Friday, February 9, 2018

दहक उठी भिलाई की सबसे बड़ी भट्ठी

सीईओ एम रवि के हाथों ब्लास्ट फर्नेेस-8 (महामाया) का ब्लोइंग इन


सेल-भिलाई इस्पात संयंत्र अपने 70 लाख टन अत्याधुनिकीकरण एवं विस्तारीकरण कार्यक्रम के तहत ब्लास्ट फर्नेस क्रमाँक-8 के सम्पूर्ण स्थापना कार्य के साथ एक महत्वपूर्ण मील के पत्थर को पार कर लिया। बीएसपी के सीईओ एम रवि ने 2 फरवरी को नए ब्लास्ट फनेस-8 का ब्लोइंग इन किया।     इस अवसर पर सीईओ एम रवि ने टीम भिलाई पर विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि संयंत्र के कर्मठ कार्मिकों ने हर क्षण मुझे प्रतिबद्धता के साथ सहयोग किया है। उन्होंने आशान्वित होते हुए कहा कि भिलाई की सृजनात्मक कार्यसंस्कृति बहुत जल्द ही उत्कृष्टता के साथ अपनी साख को बनाये रखने में सफल होगी।
     कार्यक्रम के दौरान जनसम्पर्क विभाग द्वारा निर्मित ब्लास्ट फर्नेस-8 से संबंधित लघु फिल्म का प्रदर्शन किया गया। जिसमें ब्लास्ट फर्नेस-8 के भूमिपूजन से लेकर अब तक के सफर को प्रदर्शित किया गया। 
     महामाया के नाम से नामांकित संयंत्र का नया ब्लास्ट फर्नेस अत्याधुनिक डिजाइन से तैयार किया गया है, जिसका विस्तार क्षेत्र 4060 क्यूबिक मीटर है और प्रतिदिन 8030 टन के साथ वार्षिक हॉट मेटल उत्पादन क्षमता 2.8 मिलियन टन है। इस नये ब्लास्ट फर्नेस के प्रारंभ हो जाने से भिलाई इस्पात संयंत्र से वर्तमान में प्रतिवर्ष 5 मिलियन टन हॉट मेटल उत्पादन से 7.5 मिलियन टन उत्पादन क्षमता बढ़ जाएगी।
नये ब्लास्ट फर्नेस-8 में कास्ट हाउस व स्टॉक हाउस डी-डस्टिंग सिस्टम, टॉप रिकवरी टर्बाइन, (टीआरटी), पल्वराइज्ड कोल इंजेक्शन (पीसीआई), कार्बन ब्लाक के माध्यम से माडर्न हीट ट्राँसमिशन सिस्टम, सिरेमिक कप व एसजीआई तथा क्यू-स्टोव और अत्याधुनिक तकनीक से एनर्जी-एफिशिएंट तथा प्रदूषण नियंत्रण उपकरण जिसमें वेस्ट हीट रिकवरी सिस्टम भी शामिल है जैसी अत्याधुनिक तकनीकी विशेषताओं का समावेश है। विदित हो कि संयंत्र के परियोजना विभाग के ब्लास्ट फर्नेस जोन द्वारा सतत्  सुपरविजन एवं मेसर्स पॉल वर्थ इटली (पीडब्ल्यूआईटी) के कंसोर्टियम में मेसर्स पॉल वर्थ, इण्डिया (पीडब्ल्यूआईएन) तथा मेसर्स एल एंड टी द्वारा नये ब्लास्ट फर्नेस के स्थापना कार्य को सफलतापूर्वक पूरा किया गया। साथ ही इस परियोजना के विभिन्न साइट में सिविल, मेकेनिकल, स्ट्रक्चरल एवं उपकरण निर्माण का कार्य बड़े पैमाने पर पूर्ण किया गया। बीएसपी के ब्लास्ट फर्नेस-8 परियोजना कार्य के लिए सेल मुख्यालय, नई दिल्ली से महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्राप्त होता रहा है। साथ ही संयंत्र के सभी विभागों ने इस कार्य को सम्पन्न करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया है। 
इस अवसर पर सेल के निदेशक (परियोजनाएँ) डॉ गणेश विश्वकर्मा एवं सलाहकार व पूर्व प्रबंध निदेशक बी के सिंह तथा ब्लास्ट फर्नेसेस के पूर्व अधिकारी श्री धींगरा  सहित संयंत्र के कार्यपालक निदेशक (कार्मिक एवं प्रशासन) एम के बर्मन, कार्यपालक निदेशक (परियोजनाएँ) ए के माथुर, कार्यपालक निदेशक (संकार्य) टी बी सिंह, कार्यपालक निदेशक (सामग्री प्रबंधन) रीता बैनर्जी, कार्यपालक निदेशक (वित्त एवं लेखा) बी पी नायक एवं संयंत्र के महाप्रबंधकगण, अन्य विभागों के वरिष्ठ अधिकारी, परियोजनाएँ एवं ब्लास्ट फर्नेसेस विभाग के सदस्यों तथा बड़ी संख्या में संयंत्र के कर्मचारीगण उपस्थित थे।  

