवियत रूस के दम पर हुआ था। जाहिर है, इसमें रूसी तकनीक और मशीनरी इस्तेमाल हुई। इस वजह से एक दौर ऐसा भी रहा जब रशियन टेक्नीकल एक्सपर्ट बड़ी तादाद में भिलाई में हुआ करते थे। 

इनमें से 90 फीसदी एक्सपर्ट यूक्रेन के स्टील प्लांट से ही आया करते थे। इन सभी एक्सपर्ट को उपलब्ध कराने की जवाबदारी रूसी फर्म त्याशप्रोम एक्सपोर्ट (टीपीई) की हुआ करती थी। लेकिन देखते ही देखते दौर बदलने लगा। 


टीपीई का दफ्तर बंद, इस्माइल स्वदेश लौटे और यनोद का निधन 

टीपीई के दफ्तर में मेरी दाईं ओर इस्माइल और बाईं ओर यनोद

सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत सरकार के फैसले के अनुरूप भिलाई सहित तमाम सरकारी स्टील प्लांट के विस्तारीकरण में ग्लोबल टेंडर के जरिए अलग-अलग देशों की तकनीक अपनाने  की शुरूआत हुई। 

तब जर्मन, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, चीन और इटली सहित विभिन्न देशों की तकनीक का भिलाई में प्रवेश हुआ। ऐसे में रशियन एक्सपर्ट की संख्या लगातार घटने लगी। 

2018 में स्टील अथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) ने एक अहम फैसला लेते हुए 2020 तक रशियन एक्सपर्ट की तादाद को घटाते हुए शून्य करने का फैसला लिया। इसके अनुरूप ही अब भिलाई सहित सेल के किसी भी स्टील प्लांट में रशियन एक्सपर्ट की जरूरत नहीं रही। 

भिलाई में एक्सपांशन बिल्डंग स्थित टीपीई का दफ्तर अब बंद हो चुका है। टीपीई के भारत प्रमुख इस्माइल मजयानेव ने बीएसपी मैनेजमेंट की ओर से सेक्टर-7 रशियन काम्पलेक्स में आवंटित सभी बंगले लौटा कर पिछले ही साल अपने देश रवाना हो चुके हैं। वहीं टीपीई दफ्तर की पहचान रहे यहां के केयर टेकर यनोद कुमार का भी कैंसर से देहांत हो चुका है। 


अब भारतीय स्टूडेंट से हो रहा व्यवहार चिंताजनक 

पोलैंड सीमा पर परेशान हाल भारतीय स्टूडेंट-28 फरवरी 2022

एक तरफ जिस यूक्रेन में शांतिकाल के दौरान भिलाई से गए इंजीनियरों को उन दिनों वीवीआईपी ट्रीटमेंट मिलता था तो दूसरी तरफ अब युद्धकाल में उसी यूक्रेन में भारतीय नौजवान स्टूडेंट के साथ दुव्र्यवहार की चिंताजनक खबरें आ रही हैं। 

आज भारतीय स्टूडेंट अपनी जान बचाने बंकरों में किसी तरह रह रहे हैं। युद्धग्रस्त क्षेत्र से निकलना सबसे बड़ी चुनौती है। 

ऐसे में यूक्रेनी लोग भारतीय स्टूडेंट को ट्रेन में चढऩे नहीं दे रहे हैं। वहीं पोलैंड सीमा पर भारतीय स्टूडेंट से वहां की सेना द्वारा मारपीट करने के वीडियो भी वायरल हो रहे हैं। भारत सरकार के सारे इंतजाम शांति वाले देशों में हैं। स्टूडेंट से कहा जा रहा है कि किसी तरह युद्धग्रस्त क्षेत्र से निकल जाएं। हालांकि संकटग्रस्त इलाके से बाहर निकालने के लिए किसी तरह का कोई इंतजाम भारत सरकार की तरफ से नहीं हो रहा है। ऐसे में भारतीय स्टूडेंट बेहद चुनौतीपूर्ण हालात का सामना कर रहे हैं। 

