Friday, January 14, 2022

 

वोल्गा से शिवनाथ तक एक अभूतपूर्व दस्तावेज,पठनीय ग्रंथ 

 

समीक्षक-डॉ. परदेशी राम वर्मा 

 

मैं अतीत को जीत,जीत की पहली एक किरण हूँ,

 भारत के आते भविष्य का मैं मंगलाचरण हूँ। 

बदल रहा यह देश विश्व को मैंने दिखा दिया है,

 मैं भिलाई का नगर कि मैंने जीना सिखा दिया है। 


उपरोक्त पंक्तियां दिवंगत रमाशंकर तिवारी द्वारा रचित हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र के जनसम्पर्क विभाग में प्रमुख थे। भिलाई इस्पात संयंत्र के शुरूआती दौर में कुछ ऐसे कर्मचारी और अधिकारी यहाँ आये जिन्होंने साहित्य के क्षेत्र में भी यश प्राप्त किया। 

दानेश्वर शर्मा,रविशंकर शुक्ल, रमाशंकर तिवारी,मोहन भारती और केशव पाण्डे जैसे कवि चढ़ती जवानी के दिनोंं में यहाँ आये और आगे चलकर वे अपने अपने क्षेत्रों के दिग्गज कहलाये। केशव पाण्डे जनवादी लेखक संघ दुर्ग जिला के अध्यक्ष बने। दानेश्वर शर्मा लिटररी क्लब के अध्यक्ष बने और मोहन भारतीय ने प्रतिष्ठित जैनी पत्रिका का एक दशक तक संपादन किया। इनमें केशव पाण्डे, मोहन भारतीय और रमाशंकर तिवारी अब हमारे बीच नहीं हैं। 

समीक्षक और लेखक 

प्रसिद्ध पत्रकार और सेंट थॉमस कालेज भिलाई के पत्रकारिता विभाग में शिक्षाविद् मुहम्मद जाकिर हुसैन द्वारा लिखित पुस्तक 'वोल्गा से शिवनाथ तक' में भिलाई नगर की वंदना का रमाशंकर तिवारी लिखित यह गीत महत्व के साथ प्रकाशित है। 

जाकिर छत्तीसगढ़ के जिम्मेदार और प्रतिष्ठित युवा पत्रकार हैं। नई पीढ़ी के जिन पत्रकारों ने अपना विशिष्ट स्थान बनाया जाकिर उनमें से एक प्रमुख नाम है। वे अपने दायित्वों को निबाहते हुए पुस्तक लेखन भी करते हैं। अब तक उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। 'वोल्गा से शिवनाथ तक' उनकी तीसरी पुस्तक है।

वरिष्ठ साहित्यकार रवि श्रीवास्तव की टिप्पणी वीडियो पर

निश्चित रूप से शीर्षक राहुल सांकृत्यायन की किताब 'वोल्गा से गंगा' की तर्ज पर है लेकिन 'वोल्गा से शिवनाथ तक' इस शीर्षक में ही पूरी किताब की आंतरिक सामग्री के सम्बन्ध में लेखक ने अपना उद्देश्य स्पष्ट कर दिया है। पुस्तक लेखन में सदैव शीर्षक चयन का विशेष महत्व होता है।

विशेषकर किसी विशेष संदर्भ को केन्द्र में रखकर लिखी गई किताब में तो शीर्षक का चयन पाठक को जुडऩे का आमंत्रण ही देती है। वोल्गा रूस की नदी है शिवनाथ छत्तीसगढ़ के दुर्ग नगर के पास बहने वाली नदी है। शिवनाथ नदी से जुड़ा है दुर्ग शहर जिसके पास ही भिलाई नगर यह नया नगर आबाद हुआ। रूसी भाषा में दोस्ती को द्रुगे कहा जाता है। 

वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध की टिप्पणी वीडियो पर

आश्चर्य तथ्य यह है कि छत्तीसगढ़ी में भी इसे दु्रग या दुरूग ही कहते हैं। छत्तीसगढ़ी और रूसी की दोस्ती भी दु्रगे शब्द में निहित है। भारत और रूस ने मिलकर भिलाई इस्पात संयंत्र को खड़ा किया। यह द्रुग अर्थात दोस्ती की मिसाल भी है। जवाहर लाल नेहरू ने इस तरह के नए उद्योग नगरी को भारत का नया तीर्थ कहा। विनोबा भावे ने भिलाई कारखाने को भलाई कारखाना कहा।

 जाकिर इससे पहले 'भिलाई एक मिसाल' और इस्पात नगरी के प्रसिद्ध रंगकर्मी सुब्रत बसु पर 'फौलादी रंगकर्मी सुब्रत बसु' पुस्तक भी लिख चुके हैं। जाकिर हिन्दी और उर्दू के अच्छे जानकार हैं। उनके पास आमफहम सर चढ़कर बोलने वाली भाषा है। वे कल्याण महाविद्यालय के छात्र हैं। उन्होंने इतिहास में एमए किया है। वे बाकायदा पत्रकारिता में डिग्री के साथ सक्रिय हैं। 

वरिष्ठ पत्रकार डॉ. हिमांशु द्विवेदी की टिप्पणी वीडियो

अपनी अब तक की दो दशक की पत्रकारिता में उन्हें दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ और हरिभूमि में कार्य का अनुभव है। 'हरिभूमि' में ही लगातार पन्द्रह दिनों तक उनका कॉलम 'वोल्गा से शिवनाथ तक' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। जिसमें प्रकाशित सभी साक्षात्कार रूसी दम्पत्तियों के थे जो भिलाई में ही बस गए हैं। 

पुस्तक में पहला लेख है 'ऐसे साकार हुआ भिलाई'। इस प्रथम लेख में जाकिर ने 1955 से लेकर 1961 तक के संघर्ष भरे दिनों का खाका खींचा है। इसमें 1932 में आये इस सिलसिले के महत्वपूर्ण प्रस्ताव का जिक्र भी है। किस तरह 1945 में आयरन एण्ड स्टील पैनल बना, कब से हुआ भिलाई कारखाने के लिए भूमि अधिग्रहण और पंचवर्षीय योजना में भारत सरकार ने किस तरह 1952 में देश में इस्पात की खपत की दिशा में ठोस चिंतन किया। फिर सोवियत संघ से संबंध बने, धीरे-धीरे भिलाई के सामने आ रही अड़चने हटीं। 1953 में पंडित रविशंकर शुक्ल ने ऐलान कर दिया था कि वे भिलाई के पक्ष में केंद्र सरकार के सामने दृढ़ता से बात रखेंगे।

प्रथम संस्करण के विमोचन अवसर का वीडियो

 10 सितम्बर 1954 की बैठक में सोवियत संघ से सहयोग लेने का प्रस्ताव पारित हुआ। 2 फरवरी 1955 को 10 लाख टन हाट मेटल सालाना उत्पादित करने हेतु संयंत्र लगाने हेतु सोवियत संघ और भारत के बीच समझौता हुआ। धीरे-धीरे लाल मिट्टी, डासा कन्हार वाली धरती जिसे धान का कटोरा कहा जाता है वहाँ भिलाई इस्पात संयंत्र आकार लेने लगा। रूस ठंडा मुल्क हैं और वहाँ से विशेषज्ञ भिलाई आये जो बरसात और गर्मी के मौसम में खूब अपना रंग दिखाता है।

द्वितीय संस्करण के विमोचन अवसर का वीडियो

यहाँ खूब बारिश भी होती है और गर्मी भी अधिक पड़ती है। रूसी विशेषज्ञ ठंडे माहौल में रहने के आदी थे। उन्हें मौसम, भाषा, भोजन और अन्य परिस्थितियों से समझौता करना पड़ा। लेकिन एक बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित इस्पात सेनानियों ने यहाँ धीरे-धीरे उत्साह का वातावरण बना दिया। 'द्रुगे' अर्थात दोस्ती ने विशाल कारखाने को बहुत कम समय में खड़ा कर दिया। 

मैत्री बाग भिलाई नगर में इसी दोस्ती को महत्व देते हुए बनाया गया। जहाँ संस्थापकों की प्रतिमा भी लगाई गई है। 1 जुलाई 1956 को मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल भिलाई आए। उसके बाद देश के मूर्धन्य नेतागण लगातार भिलाई आये। जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, विनोबा भावे से लेकर नेहरू जी के साथ छुटपन में भिलाई आये राजीव गांधी भी बाद में प्रधानमंत्री के रूप में भिलाई आये। देश के जाने माने कलाकार, साहित्यकार भिलाई आये। 

