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Tuesday, February 24, 2026

 "भिलाई जिंदाबाद" का विमोचन किया फिल्मकार अनुराग बसु ने



 इस्पात नगरी भिलाई के लेखक व पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन की नई किताब "भिलाई जिंदाबाद, कुछ किस्से-कहानियां" का विमोचन फिल्मकार अनुराग बसु ने रविवार 25 जनवरी 2026 को किया किया। राजधानी नवा रायपुर स्थित पुरखौती मुक्तांगन में आयोजित साहित्य उत्सव के समापन समारोह में अनुराग ने यह विमोचन किया। उन्होंने इस्पात नगरी भिलाई पर आधारित रोचक सामग्री को सराहा और लेखक को अपनी शुभकामनाएं दी।
उल्लेखनीय है कि वैभव प्रकाशन नई दिल्ली-रायपुर से प्रकाशित इस किताब में इस्पात नगरी भिलाई के स्थापना काल सेे अब तक के प्रमुख व रोचक घटनाक्रम को लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने कलमबद्ध किया है। इसके पूर्व  लेखक की "भिलाई एक मिसाल" और "वोल्गा से शिवनाथ तक" किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, जो इस्पात नगरी भिलाई के इतिहास पर केंद्रित है।

"भिलाई जिंदाबाद.." में क्या खास है..? 


इस्पात नगरी भिलाई के निर्माण काल से अब तक कुछ रोचक और हैरतअंगेज घटनाक्रमों को लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने अपनी इस किताब में दर्ज किया है। विगत तीन दशकों के लगातार शोध के बाद लेखक ने अपनी इस किताब में भिलाई से जुड़े महत्वपूर्ण घटनाक्रम को दर्ज किया है। यह सब किस्से और कहानियों की शैली है। 

इनमें फिल्मी दुनिया, राजनीति से लेकर विभिन्न क्षेत्रों के अतिविशिष्ट लोगों के इस्पात नगरी आगमन से लेकर ऐसे बहुत से तनाव भरे दिन और हादसों का भी विस्तार से उल्लेख है जिन्होंने भिलाई को कई बार झकझोर दिया। इसके साथ ही विदेश में भिलाई का परचम फहराने वाली कुछ हस्तियों का भी जिक्र है।


इस्पात नगरी का रोचक इतिहास प्रमाणित तथ्यों 

के साथ रखती है किताब भिलाई जिंदाबाद: उमाकांत

हमारी अगली पीढ़ी जानना चाहेगी तो बेहतर माध्यम 

साबित होगी किताब भिलाई जिंदाबाद : मेश्राम

सेक्टर-4 में हुआ समीक्षा गोष्ठी का आयोजन, बदलते 

भिलाई की चुनौतियों पर भी हुई चर्चा

गोष्ठी में उपस्थित विशिष्ट समुदाय

मूलनिवासी कला साहित्य और फिल्म फेस्टिवल भिलाई, डॉ अंबेडकर एग्जीक्यूटिव फ्रेटरनिटी भिलाई. डॉ अंबेडकर वेलफेयर सोसायटी छत्तीसगढ़ और एनस्टेप के संयुक्त तत्वावधान में समीक्षा गोष्ठी का आयोजन रविवार 8 फरवरी 2026 की शाम सेल एससी एसटी ओबीसी फेडरेशन भवन, सड़क नंबर 8, सेक्टर 4 में किया गया। जिसमें लेखक एवं पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन की  हालिया प्रकाशित किताब "भिलाई जिंदाबाद, कुछ किस्से-कुछ कहानियां" पर प्रमुख वक्ताओं ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने भिलाई को जानने समझने के लिए इसे एक जरूरी किताब बताया।
अतिथियों के स्वागत के उपरांत आधार वक्तव्य रखते हुए प्रसिद्ध कहानीकार मिर्जा हफीज बेग ने कहा कि कई मायनों में उन्हें यह किताब अपनी आपबीती भी लगती है क्योंकि भिलाई में जन्म लेने और भिलाई स्टील प्लांट का सेवानिवृत्त कर्मी होने के नाते इनमें से बहुत से घटनाक्रम से वह खुद भी रूबरू हुए है। उन्होंने कहा कि यह किताब लेखक की पिछली कृति "वोल्गा से शिवनाथ तक" के आगे का सिलसिला है और उसमें रह गई कमियों को पूरा करती है।