अब तो भारतीय स्टूडेंट की मौत की खबरें भी आ रही हैं। कर्नाटक के नवीन शेखरप्पा ज्ञानगौदर की यूक्रेन के खारकीव में मंगलवार 1 मार्च को हमले में मौत हो गई। पंजाब के बरनाला का रहने वाले चंदन कुमार की बुधवार 2 मार्च को को मौत हो गई। चंदन की मौत की वजह बीमारी बताई गई है और वह लंबे समय से अस्पताल में भर्ती थे। वहीं 4 मार्च को पंजाब के रहने वाले हरजोत सिंह को क्रास फायर में गोली लगी है और अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है।

Wednesday, February 16, 2022



संघर्ष के दिन भिलाई में गुजारे थे बप्पी दा ने, यहीं रहते

ख्वाब देखा फिर मुंबई गए और छा गए संगीत जगत में 

 

बप्पी दा के साथ भिलाई में इंटरव्यू 08-04-13
करीब महीने भर की तकलीफ के बाद अब संगीतकार बप्पी लाहिरी (मूल नाम-आलोकेश लाहिरी) भी नहीं रहे। मंगलवार 15 फरवरी 2022 मंगलवार की रात उन्होंने मुंबई के एक अस्पताल में 69 साल की उम्र में आखिरी सांस ली। 80-90 का दौर बप्पी दा के ऊर्जा से भरपूर संगीत का दौर था।

 तब बप्पी दा एक तरफ डिस्को की धूम मचा रहे थे तो दूसरी तरफ दक्षिण की फिल्मों की खास शैली का संगीत देकर पूरे देश का मनोरंजन कर रहे थे। लेकिन एक बप्पी लाहिरी वह भी थे, जो बेहद गंभीर किस्म का भी संगीत दे रहे थे। बप्पी दा के संगीत को इन तीन खांचें में महसूस किया जा सकता है। यही उनके संगीत की पहचान भी थी। 

यकीन कीजिए कि जिसने "आई एम ए डिस्को डांसर" रचा, उसी ने "सैंय्या बिना घर सूना" या फिर "चंदा देखे चंदा" भी रचा। खैर, बप्पी दा एनर्जी के पर्याय थे। उनके लिए हल्के-फुल्के संगीत के अलावा शास्त्रीयता का पुट लिए गंभीर संगीत का सृजन करना सहज था। 

17 साल की उम्र में गवा रहे थे लता-मन्ना डे और किशोर को

अपने माता-पिता के साथ बप्पी दा बालपन में

बप्पी दा जिस दौर में दक्षिण में व्यस्त थे और उनकी इंदीवर के साथ जोड़ी जो गीत-संगीत रच रही थी, तब उसकी खूब आलोचना हुई और उन पर फूहड़ता और नकल के आरोप लगे।

इसके बावजूद "जो चल गया वो चल गया" वाला मामला था। बप्पी दा चूंकि संगीत के समृद्ध परिवार से थे। इसलिए बचपन से ही उनके संस्कार में ही संगीत बसा था। 

महज 17 साल की उम्र में उन्होंंने बांग्ला फिल्म "दादू" में संगीत दिया। जिसमें लता मंगेशकर,मन्ना डे और किशोर कुमार जैसे दिग्गजों ने पार्श्वगायन किया। 

बाद में बप्पी दा ने मुंबई का रुख किया और फिर जो इतिहास बना वह दुनिया के सामने है। बप्पी दा के लिए स्वर्णकाल था। उस दौर में हर बड़े बैनर के साथ बप्पी दा ने काम किया और सुपरहिट संगीत दिया। 

बप्पी दा का संगीत आलोचना और लोकप्रियता के द्वंद के बीच बेहद लोकप्रिय होता रहा। इस तथ्य को उनके आलोचकों ने भी स्वीकार किया।

शिखर के दौर का संगीत ही लोकप्रिय रहा

तमाम इतिहास रचते हुए अपने करियर के शिखर के दौर में बप्पी लाहिरी ने फिल्म संगीत का जो माधुर्य रचा वह बाद के दौर में कायम नहीं रह पाया। इसलिए आज भी बप्पी दा का वही संगीत लोकप्रिय है, जो उन्हें अपने शिखर के दौर में रचा था। 

दशक भर पहले आई फिल्म "द डर्टी पिक्चर" में उसी लोकप्रियता को भुनाने के लिहाज से "उई अम्मा-उई अम्मा" के मीटर पर "ऊ ला ला ऊ ला ला" रच दिया गया। बप्पी दा के माधुर्य से सजी "हिम्मतवाला" की रिमेक बनी तो संगीत जस का तस रख दिया गया।  