श्रमिक संघर्ष ने यहाँ अपनी पहचान बनाई। भिलाई नगर में इण्टक, सीटू के बीच लगातार प्रतिद्वंद्विता रही मगर सभी श्रम संघों ने भिलाई मेें दोस्ताना माहौल बनाने का यत्न किया। इण्टक यूनियन के महासचिव रहे रवि आर्य कालान्तर में भिलाई के विधायक भी बने। शुरूआती दौर की हर परिस्थिति पर जाकिर ने इस पुस्तक में लेखन करने का प्रशंसनीय प्रयास किया है।

परी पुरोहित का स्वप्रेरणा से बनाया वीडियो मेरी किताब पर

 शुरू में भोजन और निवास के लिए यहाँ सुविधा नहीं थी। ऐसे दौर में पुरोहित होटल ने यहाँ सबसे पहले इस दिशा में काम किया। सेक्टर-1 में और कैम्प-1 में पुरोहित होटल स्थापित कर सेवा का कीर्तिमान रचा गया। तब बड़े-बड़े ठेकेदार पुरोहित होटल (लॉज) में ही ठहरते थे। मित्तल जैसे स्टील किंग भी यहीं ठहरे। 

बी के, बी.ई.सी, सिम्पलेक्स के रूप में बाद में फैक्ट्री लगाने वाले लोग तब ठेका लेने के लिए आते थे और पुरोहित लॉज में ही आसरा पाते थे। धीरे-धीरे सेक्टर-1 बना फिर अन्य सेक्टर बने। भिलाई नगर का पहली सिनेमा चित्रमंदिर सिविक सेंटर में तैयार किया गया। नेहरू सांस्कृतिक सदन बना। मड़ोदा टैंक ने भी आकार लेना शुरू किया। शिक्षा के केंद्र बने। 

1961 में छत्तीसगढ़ कल्याण समिति बनी। इस समिति ने भिलाई में आये युवा कमर्चारियों के लिए आगे की पढ़ाई के लिए महाविद्यालय प्रारंभ किया। स्व. रामेश्वर प्रसाद मिश्रा एवं तोरन सिंह ठाकुर के साथ कल्याण समिति के सदस्योंं ने सेक्टर 2 में पहले यहां रात्रिकालीन महाविद्यालय प्रारंभ किया। बाद में यह नियमित कल्याण महाविद्यालय 14 एकड़ जमीन पर सेक्टर-7 में आकार ग्रहण करता चला गया ।

 नेहरू चिकित्सालय ने यहाँ अपार यश अर्जित किया। इसी कारखानें से जुड़ी हैं पद्मभूषण तीजन बाई। विदेशी 64 मंचों पर पंथी के प्रदर्शन से देश का नाम रोशन कर चुके स्व. देवदास बंजारे भिलाई स्टील प्लांट के कर्मचारी थे। वे गुरू बाबा घासीदास के समतावादी संदेश को लेकर रूस, जापान, इंग्लैण्ड अमेरिका गए। उन्होंने हबीब तनवीर के प्रसिद्ध नाटक चरण दास चोर में काम कर अपार यश प्राप्त किया। 

जाकिर ने इन सबको अपनी किताब में यथोचित महत्व दिया है। अलेक्सेई निकोलाई कोसिजिन सोवियत संघ के मंत्री परिषद के उपाध्यक्ष के हाथों 1961 में भारत रूस मैत्री के प्रतीक स्तम्भ (ओबेलिस्क) की आधार शिला रखी गई। इसी प्रतीक स्तम्भ में एक तरफ जवाहरलाल नेहरू की पंक्ति अंकित हैं कि-'भिलाई भारत के भविष्य का शुभ शगुन एवं प्रतीक हैं।' दूसरी तरफ तत्कालीन रूसी प्रधानमंत्री खुश्चेव की पंक्ति है कि-'भारत-रूस की मैत्री भिलाई इस्पात संयंत्र की तरह मजबूत हो'।

 भिलाई इस्पात संयत्र की गतिविधियों एवं उपलब्धियों की ज्यादातर शानदार फोटोग्राफी हरीश जाधव जी द्वारा की गई है। इनकी फोटोग्राफी की कई प्रदशर्नी भी लगी है। देश की चर्चित पत्रिकाओं ने उनके द्वारा खीची गई फोटो को आदर के साथ प्रकाशित किया है। 

जाकिर ने अपनी किताब में 'टाइम कैप्स्यूल' का भी जिक्र किया है, जो 25 दिसम्बर 1965 को ब्लास्ट फर्नेस-4 की नींव में डाला गया। इस पुस्तक से गुजरते हुए मुझे एक शख्स के द्वारा रचित कीतिर्मानों को पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ। विजय सिंह पाराशर तत्कालीन सुपरिन्टेण्डेण्ट ब्लास्ट फर्नेस भिलाई इस्पात संयंत्र ने भी अपना अनुभव साझा किया है। वे नेहरू नगर में रहते हैं। पाराशर मेरी बहू के दादा जी हैं। मैं उन्हें विभिन्न पारिवारिक समारोहों में उनकी अग्रगामी भूमिका के कारण ही जानता और सम्मान देता था। इस पुस्तक से यह जानकारी मिली कि भिलाई इस्पात संयंत्र में काबिल इंजीनियर के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण सेवायें दी हैं। पुस्तक में 121वें पृष्ठ में उनके योगदान का विशेष जिक्र जाकिर ने किया है। 

पुस्तक में जाकिर ने सभी प्रबंध निदेशक, रूसी प्रमुखों के साथ विशेषज्ञों को याद किया है। इस पुस्तक में जनरल मैनेजर जी. जगतपति के नाम प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के पत्र को भी प्रकाशित किया गया है, जो एक विशेष पत्र है। यह पत्र बताता है कि देश के विकास के लिए चिंतित रहने वाले बड़े लोग किस तरह चौकन्ने होकर हर उपलब्धि का ध्यान रखकर उससे सम्बन्धित लोगों की हौसला अफजाई करते थे। 

शिवराज जैन राजनांदगांव में जन्मे,पढ़े-लिखे पहले छत्तीसगढिय़ा इन्जीनियर थे जो बाद में प्रबंध निदेशक और फिर सेल के अध्यक्ष भी बने। चर्चित जनरल सुपरिन्टेण्डेंट कुलवंत सिंह नागी का भी इस पुस्तक में जिक्र है जिन्होंने एक विशेष अवसर पर शिवराज जैन तथा रशियन विशेषज्ञ मिखाइलोविच को पंजाब की परंपरागत पगड़ी पहनाकर सम्मान दिया था। भारत और रूस के बीच राजनायिक सम्बन्धों के 70 वर्षीय इतिहास को महत्व देते हुए भिलाई से इंडिया-रशिया फ्रैंडशिप मोटर रैली 20 फरवरी 18 को निकाली गई। भिलाई में रूसी महिलाओं ने अपने लिए जीवन साथी चुना। उनके सुखद दाम्पत्य जीवन के ब्यौरे को भी बहुत आत्मीयता के साथ इस ग्रंथ में संग्रहित किया गया है।

 रूस में नेहरू, लता और राजकपूर खूब प्रसिद्ध रहे हैं। जाकिर ने रूसी लोगोंं के साक्षात्कारों के माध्यम से इस सन्दर्भ में रोचक जानकारियाँ दी हैं। इस ग्रंथ में एक मार्मिक कहानी प्रदीप पुरतेज सिंह की है। वे भिलाई इस्पात संयंत्र में जन सम्पर्क विभाग में उपप्रमुख थे। उनका प्रेम रूसी महिला से था। उन्होंने रूसी महिला के माता-पिता को राजी करने का प्रयत्न भी किया लेकिन विकलांग पुरतेज सिंह को देखकर वे लोग राजी नहीं हुए। इस तरह तान्या त्सालगावा एवं प्रदीप सिंह की प्रेमकथा का दुखद अंत हुआ।

 रूसी भाषा के जानकार दुभाषिए विष्णु प्रभाकर तोपखानेवाले का किस्सा भी कम रोचक नहीं है। वे रूसी भाषा में प्रवीण थे। रूसियों ने उन्हें खूब सम्मान एवं अपनत्व दिया। 'वोल्गा से शिवनाथ तक' एक ऐसी किताब है जिसमें एक कारखाने के जन्म की कहानी है। उसका बचपन और उसकी जवानी के किस्से भी इस कृति में है। छत्तीसगढ़ प्रान्त की आंतरिक विशेषता, यहाँ के लोगों की सहजता, देश भर से आये श्रमिकों से जुड़े उनके प्रान्तोंं की तस्वीरें किताब के हर्फ-हर्फ में है। 