आधार वक्तव्य रखते हुए कहानीकार मिर्जा हफीज बेग 

वरिष्ठ रंगकर्मी राकेश बम्बार्डे ने कहा कि जिन्हें अपने शहर भिलाई से प्यार है और जो भिलाई को जानना-समझना चाहता है,वह सभी इस किताब को जरूर पढ़ेंगे। शायर मुमताज ने भिलाई की संस्कृति को किताब के माध्यम से सामने लाने के लिए लेखक की सराहना की और चंद अशआर सुनाए। ऑल पीएसयू एससी-एसटी एम्पलाइज फेडरेशन के चेयरमैन सुनील हरिशचंद्र रामटेके ने कहा कि लेखक ने पिछली किताब "वोल्गा से शिवनाथ तक" में भिलाई के योगदान पर भारतीय और रूसी लोगों के योगदान पर बेहद रोचक ढंग से तथ्यों को रखा था। वही शैली इस किताब में बरकरार है और जिस तरह लेखक ने भिलाई के शुरूआती दौर से अब तक की  तमाम हस्तियों से मिलकर उनका साक्षात्कार लेकर सबके सामने प्रस्तुत किया है, यह सबके बस की बात नहीं। 

उन्होंने दोहराया कि आज जिस तरह भिलाई के सामने नए दौर की चुनौतियां है, उनका सामना करने हमको अपने इतिहास के बारे जानना बेहद जरूरी है। भिलाई स्टील प्लांट के ऊर्जा प्रबंधन विभाग में जनरल मैनेजर कमल टंडन ने कहा कि भिलाई सही मायनों में लघु भारत है और इसका रोचक इतिहास जानने यह किताब सहायक होगी। कवि लक्ष्मीनारायण कुम्भकार ने कहा कि इतिहास को रोचक ढंग से प्रस्तुत करना भी एक चुनौती है और इसे लेखक ने बखूबी पूरा किया है। आकाशवाणी रायपुर के कार्यक्रम प्रमुख पंकज मेश्राम ने कहा कि एक पत्रकार का न केवल स्वतंत्र होना जरूरी है बल्कि उसका निर्भिक  होना और निष्पक्ष होना उतना ही जरूरी है। वो सारे गुण लेखक में मौजूद है। भिलाई पर अगर प्रमाणिक जानकारी चाहिए तो आपको लेखक की इस किताब से जरूर रूबरू होना चाहिए।

संचालनकर्ता रिटायर अपर कलेक्टर विश्वास मेश्राम ने भी रखी अपनी बात 

संचालन कर रहे सेवानिवृत्त अपर कलेक्टर विश्वास मेश्राम ने कहा कि जिस भिलाई को हमने देखा और जीया है, आज वह बदल रहा है।  आज के भिलाई की जो तस्वीर हम देखते हैं, उसे देखकर बहुत खुशी नहीं होती बल्कि एक दर्द सा उठता है। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में जब  हमारी अगली पीढ़ी हमारे भिलाई को ढूंढना चाहेगी तो इस किताब में ही पाएगी।
बीएसपी पावर इंजीनियरिंग एंड मेंटेनेंस विभाग में जनरल मैनेजर पीएस खोब्रागड़े ने कहा कि आज सोशल मीडिया और एआई का दौर है और इंटरनेट पर हम तलाशेंगे तो   इतनी प्रमाणित जानकारी नहीं मिल सकती जितनी लेखक ने अपनी किताब "भिलाई जिंदाबाद" में तथ्यों को जुटा कर दी है। 