राजनीति में भी किस्मत आजमाई, लता को पुकारा था मां

बप्पी दा ने शेयर की थी 'मां' की याद में अपनी यह फोटो
बप्पी दा  का अपना संसार था जिन दिनों बप्पी दा का करियर चरम पर था तब अपने संगीत के लिए उन्होंने खूब आलोचनाएं झेली लेकिन उनकी उपस्थिति हमेशा बनी रही। 

करियर के ढलान के बाद बप्पी दा ने राजनीति का रास्ता भी चुना। जिसमें उन्होंने 2014 में भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा और पश्चिम बंगाल की श्रीरामपुर सीट से किस्मत आजमाई लेकिन तृणमूल कांग्रेस के हाथों उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। 

इसके बाद उन्होंने राजनीति से तौबा कर ली। हाल के दिनों में बप्पी दा सोशल मीडिया पर सक्रिय थे। वह विभिन्न मुद्दों पर ट्विट किया करते थे।

सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर के निधन पर बप्पी दा ने अपनी बचपन की फोटो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए मां के संबोधन के साथ श्रद्धांजलि दी थी। हालांकि तब खुद बप्पी दा भी बेहद बीमार थे। अब उनके जाने की खबर आई है।

बप्पी दा भिलाई पहुंचे, घिरे रहे रिश्तेदारों से

संगीतकार बप्पी लाहिरी 8 अप्रैल 2013 सोमवार को भिलाई क्लब में अपना शो करने भिलाई स्टील प्लांट के बुलावे पर आए थे। तब शो से ठीक पहले मुझे बप्पी दा से छोटी सी मुलाकात और बात करने का मौका मिला। 

हालांकि थोड़ा अफरा-तफरी का माहौल था और बप्पी दा की टीम भिलाई निवास से भिलाई क्लब रवाना होने के लिए खड़ी थी। वहीं बप्पी दा के परिजन भी उन्हें घेरे खड़े थे। ऐसे माहौल में बप्पी दा ने छोटे से इंटरव्यू के लिए मुझे वक्त दिया। इस दौरान खुद बप्पी दा ने भिलाई से अपने 40 साल पुराने रिश्तों पर रोशनी डाली।

बप्पी दा ने बताया उनके पिता और प्रख्यात संगीतकार अपरेश लाहिरी और शास्त्रीय गायिका मां बंसरी लाहिरी ने 1960-70 के दौर में भिलाई में बंगाली समाज के बीच कई कार्यक्रम दिए थे। उस दौर में मेरे माता-पिता अक्सर भिलाई आते रहते थे। तब मेरी बहन शुक्ला चौधरी (सगी बुआ की बेटी) यहां भिलाई में क्वार्टर नं. 2 डी, स्ट्रीट-46, सेक्टर-8 में रहती थी। 

मुंबई जाते वक्त अक्सर भिलाई पहुंच जाता था

बप्पी दा का आटोग्राफ
बप्पी दा ने बताया कि पहली बांग्ला फिल्म 17 साल की उम्र में तो मिल गई और उसका संगीत भी खूब चला। लेकिन आगे मेरा ख्वाब मुंबई में पैर जमाने का था।

 वह मेरे संघर्ष की शुरूआत थी। कोलकाता से मुंबई जाते वक्त अक्सर मैं तब भिलाई उतर जाता और बहन के घर 1-2 दिन रह कर जाता था। फिर कुछ 2-3 महीने का एक दौर ऐसा भी रहा जब मुझे 1971 में भिलाई में अपनी बहन के इसी सेक्टर-8 वाले घर में रहना पड़ा। 

तब यहां रह कर मैं अपना संगीत तैयार करता रहता था और खाली वक्त में भिलाई घूमता था। बप्पी दा कहते हैं-तब मेरा ख्वाब मुंबई फिल्मी दुनिया में पहचान बनाना था और इसी ख्वाब को पूरा करने मैं भिलाई में रहते हुए कोशिश कर रहा था। 

तब मैं अपने संपर्कों को चिटि्ठयां लिखता था और इंतजार करता था जवाब आने का। तब टेलीफोन तो मुश्किल से लगता था इसलिए घर में भी चिट्‌ठी लिख कर ही अपनी खैर, खैरियत देता रहता था। 