भिलाई नगर में विभिन्न प्रान्तों से आये समुदायों ने अपना भवन बनाया। पूरा देश यहाँ अपनी विशेषताओं केसाथ मिल जाता है। भिलाई इस्पात संयंत्र के हर अगुवा ने कुछ नया करने का प्रयास किया। यहाँ पर्यावरण के क्षेत्र में मैनेजिंग डायरेक्टर विक्रांत गुजराल ने विशेष काम किया। उनके समय में लगाये गए पेड़ों के कारण भिलाई नगर अन्य मैदानी नगरों की तुलना में ठंडा रहता है। छत्तीसगढ़ के उदार मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उत्तर प्रदेश, बिहार के छठ पर्व पर छुट्टी देकर छत्तीसगढ़ की उदारता का प्रमाण प्रस्तुत कर दिया है । 

विभिन्न प्रान्तों से भिलाई आये कमर्चारियों, व्यवसायियों तथा उनके बच्चों ने विभिन्न क्षेत्रों में कीर्तिमान रचकर सबको प्रेरित किया है। यह पुस्तक संतुलित विचार और समग्र जानकारी, प्रमाणित आंकड़ों एवं ऐतिहासिक महत्व की घटनाओं के आलेखन के कारण बेहद महत्वपूर्ण बन पड़ी है। कल्पना के बदले यथार्थ और सुनी सुनाई बातों के बदले प्रामाणिक इतिहास को आधार बनाकर लेखक जाकिर ने ऐसी किताब को आकार दिया है जो उसे भिलाई और देश से प्रेम करने वाले पाठक के लिए इसे बेहद उपयोगी किताब बनाती है। वोल्गा से शिवनाथ पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक हैं। 

विमोचन अवसर पर मुख्यमंत्री त्रयी अजीत जोगी, भूपेश बघेल और डॉ. रमन सिंह के साथ अतिथिगण (7 फरवरी 2019)

शीर्षक - वोल्गा से शिवनाथ तक

मूल्य - 500.00 रू. 

प्रकाशक- सर्वप्रिय प्रकाशन कश्मीरी गेट चर्च रोड, नई दिल्ली 

 लेखक - मुहम्मद जाकिर हुसैन

 समीक्षक- डॉ. परदेशी राम वर्मा 

संपर्क- लेखक-9425558442 समीक्षक-9827993494

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Thursday, January 6, 2022

 भिलाई हादसे पर इंसानी रिश्तों को बयां करती

 36 साल पुरानी डायरी मिली कोलकाता में

 

-একটি দুর্যোগ-ঝটিকার করুন কাহিনী-

-एक दुर्योग-आहत कर देने वाली कहानी-


भिलाई में 1986 में हुए कोक ओवन ब्लास्ट हादसे के दौरान एक परिवार 

की वेदना दर्ज की पड़ोसी ने, बसु परिवार खोज रहा अपने पुराने पड़ोसी को 

 

(मुहम्मद जाकिर हुसैन) 

डायरी का अंश और स्व.बीना रानी बोस मजमुदार
भिलाई स्टील प्लांट के लिए 6 जनवरी 1986 का दिन ऐसा पहला बड़ा हादसा लेकर आया था जिसमें 9 कर्मवीरों की जान चली गई थी, वहीं 48 कर्मचारी घायल हुए थे। 

इस हादसे के जख्म आज 36 साल बाद भी प्रभावित परिवारों के लिए हरे ही हैं। इस बीच कोलकाता में इस हादसे पर 36 साल पुरानी एक दुर्लभ डायरी मिली है।

वर्ष 1985-86 में सेक्टर-6 एमजीएम स्कूल के पास स्ट्रीट-74 क्वार्टर नंबर 6 ए में निवासरत तपन कुमार बोस मजुमदार भिलाई स्टील प्लांट के एनर्जी मैनेजमेंट विभाग (ईएमडी) में पदस्थ थे। 

उनकी वयोवृद्ध मां बीना रानी बोस मजमुदार की लिखी इस डायरी में একটি দুর্যোগ ঝটিকার করুন কাহিনী (एक्टि दुर्जोग झोटिकार कोरुण कहिनी) यानि ''एक दुर्योग, आहत कर देने वाली कहानी'' शीर्षक से अपने आवास के ठीक सामने रहने वाले ईएमडी के कर्मी एम. शंकर राव परिवार के साथ संबंधों और 6 जनवरी 1986 के हादसे व उसके बाद के घटनाक्रम को बेहद संवेदनशीलता के साथ उकेरा है।

डॉ. सुस्मिता
लेखिका बीना रानी तो अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन उनकी पौत्री और कोलकाता विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर डा. सुस्मिता बसु मजुमदार को जब घर के पुराने सामान में यह डायरी हाथ लगी तो उन्हें लगा कि किसी हादसे का ऐसा मर्मांतक ब्यौरा दुनिया,खासकर भिलाई और छत्तीसगढ़ के वासियों के सामने जरूर आना चाहिए।

 डॉ. सुस्मिता ने अपनी दादी की इस डायरी में लिखी मूल बांग्ला इबारत को पढ़ते हुए हिंदी अनुवाद का आडियो मुझे भेजा था। जिसे मैनें अक्षरों में ढाल कर आप लोगों के समक्ष रखने की कोशिश की है। इस डायरी का हिंदी अनुवाद आंशिक संशोधन के साथ यहां है। इस पूरी स्टोरी के लिए कैरिकेचर प्रख्यात कार्टूनिस्ट बीवी पांडुरंगा राव का बनाया हुआ है।  


सन्नाटे से भरी सुबह, जब एक ट्रक रुका हमारे घर के सामने 

वह सन्नाटे से भरी एक सुबह थी, जब एक ट्रक आकर हमारे घर के सामने रुका। देखते ही देखते घर के सामने ढेर सारी भीड़ इकट्‌ठा हो गई। 

ट्रक से चंदू के पिता एम. शंकर राव का शव उतारा गया। उनके घर में बगीचे के सामने स्लैब जैसा बना था उस पर शव रखा गया। एम. शंकर राव का निधन हम सब के लिए यह बहुत ही ह्रदयविदारक घटना थी। 

उनके दो बेटे थे 3-4 साल का चंदू यानि एम. चंद्रशेखर और उसका बड़ा भाई 10 साल का राजा यानि एम. राजशेखर। तेलुगू भाषी राव परिवार बहुत ही खुशहाल और सुखी दंपति थे। चंदू नर्सरी जाने लगा है वहीं राजा 5 वीं पढ़ता है। 

हमारे घर के ठीक सामने का उनका घर है। एक सुदर्शन व्यक्तित्व और हंसता-खेलता परिवार चंदू के पापा एम. शंकर राव की उम्र 29 साल थी वो बहुत ही सुदर्शन व्यक्तित्व वाले पुरुष और बहुत ख्यातिलब्ध थे। 

 

सलीकेदार रहन-सहन और बेहद विनम्र व्यवहार

हमारी पूरी स्ट्रीट में शंकर राव बेहद जानदार शख्सियत थे, हमेशा लोगों की मदद को तत्पर रहते थे। वह बहुत ही अच्छे इंसान थे। उनकी पत्नी का नाम एम. उमा राव था।

 शंकर राव को देखते हुए कोई भी यह कह सकता था कि वो बेहद संस्कारी व्यक्ति थे। उनके घर की सादगी से भरी साज-सज्जा और फर्नीचर को देखकर कोई भी कह सकता है कि कितना सलीकेदार रहन-सहन था उनका। वैसे उनका व्यवहार भी बेहद विनम्र था।

 उनकी पत्नी उमा भी बेहद शांत, शिष्टाचारी और गौरवर्णी थी। वह बहुत ही मीठा बोलती थी। उस वक्त हम स्ट्रीट-74 के 6 ए में नए आए हुए थे और हमारी सबसे ज्यादा करीबी ठीक सामने रहने वाले एम. शंकर राव परिवार के साथ हो गई थी। बेहद संस्कारी परिवार था उनका  और उमा से तो हम सास-बहू का बहुत अच्छा संबंध हो गया था। वो कुछ भी पकाती तो हमारे घर में जरूर देती। हम सब को बहुत ही प्यार करती थी। खास कर मेरी पौत्री मामोन (सुस्मिता) को बहुत पसंद करती थी। 