भिलाई स्टील प्लांट टेलीकम्युनिकेशन विभाग के पूर्व प्रमुख और रिटायर जनरल मैनेजर एल. उमाकांत ने कहा कि लेखक ने जिन घटनाक्रमों को इस किताब में उल्लेखित किया है, उनमें से ज्यादातर के वे गवाह रहे हैं। उन्होंने बताया कि 6 जनवरी 1986 को जिस वक्त हादसा हुआ तो तब भिलाई होटल में दूरसंचार विभाग का एक कार्यक्रम चल रहा था और एमडी के आर संगमेश्वरन भी हमारे साथ उस कार्यक्रम में ही थे। हम सबने उस धमाके की आवाज सुनी थी। उन्होंने कहा कि भिलाई को जानने-समझने इस किताब से बेहतर माध्यम और कोई नहीं है। 

संगोष्ठी में अपनी बात रखते हुए लेखक-पत्रकार मुहम्मद जाकिर हुसैन 

अंत में लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने इस किताब की सृजन यात्रा के बारे में विस्तार से जानकारी दी और कहा कि पाठकों का प्रोत्साहन ही उन्हे आगे भी भिलाई के रोचक इतिहास से रूबरू कराने की प्रेरणा देगा। 

इस अवसर पर  भिलाई नगर मस्जिद ट्रस्ट के सदर मिर्जा आसिम बेग,रंगकर्मी एल. रुद्र मूर्ति, मोहन कुमार नामदेव, मुक्तानंद साहू, बिनितोष बाला, गंगा भाऊ जांभुलकर, विजया जांभुलकर, संगीता मेश्राम, उषा मेश्राम, फैजान खान, शारिक खान, चित्रसेन कोसरे, जयश्री मोहन नागदेवे, राजेंद्र सुनगरिया और गजेंद्र सायतोड़े सहित अनेक लोग मौजूद थे। अंत में धन्यवाद ज्ञापन बीएसपी कर्मचारी और रंगकर्मी वासुदेव ने दिया।

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भिलाई की अस्मिता और गौरव का शंखनाद है 'भिलाई ज़िंदाबाद'

समीक्षा- डॉ. सुधीर शर्मा 



भारत के औद्योगिक इतिहास में कुछ शहर केवल नक्शे पर दर्ज नाम नहीं होते, वे अपने भीतर एक युग की स्मृतियाँ, संघर्ष और सपने सँजोए रहते हैं। छत्तीसगढ़ की धरती पर बसा भिलाई ऐसा ही शहर है, जिसकी पहचान केवल एक औद्योगिक नगर के रूप में नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के निर्माण की जीवंत प्रयोगशाला के रूप में रही है। यहाँ की मिट्टी में श्रम की गंध है, यहाँ की सड़कों पर इतिहास के पदचिह्न हैं और यहाँ की हवा में उस दौर की प्रतिध्वनि सुनाई देती है जब राष्ट्र निर्माण एक सामूहिक संकल्प हुआ करता था।
स्वतंत्रता के बाद भारत ने जिस समाजवादी और मिश्रित अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाया, उसमें भारी उद्योगों को राष्ट्र की रीढ़ माना गया। इसी सोच के केंद्र में रहा भिलाई इस्पात संयंत्र, जिसकी स्थापना केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की आकांक्षा का प्रतीक थी। 

1950 के दशक में जब देश योजनाबद्ध विकास की राह पर अग्रसर हुआ, तब भिलाई का नाम राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में उभरने लगा। यह वह समय था जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भारी उद्योगों को आधुनिक भारत के ‘नए मंदिर’ कहा करते थे। भिलाई उन्हीं मंदिरों में से एक बना, जहाँ मशीनों की गड़गड़ाहट के साथ भविष्य की रूपरेखा गढ़ी जा रही थी।
भिलाई की स्थापना की कहानी केवल सरकारी फाइलों या योजनाओं में सीमित नहीं है। यह उन गाँवों की कहानी भी है जिनकी जमीन अधिग्रहित हुई, उन परिवारों की कहानी है जिन्होंने अपनी पुरानी दुनिया छोड़कर नई बस्तियों में जीवन बसाया। कोटराभाठा, सोंठभाठा, बोरिया, हिंगना और मरौदा जैसे गाँवों की स्मृतियाँ आज भी बुज़ुर्गों की बातचीत में जीवित हैं। खेतों की हरियाली के स्थान पर जब सेक्टरों की व्यवस्थित रेखाएँ खिंचीं, तब एक ग्रामीण भूगोल शहरी परिदृश्य में बदल गया। 