ऐसे भिलाई से पहुंचा मुंबई

बप्पी दा बोले-फिर एक दिन ऐसा आया कि मुंबई में कुछ उम्मीदें दिखाई दी। मैनें तुरंत भिलाई से मुंबई की टिकट कटाई और यहां से सीधे जा पहुंचा मुंबई। वहां मुझे एक छोटे बजट की फिल्म "नन्हा शिकारी" मिली। इसके बाद नासिर हुसैन प्रोडक्शन की फिल्म "मदहोश" में बैकग्राउंड म्यूजिक करने का मौका मिला, जिसमें संगीतकार आरडी बर्मन थे।

 इसके बाद पहली बड़ी सुपरहिट फिल्म नासिर हुसैन की ही "जख्मी" मिली । उसके बाद "चलते-चलते", "आप की खातिर", "टूटे खिलौने" और फिर सफल फिल्मों के धूम की कतार लग गई।

इस बातचीत के दौरान बप्पी दा के भिलाई में रहने वाले भांजे शांतनु चौधरी ने बताया कि परिवार अब सेक्टर-8 छोड़ सिंधिया नगर में रह रहा है। 

अपने संगीत की आलोचना पर बप्पी दा ने कहा था...

संगीत की आलोचना के सवाल पर बप्पी दा ने कहा था-उनके संगीत की कई बार आलोचना हुई लेकिन यही हिट भी रहा। बप्पी दा ने इस तथ्य को गलत बताया कि दक्षिण की फिल्मों के हिंदी संस्करण में संगीत जस का तस रख दिया गया। 

बप्पी दा बोले-नहीं ऐसा नहीं है जिन दिनों "हिम्मतवाला", "मवाली", "मकसद","तोहफा" और "पाताल भैरवी" से लेकर "सिंघासन" तक दक्षिण की फिल्मों की कतार लगी हुई थी तो मैनें उनके दक्षिण के संगीत को एक तरफ रख कर अपना संगीत रचा। 

कहीं भी कॉपी नहीं किया,इन फिल्मों में जितना भी संगीत रचा मेरा मौलिक रहा। उन्होंने बातचीत के दौरान अपने किशोर कुमार मामा को भी याद किया। बप्पी दा ने बताया कि किशोर कुमार उनके रिश्ते के मामा लगते थे और उन्होंने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया।

तब सिविक सेंटर खूब घूमता था, फिर आउंगा भिलाई

दैनिक भास्कर में तब प्रकाशित मेरा इंटरव्यू
बप्पी दा ने फिल्मी धुनों की नकल के सवाल पर कहा कि दुनिया भर का संगीत हम ही क्या सभी सुनते हैं और यह सब हमारे कानों में रचा-बसा रहता है। इसलिए स्वाभाविक है कि कहीं न कहीं किसी धुन से हम प्रभावित हों लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम नकल कर रहे हैं।

 मैं तो अक्सर कहता हूं अगर मैनें धुन चोरी की है तो फिर मुझसे पहले के भी संगीतकार भी धुन चोरी के दोषी हैं। बप्पी दा ने भिलाई की यादों को टटोलते हुए कहा-उन दिनों तो भिलाई में काफी कम हरियाली दिखती थी।

 मैं सिविक सेंटर खूब जाता था। बप्पी दा ने कहा कि एक बार फिर वह 2-3 दिन के लिए भिलाई आकर रहना चाहते हैं, आखिर मेरे स्ट्रगल के दिनों का गवाह भिलाई भी रहा है।

माता-पिता के बाद अब मामा के जाने से हम अकेले रह गए

बाम्बे और भिलाई में बप्पी दा-शुक्ला परिवार

बप्पी दा के गुजरने पर उनकी बहन स्व. शुक्ला चौधरी के निवास पर भी शोक का माहौल है। स्व. शुक्ला चौधरी के सुपुत्र शांतनु चौधरी ने अपने मामा को याद करते हुए कुछ फोटोग्राफ्स शेयर किए हैं। ब्लैक एंड वाइट फोटो बप्पी के बाम्बे स्थित निवास की है।

इस फोटो में शांतनु अपने माता-पिता व छोटी बहन के साथ हैं, वहीं बप्पी दा के साथ उनके माता-पिता हैं। वहीं कलर फोटो शांतनु के दुर्ग सिंधिया नगर स्थित निवास की है।