जब भी किसी चीज की जरूरत होती तो मुझे बुला कर ले जाती। उमा मुझे अम्मा कहती थी। हम लोग बहुत ही करीबी थे। उनका बड़ा बेटा राजा तो बेहद सलीकेदार था जब भी नजर पड़ती तो हमेशा नमस्ते करता था। अपने बच्चों को बहुत ही अच्छे संस्कार मां-बाप ने दिए थे। कहते हैं ना अगर पिता-माता अच्छे हो तो बच्चे भी उतने ही अच्छे और संस्कारी होते हैं। इतना सुखी परिवार कई बार देखने को नहीं मिलता है।

 

 हम टीवी देखने गए तो उमा ने सर्कस जाना त्याग दिया 

एक दिन ऐसा हुआ कि हमारे यहां का टेलीविजन खराब हो गया और उस दिन रविवार शाम को फिल्म का प्रसारण होता था। मेरी बहू का नाम भी उमा है। चंदू की मां का नाम भी उमा है। मेरी बहू उमा ने कहा कि मूवी देखने चंदू के घर चलते हैं।

 हम सकुचाते हुए उनके घर गए। उनके ड्राइंग रूम में कलर टीवी था। चंदू की मां ने देखा तो खुश हो गई और खूब आव-भगत की। हम बैठकर मूवी देखने लगे तो थोड़ी ही देर में चंदू के पापा आए और चंदू और राजा को लेकर सर्कस देखने गए। 

लगा कि शायद हमारे बैठने की वजह से बाहर तो नहीं जा रहे हैं। मैनें अपनी बहू उमा से पूछा कि हमारी वजह से चंदू की मां जा नहीं पाई? पर चंदू की मां उमा ने हमें इसका एहसास नहीं होने दिया बिल्कुल भी। लेकिन हम लोग स्थिति को भांप गए थे कि हमारी वजह से चंदू की मां सर्कस देखने नहीं जा पाई। हमेशा की तरह वह बहुत ही अच्छे से पेश आई। वह बेहद गुणी थी। वह अक्सर सिलाई-कढ़ाई करते भी दिखती थी। वह सलमा सितारा लगाकर बहुत अच्छा एम्ब्रायडरी कर सकती थी।

 टीवी पर मूवी देखने के बाद मैनें आग्रह किया कि सलाई-कढ़ाई देखना चाहती हूं तो उन्होंने अपना पूरा काम दिखाया। वो खाना बहुत अच्छा बनाती थी। आज वो सर्कस जाने वाला और एम्ब्राइडरी दिखाने वाला दिन बहुत याद आ रहा है। 

 

वीणा वादिका थी उमा, हमारे साथ जाती थी बाजार 

राव परिवार दक्षिण भारतीय संगीत परंपरा में ढला हुआ था। उमा बहुत अच्छा वीणा वादन करती थीं। उनके घर में एक खुबसूरत सी विचित्र वीणा थी। एक दिन मुझे लगा कि चंदू की मां का वीणा वादन सुनूंगी।

 अक्सर चंदू की मां हमारे घर आती थी। तेलुगूभाषी होने के बावजूद उनकी हिंदी बहुत अच्छी थी। उनकी डायनिंग टेबल पर एक बहुत ही खुबसूरत एक्वेरियम था। एक दिन चंदू की मां उमा ने आकर बताया कि उनके ससुर आ रहे हैं। उनके चेहरे पर बेहद खुशी झलक रही थी। 

सेक्टर-4 का बोरिया बाजार (1986)
उमा ने बताया कि उनके ससुर की तबीयत बहुत ज्यादा खराब है, इसलिए चंदू के पापा हैदराबाद जाकर ला रहे हैं। उनका टेलीग्राम आया है कि कल ही आ रहे हैं। 

इसके बाद हम सास-बहू सेक्टर-4 के बोरिया बाजार जा रहे थे तो चंदू की मां उमा भी सामान खरीदने एक बैग लेकर हमारे साथ हो ली। उसने बहुत सी सब्जियां और फल खरीदे। परिवार में खुशियां ही खुशियां आ गई थी दादाजी के आने से। अगले ही दिन उनके ससुर आए, वह काफी वृद्ध लंबे से गोरे सुपुरुष  थे। 

उनको देखकर लग रहा है कि बेहद संस्कारी परिवार का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह शायद अक्टूबर-1985 की बात है। चंदू के दादाजी के आने से यह परिवार और भी सुखी दिखने लगा। उनके घर का माहौल जैसे और खुशनुमा हो गया है। 

दादाजी बोले आज खाना मत बनाओ तो वो सब मिल कर बाहर होटल में डिनर के लिए गए। जब वो जा रहे थे तो उनके परिवार को देखकर बहुत अच्छा लग रहा था। चंदू के दादाजी यहां की ठंड की वजह से भिलाई में ज्यादा दिन रह नहीं पाए। 

 

 भिलाई की ठंड सहन नहीं हुई तो हैदराबाद चले गए थे दादाजी 

शायद उनके दो बेटे थे और शंकर राव छोटे बेटे थे। वो यहां 15-20 दिन रुक कर बड़े बेटे के पास चले गए कि भिलाई की ठंड उन्हें सूट नहीं कर रही थी। तब कौन बता सकता था कि इतना सुखी परिवार जिसमें दादा-पिताजी-बच्चे इतना हंस बोल रहे हैं, यह पल उनकी दुनिया में लौट कर फिर कभी नहीं आएगा? 

कौन जानता था कि नियति का ऐसा परिहास होगा। चंदू के दादाजी के दो बेटे थे। बड़ा बेटा हैदराबाद में रहता था। हैदराबाद में उनका परिवार आर्थिक तौर पर बहुत ही सुदृढ़ था। एम. शंकर राव को भिलाई स्टील प्लांट ज्वाइन किए हुए महज 5-6 साल ही हुए थे। 

 

भाई-भाभी के आने की तैयारी में बनाया था केक 

ये छोटा सा परिवार इतना सुखी परिवार था कि इसे बयां नहीं कर सकते कि अचानक से काले बादलों की तरह विपदा इस परिवार पर आ पड़ेगी। दिसंबर-1985 की बात है, जब चंदू की मां अपने हाथ से बनाया हुआ केक लेकर आई और मुझसे बोली-देखिए मेरा केक कितना अच्छा बना है। बहुत दिनों के बाद भैया-भाभी आ रहे हैं। उनके लिए तैयारी कर रही हूं।

 उमा के चेहरे का भाव देख कर हम सब को बेहद खुशी हो रही थी। वो लोग भी बहुत खुश थे। फिर उमा के भाई-भाभी आए तो वो लोग साथ में अक्सर आते-जाते थे। 

 

...और आ गई वो मनहूस घड़ी, घनघना उठा फोन

ये संसार बिल्कुल अनिश्चित है रेत की तरह है कभी भी यह संसार ढह सकता है। इतना प्यारा घरौंदा नियति ने कैसे तोड़ डाला।

 फिर आई वो मनहूस घड़ी 6 जनवरी भिलाई सुबह 9-10 बजे के बीच हमारे तमिल पड़ोसी के घर फोन आया। उनके घर बेटा-बहू और मां रहते थे। 

खबर थी कि कोक ओवन में बड़ा एक्सीडेंट हो गया है और चंदू के पापा गंभीर रूप से आहत है। हम लोगों को बहुत ज्यादा पता नहीं था कि क्या हो रहा है। हमारे यहां और चंदू के यहां काम करने वाली बाई एक ही थी। उसने बताया तो हम लोग देखे।

 तब पड़ोसी के घर चंदू की मम्मी फोन पर बात कर रही थी और भी बहुत से लोग आ रहे हैं। उसी वक्त प्लांट से दो लोग आकर खबर दिए कि चंदू के पापा को हास्पिटल लेकर गए हैं। 

 

 बुरी तरह डरे हुए थे हम भी


बसु परिवार मैत्रीबाग भिलाई में
इस हादसे से हम सब भी बुरी तरह डरे हुए थे क्योंकि मेरा बेटा तपन कुमार बसु मजुमदार भी ईएमडी में होने की वजह से अक्सर कोक ओवन आते-जाते रहता था। ऐसे में हम भी चिंतित थे कि उस एक्सीडेंट में वह भी तो नहीं हैं। हमने भी फोन करने और पता लगाने की कोशिश की। 