यह परिवर्तन सहज नहीं था, परंतु समय की धारा में वह अपरिहार्य बन गया। भिलाई का एक विशेष पक्ष उसकी बहुसांस्कृतिक संरचना है। देश के कोने-कोने से आए इंजीनियर, तकनीशियन और श्रमिक यहाँ एक साथ बसे। बंगाल, पंजाब, बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और दक्षिण भारत से आए लोगों ने अपनी-अपनी भाषाएँ, खान-पान और त्योहार साथ लाए। 

इस विविधता ने भिलाई को केवल औद्योगिक नगर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संगम बना दिया। दुर्गा पूजा से लेकर गणेशोत्सव और छत्तीसगढ़ी लोकपर्वों तक, यहाँ उत्सवों की एक साझा परंपरा विकसित हुई। इस मेलजोल ने एक ऐसी नागरिक संस्कृति को जन्म दिया, जिसमें स्थानीय और राष्ट्रीय दोनों रंग समाहित हैं।
समय के साथ भिलाई ने केवल विकास ही नहीं, संकट भी देखे। औद्योगिक दुर्घटनाएँ, श्रमिक आंदोलन, बिजली और कोयले के संकट, आर्थिक उदारीकरण के बाद की चुनौतियाँ—इन सबने इस नगर को झकझोरा। 1990 के दशक में जब देश ने उदारीकरण की नीति अपनाई, तब सार्वजनिक उपक्रमों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगने लगे। निजीकरण और आउटसोर्सिंग की प्रक्रियाओं ने पुराने ढाँचे को चुनौती दी। भिलाई भी इससे अछूता नहीं रहा। उत्पादन के नए मानदंड, तकनीकी आधुनिकीकरण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा ने इस इस्पात नगरी को आत्ममंथन के लिए विवश किया।
फिर भी, यह उल्लेखनीय है कि भिलाई ने हर संकट के बाद स्वयं को पुनर्गठित किया। यहाँ की श्रमिक चेतना और प्रबंधन की सामूहिक समझ ने कई बार संभावित ठहराव को नई गति में बदला। इस्पात की तरह ही इस शहर की आत्मा भी तपकर मजबूत हुई। भिलाई की पहचान केवल उत्पादन के आँकड़ों से नहीं, बल्कि उस मानवीय रिश्ते से है जो यहाँ के लोगों को जोड़ता है। सेक्टरों की योजनाबद्ध बस्तियाँ, स्कूल, अस्पताल, पार्क और सांस्कृतिक भवन—ये सब उस कल्याणकारी सोच के प्रतीक हैं, जिसने इस नगर को आकार दिया।
आज जब डिजिटल युग में सूचना और संचार के साधन बदल रहे हैं, तब भी भिलाई का इतिहास हमें यह सिखाता है कि विकास केवल तकनीकी उन्नति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों की निरंतरता भी है। यहाँ की पीढ़ियाँ बदल रही हैं; पुराने श्रमिकों की जगह नई तकनीकी दक्षता वाले युवा ले रहे हैं। फिर भी, शहर की स्मृतियों में वह दौर जीवित है जब इस्पात संयंत्र के सायरन के साथ दिन की शुरुआत होती थी और शाम को श्रमिक कॉलोनियों में जीवन की चहल-पहल गूँजती थी।
भिलाई की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि औद्योगिक नगर केवल आर्थिक इकाइयाँ नहीं होते, वे सामाजिक और सांस्कृतिक प्रयोगशालाएँ भी होते हैं। यहाँ श्रम और सपनों का संगम हुआ, यहाँ संघर्ष और सहयोग का संतुलन बना। यह शहर आज भी अपने अतीत के गौरव और वर्तमान की चुनौतियों के बीच संतुलन साधते हुए आगे बढ़ रहा है।
समय के बदलते परिदृश्य में जब सार्वजनिक उपक्रमों की भूमिका पर बहस जारी है, तब भिलाई एक जीवंत उदाहरण की तरह सामने खड़ा है। यह शहर हमें बताता है कि यदि दूरदृष्टि, सामाजिक प्रतिबद्धता और तकनीकी नवाचार साथ हों, तो कोई भी औद्योगिक परियोजना केवल कारखाना नहीं रहती, वह समाज का धड़कता हुआ हृदय बन जाती है।
भिलाई की गाथा दरअसल उस भारत की गाथा है जिसने कठिनाइयों के बीच अपने लिए रास्ता बनाया। यह उस विश्वास की कहानी है कि विकास केवल मशीनों से नहीं, मनुष्यों से होता है। इस फौलादी नगर की आत्मा में आज भी वही उम्मीद धड़कती है—कि समय चाहे जैसा भी हो, श्रम, साहस और सामूहिकता की शक्ति से भविष्य गढ़ा जा सकता है।
प्रस्तुत पुस्तक ''भिलाई ज़िंदाबाद, कुछ किस्से-कुछ कहानियां'' के लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने भिलाई को जीया है, बचपन से लेकर अपनी जवानी की सांसें भिलाई को दी हैं। वे एक रचनात्मक और सकारात्मक पत्रकारिता तथा लेखन के सच्चे श्रमिक हैं। 