 1995 में दुर्ग में फिल्म स्टार नाइट में शामिल होने आए बप्पी दा अपनी बहन के घर भी पहुंचे थे। तब बप्पी दा के साथ इस फोटो में शांतनु व उनके माता-पिता भी नजर आ रहे हैं। 

शांतनु बताते हैं- शुरूआती दौर में जब मामा हमारे सेक्टर-8 वाले घर आते थे तो मैं बहुत छोटा था। कुछ हल्की सी यादें हैं। मामा हमारे साथ कई बार रहते थे। फिर बाम्बे या कलकत्ता जाते थे। जब भी भिलाई रुकते तो सिविक सेंटर और सेक्टर-6 कालीबाड़ी जरूर जाते थे।

 जब फिल्मों में मामा व्यस्त होते गए तो उनका यहां आना कम होता गया। इसके बाद तो वह कभी-कभार किसी स्टेज परफार्मेंस के नाम पर रायपुर या भिलाई-दुर्ग आने पर ही घर आते थे। 

परिवार के सभी सदस्यों के प्रति बप्पी दा हमेशा बेहद स्नेही रहे। वह सभी का हालचाल पूछते रहते थे। शांतनु कहते हैं-अब मेरे माता-पिता नहीं रहे और बप्पी मामा ने भी हमारा साथ छोड़ दिया। ऐसे में हम परिवार के लोग अपने-आप को बहुत ही अकेला महसूस कर रहे हैं। 

Saturday, January 15, 2022


एक कारखाने के बनने की कथा और अंतर्कथा 

-जाहिद खान, शिवपुरी (मध्यप्रदेश)

समीक्षक जाहिद खान अपने निवास पर

‘वोल्गा से शिवनाथ तक’ छत्तीसगढ़ के विश्व प्रसिद्ध ‘भिलाई स्टील प्लांट’ पर केन्द्रित दिलचस्प और तमाम दस्तावेजी जानकारियों से भरी एक मुकम्मल किताब है। लेखक-पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन की यह शानदार किताब एक अलग ही शिल्प में लिखी गई है। 

कहीं ये किताब ‘भिलाई स्टील प्लांट’ के गौरवशाली इतिहास के बारे में सूक्ष्म जानकारियां देती है, तो कहीं इस प्लांट से जुड़े रूसी और भारतीय इंजीनियर-अधिकारियों के संस्मरण, इस्पात नगरी के बनने और उनके संघर्षमय जीवन की झलकियां दिखलाते हैं। किताब के कुछ अध्याय सीधे-सीधे रिपोर्ताज की शक्ल में हैं, तो अनेक महत्वपूर्ण लोगों के साक्षात्कार से प्लांट की अंतर्कथा मालूम चलती है। 

हां, किताब में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के तीन ऐतिहासिक भाषण भी शामिल हैं, जो उन्होंने अलग-अलग वक्त में ‘भिलाई स्टील प्लांट’ के दौरे के दौरान दिए थे। अपने एक भाषण में नेहरू ने भिलाई को मुल्क की तरक्की और खुशहाली की बुनियाद बतलाया था। उनका यह दावा बाद में सच साबित हुआ।

फरवरी, 1960 को सोवियत संघ के तत्कालीन प्रधानमंत्री निकिता सरगेयेविच खु्रश्चेव के दो दिवसीय दौरे का भी लेखक ने किताब में तफ्सील से जिक्र किया है। यह जानना भी बेहद जरूरी होगा कि भिलाई कारखाने के निर्माण के पीछे नेहरू के साथ-साथ ख्रुश्चेव की बड़ी भूमिका थी। अगर खु्रश्चेव दिलचस्पी नहीं लेते, तो यह कारखाना आकार नहीं लेता। किताब में शामिल अनेक तस्वीरें, हमें उस दौर में ले जाती हैं, जब इस कारखाने का विस्तार हो रहा था। 

प्रकाशित समीक्षा

कुल मिलाकर ‘भिलाई स्टील प्लांट’ की स्थापना और इसके विकास को अच्छी तरह से जानना-समझना है, तो ‘वोल्गा से शिवनाथ तक’ एक मददगार किताब है। जो अथक शोध, धैर्य और परिश्रम के साथ लिखी गई है। हिंदी में इस तरह का काम बहुत कम हुआ है। 