इस बीच चंदू के मामा तुरंत ही हास्पिटल निकल गए। बाद में फोन पर उमा के भाई ने पूरा ब्यौरा बताया कि शंकर राव काफी जल चुके थे। हम सब फोन पर संपर्क कर रहे थे।

 हमें भी कुछ सूझ नहीं रहा था औऱ् बदहवास होकर हम लोग भी तपन की खबर ले रहे थे। हम भी पागलों की तरह बीएसपी के फोन पर संपर्क करने की कोशिश कर रहे थे लेकिन हमारा फोन नहीं लग रहा था।

 उम्मीद पर जी रहे थे हम सब

लगातार फोन करते हुए हमनें बहुत कोशिश की लेकिन कोई खबर नहीं आई। मैनें उस दिन देखा कि अनिश्चतता में जीना कितना कठिन होता है। जब तक तपन नहीं आए, हम लोग भी बेहद परेशान थे। इस बीच हम सभी चंदू की मां को दिलासा दे रहे थे। 

कुछ देर बाद चंदू की मां अस्पताल चली गई। फिर हमें पता चला कि चंदू के पापा ठीक हो जाएंगे। हालांकि चंदू के पिता शंकर राव करीब 10 दिनों तक जूझते रहे। चंदू के पापा को पता नहीं था कि मौत उन्हें यूं ही इस तरह से खींच कर ले जाएगी।

 इस वजह से उन्होंने चंदू की मां को बोला था कि मेरे या तुम्हारे पिता को मत बताना क्योंकि उन्हें पूरा यकीन था कि वो पूरी तरह ठीक हो जाएंगे।

 

 मकर संक्रांति के दिन उमा का चेहरा बयां कर रहा था हालात

आज 14 जनवरी है जिसे बंगालियों में दधि संक्रांति भी कहा जाता है। इस दिन हम उत्सब मनाया करते हैं। तेलुगू संस्कृति में भी इसे खूब अच्छी तरह धूम-धाम से मनाते हैं। 

उधर अस्पताल में भर्ती चंदू के पिता ने मना किया हुआ था कि मेरे व अपने पिता को हादसे के बारे में मत बताना और उनको आने भी मत कहना। बंगालियों की तरह तेलगुओं में मकर संक्रांति वाला दिन बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है। बंगालियों की दुर्गा पूजा की तरह तेलुगू परिवार इसे धूमधाम से मनाते हैं। 

तो संक्रांति वाले उस दिन उमा एक थाली में हल्दी कुमकुम पान सुपारी मिठाई डालकर लेकर आई। उस दिन उमा का चेहरा देखकर समझ मेें आ रहा था कि किस तरह से उनका चेहरा करूणा और विषाद से भरा हुआ था। उनका दुख हम सब समझ रहे थे। 

लेकिन फिर भी त्यौहार का दिन था तो जो करना चाहिए वो कर रही थी। बहुत ही अजीब सा माहौल था कि उनके भैया-भाभी आए थे कि उनके साथ यहीं संक्रांति मनाएंगे। कितने सारे सपने देखे होंगे उन्होंने इस त्यौहार के दिन को लेकर। लेकिन भाग्य का कितना बड़ा परिहास है कि बिना बादल के बिजली कड़की और इस परिवार पर गिर गई।

 

 हंसते-खेलते परिवार पर गिर पड़ी बिजली

 15 जनवरी 1986 सुबह सचमुच बिजली गिर पड़ी। हालांकि इसके दो दिन पहले से ही चंदू के पापा की तबीयत काफी बिगड़ गई थी। शंकर राव की बिगड़ती हालत को देखते हुए डाक्टरों ने घर वालों को बता दिया था।

ऐसे में एक दिन पहले ही उमा के पिता और ससुर भिलाई आ गए थे। फिर भी वो शंकर राव को अस्पताल में नहीं देख पाए क्योंकि शंकर राव तब आईसीयू में थे। उन्हें देखने मिला तो शंकर राव का मृत शरीर।

 शंकर राव उन दिनों मौत से लड़ते रहे और लड़ते-लड़ते आखिर चले ही गए। 15 जनवरी की रात को उन्होंने आखिरी सांस ली उसके बाद सुबह उनका शव लाया गया।

 

 गमगीन माहौल में, जब शंकर राव का शव आया

 

सेक्टर-6 में स्ट्रीट-74 का 6ए और सामने का आवास

16 जनवरी की सुबह माहौल बेहद गमगीन था, जब शंकर राव का शव घर लाया गया। चंदू के दादाजी, नानाजी, नानीजी, कई रिश्तेदार और भिलाई स्टील प्लांट के आफिसर-कर्मचारी बहुत से लोग वहां इकट्‌ठा हो गए थे। सुबह 10 बजे एक ट्रक आकर रुका। 

सभी आंसू भरी आंखों से इस घड़ी का इंतजार कर रहे थे। तब तक ढेर सारे लोग वहां जमा हो गए थे। हम लोगों की हिम्मत नहीं हो रही थी कि वहां पास में जाएं। उनका शव एक सफेद कपड़े में लिपटा हुआ था। 

शव को अंदर घर में नहीं ले जाया गया बल्कि वहीं चबूतरे पर रखा गया जो बगीचे में बना था। उनका बड़ा बेटा राजा जो कि सिर्फ 10 साल का था उसे देखने हीं दिया गया। मामून (मेरी पौत्री सुस्मिता) और राजा दोनों अंदर बैठे हुए थे। हम लोगों ने उन्हें ड्राइंग करने दिया था। जिससे उनका ध्यान उस तरफ न जाए और वह बाहर न निकले। 

अबोध बच्चों को क्या मालूम उनका संसार लुट गया उसे क्या पता था कि उसका इतना बड़ा सर्वनाश हो चुका है। छोटे से निष्पाप शिशु को पता नहीं था कि क्या हो गया है। 

 

फूलों की वो शैय्या और हमारी आंखों से ओझल हो गया ट्रक

कुछ ही देर में चंदू को लेकर उसके मामा हमारे घर आए और आकर भीतर से राजा को लेकर बाहर आए। दोनों बच्चों को पिता का पांव छूने बोला गया। उन्हे क्या पता था कि उनका रखवाला नहीं रहेगा। इस तरह से विधि का विधान है। धीरे-धीरे ट्रक हम सब की आंखों से ओझल होता गया। 

शंकर राव को सफेद फूलों के बिछौने पर ले जाया गया। यह बेहद दर्दनाक नजारा था। उनकी यह शैया भी फूल की ही है जिस पर आखिरी बार यात्रा हो रही है। एक वो फूल से सजी सेज थी जिसमें उन दोनों का मधुर मिलाप हुआ था। कितना वेदना दायक है इस शैय्या को देखना। कितना निष्ठुर है यह समय। 

 

राव परिवार की शिद्दत से तलाश है डॉ. सुस्मिता को 

 डॉ. सुस्मिता ने बताया कि भिलाई से कोलकाता आने के बाद राव परिवार से संपर्क नहीं हो पाया। स्व. शंकर राव की जगह उनकी पत्नी एम. उमा राव को सेल के हैदराबाद आफिस में अनुकंपा नियुक्ति मिली थी। इसके बाद हमें ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाईं। 

डॉ. सुस्मिता के मुताबिक वह उमा आंटी और उनके दोनों बेटों चंद्रशेखर और राजशेखर का पता लगाने की कोशिश कर रही हैं। अगर राव परिवार फिर से मिल जाता है तो वह अपनी दादी की इस डायरी में लिखे भाव उस परिवार के साथ साझा करना चाहती हैं। 

वहीं भिलाई स्टील प्लांट प्रबंधन से मिली जानकारी के अनुसार एम. उमा राव ने 31 मार्च 2004 को भिलाई स्टील प्लांट के परचेस विभाग से जूनियर असिस्टेंट के पद से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी। तब उनका पूरा पता 7-1-644/32, सुंदर नगर हैदराबाद 500038 दर्ज था। फिलहाल राव परिवार से कोई संपर्क नहीं हो पाया है। 

 

बांग्लादेश से सुकमा और फिर भिलाई, बस्तर जाने

तीन दिन तक बैलगाड़ी का सफर भी तय किया 

डा. रमणीमोहन-बीना रानी

दादी बीना रानी बोस मजमुदार ने सिर्फ एक हादसा या पड़ोसी की संवेदना को ही अपनी डायरी में दर्ज नहीं किया है बल्कि उनकी डायरी में उनके अपनी निजी जीवन से जुड़ी भी कई बातें हैं।