अपने अनुभव और भिलाई को ढालने वाले अनेक विभूतियों से सुनकर तथा समझकर उन्होंने यह पुस्तक लिखी है। बीते बीस-तीस बरस के देखे-सुने किस्सों का यह संग्रह है। 'भिलाई ज़िंदाबाद' सही मायनों में भिलाई की अस्मिता और गौरव का शंखनाद है। लेखक को इसके लिए साधुवाद है। ये किस्से आनेवाली पीढ़ी के लिए इतिहास से लेकर वर्तमान की गाथा है। भविष्य के सपनों को पूरा करने का मंत्र है। बधाई जाकिर और धन्यवाद उन किस्सागोई व्यक्तित्वों का जो इसके गवाह हैं।

 (डॉ सुधीर शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई छत्तीसगढ़) 

Sunday, June 2, 2019


भिलाई का इतिहास  ''टाइम कैप्सूल'' में

 डाल कर अमर कर दिया ज़ाकिर भाई ने 


मेरी किताब  ''वोल्गा से शिवनाथ तक'' पर प्रतिक्रिया


विश्वास मेश्राम-राज्य प्रशासनिक सेवा अफसर 


मेश्राम जी को ''वोल्गा '' का समर्पण 
भिलाई से जिनकी जड़ें गहराई से जुड़ी है उन्हें  ''वोल्गा से शिवनाथ तक'' पढ़ते हुए वो सारा इतिहास भूगोल आंखों के सामने झांकता हुआ दिखाई देगा। पत्रकार के रूप में सालों से कार्यरत मोहम्मद जाकिर हुसैन साहब की कलम की यही खूबी है। उन्होंने औद्योगिक शहर भिलाई के कदम ब कदम निर्माण और विकास के इतिहास को हमेशा के लिए टाइम कैप्सूल में डाल कर अमर कर दिया है।
अपने स्कूल के दिनों में मैंने राहुल सांस्कृत्यायन की पुस्तक ''वोल्गा से गंगा'' पढ़ी थी जो कि आर्यों के मध्य एशिया से आगमन और भारत के मूलनिवासियों से उनके संघर्ष, प्रतिरोध , बौद्ध सभ्यता के प्रगतिशील आयाम और फिर क्रांति प्रतिक्रांति को  इतिहास की गाथा के रूप में लिखी गई है और भारतीय इतिहास को समझने के लिए आज भी प्रासंगिक है। उसके आगे की कड़ी के रूप में मुझे ''वोल्गा से शिवनाथ तक'' दिखाई देती है जो यह कहती है कि राहुल के समय उस पुरातन काल के बारे में बताने वाले लोग मरखप कर मिट्टी में मिल चुके थे मगर भिलाई का इतिहास बताने वाले लोग जिंदा है जिनसे जाकिर ने समय ले लेकर उनकी जबानी उन दिनों को याद किया और उन संस्मरणों को लिपिबद्ध कर इतिहास को वर्तमान में साकार कर दिया। 
पूरी किताब तीन खंडो में विभाजित है । पहले खंड बुनियाद'में 71 संस्मरण हैं। 6 जून 1955 को पायोनियर टीम के पहुंचने से लेकर  20 फरवरी 2018 को भिलाई से मास्को के लिए रवाना हुई इंडिया रशिया फ्रेंडशिप मोटर रैली तक की यादें जाकिर भाई की कलम से सहेजी गयी हैं। यह यादों का जबरदस्त पिटारा है जो घन्टों आपको बांधकर रखने की क्षमता रखता है। 
दूसरे खण्ड में दस्तावेज शीर्षक से 72 से 78 तक के लेख हैं जिनमें जवाहर लाल नेहरू की भिलाई यात्रा की रिपोर्टिंग हैं और  आर्काइव से ली गईं है। इस खंड में भिलाई में रशियन कामगारों की संख्या की सांख्यकी-भिलाई को बनाने में रशियन सहयोग को सीधे रेखांकित करती है।
तीसरे खंड का शीर्षक जाकिर ने दिल की बातें दी है मगर मुझे वह दिलों की बात ज्यादा लगी। रशियन इंडियन दिलों का मिलना और भिलाई में घर बसा लेने के शानदार संस्मरण 79 से 99 तक लिपिबद्ध किये गये हैं और हर एक दिल का दर्द इनमें उमड़ा पड़ा है। 

बकौल फैज़.अहमद फैज़ 
उठकर तो आ गये हैं तेरी बज़्म से मगर
कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आये हैं ।

मेरी सिफारिश है कि भिलाई से जुड़े साथी और वो भी जो इस आधुनिक शहर को जानना समझना चाहते हैंए इन संस्मरणों को जरूर पढ़ें। सर्वप्रिय प्रकाशन कश्मीरी गेट,नई दिल्ली से प्रकाशित किताब का मूल्य ₹ 500 रुपए . है । आप इसे जाकिर भाई  मोबाइल नंबर 9425558442 से भी सीधे प्राप्त कर सकते हैं।