अलबत्ता, मुहम्मद जाकिर हुसैन जरूर इस तरह का काम पहले भी कर चुके हैं। इस किताब से पहले इस्पात नगरी भिलाई पर साल 2012 में उनकी एक और महत्वपूर्ण किताब ‘भिलाई-एक मिसाल’ आई थी, जो काफी चर्चा में रही।

 वोल्गा नदी, अविभाजित रूस की जीवनरेखा रही है, तो शिवनाथ नदी छत्तीसगढ़ की। विश्व की सारी आधुनिक सभ्यताएं, नदी किनारे विकसित हुईं। भिलाई, शिवनाथ नदी के किनारे तो नही है, लेकिन इस नदी से ‘भिलाई स्टील प्लांट’, के लिए पानी की आपूर्ति हुई और एक आधुनिक शहर अस्तित्व में आया। जिसकी संस्कृति मिली-जुली है

प्रकाशित समीक्षा

रशियन टेक्नालॉजी, वर्क कल्चर और छत्तीसगढ़ी संस्कृति से मिलकर भिलाई में एक ऐसी संस्कृति बनी जो बेजोड़, बेमिसाल है। किताब में जितने भी इंटरव्यू हैं, चाहे वे रूसियों के हों या फिर भारतीयों के इनमें एक दूसरे के प्रति गहरी दोस्ती, मुहब्बत, एहतराम और यकीन झलकता है। 

किताब का सबसे दिलचस्प हिस्सा, ऐसे दंपतियों के इंटरव्यू हैं, जिनमें पति भारतीय और पत्नी रशियन हैं। इन इंटरव्यू से मालूम चलता है कि मुहब्बत, किसी देश-दुनिया की दीवार और बंधनों को नहीं मानती। लेखक ने किताब में उस अनुबंध को भी शामिल किया है, जो भारत सरकार और सोवियत संघ के बीच हुआ था।

अनुबंध से मालूम चलता है कि परियोजना के लिए दोनों सरकारों के बीच उस वक्त क्या-क्या अहम करार हुए थे। छोटे-छोटे अध्यायों में बंटी ‘वोल्गा से शिवनाथ तक’ की कोई कमी की यदि बात करें, तो जितना संजीदा कंटेन्ट है, उसके बरक्स किताब की छपाई बेहद निम्न स्तर की है। 

किताब बिल्कुल टेक्स्ट बुक की तरह लगती है। प्रकाशक ने पेपरबैक किताब का दाम तो पांच सौ रुपए रखा है, लेकिन क्वालिटी थोड़ी सी भी देने की कोशिश नहीं की है। जबकि किताब की मांग को देखते हुए, एक साल के अंदर इसका दूसरा संस्करण आ गया है।

शीर्षक: वोल्गा से शिवनाथ तक

लेखक:मुहम्मद जाकिर हुसैन

समीक्षक-जाहिद खान, महल कॉलोनी, शिवपुरी मप्र 

मोबाईल 94254 89944 

मूल्य : 500 (पेपरबैक संस्करण), 

प्रकाशक : सर्वप्रिय प्रकाशन, नई दिल्ली

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 लोहे का बदन... लोहे का कारखाना 

गर छूने से नहीं सिहरता तो मेरे किस काम का

-पीयुष कुमार, रामानुजगंज छत्तीसगढ़ 

इंसानी सभ्यता की बड़ी पहचान उसकी बनाई तामीर है। मिस्र के पिरामिड्स से लेकर सिंधु सभ्यता और और आज शंघाई की गगनचुम्बी इमारतों को देखकर यह बेहतर समझा जा सकता है। सभ्यता के इस विकास क्रम में स्टील का सबसे बड़ा योगदान है। 

यह इस्पात कैसे बनता है और इसमें लोहे के साथ पसीना, दिमाग और जज्बात किस तरह घुले मिले हैं उसकी यह अलहदा सी कहानी है जिसे भिलाई के पत्रकार लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने 'वोल्गा से शिवनाथ तक' में बयान किया है। 