Wednesday, November 1, 2017

55 साल का नाता छूट न सका तो केरल में बना लिया 'भिलाई हाउस'

भिलाई में अपनी आधी जिंदगी बिताने वाले अबूबक्र का केरल का घर है एक मिसाल  

केरल में अबूबक्र अपने भिलाई हाउस के सामने 
इस्पात नगरी भिलाई से अपना लगाव सुदूर केरल जाकर भी भुला नहीं पाए अबूबक्र। आज भले ही वो अपने जन्मस्थान में लौट गए हैं लेकिन रह-रह कर उन्हें अपने भिलाई की याद सताती है।
भिलाई में बिताए दिनों की याद कुछ ज्यादा ही परेशान करने लगी तो केरल में अबूबक्र ने अपने मकान का नाम ही 'भिलाई हाउस' रख दिया। आज उनका यह भिलाई हाउस' सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों के बीच खासा चर्चित हो गया है वहां के लोगों के लिए एक लैंडमार्क बन गया है।
केरल के त्रिशूर जिले के काटूर गांव निवासी एए अबूबक्र 1958 में अपने दूसरे रिश्तेदारों के साथ भिलाई पहुंचे थे। यहां उन्होंने भिलाई स्टील प्लांट में नौकरी तो नहीं की लेकिन रोजी-रोटी के लिहाज से भिलाई-तीन में टेलरिंग की एक छोटी सी दुकान खोल ली।
शुरूआत में उनका इरादा कुछ साल बाद केरल लौट जाने का था लेकिन बाद देखते ही देखते बरस बीतते गए और अबूबक्र व उनका परिवार पूरी तरह भिलाई का ही हो कर रह गया। उनके बच्चे  और दूसरे रिश्तेदार भिलाई स्टील प्लांट, निजी व्यवसाय सहित अलग-अलग क्षेत्रों में व्यस्त हैं। करीब 55 साल बाद इस वृद्धावस्था में जब उन्हें अपने जन्मस्थान लौटना पड़ा तो उनके लिए एक पीड़ादायक अनुभव था। पुरखों की जमीन में लौटते हुए अबूबक्र अपने साथ भिलाई की यादें लेकर गए।
चार साल पहले वहां जब उन्होंने अपने नए मकान में कदम रखा तो भिलाई की उन्हीं यादों को ताजा करते हुए इसका नाम 'भिलाई हाउस' रख दिया। पिछले हफ्ते भिलाई स्टील प्लांट के रिटायर डीजीएम जीएस सेंगर अपने पारिवारिक मित्र और यहां सीआईएसएफ  में कार्यरत सीएम रफीक के साथ केरल पहुंचे तो भिलाई हाउस देखकर उनकी भी खुशी का ठिकाना न रहा।
अबूबक्र दरअसल रफीक की अम्मी के मामा लगते हैं। सेंगर ने बताया कि भिलाई का नाम आते ही अबूबक्र बेहद भावुक हो जाते हैं। खास कर अगर कोई भिलाई से पहुंच जाए तो अबूबक्र के लिए वह दिन बेहद खुशी का होता है। सेंगर के मुताबिक अबूबक्र ने मेहमान नवाजी में कोई कसर नहीं छोड़ी साथ ही भिलाई में बिताए दिनों को हर पल याद करते रहे।
रफीक बताते हैं कि अबूबक्र यहां भिलाई-तीन मेें 50 साल रहे हैं। वहीं अब भी बहुत से रिश्तेदार भिलाई में रहते ही हैं। इसलिए भिलाई से रिश्ता तो बना हुआ है और इसी रिश्ते की पहचान के तौर पर उन्होंने अपने घर का नाम 'भिलाई हाउस' रखा है। रफीक ने बताया कि अक्सर त्रिशूर जिले में भिलाई से रिटायर हो कर गए लोग उनके मकान की नेमप्लेट देखकर अंदर जरूर आते हैं और फिर भिलाई की यादें मिल बैठकर ताजा करते हैं।
भिलाई की यादों के सहारे लगता है यहां मन 
हरिभूमि भिलाई 6 अक्टूबर 2017 में प्रकाशित खबर 
केरल से फोन पर चर्चा करते हुए एए अबूबक्र ने बताया कि 1958 में जब वो भिलाई पहुंचे थे तो भिलाई स्टील प्लांट कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था। बहुत सारे मजदूरों को मैं देखता था कि सब जाते अच्छे कपड़ों में हैं और लौटते हुए ग्रीस-आइल में लिपे-पुते आते हैं तो मुझे कुछ अटपटा लगा। फिर उन दिनों मजदूरों की मौत बहुत ज्यादा होती थी। इसलिए भले ही मेरे सारे रिश्तेदार बीएसपी में लग गए लेकिन मैनें नौकरी नहीं की। हालांकि भिलाई का माहौल मुझे भा गया तो वहीं रहने लग गया।
55 साल में पूरे 45 साल मैं किराए के मकान में रहा। इस दौरान मैं कैम्प-4 (खुर्सीपार) और तितुरडीह दुर्ग में भी रहा। भिलाई तीन में टेलरिंग की शॉप से परिवार चल गया, इसलिए कहीं जाने का सवाल ही नहीं था। अभी भी मेरा बड़ा बेटा नौशाद कवर्धा में और छोटा बेटा शाहजहां भिलाई-तीन में रहते हैं।
पुरखों की जमीन में केरल लौटना था, इसलिए आना पड़ा। अपने घर का नाम 'भिलाई हाउस' रख लिया जिससे कि भिलाई की याद ताजा होती रहे और किसी को पता पूछने में दिक्कत न हो। सच बताऊं तो यहां उतना मन नहीं लगता है। गांव के ज्यादातर लोगों के बच्चे गल्फ  में हैं। मेरे बच्चों के बच्चे भी दूसरे शहरों में पढ़ रहे हैं। बहुत कम मौका आता है, जब पूरा परिवार इकट्ठा होता है। नहीं तो भिलाई की यादों के सहारे दिन कटते हैं। 