Saturday, September 1, 2012

सीईओ के हाथो 'भिलाई एक मिसाल' का विमोचन

भिलाई के इतिहास को संजोने की बीएसपी जनसंपर्क विभाग की पहल

भिलाई इस्पात संयंत्र के मुख्य कार्यपालक अधिकारी के इस्पात भवन सभागार में बीएसपी के जनसंपर्क विभाग द्वारा प्रकाशित, लेखक व पत्रकार मोहम्मद जाकिर हुसैन द्वारा लिखित पुस्तक 'भिलाई एक मिसाल फौलादी नेतृत्वकर्ताओं की' का विमोचन 30 अगस्त को तत्कालीन सीईओ पंकज गौतम ने किया। इस अवसर पर ईडी पीएंडए एम अखौरी, ईडी वक्र्स वाई के डेगन, डायरेक्टर इंचार्ज (चिकित्सा एवं स्वास्थ्य सेवायें) डॉ सुबोध हिरेन, महाप्रबंधक (कार्मिक) आर के शर्मा, महाप्रबधक (सामग्री प्रबंधन) डी ए लोथे तथा जनसंपर्क विभाग के प्रमुख  विजय मैराल, वरिष्ठ साहित्यकार व विचारक रमेश नैयर और इस पुस्तक के लेखक मोहम्मद जाकिर हुसैन विशेष रूप से उपस्थित थे।
इस मौके पर मुख्य कार्यपालक अधिकारी पंकज गौतम ने कहा कि इतिहास संकलन व लेखन होना चाहिए, यह नई पीढ़ी को प्रेरणा प्रदान करती है। लेखक श्री जाकिर ने बड़े ही परिश्रम लगन के साथ इस पुस्तक को आकार दिया है। उनका यह प्रयास निश्चित ही सराहनीय है। जनसपर्क विभाग ने भिलाई के स्वर्णिम इतिहास को संजोने का यह अनुपम प्रयास किया। लेखक श्री जाकिर तथा जनसंपर्क विभाग बधाई के पात्र हैं।
विशेष अतिथि, वरिष्ठ साहित्यकार, विचारक व प्रतिष्ठित पत्रकार एवं संपादक  रमेश नैयर ने लेखक मोहम्मद जाकिर हुसैन तथा भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रयासों की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा कि जिस कुशलता से भिलाई स्टील प्लांट अनगढ़ मटमैले लौह अयस्क को पूरे जतन से फौलाद में तब्दील करता है। इसी तन्मयता से कुशल कारीगर, मेधावी प्रोफेशनल, कलाकार, लेखक-विचारक और विभिन्न विधाओं की प्रतिभाओं को भी तराशता है। भिलाई उद्योग गगन की आकाशगंगा है। भिलाई आज देश के सामने एक मिसाल बन गया है। इतिहास को संजोना एक दुष्कर कार्य है और इस चुनौतिपूर्ण कार्य को लेखक मोहम्मद जाकिर हुसैन ने बखूबी अंजाम दिया है। मैं जाकिर हुसैन व भिलाई इस्पात संयंत्र के उनके इस सद्प्रयास के लिए दिल से बधाई देता हूँ।