उनकी पौत्री डॉ. सुस्मिता बसु मजुमदार उस डायरी के पन्ने खोलते हुए बताती हैं-इसमें दादी ने बांग्लादेश से बस्तर के सुकमा में आकर बसने की कहानी का रोचक ब्यौरा दिया है, साथ ही यह भी बताया है कि किस तरह वह तीन दिन तक लगातार बैलगाड़ी का सफर तय कर जगदलपुर से सुकमा पहुंची थी। 

डायरी में उन्होंने लिखा है कि किस तरह से एक ''अंजान'' व्यक्ति (विवाहोपरांत) के साथ बांग्लादेश से कोलकाता, कोलकाता से रायपुर, फिर रायपुर से बस से जगदलपुर और जगदलपुर से बैलगाड़ी में तीन दिन में सुकमा का सफर तय किया था। 

डॉ. सुस्मिता बताती हैं-उनके दादा डॉ. रमणीमोहन बोस मजुमदार पेशे से चिकित्सक (सर्जन) थे। अपने विद्यार्थी जीवन में उन्होंने केमेस्ट्री में टॉप किया था, तब उन्हें जर्मनी जाकर अध्यन का मौका मिला था। लेकिन घर की आर्थिक परिस्थिति के चलते वह जर्मनी नहीं पाए। इसके बाद दादाजी ने डाक्टरी की पढ़ाई की और कोलकाता में प्रेक्टिस की। 

दादाजी सोनारपुर शासकीय हास्पिटल में पदस्थ थे। इसी दौरान उनके पास सुकमा (बस्तर) के जमींदार के मुंशी अपना उपचार कराने आया करते थे। मुंशी जी जब ठीक हो गए तो उन्होंने ही सुकमा में आने का प्रस्ताव दिया। इसके बाद दादाजी और दादाजी सुकमा पहुंचे और यहां कई साल तक रहे। इसके बाद पापा जब भिलाई स्टील प्लांट की सेवा से संबद्ध हुए तो परिवार 1961 में भिलाई आ गया। दादी बीना रानी बोस मजुमदार का निधन जनवरी 1992 में भिलाई में हुआ था।

क्या हुआ था 6 जनवरी 1986 को 

 यहां हुआ था भीषण विस्फोट

भिलाई स्टील प्लांट की कोक ओवन बैटरी-6 में 6 जनवरी 1986 की सुबह जोर का विस्फोट हुआ था। 

इस हादसे में कोक ओवन, मेंटनेंस एंड रिपेयर ग्रुप, कंस्ट्रक्शन एंड हैवी मेंटनेंस, सेफ्टी और फायर ब्रिगेड के 48 कर्मी घायल हुए थे। 

वहीं 9 कर्मियों-अफसर की मौत हो गई थी। इन मृतकों में त्रिलोकनाथ गैस सेफ्टी आपरेटर, जवाहर लाल टंडन हवलदारी एनएमआर, आरके दास प्रबंधक कोक ओवंस, तेजू राजभर फिटर, ऊर्जा प्रबंधन विभाग, एम शंकर राव उपप्रबंधक कोक ओवंस, ओपी ठाकुर फिटर एमिल मिंज फिटर और एसके बनर्जी चार्जमैन सभी ऊर्जा प्रबंधन विभाग से और ओपी जांगिड़ उपप्रबंधक कोक ओवंस शामिल हैं।


हरिभूमि भिलाई-दुर्ग संस्करण-6 जनवरी 2022




Tuesday, November 16, 2021

इस समय मूर्खता को लाइसेंस मिला हुआ है,आपमें 

से कितनों ने ऐसी मूर्खताओं का प्रतिवाद किया है? 

 

चिंतक-आलोचक प्रो. अग्रवाल भिलाई में

प्रसिद्ध आलोचक-चिंतक प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल मूलत: ग्वालियर के रहने वाले हैं और कभी अपना छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश संयुक्त हुआ करते थे,लिहाजा प्रो. अग्रवाल की छत्तीसगढ़ के प्रति आत्मीयता स्वाभाविक रही है। 

10 नवंबर 2021 बुधवार को कांग्रेस पार्टी की ओर से भिलाई में जवाहरलाल नेहरू पर केंद्रित कार्यक्रम में प्रो. अग्रवाल मुख्य वक्ता थे। आयोजक छत्तीसगढ़ सरकार ने आनन-फानन तैयारी में महात्मा गांधी कला मंदिर जैसे छोटे से सभागार को बुक कर लिया था, नतीजे में सभागार के अंदर जितने खड़े और बैठे थे, उतने ज्यादा बाहर भटक रहे थे। बेहतर होता नेहरू हाउस सेक्टर-1 जैसा बड़ा सभागार बुक किया जाता।

 इस अव्यवस्था के चलते अपनी पत्रकार बिरादरी को बहिष्कार जैसा कदम उठाना पड़ा। हालांकि कार्यक्रम समाप्ति के बाद 'कका' भूपेश बाहर आए और अव्यवस्था के लिए खेद जता दिया, इसके बाद बहिष्कार भी काफूर हो गया।

 आयोजन की जानकारी मिलने के बाद मेरी तैयारी प्रो. अग्रवाल से लंबी बातचीत करने की थी लेकिन वहां अव्यवस्था इतनी थी कि ऐसा हो नहीं पाया। हां, प्रो. अग्रवाल से छोटी सी आत्मीय मुलाकात जरूर हो गई। उन्हें मैनें अपने काम के बारे में बताया और मेरा कुछ तार्रुफ भिलाई विद्यालय में मेरे शिक्षक रहे रवि श्रीवास्तव सर और भिलाई की पहली महापौर नीता लोधी ने भी उनसे करवा दिया। 

प्रो. अग्रवाल से आत्मीय मुलाक़ात

अलग हट कर अकेले में मैनें प्रो. अग्रवाल से कुछ कहा और उन्होंने जवाब में भी कुछ कहा। बस इतनी सी मुलाकात संभव हो पाई, जिसकी गवाह ये फोटोग्राफ है। इंशा अल्लाह, उम्मीद है कभी प्रो. अग्रवाल से तसल्ली से बात हो पाएगी। भिलाई का यह आयोजन खास तौर पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की ओर से था, लिहाजा इसमें पार्टी के कार्यकर्ता ज्यादा था।
 वैसे बहुत कम लोगों को यह बात मालूम है कि प्रो. अग्रवाल कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हिस्सा हुआ करते थे। उनके इस संदर्भ में वीडियो भी यूट्यूब पर मौजूद है। संघ का हिस्सा होने की वजह से अंदरखाने की बहुत सी बातें जानते हैं। इसलिए उन्होंने व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में तैर रहे कई झूठ की कलई यहां आयोजन में बाकायदा नाम लेकर खोली। 

प्रो. अग्रवाल ने जवाहरलाल नेहरू पर जो भी कहा, उसमें पूरा का पूरा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय व राष्ट्रीय स्तर का था। उम्मीद थी कि भिलाई में नेहरू पर बात करने प्रो. अग्रवाल आ रहे हैं तो वो यहां नेहरू और भिलाई पर भी कुछ बोलेंगे। हालांकि ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने यहां जो कुछ कहा उसे आप भिलाई की प्रथम महापौर नीता लोधी की फेसबुक वॉल पर जाकर वीडियो में सुन सकते हैं। यहां उनकी खास बातें इस तरह से रहीं-

 बड़े लोगों के मतभेद ओछे दिमाग के लोग नहीं समझ सकते 

प्रचारित तो ऐसे किया जाता है, जैसे सरदार पटेल का हक मारकर नेहरू छल से प्रधानमंत्री बन गए। अगर सरदार पटेल प्रधानमंत्री बनते तो बेहतर साबित होते। दरअसल, कुछ लोगों को लगता है कि वो गांधी और पटेल को उनसे भी ज्यादा जानते हैं। वास्तविकता यह है और कांग्रेस संगठन की परंपरा और ताकत है कि यहां वैचारिक मतभेदों को व्यक्तिगत विद्वेष में यथासंभव नहीं बदलने दिया जाता।

 वैसे भी बड़े लोगों के बीच के मतभेद को ओछे दिमाग के लोग नहीं समझ सकते। यह बड़े लोगों की बड़ी बातें हैं, इस पर ओछापन नहीं थोपना चाहिए। यह भाव आज का नहीं और कोई दबी ढकी बात नहीं कि नेहरू-पटेल में मतभेद थे। मतभेद तो गांधी-नेहरू में भी थे। 

गांधी-नेहरू में मतभेद थे लेकिन... 