Sunday, April 23, 2017

 सड़क के रास्ते रावघाट खदान से जाएगा आयरन ओर

पहुंच मार्ग पर ट्राइल रन सफल परियोजना का मील का पत्थर हासिल

भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए भविष्य में लौह अयस्क का सुरक्षित भंडार साबित होने जा रहे रावघाट खदान तक भले ही रेल पटरियां न बिछ पाईं हो लेकिन सेल  बीएसपी ने अब सड़क मार्ग से लौह अयस्क लाने की तैयारी पूरी कर ली है। इस दिशा में 21 अप्रैल 2017 को एक महत्वपूर्ण पड़ाव हासिल हुआ है,जिसमें बीएसपी को आवंटित रावघाट खदान के एफ ब्लॉक से पहुंच मार्ग पर लौह अयस्क से लदे प्रथम ट्रक का ट्राइल रन सफलतापूर्वक संचालित किया गया। 
21 अप्रैल को बीएसपी को आवंटित रावघाट खदान का एफ ब्लॉक से अप्रोच रोड पर लौह अयस्क से लदे प्रथम ट्रक का ट्राइल रन को पीके सिन्हा, कार्यपालक निदेशक (खदान- रावघाट) एवं एमके बर्मन, कार्यपालक निदेशक (कार्मिक एवं प्रशासन) की उपस्थिति मे सफलतापूर्वक अंजाम दिया गया। 
रावघाट भिलाई इस्पात संयंत्र की पूरी टीम को प्रेरित करने के अलावा,इस ट्रायल रन का उद्देश्य अप्रोच रोड की मजबूती/क्षमता,ढलान, घुमावदार क्षमता को निर्धारित करना था। 
रावघाट में अंतरिम खनन संचालन शुरू करने के लिए यह पहला कदम है।आगे की गतिविधियों में राजहरा से केवटी तक चलने वाली रेलवे लाइन को पूरा करने और रावघाट से केओति तक सड़क द्वारा अयस्क परिवहन की सरकारी अनुमति हासिल करना शामिल है। यह दोनों गतिविधियां अक्टूबर/नवंबर 2017 तक पूरी होने की संभावना है।इसके बाद रावघाट अयस्क को अंतरिम खनन के द्वारा भिलाई को उपलब्ध कराया जाएगा। 
भिलाई इस्पात संयंत्र महारत्न सेल का एकमात्र संयंत्र है जिसकी अपनी  स्वयं की कैप्टिव लौह अयस्क खदानें है और इस लाभ का फ ायदा उठाने के लिएसेल-भिलाई विभिन्न सरकारी एजेंसियों के साथ रावघाट खदान को हासिल करने के लिए सभी आवश्यक और सांविधिक मंजूरी पाने के भरसक प्रयास करता रहा है। 
पहली बार 1983 में खनन हेतु लीज के लिए आवेदन किया था। इसके बाद एक संशोधित आवेदन राज्य सरकार को 2 जून 1988 को प्रस्तुत किया गया। फॉरेस्ट क्लियरेंस का प्रथम चरण अक्टूबर 2008 में और पर्यावरण मंजूरी जून 2009 में प्राप्त की थी।
पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा भिलाई इस्पात संयंत्र को 5 अगस्त 2009 को स्टेज-2 यानि अंतिम फॉरेस्ट क्लियरेंस प्रदान किया गया। 15 सितंबर 2009 को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा भिलाई इस्पात संयंत्र को खनन हेतु लीज प्रदान की गयी जिससे रावघाट 'एफझ् ब्लॉक की लौह अयस्क भंडार से संयंत्र द्वारा खनन का मार्ग खुल गया। 