जनसंपर्क के मुखिया विजय मैराल ने इस प्रकाशन के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जनसपर्क विभाग समय-समय पर उपयोगी पुस्तकें प्रकाशित करता रहा है। इस कड़ी में यह पुस्तक भिलाई उन पूर्ण नेतृत्वकर्ताओं को समर्पित है जिन्होंने भिलाई को नई ऊँचाई दी या फिर भिलाई की इस जमीं से उठकर एक मुकाम हासिल किया। बीएसपी के प्रथम जनरज मैनेजर से लेकर प्रथम सीईओ तक के विभिन्न नेतृत्वकर्ताओं के साक्षात्कार लेना तथा उसे लिपिबद्ध करना अपने आप में दुष्कर कार्य था जिसे लेखक जाकिर ने बखूबी निभाया।यह प्रकाशन भिलाई के उन्हीं नेतृत्वकर्ताओं का सादर स्मरण है। जिनके हम सदैव ऋणी रहेंगे एवं वे हमारे भविष्य की उपलब्धियों के भी प्रेरणास्त्रोत बने रहेंगे।
पुस्तक के लेखक मोहम्मद जाकिर हुसैन ने अपने लेखकीय अनुभव को शेयर करते हुए कहा कि यह पुस्तक तीन से चार वर्ष के कठोर परिश्रम के बाद पूर्ण हो सकी। यह मेरे लिए एक सपने के सच होने जैसा है। इस पुस्तक में मुझे बीएसपी के प्रथम जीएम से लेकर प्रथम सीईओ तक अनेक नेतृत्वकर्ताओं से साक्षात्कार लेने के साथ-साथ भिलाई की सरजमीं से अपना करियर प्रारंभ कर सेल व अन्य कंपनियों के मुखिया के रूप में नई ऊँचाई देने वाले अनेक व्यक्तियों से रूबरू होकर उनके मनोभाव को संकलित करने का अवसर मिला। मैं भिलाई इस्पात संयंत्र के उच्च प्रबंधन तथा जनसंपर्क विभाग से मिले सहयोग व समर्थन के प्रति सदैव आभारी रहूँगा। कार्यक्रम का संचालन व आभार प्रदर्शन जनसंपर्क विभाग के जूनियर मैनेजर सत्यवान नायक ने किया। इस अवसर पर सीईओ सचिवालय, जनसपर्क विभाग व अन्य विभागों के अधिकारीगण तथा लेखक के परिजन आदि विषेष रूप से उपस्थित थे।