 प्रथम महापौर नीता लोधी और प्रख्यात व्यंगकार रवि श्रीवास्तव  साथ में

1927 में मद्रास कांग्रेस में नेहरू के दबाव में डोमिनियन स्टेट के बजाए पूर्ण स्वराज की बात हुई थी और गांधी जी इससे खुश नहीं थे। बाद में 1929 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव पर गांधी जी ने बाकायदा आलोचना की कि यह प्रस्ताव हड़बड़ी में पारित किया गया। लेकिन 1930 में आते-आते गांधी जी का मन बदल गया और उन्होंने भी पूर्ण स्वराज की बात कही।
 इन दोनों के बीच में गांधी-इरविन पैक्ट को लेकर मतभेद थे। महात्मा गांधी के साथ हुए तमाम मतभेदों को नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है और इसे प्रकाशित करने से पहले 1937 में नेहरू ने पांडुलिपी महात्मा गांधी को दी थी कि कोई अंश पसंद न हो तो बताइए, हटा देंगे। लेकिन महात्मा गांधी ने कहा-एक शब्द भी नहीं हटेगा और इसे जस का तस प्रकाशित करवाओ। इस दौरान दोनों के बीच तीखा पत्र व्यवहार भी हुआ था। 

पटेल ने खुद माना, कि देश का प्रधानमंत्री कैसा होना चाहिए..?

 दरअसल, सरदार पटेल संगठन के व्यक्ति थे और संगठन के लोग चाहते थे कि सरदार पटेल को अहम जिम्मेदारी देते हुए प्रधानमंत्री बनाया जाए लेकिन गांधी केवल संगठन ही नहीं जनता का मिजाज भी जानते थे। इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात ये है कि इस बात को सरदार पटेल ने आगे चल कर माना भी कि इसके दस्तावेज भी उपलब्ध हैं कि एक नवस्वाधीन देश के प्रधानमंत्री को अंतरराष्ट्रीय मामले की गहरी समझ होनी चाहिए और उसकी अंतराष्ट्रीय स्थिति होनी चाहिए। 

महात्मा के निधन के बाद 1949 में सरदार पटेल ने लिखा कि, महात्मा गांधी ने अपना उत्तराधिकारी नेहरू को घोषित किया तो आज गांधी जी के जाने के बाद लगता है कि उनका फैसला बिल्कुल सही था। सरदार पटेल स्वीकार भी करते थे कि- हां, मतभेद है हम लोगों के बीच लेकिन एक दूसरे के विचारों को समायोजित कर सकते हैं।

 गांधी ने नेहरू का अपना वारिस इसलिए घोषित किया

 नेहरू-गांधी के रिश्तों को लेकर बात करें तो इसी पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव पर महात्मा गांधी से कहा गया कि नेहरू ने इस प्रस्ताव में अहिंसा के सिद्धांत को लेकर बहुत तीखी बातें कही हैं और आपकी आलोचना की है। गांधी जी लाहौर अधिवेशन में तो थे नहीं लेकिन इसके बाद 1942 की वर्धा एआईसीसी में उन्होंने भाषण दिया और कहा कि सरदार पटेल नहीं, राजेंद्र प्रसाद नहीं, राजाजी नहीं, मेरा वारिस जवाहर होगा। क्योंकि गांधी जी अपने आप को व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के इन प्रोफेसरों से ज्यादा जानते थे।

 अंतरराष्ट्रीय धाक जम चुकी थी नेहरू की

 अंतरराष्ट्रीय धाक 1927 से जमना शुरू हो गई थी, जब दुनिया के तमाम औपनिवेशिक देशों की ब्रुसेल्स में हुई कान्फ्रेंस में उन्होंने शिरकत की थी। इसके बाद से नेहरू का अंतरारष्ट्रीय पटल पर सम्मान बढऩे लगा था। अंतरराष्ट्रीय पटल पर लोग उनको अच्छी तरह जानते थे और नेहरू इस बात को बार-बार रेखांकित करते थे जो आज तक रेखांकित करने की जरूरत है कि भारतीय स्वाधीनता संग्राम केवल भारत की अपनी स्वाधीनता का आंदोलन नहीं था बल्कि उपनिवेशवाद के अंत का आरंभ भी था। 

आप देखिए, 1947 में हिंदुस्तान आजाद हुआ और सन 1955 तक लगभग सारा ब्रिटिश फ्रेंच और पुर्तगाली उपनिवेश आजाद होता गया। इंडोनेशिया से लेकर ब्राजील तक सारे उपनिवेश ताश के महल की तरह ढहते गए। 

 

 उपनिवेशवाद के अंत की शुरूआत 

याद कीजिए कि जब तक भारत औपचारिक रूप से आजाद नहीं हुआ था और नेहरू अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष थे। उस समय नेहरू ने दिल्ली में 15 दिन की एशियन पीपुल्स कांग्रेस आयोजित की थी। जिसे गांधी जी ने आशीर्वाद दिया था और इस कान्फ्रेंस के बारे ब्रिटिश जर्नलिस्ट फिलिप्स टालबोट ने लिखा था कि ये कान्फ्रेंस कुछ लोगों को केवल एक तमाशा लग सकती है लेकिन जानने वाले जानते हैं कि यह उपनिवेशवाद के अंत की शुरूआत है।

 सिंगापुर के संस्थापक प्रधानमंत्री ली कुआन यू जो हमारे दक्षिणपंथी मित्रों के बड़े अजीज है और इनके आदर्श पुरुष कहलाते हैं। उन्होंने कहा था एशिया और अफ्रीका के सिरमौर तो नेहरू थे।

 ..तो सुभाष बाबू ने एक ब्रिगेड उनके नाम पर भी क्यों नहीं रखी?

 व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के मुताबिक सुभाष बोस के साथ गांधी-नेहरू ने ज्यादती की और मौलाना आजाद तो फिर मुसलमान भी थे। अब फैलाया जा रहा है कि सावरकर ने सुभाष चंद्र बोस को प्रेरणा दी थी अपनी सेना बनाने। 

मुझे हैरानी होती है कि अगर ऐसा था तो सुभाष बाबू ने आजाद हिंद फौज के बजाए अपने संगठन का नाम स्वाधीन भारत सेना क्यों नहीं रखा, फिर उनका तराना कदम-कदम बढ़ाए जा भी पूरी तरह उर्दू में है। फिर सुभाष बोस ने अपनी फौज में गांधी ब्रिगेड, नेहरू ब्रिगेड, आजाद ब्रिगेड और रानी झांसी ब्रिगेड बनाई। क्या उनमें इतनी कृतज्ञता भी नहीं थी कि कथित प्रेरणा देने वाले सावरकर के नाम पर भी एक ब्रिगेड बना देते? 

नेहरू पर यह झूठ चिपकाया गया

 एक और झूठ फैलाया जाता है कि जवाहरलाल नेहरू ने एक्सीडेंटल हिंदू और कल्चर से मुस्लिम बताया है। दरअसल ये शब्दावली नेहरू पर हिंदू महासभाई नेता खरे ने चिपका दिया था और साफ कहूं तो यह कांग्रेस पार्टी की कमजोरी है कि इसका प्रतिवाद नहीं कर पाए। ऐसे कई झूठ आज व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के जरिए बच्चे-बच्चे तक पहुंचाए जा रहे हैं। 

नेहरू, जिन्ना और एडविना पर ऐसा झूठ 

एक सज्जन राजीव दीक्षित, जो आज के एक बाबाजी के बड़े प्रिय थे। उनके हर वीडियो में मूर्खतापूर्ण बातें हैं। सही बात है कि मूर्खों का आत्मविश्वास भी गजब का होता है। अपने एक वीडियो में राजीव दीक्षित कहते हैं जिन्ना, एडविना और नेहरू लंदन के हॉरिस कॉलेज में सहपाठी थे।

 इसलिए जानबूझ कर माउंटबेटन को वायसराय बनवाया गया जिससे उनकी पत्नी एडविना के माध्यम से नेहरू को प्रभावित करवाया जा सके। हकीकत यह है कि लंदन में हॉरिस नाम का कोई कॉलेज ही नहीं है। वहीं जिन्ना तो नेहरू से 15 साल पहले ही लंदन से पढ़ कर लौट चुके थे और एडविना तो हाई स्कूल से उपर पढ़ी भी नहीं है। फिर कहां से तीनों के एक साथ पढऩे की बात आती है।

