‘वोल्गा से शिवनाथ तक’ छूती है भिलाई की अंतरात्मा को
भिलाई की संस्कृति व परंपरा और इसके इतिहास पर चर्चा की भारतीय-रूसी प्रतिनिधियों ने

आल इंडिया एससी
एसटी एम्प्लाइज फेडरेशन कार्यालय 7 डी, सड़क 8, सेक्टर 4, भिलाई में हुए इस
आयोजन में आधार वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार विनोद साव ने कहा कि
लेखक मुहम्मद जाकिर हुसैन ने भिलाई के अतीत से वर्तमान तक का खाका सरल
शब्दों में खींचा है। वहीं दुर्लभ फोटोग्राफ्स की वजह से यह किताब और
ज्यादा रोचक बन पड़ी है। उन्होंने कहा कि भिलाई की अंतरात्मा को छूती यह
किताब पाठकों को अतीत से वर्तमान तक के रोमांचक सफर पर ले जाती है। सेल
एससी-एसटी एम्पलाइज वेलफेयर एसोसिएशन के चेयरमैन सुनील रामटेके ने कहा कि
लेखक ने भिलाई की शुरूआत से लेकर अब तक का तथ्यात्मक ब्यौरा जुटाने में
काबिले तारीफ मेहनत की है। पूरी किताब में लेखक का समर्पण और भिलाई के
प्रति एक भावनात्मक लगाव झलकता है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस किताब को ना सिर्फ भिलाई बल्कि सेल की तमाम इकाइयों में भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए। मूल निवासी कला,साहित्य एवं फिल्म फेस्टिवल भिलाई के अध्यक्ष व भिलाई स्टील प्लांट के रिटायर जनरल मैनेजर एल. उमाकांत ने बताया कि आंध्र में कक्षा चौथी की स्कूली किताब में उन्होंने भिलाई के बारे में पढ़ा था और संयोग से सेवा का अवसर भी यहीं मिला। देश-विदेश के दौरे का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पूरे सेवाकाल में हम जहां भी गए भले ही मूल कंपनी सेल रही लेकिन हमारी पहचान हमेशा भिलाई से ही रही है। उन्होंने भिलाई के निर्माण में रूसी इंजीनियरों के योगदान का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि वह सारा समर्पण इस किताब में रोचक ढंग से नजर आता है। रूसी प्रतिनिधि के तौर पर पहुंचे सेल रिफ्रैक्ट्रीज यूनिट (एसआरयू) के वरिष्ठ अफसर विवेक चतुर्वेदी और उनकी रूसी मूल की पत्नी इना चतुर्वेदी ने भी इस मौके पर अपने विचार व्यक्त किए। विवेक ने भिलाई के रूसी परिवेश से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें बताईं। वहीं इना ने बताया कि 34 साल पहले जब वह शादी के बाद भिलाई आई तो यहां कभी भी विदेशी होने का एहसास नहीं हुआ और अब तो वह भिलाई और यहां की संस्कृति में पूरी तरह रच-बस गई हैं।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस किताब को ना सिर्फ भिलाई बल्कि सेल की तमाम इकाइयों में भी उपलब्ध कराया जाना चाहिए। मूल निवासी कला,साहित्य एवं फिल्म फेस्टिवल भिलाई के अध्यक्ष व भिलाई स्टील प्लांट के रिटायर जनरल मैनेजर एल. उमाकांत ने बताया कि आंध्र में कक्षा चौथी की स्कूली किताब में उन्होंने भिलाई के बारे में पढ़ा था और संयोग से सेवा का अवसर भी यहीं मिला। देश-विदेश के दौरे का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पूरे सेवाकाल में हम जहां भी गए भले ही मूल कंपनी सेल रही लेकिन हमारी पहचान हमेशा भिलाई से ही रही है। उन्होंने भिलाई के निर्माण में रूसी इंजीनियरों के योगदान का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि वह सारा समर्पण इस किताब में रोचक ढंग से नजर आता है। रूसी प्रतिनिधि के तौर पर पहुंचे सेल रिफ्रैक्ट्रीज यूनिट (एसआरयू) के वरिष्ठ अफसर विवेक चतुर्वेदी और उनकी रूसी मूल की पत्नी इना चतुर्वेदी ने भी इस मौके पर अपने विचार व्यक्त किए। विवेक ने भिलाई के रूसी परिवेश से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें बताईं। वहीं इना ने बताया कि 34 साल पहले जब वह शादी के बाद भिलाई आई तो यहां कभी भी विदेशी होने का एहसास नहीं हुआ और अब तो वह भिलाई और यहां की संस्कृति में पूरी तरह रच-बस गई हैं।
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