राहुल सांकृत्यायन आज होते तो उन्हें खुशी होती कि 'वोल्गा से गंगा' के अलावा एक धारा शिवनाथ (नदी) तक भी बह चली है, वह धारा जिसने देश की आज़ादी के बाद उसके भविष्य को थामकर रखने के लिए बुनियाद दी। 

जी हां, यह किताब रूस के सहयोग से 1955 में स्थापित भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना और प्रक्रिया पर आधारित है जिसमें लोहे को इस्पात में बदलने में लगे जज्बातों का पानी मिला हुआ है। भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना रूस के सहयोग से हुई थी। 

ऐसे में रूसी इंजीनियरों का भिलाई आना और उनके यहां रम जाने के किस्से पढऩा अद्भुत एहसास कराते हैं। इन किस्सों में एक ओर जहां भिलाई इस्पात संयंत्र के विकास क्रम में हुई हर बात जो भट्टी के अंदर के ताप से रूबरू कराती है, वहीं साथ मिलकर काम करने से उपजे इंसानी रिश्तों की तरलता भी साथ साथ बहती है। गौरतलब है कि कई रूसी महिलाओं ने यहीं भारतीय पुरुषों के साथ विवाह कर यहीं घर बसा लिया है जिनमे से कई जोड़ों का तस्वीर सहित इसमें जिक्र है। 

पहली-दूसरी पंचवर्षीय योजनाओं में बने औद्योगिक तीर्थों की खास बात यह है कि हर जगह वे एक लघु भारत का निर्माण करते हैं। छत्तीसगढ़ के भिलाई की भी यही कहानी है। यह बोकारो, राऊरकेला जैसे शहर के लोग और रेलवे में जिनके पिता या दादाजी कार्यरत रहे हैं, वे भी बेहतर महसूस कर सकते हैं। 

विशेष ढंग से बनी कालोनियां, पार्क, अस्पताल, स्कूल, पेड़ पौधे और मार्केट इन्हें बाकी जगहों से अलग करते हैं। यह किताब देश के बुनियादी विकास का एक दस्तावेज है। औद्योगिक नगरीयकरण में श्रम, सहकार और विभिन्न सांस्कृतिक पहचानों में गुंथे समाज को साहित्यिक विधाओं और विमर्शों में जगह नहीं मिली है, इस लिहाज से यह किताब इस कमी को पूरा करती है और प्रेरित करती है कि हर ऐसी जगहों को उसके मिजाज बदलने से पहले ही दर्ज कर लिया जाए। लेखक को इस किताब के लिए बधाई।

 सुझाव है कि आप भी यह किताब जरूर पढ़ें ताकि पता लगे कि साहित्य में कविता कहानी से अलग भी कोई दुनिया है। 

संपर्क-+918839072306 

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एक खुशहाल मुल्क बनने का ब्यौरा इस किताब में 

 -पल्लव चटर्जी, भिलाई छत्तीसगढ़

'वोल्गा से शिवनाथ तक' के लेखक मुहम्मद ज़ाकिर हुसैन को मैं मुबारकबाद देता हूं। उन्होंने अपनी पुस्तक में तत्कालीन रुसी प्रधानमंत्री खुशचेव तथा भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जी के मित्रतापूर्ण संबंध और भिलाई में आधुनिक भारत के लौह इस्पात संयंत्र निर्माण कार्य पूरा कर इस्पात उत्पादन सम्भव बनाने का ब्यौरा दिया है। 

केवल कृषि प्रधान देश नहीं हमें कुछ नये ख्वाब देखना होगा। देश में खनिज पदार्थ का इस्तेमाल करके नये तकनीकी शिक्षा को अपनाकर देश को स्वाबलंबी बनाने हेतु भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने यह विचार व्यक्त किए। 

उनके इस विचार को किस प्रकार रुसी भाईयों ने वास्तव में परिणत किया उसका बिस्तारपूर्वक उल्लेख लेखक ने अपनी किताब में किया है। दोस्ती बढी, प्रेम बढ़ा दो बड़े देशों के बीच। विश्व में आधुनिक भारत का लोहा मनवाया रूसी मित्रता ने। धीरे धीरे एक खुशहाल मुल्क बनाने का विवरण इस पुस्तक में मिलता है। इस पुस्तक को पढ़कर मुझे बेहद संतुष्टि मिला।

 मैं मोहम्मद जाकिर हुसैन के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं। 

संपर्क -+918109303936