भिलाई से 185 किमी दक्षिण में स्थित रावघाट एफ ब्लॉक मटला आरक्षित वन क्षेत्र के तहत नारायणपुर और कांकेर के जिलों में फैला हुआ है और यहाँ का अनुमानित लौह अयस्क भंडार 511 मिलियन टन है। बीएसपी वतर्मान में आधुनिकरण एवं विस्तारिकरण कार्यक्रम से गुजर रहा है जिसके फलस्वरूप संयंत्र की हॉट मेटल बनाने की क्षमता 7.5 मिलियन टन तक बढ़ जाएगी। बीएसपीके दल्ली-राजहारा के मौजूदा कैप्टिव लौह अयस्क खदानों का भंडारण तेजी से घट रही है और सभी आवश्यक पर्यावरण और वन संबंधी मंजूरी हासिल करने के बाद खनन लीज के अनुदान से सेल और बीएसपी को बहुत राहत मिली है । हालांकि, रावघाट इलाके के सुरक्षा मुद्दों के चलते परियोजना पर काम वांछितगति प्राप्त नहीं कर पाया।  
फलस्वरूप भिलाई इस्पात संयंत्र की भविष्य की कच्ची सामग्री की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रावघाट परियोजना के महत्व और गंभीरता को समझतेहुए महारत्न सेल ने गृह मंत्रालय को परियोजना मे लगे विभिन्न कमिर्यों और ठेकेदारों की जिंदगी और संपत्ति की सुरक्षा हेतु बल प्रदान करने के लिए अनुरोध किया।रावघाट में खनन परियोजना कार्य को सुनिश्चित करने  के लिए सीमा सुरक्षा बल के दो बटालियन प्रदान किए गए।साथ ही एसएसबी की दो बटालियन प्रदान की गयी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि दल्ली-राजहारा से रावघाट तक का रेल लाइन के विभिन्न हिस्सों का कार्य प्रगति कर सके।सेल-बीएसपी ने पैरा-मिलिटरी फोर्सेस को इस क्षेत्र मे कैंप स्थापित करने के लिए सभी जरूरी आधारिक संरचना प्रदान की है।  
कमिर्यों और उपकरणों की सुरक्षा की सुनिश्चिति के साथ, भिलाई इस्पात संयंत्र के रावघाटखदान विभाग के कमर्चारी आगे बढ़ते गए, विशेष रूप से पिछले दो सालों में, बिना कोई कसर छोड़ते हुये कई महत्वपूर्ण कार्यों को अंजाम दिया जैसे पेड़ के कटाई, खदान के लिए अप्रोच मार्ग का निर्माण, रेलवे लाइन के निर्माण और पानी की पाइपलाइनों आदि बिछाने सहित अन्य संबंधित कार्यों सहित कई अन्य मोर्चों पर तेजी से प्रगति दर्ज की है ।  
जबकि एक ओर नए खनन सुविधाओं की स्थापना के लिए सभी गतिविधियां जैसे सड़क निर्माण और रेलवे के चरण-वार बिन्दुओं को गति प्रदान की गयी,सीएसआर की गतिविधियों को बड़े पैमाने पर बीएसपी के खदान-सीएसआर कमिर्यों ने संचालित कर स्थानीय लोगों के दिल मे जगह बना ली।