 कश्मीर पर तो नेहरू को कोसते हैं पाकिस्तानी इतिहासकार

 कश्मीर का सवाल उठाया गया तो मेरा आग्रह है कि तमाम राजनीतिक डिबेट के बीच अपने कामन सेंस को जागृत रखिए। कश्मीर की अंतरराष्ट्रीय स्थिति जो उस वक्त की थी, उसमें उसकी सीमा सोवियत संघ, अफगानिस्तान और चीन से मिलती है। नेहरू यह अच्छी तरह जानते थे कि ऐसी रणनीतिक जगह को पाकिस्तान जैसे होस्टाइल देश के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता था। 

यह बात गांधी जी को भी समझ में आई और पटेल को भी मालूम हुई। उसके बाद भारत सरकार की यह आमराय बनीं कि कश्मीर को पाकिस्तान को दिए जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता। पाकिस्तान के प्रख्यात इतिहासकार बर्क एंड कुरैशी (एसएम बर्क-सलीमुद्दीन कुरैशी) इस बात के लिए नेहरू की निंदा करते हुए पटेल का समर्थन करते हैं कि कश्मीर पर नेहरू ने तो गड़बड़ कर दी पटेल तो ठीक चल रहे थे।

 कश्मीर पर नेहरू गलत थे तो इस्तीफे क्यों नहीं हुए?

 मैं यह जानना चाहता हूं कि अगर कश्मीर के सवाल पर नेहरू की सोच इतनी गड़बड़ थी और कश्मीर के सवाल पर नेहरू मनमानी कर रहे थे। किसी की नहीं सुन रहे थे और सारी जिम्मेदारी उनकी ही थी तो कैबिनेट से सरदार पटेल ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया? अंबेडकर ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया? स्वयं हिंदू महासभा के हिंदू राष्ट्रवादी नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इस्तीफा क्यों नहीं दिया? 

इन लोगों ने इस्तीफा इसलिए नहीं दिया क्योंकि जो भी फैसले थे वो सर्वसम्मत थे किसी मतभेद की गुंजाइश नहीं थी। इन पर सरकार की पूरी सहमति थी। मुखर्जी ने इस्तीफा इसलिए दिया था.. वैसे, श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर के सवाल पर कैबिनेट से इस्तीफा नहीं दिया बल्कि उस नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में दिया जिसमें यह संकल्प लिया गया कि दोनों देश अपने अपने अल्पसंख्यकों की रक्षा करेंगे।

 मुखर्जी चाहते थे कि दोनों कौम का शत-प्रतिशत अदला-बदली हो। ऐसे बहुत से उदाहरण है, जब मंत्रियों ने कैबिनेट से इस्तीफा दिया। 2002 में गुजरात में हिंसा के बाद कैबिनेट मंत्री रामविलास पासवान ने अटलबिहारी बाजपेयी की सरकार से इस्तीफा दिया था, यह कहते हुए कि बाजपेयी ने नरेंद्र मोदी सरकार के विरुद्ध कड़े कदम नहीं उठाए। इसी तरह हिंदू कोड बिल को कैसे पास किया जाए, इस बात पर नेहरू कैबिनेट से अंबेडकर ने इस्तीफा दे दिया था।

 लियाकत दिल्ली आए तो दोनों देश के राष्ट्रध्वज के साथ...

 क्योंकि तब पाकिस्तान जानता था कि सर्जिकल स्ट्राइक कह कर नहीं की जाती। समझौते के लिए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान तुरंत राजी हो गए और जब लियाकत पाकिस्तान के जहाज पर दिल्ली आए तो इस जहाज पर हिंदुस्तान-पाकिस्तान दोनों देशों के झंडे लगे थे। दिल्ली में नेहरू-लियाकत पैक्ट हुआ।

 जिसमें दोनों देशों ने अपने यहां अपने-अपने अल्पसंख्यक आबादी की पूरी सुरक्षा करने का संकल्प दिलाया। इधर श्यामाप्रसाद मुखर्जी अड़े हुए थे कि दोनों देशों की अल्पसंख्यक आबादी का पूरी तरह तबादला होना चाहिए। जबकि यह संविधान की मूल भावना के विरुद्ध होता क्योंकि भारत ने हिंदू राष्ट्र बनाने का इरादा नही किया था।

 ...तो बाबा की जगह पितामह बोलिए 

भारत ने हर आने वाली सभ्यता से कुछ सीखा और सिखाया है। समोसा भारत में तुर्को के साथ आया है। वैदिक व्यंजन नहीं है। आप इसे कैसे अलग कर सकते हैं? बाबा तो मूलरूप से तुर्की का शब्द है। जिन्हें अरबी-उर्दू करण से परहेज है, उन्हें बाबा की जगह पितामह शब्द इस्तेमाल कहने की आदत डाल लेना चाहिए।

 इसलिए होता है दुष्प्रचार 

सांप्रदायिक राजनीति के लोगों द्वारा नेहरू का बहिष्कार और नेहरू के प्रति दुष्प्रचार इसलिए किया जा रहा है क्योंकि नेहरू भारतीय परंपरा, भारतीय चिंतन की जो गतिशीलता है जो डायनामिज्म है, नेहरू उसके सबसे शानदार प्रतिनिधि हैं। लोकतांत्रिक और सामाजिक न्याय संरचना के सबसे प्रबल प्रवक्ता हैं। विविधता में एकता कोई खोखला नारा नहीं है। वहीं सांप्रदायिकता  तो फासिज्म का भारतीय रूप है जो भारतीयता के विरुद्ध है।

देश को आधुनिक राष्ट्र में तब्दील कर रहे थे  नेहरू

 नेहरू पर हमला इसलिए भी होता है क्योंकि नेहरू अपने देश को बहुत अच्छी तरह समझते थे। वह जानते थे कि भारत एक प्राचीन सभ्यता है और इसे एक आधुनिक नेशन में तब्दील करना है। अब दुनिया में मुगल, आटोमन साम्राज्य नहीं बचे हैं अब आधुनिक राज्य बचे हैं। तो साम्राज्यवाद के बाद दुनिया आधुनिक राज्य की दुनिया होगी। नेशन स्टेट की दुनिया होगी। प्राचीन सभ्यता को हमे एक नेशन स्टेट में तब्दील करना है। नेहरू इस प्रयास में आजीवन लगे रहे।

 आलोचनाओं के बावजूद मुझे नहीं कहा देशद्रोही 

मैं कांग्रेसी नहीं हूं और कांग्रेस के कार्यक्रमों में जाता हूं। कांग्रेस के मंचों से सार्वजनिक या व्यक्तिगत रूप से बड़े नेताओं से बातचीत में और लोगों से कड़वी बातें करता रहा हूं। इस तरह की आलोचनाओं के बावजूद कांग्रेसियों ने मुझे कभी एंटीनेशनल नहीं कहा और मुझ पर देशद्रोह का आरोप कभी नहीं लगाया।

 खुद को पैदाइशी विश्वगुरू बताने वाले वस्तुत: मूर्ख 

जो लोग पैदाइशी विश्वगुरू होने का दावा करते हैं वो वस्तुत: मूर्ख होते हैं। आज इनके पास अपना कोई प्रतीक या नेता नहीं है। इसलिए इनके प्रचार तंत्र को देखने पर लगता है कि लाल बहादुर ने अपनी राजनीति जनसंघ से शुरू की थी और सरदार पटेल ने संघ पर प्रतिबंध नहीं लगाया बल्कि संघ के स्वयंसेवक थे। इनके फर्जी दावों से तो ऐसा लगता है कि खुद महात्मा गांधी या सरदार पटेल अपने आप को नहीं जानते होंगे, जितना ये लोग जानते हैं। इस समय मूर्खता को लाइसेंस मिला हुआ है। 

आपके कॉमन सेंस को ध्वस्त कर रही व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी 

तमाम राजनीतिक डिबेट के बीच अपने कामन सेंस (सहजबोध) को जागृत रखिए। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी जो सबसे खतरनाक काम करती है, वह यह है कि वह आपके कामन सेंस को ध्वस्त करती है टेलीविजन भी ही करता है। सब चीजे आपको मूर्ख बनाने का हिस्सा है। सहजबोध का मतलब आपका ज्ञान व अनुभव है। आज तमाम फर्जी दावे व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के माध्यम में समाज में फैलाए जा रहे हैं। आपमें से कितनों ने ऐसी मूर्खता का प्रतिवाद किया है?